इतिहास से सबक

ब्रिटेन में इतिहास लेखन की एक परंपरा बन चुकी थी। भारत में जब अंग्रेज आये तब मुगलों का आखिरी दौर चल रहा था। कुछ दूसरे सामंत-नवाब भी थे। उन सबकी विलासिता चरम पर थी। समाज में एक नैराश्य पसरा पड़ा था। हिंदी लेखक प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘शतरंज के खिलाडी’ में इस प्रवृति की बेहतर व्याख्या की है

जन-विकल्प

[प्राख्यात लेखक व विचारक प्रेमकुमार मणि के साप्ताहिक स्तंभ जन-विकल्प की यह कड़ी एक विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग है। इस श्रृंखला में वह भारत के इतिहास और इतिहासलेखन व विभिन्न नजरियों के बारे में बता रहे हैं : संपादक]

(गतांक से आगे)


भारत क्या है?

  • प्रेमकुमार मणि

अध्ययन यही बतलाते हैं कि भारत के लोग अपने अतीत को लेकर कभी बहुत गंभीर  नहीं रहे हैं। बहुत कम लोग मिलेंगे जिन्हे तीन-चार पीढ़ियों से अधिक की जानकारी होगी। मृतकों को पुरोहिती श्रद्धांजलि देने  के बाद वे उन्हें जल्दी-ही भूलने की कोशिश करते हैं। अनाम पितरों को पिण्ड-दान कर वे उन्हें अपनी स्मृति से हमेशा के लिए दूर कर देते हैं। आम सामाजिक-सांस्कृतिक रिवाजों में भी उनका जोर नए पर अधिक होता है, हालांकि कुछ पुरानी चीजों को परिपाटी या परंपरा के नाम पर पालने-पोसने की थोड़ी-सी प्रवृति भी उनमे दिखती है। संस्कारों में अपनी प्राचीनतम जुबान, वनस्पतियों के कुछ अवशेषों,पशु-पक्षियों, नदियों, पर्वतों और उन देवी-देवताओं को वे भूलना नहीं चाहते जिनके साथ उनके पूर्वजों ने कभी संगत की थी। इसलिए भारतीय जन-गण की प्रवृति नए और पुराने के एक ऐसे सार्थक संयोग में है, जिसमे प्राचीन रहे, लेकिन प्रभावकारी स्तर पर पर नहीं। उसने हमेशा वर्तमान और भविष्य की चिंता की है। अतीत को भूलो और आगे बढ़ो की भावना भारत में प्रबल है।

भारत में इतिहास लेखन का कार्य बहुत पुराना नहीं है। हम तो ऐसे थे कि अपने बुद्ध, अशोक सबको भूल चुके थे। उन  सबकी स्मृतियों को ही नहीं, बल्कि उनके पुरातात्विक अवशेषों को भी हमने विनष्ट कर दिया था। हड़प्पा-मुईन-जो दड़ो की सभ्यता हो, अथवा तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, कुम्हरार, सारनाथ आदि के पुरावशेष हमने ब्रिटिश शासन-काल में हासिल किये हैं। कभी-कभी विचार आता है कि ऐसा क्यों हुआ। क्या केवल इसलिए कि बुद्ध और अशोक जैसे व्यक्तित्वों को बाद में समाज में प्रभावशाली हुए सामाजिक समूहों ने ख़त्म कर देना चाहा? इसमें थोड़ी-सी सच्चाई हो सकती है, लेकिन यह पूरा सच नहीं प्रतीत होता। क्योंकि पुराना कुछ भी तो नहीं बचाया था लोगों ने। न अपना, न उनका।

बिहार की राजधानी पटना में बुद्ध की एक प्रतिमा

जैसा कि पहले ही कह चुका हूँ कि अतीत के प्रति उदासीनता भारतीय प्रवृति रही है। अतीत को वह इतिहास में नहीं, पौराणिकता में बदलने की कोशिश करते हैं। हर घटना को किंवदंती बनाने में उन्हें कुछ मजा आता है। उसे वे काव्यात्मकता प्रदान करते हैं। विकृतिकरण की इस प्रक्रिया को वे रचनात्मक मानते हैं। ऐसे में सब कुछ गड्ड-मड्ड होना ही होता है।

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जब यहाँ अंग्रेज आये और परिस्थितिवश यहां की राजनैतिक सत्ता उन्हें हासिल हो गयी, तब उन्होंने भारत को जानना चाहा। यह उनकी समस्या भी थी। इसलिए कि इस भारत को जाने बिना उन्हें यहां जमना मुश्किल था। ब्रिटेन में इतिहास लेखन की एक परंपरा बन चुकी थी। भारत में जब अंग्रेज आये तब मुगलों का आखिरी दौर चल रहा था। कुछ दूसरे सामंत-नवाब भी थे। उन सबकी विलासिता चरम पर थी। समाज में एक नैराश्य पसरा पड़ा था। हिंदी लेखक प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘शतरंज के खिलाडी’ में इस प्रवृति की बेहतर व्याख्या की है। ऐसे में अंग्रेजों ने भारतीय समाज को समझने के लिए इसके इतिहास को टटोला। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अंग्रेज अधिकारी अलेक्सांडर डाउ द्वारा रचित या अनुदित  ‘द हिस्ट्री ऑफ़ हिन्दोस्तान’ संभवतः पहली किताब हुई, जिसके द्वारा पश्चिम की दुनिया ने भारत के अतीत को जाना। यह 1771 की बात है। इन दिनों अंग्रेज शासक भारतीय हुकूमत को एक ऐसा ढांचा देना चाहते थे, जो उनके अनुकूल हो। इस प्रयास में उन्होंने हिन्दुओं के उन संस्कृत ग्रंथों को देखना चाहा जिनमे उनके सामाजिक रिवाजों और विधि-विधानों का ब्यौरा हो। मनुस्मृति जैसे ग्रन्थ का इसीलिए अध्ययन आवश्यक प्रतीत हुआ। जब तुर्कों का आना हुआ था, तब उन्होंने भी हिन्दुओं के रीति -रिवाजों को समझने की कोशिश की थी। अल बरुनी ( 973 -1049 ई.) की यात्रा-परक किताब इसी की सूचना देता है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि इतिहास की जरुरत उन समाजों को उतनी नहीं होती ,जो स्वतंत्र और स्वायत्त हैं। शायद इसी  कारण फ्रांसिस फुकुयामा ने विकसित समाजों के लिए इतिहास के अंत की परिकल्पना की है।

 यूरोप की भारतीय दर्शन और विद्या के प्रति दिलचस्पी एक अलग चीज थी। हर विकसित समाज और व्यक्ति अधिक से अधिक जानकारी चाहता है। एशियाई समाज तो इसी धरती का हिस्सा था ,आदमी दूसरे लोक और गृह-नक्षत्रों की जानकारी चाहता है ,पूरे ब्रह्माण्ड को जानना चाहता है। लेकिन इस जिज्ञासा के साथ जब राजनैतिक चालाकी चेतन या अवचेतन रूप से जुड़ जाती है ,तब इसका प्रगटीकरण भी होता है। उन्नीसवीं सदी में भारत के प्रति यूरोपीय जिज्ञासा में राजनैतिक और सहज जिज्ञासु प्रवृत्तियां घुली-मिली थीं। एक तरफ मैक्स मूलर की सहज जिज्ञासा थी, जो कभी भारत नहीं आये, लेकिन संस्कृत के गंभीर अध्येता और वेदों के उद्धारकर्ता बने।

विलियम जोन्स (28 सितंबर 1746 – 27 अप्रैल 1794)

दूसरी तरफ विलियम जोन्स थे जिनके प्रयासों से 1784 में एसियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना हुई। यह विशुद्ध औपनिवेशिक प्रयास था, जिसका प्राथमिक उद्देश्य भारत और यूरोप के बीच एक सांस्कृतिक सेतु तैयार करना था। इस सोसाइटी से कुछ शोध-पत्रिकाओं के प्रकाशन शुरू हुए जिनका भारतीय अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान है। 1788 में एशियाटिक रिसर्चिज़,1821 में क्वार्टरली जर्नल और 1832 में जर्नल ऑफ़ द एशियाटिक सोसाइटी के प्रकाशनों के द्वारा भारत सम्बन्धी अध्ययन को विस्तार मिला। लेकिन इसी सोसाइटी से ओरिएन्टलिज़्म (प्राच्यवादिता) की वह बुनियाद भी खड़ी की गई, जो ऊपर से देखने में तो समन्वयकारी दिख रही थी, लेकिन जिसका उद्देश्य शुद्ध साम्राज्यवादी था। इसके प्रस्तावकों  की मान्यता थी कि भारत के ब्राह्मण और कुछ अन्य ऊँची जातियों के लोग आर्य हैं और इनका रिश्ता यूरोपीय आर्यों से अधिक निकट है, बनिस्पत कि तुर्क-मुग़ल और द्रविड़ों से। यह इतिहास की राजनैतिक व्याख्या थी, जिसके लिए तथ्य ढूंढे जा रहे थे। इस प्रयास से यूरोपीय शासक तबका भारत में अपने लिए एक मजबूत सांस्कृतिक आधार विकसित करना चाहता था। इस प्रयास में उन्हें सफलता भी मिली। इसके प्रथम चरण में तो यूरोपियनों ने भारत के अतीत की खूब सराहना की और वेदों-उपनिषदों के ज्ञान का महिमामंडन किया; लेकिन दूसरा चरण आते-आते वे उपदेशक बन गए। इसी प्रवृति को 1817 में प्रकाशित जेम्स मिल की किताब हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया प्रदर्शित करती है। यह पहली किताब थी जिसने इतिहास को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखा था। इसने भारतीय इतिहास को प्राचीन ,मध्य और आधुनिक भारत में न विभाजित कर हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजित किया। ओरिएन्टलिज़्म के दौर की भारत भक्ति अब ख़त्म हो चुकी थी। मिल की नज़र में वर्तमान और मध्य के साथ प्राचीन भारत भी बर्बर था और अंग्रेज यहां सभ्यता की रौशनी  लेकर आये हैं।

बिहार के वैशाली में अशोककालीन स्तंभ (तस्वीर : फारवर्ड प्रेस)

इन सब की प्रतिक्रिया भिन्न तबकों में भिन्न स्तरों पर हुई। बंगाल की धरती पर विकसित ओरिएन्टलिज़्म की प्रतिक्रिया महाराष्ट्र से कुछ देर से आई। जोतीराव फुले (11अप्रैल 1827 – 28 नवंबर 1890) ने अपनी किताबों के द्वारा यूरोपीय लोगों से भारत के शूद्रों का सम्बन्ध बतलाया। इसके लिए बलिराजा नाम के एक पौराणिक आख्यान की उनने पुनर्व्याख्या की। यह उस प्राच्यवादिता का निषेध करता था जो  यूरोपीय लोगों के सम्बन्ध भारतीय ब्राह्मणों से स्थापित करता था। इसकी भी प्रतिक्रिया महाराष्ट्र से ही हुई। बाल गंगाधर तिलक ने उस आर्य सिद्धांत को नकारा जिसके अनुसार आर्य बाहर से यहां आये थे। दरअसल वह जोतीराव फुले के मूलवासी होने की दलील का प्रतिकार करना चाहते थे। यूँ तिलक ने अंग्रेजों से अपने नस्ल-सम्बन्ध पर उनका विरोध नहीं था। यह जुझारू राष्ट्रवाद की इतिहास दृष्टि थी।

उन्नीसवीं सदी के आखिर तक भारतीय इतिहास लेखन का आरंभिक दौर ख़त्म हो चुका था। बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी इतिहासकारों का दौर आरम्भ होता है। आर. सी. दत्त की किताब ‘द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ ने भारतीय ऐतिह्य को राष्ट्रवादी नज़रिये से देखा और फिर इस ढर्रे से इतिहास लेखन की एक परंपरा ही शुरू हो गयी। एच.सी. राय चौधुरी ,काशीप्रसाद जायसवाल, आर.सी. मजूमदार, आर.के. मुखर्जी जैसे कतिपय इतिहासकारों ने राष्ट्र निर्माण के लिए इतिहास की मनमानी व्याख्या की और इतिहास को राजनीति का निदेशक तत्व बनाने का हरसंभव प्रयास किया। यह उसी औपनिवेशिक प्रवृत्ति का विकास था, जिसका इस्तेमाल ओरिएन्टलिज़्म के दौर में हुआ था।  इन तमाम इतिहासकारों ने इतिहास-लेखन की उस बिसात का ही इस्तेमाल किया जिसकी बुनियाद जेम्स मिल ने रखी थी, यानी अपने अवचेतन में वे औपनिवेशिक इंद्रजाल में बुरी तरह उलझे थे। इस इतिहास-दृष्टि से ही सावरकर ने पहले 1857 के विद्रोह को स्वतंत्रता का प्रथम संघर्ष कहा और फिर उसी आंच पर हिंदुत्व के राजनैतिक दर्शन की बुनियाद रखी।

राष्ट्रीय आंदोलन के गाँधी युग में पंडित सुंदरलाल जैसे लेखकों ने राष्ट्रवाद की बुनियाद को हिंदुत्व के मायाजाल से निकालने का प्रयास अवश्य किया किन्तु वह भी इतिहास अध्ययन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं विकसित कर पाए। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही हड़प्पा से लेकर अन्य खुदाइयों के नतीजे आये। पुरातत्व की नयी  जानकारियों ने हमें बौद्ध-काल के अवशेषों से परिचित कराया। अशोक, नालंदा, विक्रमशिला आदि के पुरातात्विक अवशेषों ने हिन्दू भारत के मिथ को ध्वस्त कर दिया। सिंधु-काठे की सभ्यता ने आर्य सभ्यता के प्रभुत्व को भी विनष्ट कर दिया। इन सबके बीच से इतिहास की एक नयी धारा विकसित होनी थी; लेकिन दुर्भाग्यवश वह नहीं हो सकी।

(क्रमशः जारी )

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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