जाति और अर्थ पर आंबेडकर-नेहरू के विचार

समाजवाद के संबंध में नेहरू और डॉ. आंबेडकर के विचारों में थोड़ा अंतर था। जहां नेहरू सभी लोगो के लिए समान अवसर की बात करते थे, वहीं डॉ. आंबेडकर ने जातियों के बीच समानता को समाजवाद का अभिन्न हिस्सा माना

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) और जवाहरलाल नेहरू (14 नवंबर 1889 – 27 मई 1964) आधुनिक भारत के दो महान समकालीन राजनेता हैं। इन दोनों को ही आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। जहां नेहरू इलाहाबाद के ब्राह्मण परिवार में जन्मे प्रसिद्ध वकील और कांग्रेसी नेता मोतीलाल नेहरू के बेटे थे, वही डॉ. आंबेडकर का जन्म एक दलित (महार जाति ) परिवार में हुआ था। दोनों के लालन-पालन में बहुत बड़ा अंतर था। नेहरू अमीर और शानो-शौकत से पले। जबकि आंबेडकर को बचपन में छुआछूत का सामना करना पड़ा, बड़े होकर भी इस दंश ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

उन्होंने देखा कि उनका पूरा समाज इसी छुआछूत को झेलने को विवश है, इसलिए उन्होंने बड़े होकर इस सामाजिक बुराई को दूर करने का बीड़ा उठाया। वे साधारण गरीब परिवार में पैदा हुए। बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ जी महाराज की छात्रवृति पर वे पढ़ने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन गए। वहीं से उन्होंने अर्थशास्त्र और कानून की ऊँची डिग्रियां लीं। नेहरू की शिक्षा भी ब्रिटेन में हुई थी। दोनों अच्छे लेखक थे, दोनों ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की है।

डॉ. आंबेडकर ऊँचे दर्जे के विद्वान थे। उन्होंने अमेरिका में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एक साथ 6 विषयों- अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र, समाज शास्त्र, मानव विज्ञान में एम. ए. किया था। अर्थशास्त्र में उन्होंने पीएचडी और डीएससी किया था। साथ में वे बैरिस्टर भी थे। उनको हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म की गहरी जानकारी थी। नेहरू के पास इतनी ऊँची डिग्रियां तो नहीं थीं, किन्तु वे भी ऊँचे दर्जे के विद्वान थे। डॉ. आंबेडकर की तत्कालीन कांग्रेस में किसी नेता से ज्ञान के मामले में में तुलना हो सकती थी, तो वह केवल नेहरू थे।

आंबेडकर व नेहरू

दोनों 1920 के दशक में राजनीति में आये। किन्तु दोनों की राजनीति में आने में बहुत अंतर है। 1923 में लंदन से बैरिस्टरी पास करने के बाद डॉ. आंबेडकर भारत आये, बम्बई में कानून के प्रोफेसर बने। उन्होंने सामाजिक आंदोलन को चलाया जिसमे महाड़ के चावदार तालाब में पानी पीने का अधिकार और कालाराम मंदिर सत्याग्रह चलाया।

जाति पर डॉ. आंबेडकर के विचार

डॉ. आंबेडकर का कहना था कि कांग्रेस के जन्म से ही उसमें दो तरह के सुधार की बातें होती थीं – राजनीतिक सुधार और सामाजिक सुधार। कुछ विचारक दोनों को साथ लेकर चलना चाहते थे और कुछ सामाजिक सुधारों पर राजनीतिक सुधारों को वरीयता देते थे। यहां उनके सामाजिक सुधार का अर्थ था – परिवार के अंदर का सुधार जैसे बालिका विवाह पर रोक, विधवा विवाह को प्रोत्साहन आदि। किन्तु इसमें जाति तोड़ने का समाज सुधार सम्मिलित नहीं था। और जाति तोड़े बिना भारत में कोई समाज सुधार संभव नहीं है क्योंकि जाति सामाजिक बुराइयों का मूल कारण है। यही कारण है कि समाज सुधार जल्दी ही विफल हो गया और कांग्रेस का प्रोग्राम राजनीतिक सुधार बन गया। डॉ. आंबेडकर के अनुसार कोई भी राजनीतिक क्रांति तभी सफल हो सकती है, जब सामाजिक – धार्मिक क्रांति हो चुकी हो। किन्तु कांग्रेस ने जाति तोड़ने को लेकर कोई भी सामाजिक क्रांति नहीं की।[1]

उनके अनुसार जाति प्रथा केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि यह श्रमिकों का भी विभाजन है। यह श्रेणीबद्ध व्यवस्था है जिसमे श्रमिकों का विभाजन एक के ऊपर दूसरे के क्रम में होता है। यहां श्रम का विभाजन जन्म के आधार पर है, जो प्राकृतिक नहीं है। इसमें अभिरुचि और कार्यकुशलता के लिए कोई जगह नहीं है। इस प्रणाली में बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसे श्रम में लगे हैं जिसमें उनकी कोई रूचि नहीं है। अतः आर्थिक दृष्टि से यह हानिकारक प्रणाली है।

हिन्दुओं के नैतिक आचार समाज के लिए बड़े ही हानिकारक हैं। जाति प्रथा ने समाज हित की चेतना को नष्ट कर दिया है। जाति व्यवस्था के कारण किसी भी विषय पर सार्वजनिक सहमति बन पाना असम्भव है। इनकी निष्ठा अपनी जाति तक ही सीमित है। [2]

यह प्रश्न कि कैसा समाज होना चाहिए ? तो उनका मानना है कि ऐसा समाज जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित हो। लोकतंत्र केवल सरकार का एक रूप नहीं है, बल्कि लोकतंत्र वह है जहां लोग सोच-समझकर विचार-विमर्श करें, परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करे, और सब उसमें हिस्सा लें।[3] लोकतंत्र का आधार है अपने साथियों के प्रति आदर सम्मान।

उनके अनुसार, हिन्दू व्यवस्था ने अछूत और आदिवासी जातियों के रूप में जिन वर्गों को जन्म दिया है, उनका अस्तित्व कैसे आया, यह बड़ा चिंतन का विषय है। यदि हिन्दू सभ्यता को इन वर्गो के जनक के रूप में देखा जाये, तो यह ‘ सभ्यता’ नहीं कहला सकती। यह मानवता का दबाये रखने और गुलाम बनाने का एक षड़यंत्र है। इसका ठीक नामकरण शैतानियत होना चाहिए। [4]

दूसरे शब्दों में, हिन्दू धर्म और उसका दर्शन ब्राह्मण के लिए स्वर्ग और साधारण मनुष्य के लिए नर्क है। यह कहना कि हिन्दू धर्म का फलां हिस्सा रूढ़िवादी है, जाति को मानता है, और फलां हिस्सा ठीक-ठाक है, क्योंकि जाति को नहीं मानता। इस संबंध में उनका कहना था कि मनुस्मृति, वेद और भगवत गीता का सार एक ही है। ये सभी एक ही नमूने पर बने हुए हैं। इन सभी के भीतर एक ही प्रकार का धागा चलता है, और वास्तव में ये सभी एक वस्त्र के हिस्से हैं। [5] अतः उन्होंने हिन्दू धर्म के सभी ग्रंथों को ही जाति को बढ़ावा देने वाला बताया।

जवाहरलाल नेहरू के जाति पर विचार

जवाहरलाल नेहरू ने जाति और हिंदुत्व पर कोई अलग से विशेष विचार नहीं लिखे हैं। उनकी पुस्तक ‘दी डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में भारत के प्राचीन इतिहास और संस्कृति के बारे में लिखा है। उनकी पुस्तक से इस बारे में उनके विचार पता चलते हैं। उन्होंने यह भी लिखा है प्राचीन ग्रंथों में हिन्दू नाम का शब्द नहीं मिलता है। आठवीं शताब्दी में पहली बार यह शब्द मिलता है, जहां यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया गया था जो किसी धर्म को नहीं मानते थे। चीनी यात्री इत्सिंग जो सातवीं शताब्दी में भारत आया, उसके अनुसार यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग होता था जो आर्यदेश में रहते थे। हिन्दू एक धर्म के रूप में बहुत बाद में आया। [6]

भारत के प्रथम विधि मंत्री के रूप में डॉ. आंबेडकर को शपथ दिलाते प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद। दायें प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बैठे हुए

इसलिए हिन्दू शब्द को परिभाषित करना सम्भव नहीं है। हिंदुत्व एक आस्था तो है, किन्तु धर्म है या नहीं, बता पाना मुश्किल है। किन्तु इस धर्म की एक खास बात रही। जो भी विदेशी आये, वे भी हिन्दू संस्कृति में समा गए।

जब भारत में आर्य आये, उन्होंने यहां के निवासी द्रविड़ों को हराया। उस समय यह विजय नस्लीय भी थी और राजनीतिक भी। शायद आर्यों ने अपने को श्रेष्ठ समझा। और इसलिए आर्यो और द्रविड़ों के बीच एक खाई तैयार हो गयी। जाति न तो पूर्ण रूप से आर्य संकल्पना है और न द्रविड़। इन्ही आर्य और द्रविड़ों के बीच संघर्ष में जाति व्यवस्था का उदय हुआ। [7] शुरूआत में चार ही जातियां थीं। यह बिलकुल वैसे ही था जैसे प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में समाज को तीन वर्गो में बांटा है। समाज में चार जातियों का उदय हुआ। ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। उस समय आर्य शब्द एक नस्ल का प्रतीक था। और इसका अर्थ श्रेष्ठ के रूप में लिया जाता था। इस जाति प्रथा का उदय वैदिक काल में हुआ था। बाद में यह जाकर प्रथा रूढ़ हुई।

उपनिषद काल तक यही पुरोहितवाद चलता रहा। उपनिषद काल के बाद भारत में बौद्धिक क्रांति हुई जिसमें जैन और बौद्ध प्रमुख हैं। जैन और बौद्ध वैदिक धर्म में से ही निकले, किन्तु इससे बगावत भी थी। उन्होंने वेद की सत्ता को मानने से इंकार कर दिया। यद्यपि इन्होंने सीधे- सीधे जाति पर हमला नहीं किया किन्तु जाति को मान्यता भी नहीं दी। जिससे यह जरूर कहा जा सकता है कि जाति प्रथा कमजोर हुई। इसी काल में क्षत्रिय वर्ग के अंतर्गत नई नई जातियों का उद्भव हुआ। क्योंकि इस काल में समाज का रूपांतरण तेजी से हुआ। जैन और बौद्ध दोनों धर्मों के संस्थापक क्षत्रिय थे, और इन्होंने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी। शूद्र वर्ग में चेतना फैली, इस काल में क्षत्रिय शब्द जाति के बजाय प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। जाति व्यवस्था लचीली हो गयी। क्षत्रिय शब्द सभी राजाओं के लिए प्रयोग किया जाने लगा।[8]

जवाहरलाल नेहरू के समाजवाद तथा अर्थतंत्र पर विचार

समाजवाद के बारे में नेहरू का मत था कि समाजवाद लोकतंत्र के साथ ही सम्भव है। वह फैबियन समाजवादियों से बहुत प्रभावित थे। उनका कहना था कि कोई भी क्रांति लोगों की सहमति से होनी चाहिए, और उसे जनता पर थोपा नहीं जाना चाहिए। समाजवादी लक्ष्यों को पाने के लिए हिंसा का प्रयोग नहीं होना चाहिए। वह सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था से बहुत प्रभावित थे, किन्तु उनका कहना था की जिन साधनों का प्रयोग सोवियत संघ में किया गया है, उनका प्रयोग भारत में बिलकुल नहीं हो सकता। उनका आशय हिंसा से परहेज करने से था। उनका मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र ही देश में सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करेगा। वे मिश्रित अर्थव्यवस्था के समर्थक थे। वे छोटी पूंजी के मामले में निजी क्षेत्र के अंतर्गत संचालित करने के समर्थक थे, किन्तु उनके अनुसार बड़े उद्योगों को राज्य के अंतर्गत लाना ही होगा। [9]

नेहरू ने जमींदारी प्रथा का भी स्पष्ट शब्दों में विरोध किया। उन्होंने कहा , मुझे साफ़-साफ़ स्वीकार कर लेना चाहिए कि मैं एक समाजवादी हूँ, राजा – महाराजों में मेरा कोई विश्वास नहीं है। मैं उस उद्योग व्यवस्था में भी विश्वास नहीं करता जो आधुनिक राजा – महाराजा ( उद्योगपति ) पैदा करती है, और लूटपाट का तरीका अख्तियार करती है।”[10] जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस के अंदर कांग्रेस के कार्यक्रमों को समाजवादी रूप देने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने भारत के स्वतंत्र आंदोलन का समाजवादी दृष्टि प्रदान की और 1929 के बाद वे समाजवादी विचारों के प्रतीक बन गए। 1929 में ही उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इसके बाद वे पुनः 1936 और 1937 में इसी पद पर चुना गया।

उन्होंने कहा कि, “मुझे पक्का विश्वास हो चला है कि विश्व की और भारत की समस्याओं के समाधान की एकमात्र कुंजी समाजवाद है। जब मैं इस शब्द का इस्तेमाल करता हूँ तो अस्पष्ट मानवतावादी अर्थ में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सार्थक अर्थ में करता हूं, जिसके अंतर्गत काफी व्यापक और क्रांतिकारी परिवर्तनों की जरूरत होती है।जिसका मतलब है व्यक्तिगत सम्पत्ति की समाप्ति, सीमित अर्थो को छोड़कर, जिसका मतलब वर्तमान लाभ की व्यवस्था के स्थान पर सहकारी सेवा के उच्चतम आदर्श की प्रतिष्ठा।” [11]

नेहरू का कांग्रेस पर राजनीतिक प्रभाव गाँधी के बाद था। 1930 के दशक में नेहरू कांग्रेस के अंदर एक शक्तिशाली नेता बन गए, समय के साथ उनका राजनीतिक कद बढ़ता चला गया। गांधी की मृत्यु के बाद वह कांग्रेस के सर्वमान्य नेता बन गए। वह 1946 से 1964 तक भारत के प्रधान मंत्री रहे। विदेश विभाग भी हमेशा उनके ही पास रहा। यद्यपि गांधी से उनका कई बिंदुओं पर मतभेद था। फिर भी 1940 में गाँधी ने उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी चुना। [12]

नेहरू रिलिजन को पॉलिटिक्स में शामिल करने के विरुद्ध थे। इस मामले में वे उदारवादी पश्चिमी विचारकों का अनुसरण करते थे। वे निजी जिंदगी में भी धर्म का पालन नहीं करते थे। नेहरू ने खुद स्वीकार किया कि वह किसी भी धर्म में आस्था नहीं रखते, हिंदुत्व में भी नहीं। वह जीवन भर नास्तिक रहे। उन्होंने कहा कि मानववाद ही सबसे बड़ा धर्म है, और गरीबों की सेवा सबसे बड़ी पूजा है।[13] ऐसा कई बार हुआ जब धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों पर उनका मत तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से भिन्न था। देश की आज़ादी के बाद राजेंद्र प्रसाद ने जब सोमनाथ मंदिर का सरकारी पैसे से पुनर्निर्माण कराने की बात कही तो नेहरू इसके खिलाफ थे। उनका कहना था कि सरकारी धन धार्मिक कार्यो में खर्च नहीं किया जाना चाहिए।

जब भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ, उन्होंने घोषित किया कि भारत में मुस्लिम सामान नागरिक के तौर पर रहेंगे। वे धर्म के आधार पर भेदभाव के कट्टर विरोधी थे। उनका दृढ मानना था कि धर्मनिरपेक्षता की नीति पर चलकर ही देश को एक और अखंड बनाये रखा जा सकता है। वे बहुसंख्यकवाद के घोर विरोधी थे।

यदि डॉ. आंबेडकर और नेहरू की जाति के विचारों पर तुलना की जाये तो आंबेडकर का दृढ मानना था कि अछूतों को पृथक निर्वाचन अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से मांग कर इसे पा भी लिया था। किन्तु गांधी ने आंबेडकर को ब्लैकमेल किया। मजबूरी में पूना पैक्ट हुआ. यहां कांग्रेस के बाकी नेता चुप थे या वे गांधी का साथ दे रहे थे। नेहरू ने भी डॉ. आंबेडकर के पक्ष में एक शब्द भी नहीं बोला।[14]

जब आंबेडकर दलितों को सशक्त बनाने का कार्यक्रम चला रहे रहे थे और जाति का विनाश की बात कर रहे थे, नेहरू ने गांधी की हां में हां मिलाते हुए कहा कि जाति एक सामाजिक समूह है जो कर्म पर आधारित है।”[15] प्रत्येक जाति किसी विशेष कार्य के लिए बनाई गयी थी। इससे कार्य दक्षता में निपुणता आती है। जाति व्यवस्था बाद में जड़ हो गयी है, इसलिए अब वह लोकतंत्र के अनुकूल नहीं है। नेहरू के इस बारे में विचार लगभग उसी प्रकार के थे जो बाकी उच्च जाति में जन्मे विचारक या नेता जैसे गांधी, स्वामी विवेकानंद या स्वामी दयानन्द सरस्वती के थे। डॉ. आंबेडकर ने छुआछूत के बारे में इतना लिखा, विरोध किया किन्तु नेहरू ने छुआछूत के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है।

1946 में ही गांधी की सलाह पर डॉ. आंबेडकर को संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। संविधान सभा में संविधान कैसे बनाया जाये, इसके लिए लम्बी बहस हुई। अंत में जब संविधान को अपनाया गया,डॉ. आंबेडकर ने कहा कि, हम एक ऐसे समाज में जा रहे है जहां राजनीतिक समानता होगी, किन्तु सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं होगी। जल्दी ही अंतर्विरोध दूर करना होगा, नहीं तो जो असमानता से पीड़ित लोग हैं, वे राजनीतिक लोकतंत्र को उखाड़ फेंकेंगे।

यद्यपि नेहरू धर्म को नहीं मानते थे। लेकिन पैरी एंडरसन ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन आइडियोलॉजी में एक-दो दृष्टांत ऐसे दिए हैं, जो दिखाते हैं कि नेहरू ने भी एक दो बार धर्म का इस्तेमाल किया। किन्तु ऐसा अपवादस्वरूप ही है। जब 1947 में देश आज़ाद हुआ, 14 अगस्त को नेहरू और उनके साथी लोग दिल्ली में पूजा-हवन के सामने बैठे, और पण्डे-पुजारियों ने पूजा के कर्मकांड किये। वेद मंत्र पढ़े गए।[16]जब नेहरू की मृत्यु हुई, उनका अंतिम संस्कार पूरे वेद उच्चरण और मंत्रों के साथ किया गया। मृत्यु के बाद उनका क्रिया-कर्म इस ढंग से किया गया, इसके लिए यद्यपि उनको जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। फिर भी यह जरूर है कि उनके आसपास के लोग, जिनसे वह घिरे रहते थे, अपने चरित्र में हिन्दू रिवाज़ों का पूरी तरह पालन करते थे।

डा आंबेडकर के समाजवाद और अर्थतंत्र पर विचार – समाजवाद के बारे में उनके विचार उनकी पुस्तक ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ में मिलते हैं। डॉ. आंबेडकर शास्त्रीय रूप से समाजवादी नहीं थे किन्तु उनका समाजवाद अपने तरह का था, यह जरूर कहा जा सकता है कि वे राज्य समाजवाद या विकासवादी समाजवाद को मानते थे। वे सामाजिक और आर्थिक असमानता के घोर विरोधी थे, जिसके खिलाफ वे आजीवन संघर्ष करते रहे।

उन्होंने भारत की जाति व्यवस्था को भारत के परिपेक्ष्य में ही समझा था। जबकि दूसरे विचारकों के लिए समाजवाद यूरोप से आया था।

उन्होंने लिखा है कि भारत में जोत[17] का आकार बहुत कम है, जो भारतीय कृषि के लिए हानिकारक है। उन्होंने दिखाया था कि इंग्लैंड बड़ी जोतों वाला देश है। उन्होंने कहा कि बिखरी-बिखरी जोतों की न केवल चकबंदी की जाये, बल्कि उनका आकार भी बड़ा किया जाय। [18]

उन्होंने भारत की जाति व्यवस्था और गरीबी के निकट संबंध को देखा था। उन्होंने देखा था कि तथाकथित निचली जातियों का व्यक्ति गरीबी के दुष्चक्र में फंसा हुआ है। इस गरीब व्यक्ति को दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए यह जरूरी है तथा यह राज्य का कर्तव्य है कि उनकी आर्थिक मदद की जाये। इसके लिए अमीर व्यक्तियों पर ज्यादा कर लगाया जाये। अमीर व्यक्ति मंहगे अस्पताल में इलाज करा सकता है, मंहगे स्कूल में शिक्षा पा सकता है, किन्तु गरीब के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होने से वह इनको नहीं जुटा सकता। [19]

समाजवाद के संबंध में नेहरू और डॉ. आंबेडकर के विचारों में थोड़ा अंतर था। जहां नेहरू सभी लोगो के लिए समान अवसर की बात करते थे, वहीं डॉ. आंबेडकर ने जातियों के बीच समानता को समाजवाद का अभिन्न हिस्सा माना। इस प्रकार डॉ. आंबेडकर ने अपने समाजवाद में आर्थिक के साथ सामाजिक बुराइयों को दूर करने का लक्ष्य बनाया।

डॉ. आंबेडकर का समाजवाद संसदीय लोकतंत्र पर आधारित था। उनका कहना था कि लोकतंत्र को उचित तरीके से कार्य करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को कुछ मूल अधिकार मिलने चाहिए जिन्हें सरकार उससे नहीं छीन सकती हो । ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तित किये जा सकते हों। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल सरकार तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सामाजिक जीवन का भाग भी होना चाहिए। उचित संसदीय लोकतंत्र वही होगा जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित होगा। उन्होंने कहा कि जाति व्यवस्था की जड़ हिन्दू धर्म शास्त्रों में है, इसलिए राज्य का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दू धर्म शास्त्रों की पवित्रता को नष्ट करे, जाति के रहते लोकतंत्र सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकता।

डॉ. आंबेडकर ने कहा कि बड़े उद्योग राज्य द्वारा संचालित और नियंत्रित होने चाहिए। बीमा राज्य द्वारा संचालित होना चाहिए। व्यक्ति निजी सम्पत्ति रख सकता है, किन्तु यह केवल छोटे उद्योगों, छोटे जोत के खेत के लिए लागू हो सकता है। उद्योग में निजी और राज्य दोनों का स्वामित्व होगा।[20]

नेहरू और डॉ. आंबेडकर दोनों यूरोप के महान समाजवादी विचारक कार्ल मार्क्स के कुछ बातों पर असहमत थे। दोनों इतिहास की आर्थिक व्याख्या से असहमत थे, दोनों वर्ग संघर्ष को नहीं मानते थे, दोनों ने सर्वहारा के अधिनायक तंत्र को भी नहीं माना। दोनों राज्य समाजवाद को मानते थे, दोनों विकासवादी समाजवाद या संसदीय लोकतंत्र को मानते थे, जिसमें विकास धीरे-धीरे होगा। फिर भी जाति बिंदु पर दोनों के समाजवाद में बहुत भिन्नता थी। डॉ. आंबेडकर ने भारतीय समाज को जातियों का समूह माना जिनमे विरोधाभासी संबंध हैं। जबकि नेहरू ने इस नजरिये से भारतीय समाज को नहीं देखा।

(कॉपी संपादन : लोकेश/नवल)

सन्दर्भ –

  1. B. R. Ambedkar, Volume 1, Dr Ambedkar Pratishthan, New Delhi, 2013.
  2. B. R. Ambedkar, Volume 2, Dr Ambedkar Pratishthan, New Delhi, 2013.
  3. B. R. Ambedkar, Volume 4, Dr Ambedkar Pratishthan, New Delhi, 2013.
  4. B. R. Ambedkar, Volume 6, Dr Ambedkar Pratishthan, New Delhi, 2013.
  5. B. R. Ambedkar, Achhoot kaun aur kaise, Gautam Book Centre, Delhi, 2008.
  6. Badal Sarkar, Dr. B. R. Ambedkar’s theory of State Socialism, International Research Journal of Social Sciences, Vol. 2 (8), Aug. 2013.
  7. C. N. Chitta Ranjan, Nehru and Socialism, Vol. No. 47, Nov. 2006.
  8. Jawaharlal Nehru, The Discovery of India, Penguin Books, Gurgaon, 2010.
  9. Perry Anderson, The Indian Ideology, Three Essays Collective, New Delhi, 2016.
  10. Ramchhandra Guha, Makers of Modern India, Penguin Books, Gurgaon, 2012.
  11. See Tai Yong Tan and Gyanesh Kudaisya, The Aftermath of Partition in South Asia, London,2000.
  12. Valerian Rodrigues (eds), The Essential Writings of B. R. Ambedkar, Oxford University Press, New Delhi, 2018.
  13. Vivek Kumar Srivastava, Nehru and his views on Secularism, Mainstream Weekly, Vol. No. 47, Nov. 2014.
  14. Vivek Kumar Srivastava, Ambedkar and his Vision of Socialism, Mainstream Weekly, Vol. No.19, April 2016.
  15. Vipin Chandra, Bharat ka Swatantrata Sangharsh, Hindi Madhyam Karyanvy Nideshaly, Delhi, 1997.

[1] 55, Volume 1.

[2] 77, Volume 1.

[3] 64, The Essential Writings of B. R. Ambedkar.

[4] 5, Achhoot kaum aur kaise.

[5] 102-106, Volume 6.

[6] 68-71, Discovery of Inida.

[7] 81-82, ibid.

[8] 120-123, ibid.

[9] Nehru and Socialism.

[10] 235, Bharat ka swatantrata sanghrsh.

[11] 236, ibid.

[12] 326-327, Makers of Modern India.

[13] Nehru and His Views on Secularism.

[14] 53, The Indian Ideology.

[15] 54-55, ibid.

[16] 53-54, The Aftermath of Partition in South Asia.

[17] खेती के लिए भूखंड

[18] 245-255, Volume 2.

[19] Ambedkar and his vision on Socialism.

[20] Dr. B. R. Ambedkar’s theory of State Socialism.


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