असम : कांग्रेस को न माया मिली न राम

लेखक नजीमुद्दीन सिद्दीकी बता रहे हैं कि किन कारणों से पूर्वोत्तर के राज्य असम में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। उनके मुताबिक इस हार के पीछे कांग्रेस का परिवारवाद और पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के अलावा हिंदुत्व का झंडा फहराने व मुस्लिम वोट बैंक पर कब्ज़ा बनाये रखने की नीति भी है

हालिया लोकसभा चुनाव में असम में तीन चरणों में मत डाले गए. मतदान की प्रक्रिया 11 अप्रैल 2019 से शुरू और 23 अप्रैल 2019 को समाप्त हुई. चुनाव नतीजे, भाजपा और उसके समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए खुशियाँ लेकर आये. भाजपा पार्टी ने राज्य की 14 में से नौ सीटें जीत लीं. यह भाजपा की राज्य में अब तक कि सबसे बड़ी विजय थी. 

दक्षिण भारत को छोड़ कर, देश के प्रायः सभी हिस्सों में मतदाताओं ने भाजपा और उसके शीर्ष नेता नरेन्द्र मोदी का जमकर साथ दिया. कांग्रेस, राष्ट्रीय स्तर पर फिसड्डी साबित हुई. राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और उत्तराखंड सहित कई राज्यों में वह अपना खाता तक नहीं खोल सकी. असम में भी पार्टी अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने और भाजपा के रथ को रोकने में विफल रही. आईए, हम देखें कि असम में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन के पीछे क्या कारण रहे.

सन 2014 के आमचुनाव में कांग्रेस के सफाए के बाद से, पार्टी असम में किसी भी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी. राज्य में सन 2016 में हुए विधानसभा चुनाव, 2018 में हुए पंचायत चुनाव और हालिया लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत बनी. कई विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की चुनावों में लगातार असफलता, राज्य की राजनीति में उसकी बढ़ती अप्रासंगिकता और देश की सबसे पुरानी पार्टी में सक्षम नेतृत्व के अभाव का नतीजा हैं. राज्य में पार्टी के संगठन दमदार नहीं है, आम लोगों से पार्टी का जुड़ाव बहुत कम है और वह अन्य पार्टियों से गठबंधन करने में असफल रही है. इसके अतिरिक्त, राज्य कांग्रेस में कोई भी ऐसा नेता नहीं हैं जो जनता में लोकप्रिय हो. पार्टी में चाटुकारिता की संस्कृति तेजी से विकसित हुई है और उसके नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति भी पार्टी को महंगी पड़ी. 

इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा का चुनाव अभियान बहुत प्रचंड था और पार्टी को आरएसएस द्वारा लम्बे समय से ज़मीनी स्तर पर चलाये जा रहे अभियान का लाभ भी मिला. भाजपा और संघ अपना सन्देश प्रदेश के दूरस्थ गांवों तक पहुँचाने में सफल रहे.  इसके विपरीत, कांग्रेस ज़मीन पर कहीं नज़र ही नहीं आ रही थी. वह पार्टी, जो सन 1970 के पहले तक, एक मज़बूत कैडर-बेस्ड पार्टी थी, अपने सामाजिक आधार को खोती चली गई और उसका स्थान उसके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों ने ले लिया. कांग्रेस का चुनाव प्रचार इतना कमज़ोर था कि वह न तो कहीं दिखाई पड़ रहा था और ना ही सुनायी. आज की कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं और उसके अधिकांश नेता सत्ता और धन के भूखे हैं. ऐसा नहीं है कि भाजपा नेताओं को सत्ता और धन से कोई परहेज़ है परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि पार्टी के कार्यकर्ता उसकी विचारधारा में आस्था रखते हैं.  

एआईयूडीएफ नेता बहरुद्दीन अजमल का दावा है कि उनकी पार्टी का चुनाव के पूर्व कांग्रेस से समझौता हुआ था

भाजपा ने बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (एजीपी) के साथ गठबंधन किया परन्तु कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा. कांग्रेस की आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठजोड़ बनाने में असफलता के कारण कम से कम एक अतिरिक्त सीट (करीमगंज) भाजपा की झोली में चली गयी. एआईयूडीएफ का असम चुनाव में कांग्रेस के साथ गठजोड़ नहीं था परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर वह कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का हिस्सा है. भाजपा लगातार यह दावा करती रही कि कांग्रेस का एआईयूडीएफ से समझौता है परन्तु कांग्रेस ने इस दावे को गलत बताया. इस बीच, एआईयूडीएफ अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से चर्चा हुई थी, जिसके बाद उनकी पार्टी ने तीन को छोड़कर अन्य सभी सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दीं. ऐसा कहा जाता है कि कांग्रेस इस बात के लिए राजी हो गयी थी कि इन तीन सीटों पर वह कमज़ोर उम्मीदवार खड़े करेगी परन्तु उसने इस कथित समझौते का पालन नहीं किया.  

एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन, कांग्रेस के गले की फाँस बन गयी. अगर वह यह स्वीकार करती कि उसने एआईयूडीएफ के साथ समझौता किया है तो मतदाता कांग्रेस को ‘अवैध प्रवासी’ मुसलमानों से जोड़ने लगते. निचले असम और बराक घाटी में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों पर ‘अवैध प्रवासी’ का लेबल चस्पा कर दिया गया है. यद्यपि कांग्रेस ने, सॉफ्ट हिंदुत्व की अपनी राजनीति के तहत, एआईयूडीएफ से दूरी बनाने की भरपूर कोशिश की परन्तु वह इसमें कामयाब नहीं हुई. उसकी रणनीति में विरोधाभास था और उसने एआईयूडीएफ के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास किया क्योंकि उसे पता था कि ऊपरी असम में उसे कुछ मिलने वाला नहीं है.  कांग्रेस आज मुख्यतः मुसलमानों पर निर्भर है – उन मुसलमानों पर, जिन्हें उसने दशकों तक वोट बैंक से अधिक कुछ नहीं माना और जिन्हें उसने विकास के फल चखने ही नहीं दिए. यह विडंबना ही है कि विकल्प के अभाव में असम के मुसलमानों ने सॉफ्ट हिंदुत्व की झंडाबरदार कांग्रेस को ही अपने मत दिए. 

Former chief minister Tarun Gogoi and son Gaurav Gogoi

असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अपने पुत्र गौरव गोगोई के साथ

राज्य में कांग्रेस की एक और समस्या है. वह है तेजतर्रार और सक्रिय नेताओं का घोर अभाव. कांग्रेस, खुशामद की संस्कृति और परिवारवाद के लिए कुख्यात हो गयी है. राज्य कांग्रेस का एक भी नेता ज़मीन से उठ कर नहीं आया है और उन्हें यह पता ही नहीं है कि ज़मीनी स्तर पर किस तरह का राजनैतिक संघर्ष करना होता है. उनमें से कई को असम प्रदेश कांग्रेस समिति में बड़े पदों पर सिर्फ इसलिए बिठा दिया गया है क्योंकि उनके परिवारों का राजनीति में दबदबा है. कार्यकर्ताओं के लिए आगे बढ़ने के अवसरों के अभाव में, पार्टी ने अपनी चमक और ऊर्जा खो दी है. सांसद गौरव गोगोई और विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे हैं. उनके जैसे कई अन्य नेता, राज्य कांग्रेस में महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं. क्या पार्टी का कोई समर्पित, शिक्षित, सक्रिय और सक्षम कार्यकर्ता – जिसे राजनीति विरासत में प्राप्त नहीं हुई हो – यह उम्मीद कर सकता है कि उसे लोकसभा चुनाव में टिकट मिलेगा? इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट ‘नहीं’ है. असमान अवसरों की यह संस्कृति आखिर कब समाप्त होगी?  

कांग्रेस ने घोषणा की है कि वो राज्य में 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में 80 सीटें जीतने को अपना मिशन बनाने जाने रही है. परन्तु जब तक पार्टी अपने संगठन और नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करती, तब तक यह लक्ष्य पाना असंभव होगा. वैसे भी, पार्टी के सामने अब कोई विकल्प भी नहीं है. वह अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है.

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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