मेरी सलाह पर आंध्र प्रदेश में पसमांदा मुसलमानों को मिला 4 प्रतिशत आरक्षण : पी.एस. कृष्णन

सेवानिवृत्ति के बाद भी सामाजिक न्याय के योद्धा पूर्व नौकरशाह पी. एस. कृष्णन सतत सक्रिय हैं। उन्होंने कई राज्य सरकारों के लिए सलाहकार की भूमिका का निर्वहन किया और वह भी बिना कोई पारिश्रमिक के

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। प्रस्तुत लेख ‘दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए बने महत्वपूर्ण कानूनों व योजनाओं में पी.एस. कृष्णन की भूमिका’ शीर्षक लेख की दूसरी कड़ी है। इसमें पी.एस. कृष्णन वासंती देवी द्वारा पूछ गए सवालों का जवाब दे रहे हैं। पाठकाें की सुविधा के लिए हम इन्हें अलग-अलग किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। आज पढ़ें सेवानिवृत्ति के बाद भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े गर्व के हितों को लेकर जारी उनके संघर्ष के बारे में – संपादक)

सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी है पी. एस. कृष्णन की यात्रा

  • वासंती देवी

वासंती देवी : क्या सामाजिक न्याय और कमजोरों के सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों के प्रति नौकरशाहों को संवेदनशील बनाने के लिए आप किन्हीं विशिष्ट उपायों को लागू करने का सुझाव देंगे? यह इसलिए, क्योंकि आपकी यह मान्यता है कि केवल ऐसा करके ही हमारे देश में सच्चे प्रजातंत्र का आगाज हो सकता है?

पी.एस. कृष्णन (गतांक से आगे) : पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीबीसी) में मेरा दूसरा और अंतिम कार्यकाल 28 फरवरी 2000 को समाप्त हो गया। इसके बाद से मुझे  ऐसे किसी पद पर कार्य करने का अवसर नहीं मिला है जिससे मैं एससी-एसटी और एसईडीबीसी की बेहतरी की दिशा में कोई कार्य कर सकूं। परंतु मैं चुप नहीं बैठा। मैंने अपनी व्यक्तिगत हैसियत में और इन वर्गों के लिए काम करने वाली कई स्वयंसेवी संस्थाओं, जिनसे मैं जुड़ा हुआ था, के जरिए इस दिशा में कई पहल की। इनमें से एक महत्वपूर्ण पहल थी दलित घोषणापत्र तैयार किया जाना। नेशनल एक्शन फोरम फाॅर सोशल जस्टिस (एनएएफएसजे) के तत्वाधान में तैयार किए गए इस घोषणापत्र में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों व पिछड़े वर्गों के अधिकारों और पात्रताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसे मेरे द्वारा 7 मार्च 1996 को दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं और दलित, आदिवासियों व एसईडीबीसी के लिए काम कर रहे व्यक्तियों व संस्थाओं के परामर्श कर तैयार किया गया था। उन सभी ने मेरे द्वारा सुझाए बिंदुओं से सहमति जाहिर की। मैंने इस फोरम के प्रतिनिधिमंडल के साथ कई नेताओं से मुलाकात की, जिनमें उस समय कांग्रेस (तिवारी) केे श्री अर्जुन सिंह, सीपीआई के कामरेड इन्द्रजीत गुप्त, सीपीएम के कामरेड सीताराम येचुरी और कांग्रेस के श्री जयपाल रेड्डी शामिल थे।

कामरेड इन्द्रजीत गुप्त ने हमें अपनी पार्टी के कामरेड डी. राजा से मिलने के लिए कहा। श्री अर्जुन सिंह ने हमारे तर्कों पर काफी अनुकूल प्रतिक्रिया दी और उनकी पार्टी के घोषणापत्र में ‘श्री पी. एस. कृष्णन द्वारा तैयार किए गए दलित घोषणापत्र‘ को लागू करने का वायदा किया गया। उस साल हुए चुनावों में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से संयुक्त मोर्चा सरकार सत्ता में आई। संयुक्त मोर्चा कई पार्टियों का गठबंधन था, जिनमें सीपीआई, कांग्रेस (तिवारी) व श्री जी.के. मूपनार के नेतृत्व वाली तमिल मनीला कांग्रेस शामिल थीं। थिरू चिदंबरम उस समय तमिल मनीला कांग्रेस के सदस्य थे। सीपीएम, जो सरकार में शामिल नहीं हुई परंतु जिसने सरकार को बाहर से समर्थन देने का निर्णय किया था, ने सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया। इस समिति के चार सदस्य थे जिनमें श्री जयपाल रेड्डी, कामरेड सीताराम येचुरी, कामरेड डी राजा व थिरू चिदंबरम शामिल थे। मैंने इनमें से पहले तीन से संपर्क किया और उन्हें दलित घोषणापत्र की याद दिलाई। उन तीनों ने इसे महत्वपूर्ण माना और परिणामस्वरूप, न्यूनतम साझा कार्यक्रम में यह वायदा किया गया कि ‘संयुक्त मोर्चा सरकार, नेशनल एक्शन फोरम फाॅर सोशल जस्टिस द्वारा तैयार किए गए दलित घोषणापत्र का ध्यानपूर्वक अध्ययन करेगी और उसकी प्रमुख सिफारिशों को लागू करेगी’।

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कामरेड डी. राजा ने मुझे बताया कि उन्होंने पहले यह सोचा कि दलित घोषणापत्र के प्रत्येक बिंदु का परीक्षण किया जाए। परंतु जब उन्होंने यह करना शुरू किया तो उन्होंने पाया कि इस घोषणापत्र का हर बिंदु महत्वपूर्ण और व्यवहार्य है और इसलिए उन्होंने पूरे दलित घोषणापत्र को संयुक्त मोर्चा सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम का हिस्सा बनाया। मुझे बाद में यह पता चला कि थिरू पी. चिदंबरम ने इसमें कोई अड़ंगा नहीं लगाया क्योंकि वे चाहते थे कि सरकार का गठन जल्द से जल्द हो जाए और वे उसमें वित्तमंत्री बन सकें।

सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत योद्धा पी. एस. कृष्णन

मैं अब भी सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए कार्य कर रहा हूं। मेरा मुख्य फोकस दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों, जिनमें अल्पसंख्यक समुदायों के पिछड़े वर्ग शामिल हैं, पर है। इस संदर्भ में मैं यह भी सुनिश्चित करता हूं कि अत्यंत पिछड़ी जातियों/जनजातियों व वर्गों जैसे महिलाएं और बच्चे, हाथ से मैला साफ करने वाले लोग और घुमंतू व अर्ध-घुमंतू समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जाए। मैं अपनी व्यक्तिगत हैसियत में और उन संस्थाओं के जरिए, जो इन वर्गों या इनमें से किसी एक वर्ग की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं, इस अभियान को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं। इस अवधि में भारत सरकार और आंध्र प्रदेश व तैलंगाना की सरकारों ने मुझे सलाहकार नियुक्त किया। मैंने सलाहकार के रूप में कार्य करना इस शर्त पर स्वीकार किया कि मुझे इसके लिए किसी पारिश्रमिक का भुगतान नहीं किया जाएगा। मैंने यही शर्त तब लगाई थी जब भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव और मंत्री ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं केन्द्रीय शैक्षणिक संस्थाओं (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 और उससे संबद्ध संविधान (93वां संशोधन) अधिनियम 2005 का बचाव करने में मंत्रालय की मदद करने हेतु सलाहकार के रूप में कार्य करूं। मेरी शर्त को मंत्रालय द्वारा स्वीकार किया गया और इससे संबंधित विवरण, प्रश्न क्रमांक 20 के मेरे उत्तर, जो नीचे उपलब्ध है, में दिया गया है।



आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सरकारों के सलाहकार के रूप में मैं भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे मुसलमानों के संबंध में तथ्यात्मक और सही चित्र प्रस्तुत कर सका। मैंने इस संबंध में भी तथ्य प्रस्तुत किए कि देश और आंध्र प्रदेश में मुस्लिम समुदाय में किस तरह के स्तरीकरण व पदक्रम हैं और उनमें एसईडीबीसी की पहचान कैसे की जा सकती है। मेरी रपट और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सांविधिक रपट के आधार पर आंध्र प्रदेश सरकार ने सन् 2007 में मुस्लिम समुदाय के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को चार प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

मैं दलितों, आदिवासियों और एसईडीबीसी से जुड़े मुद्दों पर व्यक्तिगत रूप से और कई ऐसे संगठनों के जरिए, जिनसे मैं जुड़ा हुआ हूं, केन्द्र और राज्य सरकारों को सलाह और सुझाव देता रहा हूं। इस क्षेत्र में कार्य करने का मेरा लगभग सात दशकों का अनुभव है और यह शायद किसी भी जीवित मनुष्य से कहीं अधिक है। इस दौर में मैंने जो मुद्दे उठाए उनका वर्णन में संक्षेप में आगे करूंगा।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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