नदी घाटी सभ्यताएं

कृषि के विकास ने मानव सभ्यता को नया आयाम दिया। इसमें अहम भूमिका शिल्पकारों की भी रही। तदुपरांत नगरों का विकास हुआ। फिर एक नया शासक वर्ग भी सामने आया। यह सब नदियों के दोआबे में हुआ और निश्चित रूप से केंद्र में कृषि ही रही

जन-विकल्प

कृषि-क्रांति के बाद मनुष्य के इतिहास में एक और उल्लेखनीय परिदृश्य उभरा; वह था नदी घाटी सभ्यताओं का विकास। दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी सभ्यताएं नदियों के किनारे या दोआबा इलाकों में विकसित हुईं, इसीलिए इन्हें नदी घाटी सभ्यता कहा गया। मेसोपोटामिया में टिगरिस और युफ्रेटस नदियों के दोआबे ,मिस्र में नील नदी के इर्द-गिर्द और भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु नदी के किनारे ये सभ्यताएं आकार ले सकीं। यूँ तो मानव समाज के विकास का हर मोड़ या सोपान महत्वपूर्ण ही होता है, लेकिन यह कुछ अधिक महत्वपूर्ण था, जिसे लोगों ने सभ्यता या सिविलाइज़ेशन कहा। अभिप्राय यह कि इस सभ्यता के तहत जो चीजें अस्तित्व में आईं, उसके बगैर भी मानव जीवित रह सकता था, जैसा कि हज़ारों या लाखों वर्षों से उसके जीने-मरने का एक सिलसिला चलता आ रहा था। लेकिन इस सभ्यता ने उसे संसार के अन्य प्राणियों से और अधिक दूर कर दिया। इतना दूर कि वह अन्य प्राणियों से अपना कोई जुड़ाव स्वीकारना भी अपनी शान के खिलाफ समझने लगा। दरअसल सभ्यता का यह पहला पाठ होता है कि हम दूसरों से अपने को अधिक अक्लमंद और बड़ा समझने लगते हैं . सभ्यताएं हमें अभिमानी बनाती रही हैं।

इस मार्क्सवादी नजरिये में बहुत दम नहीं है कि इन सभ्यताओं का उदय कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त उत्पादन से ही संभव हुआ। यह एक महत्वपूर्ण कारण अवश्य है, लेकिन एकमात्र कारण बिलकुल नहीं है। कृषि और उस पर आधारित ग्राम-समुदाय को एक रूप ले लेने के बाद मानव-मस्तिष्क विराम या विश्राम नहीं ले सकता था। वह नयी संस्थाओं के निर्माण के लिए सक्रिय हुआ। कृषि-संस्कृति में जो सामुदायिक व्यवस्था थी, वह मनुष्य के व्यक्ति-स्वातंत्र्य को हतोत्साहित करती थी। मनुष्य को एक कबायली अंदाज़ की व्यवस्था की जकड़न में बंधा होना होता था। शिल्पियों का इससे मोहभंग स्वाभाविक हुआ। उन्हें मुक्ति की आकांक्षा के साथ एक नयी सामाजिक व्यवस्था चाहिए थी। दूसरी तरफ कुछ अन्य शक्तियां थी, जिन्हे अपने वर्चस्व के लिए एक नए समाज की आकांक्षा थी। इन दो अंतर्विरोधी उद्देश्यों के साथ कुछ लोगों ने एक नयी व्यवस्था का स्वप्न देखा और अंततः उसे साकार किया। इस सभ्यता के कारण कुछ अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक प्रणालियों का विकास हुआ। बाजार और उसके अवयव अस्तित्व में आए। कुल मिलाकर एक नया संगठन अस्तित्व में आया, जिसे नगर कहा गया। ग्राम व्यवस्था अब नगर व्यवस्था की ओर अग्रसर हुई। धीरे-धीरे इन नगरों का गांवों पर नियंत्रण हुआ। इनसे जनपदीय व्यवस्था बनी। इन सब की एक दिलचस्प किन्तु जटिल प्रक्रिया रही।

कृषि के विकास से जनपदीय संस्कृति विकसित हुई

बतलाया जा चुका है कि मानवों के एक समुदाय ने किन उद्देश्यों के साथ स्वयं को गांवों से पृथक किया था। इन सब की रुचियाँ कृषि-उत्पादन से भिन्न थीं। ये शिल्पकार थे, जिनकी रचनात्मकता अंगड़ाइयां ले रही थीं। वे ऐसी चीजें बनाना चाहते थे, या बना रहे थे, जिनकी जरुरत आम तौर पर ग्रामीण समाज को नहीं थी। वे कुछ ऐसा बना रहे थे, जिनका लागत-खर्च अधिक था। कृषि-आधारित ग्रामीण समाज में उनका निर्माण असंभव था,क्योंकि उसमे अधिक शिल्पियों की एक साथ जरुरत होती थी। इन शिल्पियों को बाँध कर रखना अथवा संयोजन करना बहुत आसान नहीं था। उनके और उनके परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था नियोजक-संयोजक को करनी होती थी। इसके लिए काफी मात्रा में अन्न और दूसरे खाद्य पदार्थों और निर्माण में काम आ रही सामग्रियों की व्यवस्था करनी होती थी। इसके लिए एक अनुशासन और व्यवस्था का होना जरुरी था। लेकिन इन लोगों ने मिल-जुल कर अपने ठिकानों को कुछ जरुरी सुविधाओं से जोड़ा और ग्रामीण बस्तियों की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित-सुसज्जित किया। यही नगर थे। जैसा कि मैंने पहले बतलाया, यह आवश्यक नहीं था कि किसी व्यवस्था के अतिरिक्त उत्पादन ही इसके कारण हों। हर उन जगहों पर जहाँ कृषि-व्यवस्था फल-फूल रही थी, नगर नहीं बन गए। फिर कुछ ऐसी परिस्थितियों में नगर बने, जिन्हें हम आकांक्षाओं का मूर्त होना ही कह सकते हैं। भारतीय महाकाव्य महाभारत में वर्णन है कि कृष्ण मथुरा से निष्कासित किये जाने के बाद द्वारिका में नगर निर्माण करता है। कृष्ण की ही सलाह पर पांडव अपने हिस्से में खांडव वन ले लेते हैं और उसे इंद्रप्रस्थ नामक नगर में तब्दील कर देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कृष्ण अपने समय में शिल्पियों का महत्व समझने वाला नेता था। इसी के बूते उसने कम लोगों के साथ भी महाभारत युद्ध में जीत हासिल की। यह एक काव्य-कथा का सच है। लेकिन वास्तविक सच भी कुछ न कुछ इसके करीब ही रहा होगा।

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नगरों की संरचना गांवों से बहुत भिन्न थी। यहाँ खेती नहीं होती थी। खेती से जुड़े पशु भी यहाँ नहीं थे। किसान यहां क्यों कर, किसलिए रहते। तब यहाँ के लोगों को अन्न, दूध और मांस कैसे मिलते थे? क्योंकि इनके बिना तो जीवन ही संभव नहीं था। अन्न-संग्रह के लिए कोठार तो यहां थे, लेकिन जिनका संग्रह कुछ घंटों से अधिक नहीं किया जा सकता था, जैसे दूध, मांस, सब्जियां आदि, उनका भी उपभोग नगरवासी करते थे। अतएव यह स्वयंसिद्ध है कि इन नगरों में आवश्यक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए पास में कृषि-केंद्रित ग्रामीण बस्तियां अवश्य होती होंगी। इन बस्तियों से उन्हें श्रमिकों की भी आपूर्ति होती होगी।

ऐसा प्रतीत होता है और इसके प्रमाण भी उत्खनन में मिले हैं कि इन नगरों के केंद्र में पुरोहित रहे होंगे। गांव में कृषि व्यवस्था को अपने ज्ञान से सम्बल देने वाले पुरोहितों से ये पुरोहित भिन्न थे। ये कुछ ऐसी आसमानी चीजों में रूचि लेते थे, जिनके बल पर भोले-भाले किसानों से ये उपज का एक हिस्सा हासिल कर सकें। वह कौन-सी चीज थी जिसका इस्तेमाल ये किसान जनता पर उनके उत्पादन का एक हिस्सा झटकने के लिए करते थे? यह चीज थी भय। पुरोहितों ने देवताओं का एक रूपक लोगों के सामने रखा। प्राकृतिक आपदाओं, व्याधियों और तमाम वैसे दुखों, जिनका प्रत्यक्ष कारण नहीं था, की व्याख्या इन पुरोहितों ने काल्पनिक तरीके से की और देवताओं के मिथ का सृजन किया। इन पुरोहिती व्याख्याओं को शिल्पियों ने मूर्त रूप दिया और मंदिर अस्तित्व में आए। इन मंदिरों के नाम पर किसानों से उनके उत्पादन का एक अंश हासिल किया जाने लगा। कालांतर में मंदिरों ने अपनी आमदनी से उपजाऊ जमीन ख़रीदे और इन पर किसानों द्वारा खेती करवाई। इससे भी मंदिरों का राजस्व बढ़ने लगा। इस राजस्व का इस्तेमाल अधिक मंदिरों के निर्माण में होने लगा। सामान्य किस्म के कम हुनरमंद शिल्पी गांव में रह गए, लेकिन अधिक हुनरमंद शिल्पी नगरों में पहुँचने लगे। धीरे-धीरे इन नगरों में बड़े पैमाने पर कारीगरों यानी शिल्पी, बुनकर, कुम्हार और धातुकर्मियों का जमावड़ा होने लगा।

सब से आखिर में कुछ दूसरे चालाक और भुजबली लोगों ने शारीरिक बल प्रयोग द्वारा स्वयं को राजा घोषित किया और शेष सबों पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। लेकिन इन सबों में पुरोहित अपवाद थे। दरअसल, इन राजाओं को भी मालूम था कि केवल शारीरिक बल के भरोसे किसानों और शिल्पियों पर पकड़ बनाये रखना मुश्किल है। इन राजाओं ने पुरोहितों द्वारा निर्मित देवताओं के प्रति अपनी श्रद्धा-भक्ति सुनिश्चित की और पुरोहितों को सम्मान देना तय किया। इस आधार पर हुए समझौते से देवताओं की ताकत और बढ़ गयी . उनके पालक पुरोहितों की ताकत भी इसी अनुपात में बढ़ी। जल्दी ही इन राजाओं ने बल प्रयोग करने के लिए सेना का निर्माण किया। इस सेना का प्रयोग राजा अपना प्रभाव ज़माने के लिए करता था। शिल्पियों द्वारा बड़ी मात्रा में उत्पादन किये गए हथियारों के बल पर इस सेना का शस्त्रीकरण यानी सशक्तिकरण हुआ। आरंभिक अवस्था में इसका इस्तेमाल राजाज्ञा के अनुपालन हेतु आंतरिक स्तर पर किया गया और कालांतर में दूसरे राजाओं से होने वाले युद्धों में।

 

ये राजा अन्य राजाओं से चाहे जितना लड़ लें, पुरोहितों से कम से कम शुरूआती दिनों में संघर्ष नहीं किया। भारत में राजन्यों और पुरोहितों के संघर्ष की एक लम्बी परंपरा रही है। लेकिन आरम्भ में इन दोनों में सहमति थी। मिस्र और मेसोपोटामिया में भी इन तबकों के बीच ऐसी ही सहमति की सूचना है। यह सहमति क्यों थी? क्योंकि पुरोहितों से शत्रुता लेना खतरे से खाली नहीं था। देवताओं का चमत्कारिक प्रभाव भोले-भाले किसानों और कारीगरों पर सेना से कहीं अधिक था। इसके एवज में पुरोहितों ने भी अपना आशीर्वाद अथवा समर्थन राजाओं को दिया। इस तरह राजा, पुरोहित और पुरोहितों द्वारा गढ़े गए देवता मिल-जुल कर किसानों पर इतना भय पैदा करते थे कि वे अपने उत्पादन का एक खास हिस्सा इन मंदिरों और राजाओं को देने के लिए विवश या सहमत हो जाएँ। जहाँ असहमति के स्वर उठते थे, वहां सेना बल प्रयोग करती थी। किसानों के इस अंशदान से नगरों को अनाज का एक अच्छा-खासा हिस्सा मिल जाया करता था। धीरे-धीरे ऐसा अंशदान कीमती धातु, पत्थर या और नहीं तो बनी हुई सामग्री रूप में शिल्पी और व्यापारी भी देने के लिए मजबूर किये गए।

धीरे -धीरे इन सब की एक व्यवस्था बनने लगी। इन व्यवस्थाओं को रूप देने के लिए लम्बे समय तक जुबानी कहे अनुसार (श्रुति ) की एक परंपरा बनी। कालांतर में पुरोहितों और शिल्पियों ने मिलजुल कर लिपि बनाई और कुछ करारों और व्यवस्था को लिखित रूप दिया। इसी लिपि द्वारा कालांतर में देवताओं और राजाओं के समर्थन और अभ्यर्थना में शब्दों के कसीदे गढ़े गए। यह सब सभ्यता का परवान चढ़ना था।

नगरों की स्थापना ने कारीगरी के क्षेत्र में अनुकूलता विकसित की। शिल्पियों का नगरों में केंद्रित होना शिल्प के विकास के लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हुआ। उनके इस जमावड़े ने एक दूसरे से सीखने और एक दूसरे से बेहतर दिखने-दिखाने की स्पर्धा अथवा प्रतियोगिता की भावना विकसित की। इस प्रवृत्ति ने शिल्पकारिता का अपेक्षित विकास किया। शिल्पियों के संघ या गिल्ड बनने लगे। नगर-केंद्रित इन शिल्पियों के उत्पादन कृषि क्षेत्र में सहयोग करने वाले नहीं थे। ये मुख्यतः विलासिता की वस्तुएं थीं। जेवर, खिलौने, मूरतें, बर्तन-बासन आदि या फिर बुनकरों द्वारा निर्मित महीन और छापेदार कपड़े बड़े पैमाने पर बनने लगे। घर और मंदिर डिजायनदार बनने लगे। मंदिरों और राजाओं के बड़े मकानों में शिल्पियों ने पच्चीकारी और नक्काशी शुरू कर दी।

इन शिल्पियों के अतिरिक्त उत्पादन से व्यापार की संभावनाएं विकसित हुईं। एक नगर से दूसरे नगर के लिए व्यापारी घूमने लगे। नाव, बैल और दूसरे जानवरों पर लाद कर इन सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोया जाता था। फिर लेन-देन के लिए सिक्कों का निर्माण हुआ। धीरे-धीरे उत्पादन के साथ व्यापार समाज की एक ऐसी व्यवस्था बनती चली गयी, जिसके बिना किसी सभ्यता का अब हम अनुमान ही नहीं कर सकते थे।

बतलाया जा चुका है, संसार में सब से पहले जो सभ्यताएं अस्तित्व में आयीं वे नदियों के किनारे आयीं। लेकिन इन्हें हम नदी-नगरों की सभ्यता नहीं कह कर नदी घाटी सभ्यता क्यों कहते हैं? बेशक नदियों के किनारे इन सभ्यताओं का विकास हुआ। लेकिन ये नदी घाटी सभ्यताएं थीं। नदियों के किनारे इन सभ्यताओं के विकास का कारण उनके इर्द-गिर्द कृषि-उत्पादन की तय संभावनाएं थीं। पहले ही हम जान चुके हैं कि कृषि-उत्पादन का आरम्भ इन नदियों के किनारे और कई नदियों के बीच के दोआबे में ही हुई क्योंकि वहां नदियों द्वारा लायी गयी उपजाऊ मिटटी पर्याप्तमात्रा में थी और इस पर आसानी से खेती हो सकती थी। फिर इन नदियों का इस्तेमाल जल-मार्ग के रूप में भी किया गया। पहिया बनने के पूर्व से ही मनुष्य नावों से एक जगह से दूसरी जगह जाना सीख चुका था। अब इन नावों से शिल्पियों के लिए आवश्यक पत्थरों व धातु-अयस्कों के आयात और फिर उनके द्वारा निर्मित सामानों का निर्यात संभव हुआ। इन सब से संचार, संवाद, व्यापार आदि की एक व्यवस्था बनने लगी। इन्ही के गर्भ से अंततः एक ऐसी भाषा की रुपरेखा बनने लगी, जो संवाद केलिए जरुरी थे। नगर जीवन और व्यापार संवाद के बिना नहीं चल सकता था। इस संवाद के लिए भाषा और फिर लिपि का निर्माण लाज़िम था, जो धीरे-धीरे हुआ।

संसार की कुछ आरंभिक नदी घाटी सभ्यताओं की जानकारी, जो इतिहासकारों ने खोज-ढूँढ कर हासिल की है उसमे मेसोपोटामिया, मिस्र और सिन्धु घाटी की सभ्यताएं मुख्य हैं। चीन में ह्वांग-हो नदी के किनारे भी ऐसी ही सभ्यता विकसित हुई थी, लेकिन काल-खंड के हिसाब से यह बाद की घटना है। मेसोपोटामिया, मिस्र और सिंधु की सभ्यता के साथ इनका कोई ताल-मेल नहीं है। उपरोक्त तीनों सभ्यताओं के बीच आवा-जाही का भी एक रिश्ता था। इन सब पर आज भी अनुसन्धान-कार्य चल रहे हैं और निरंतर नयी जानकारियाँ मिल रही हैं। ये सभ्यताएं अचानक नहीं बन गयी थी। इनके विकास में लम्बा समय लगा। एक अनुमान से कोई पाँच हज़ार वर्ष ईसापूर्व इनका बनना शुरू हुआ और कम से कम 2600 से 1900 ईसापूर्व तक ये अपने उत्कर्ष पर रहीं। मेसोपोटामिया, मिस्र और सिन्धु सभ्यता के विकास का मुख्य क्षेत्र टिगरिस, युफ्रेटस,नील और सिन्धु नदियां थीं। मेसोपोटामिया का अर्थ होता है दो नदियों के बीच की जगह अथवा दोआबा। इसी दोआबे से बेबीलोन और अक्कड़ की सभ्यताएं विकसित हुईं। बेबीलोन की सभ्यता के जो अवशेष मिले हैं वे आज भी हमें हैरान करते हैं। इन्हें सुमेर सभ्यता भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ के लोग सुमेरियन भाषा बोलते थे। आजकल यह इलाका इराक में है। नील नदी के किनारे जो सभ्यता विकसित हुई, उसने फैरोअ शासकों को विकसित किया जिनके ममी और पिरामिड आज भी देखे जा सकते हैं। लेकिन सिन्धु घाटी की सभ्यता से हम भारतवासियों का जुड़ाव है। इस सभ्यता की जानकारी ने इतिहास सम्बन्धी हमारी अनेक मान्यताओं को छिन्न-भिन्न कर दिया। आगे हम इसी पर विचार करेंगे।

(कॉपी संपादन : नवल)


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