शब्द की अग्नियात्रा का शिल्पी : ओमप्रकाश वाल्मीकि

डॉ. एन. सिंह बता रहे हैं कि भले ही ओमप्रकाश वाल्मीकि को देश-दुनिया के पाठक उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ के लिए जानते हों, लेकिन उनका कवि एवं कहानीकार व्यक्तित्व भी काफी महत्वपूर्ण है

कवि और कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950 – 17 नवम्बर 2013) और उनकी आत्मकथा जूठन एक दूसरे के पर्याय से बन चुके हैं। लेकिन उनकी काव्य संवेदना और कथाकार रूप भी उतना ही सशक्त है। उनकी व्यापक संवदेना ने चाहे कथा के रूप में अभिव्यक्ति पायी हो या कविता में, उनका संवरा हुआ शिल्प बरबस पाठक का ध्यान अपनी ओर खींचता है। आलोचकों को उन्होंने झकझोरा है। चूंकि ओमप्रकाश वाल्मीकि की तकनीकी शिक्षा महाराष्ट्र में हुई, अतः वहां पर विकसित हो रही दलित चेतना को उन्होंने ग्रहण किया और धीरे-धीरे हिन्दी में उसे अभिव्यक्ति प्रदान करना प्रारम्भ किया। आज स्थिति यह है कि दलित कविता और दलित कहानी के क्षेत्र में ओमप्रकाश वाल्मीकि एक स्थापित नाम है। उन्होंने हिन्दी साहित्य में अपना एक ऐसा स्थान बना लिया , जो लम्बी साहित्य साधना के बाद ही हासिल होता है।

30 जून 1950 को बरला गांव, जिला मुजफ्फरनगर, उ.प्र. में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि सहज और सरल व्यक्तित्व के धनी थे, कहीं कोई कृत्रिमता उन्हें छू तक नहीं गई थी, तभी तो वे समकालीन लेखकों में इतने लोकप्रिय थे। जैसे-जैसे व्यक्ति साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित होता जाता है, वैसे-वैसे उसके शत्रुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होती जाती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि में शत्रु को भी मित्र बनाने की अद्भुत क्षमता थी। वे अपनी बात को पूरी तार्किकता के साथ कहते थे। उनके स्वभाव की यह विशेषता थी कि वे सही बात कहने से डरते नहीं थे और गलत बात पर अड़ते नहीं थे। यही कारण है कि वे बड़े से बड़े लेखक और बड़ी से बड़ी कृति पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने से नहीं हिचके। मुझे ध्यान है, प्रथम हिन्दी दलित लेखक सम्मेलन, नागपुर के अध्यक्ष पद से दिया गया उनका भाषण, जिसमें उन्होंने प्रेमचन्द की ‘कफन’ कहानी का विवेचन करते हुए उसे दलित विरोधी कहानी कहा था और जब उनका यह वक्तव्य ‘समकालीन जनमत’ में छपा, तो उस पर लगभग वर्ष भर विवाद चलता रहा और अन्ततः यह बहस गाली-गलौच पर जाकर समाप्त हुई। इसी प्रकार उन्होंने ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ (अमृतलाल नागर), ‘परिशिष्ट’ (गिरिराज किशोर) जैसी कृतियों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए और दलित लेखकों के सम्मुख यह अवधारणा रखी कि वे एक-आध कृति या लेखक को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का दलित दृष्टिकोण से पुनर्पाठ करें। जिसकी प्रतिक्रिया धीरे-धीरे सामने आने लगी है। ‘प्रज्ञा साहित्य’ के ‘दलित साहित्य विशेषांक’ (जिसके वे अतिथि संपादक थे) के अपने संपादकीय ‘साहित्य में कठमुल्लापन’ में यथास्थिति वादी लेखकों को उन्होंने आड़े हाथों लिया था और दलित साहित्य की संवेदना को रेखांकित करते हुए लिखा था कि – “वर्ण व्यवस्था से उपजी घोर अमानवीयता, स्वतंत्रता समता विरोधी सामाजिक अलगाव की पक्षधर सोच को परिवर्तित कर बदलाव की प्रक्रिया तेज करना दलित साहित्य की मूलभूत संवदेना है।” उन्होंने दलित साहित्य की अवधारणा को स्पष्ट करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ओमप्रकाश बाल्मीकि की चर्चित आत्मकथा ‘जूठन’

ऐसा भी नहीं कि उनकी दृष्टि अपनों और परायों में भेद करती हो। वे पूरी तटस्थता से दलित लेखकों के अंतर्विरोधों पर भी प्रहार करते हैं। अपनी आत्मकथा के प्रकाशित अंश ‘मैं और मेरा सरनेम’ में यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि दलित लेखक साहित्य में तो दलित चेतना पर बढ़-चढ़कर लिखते और बोलते हैं, लेकिन किसी दूसरे से मिलते समय अपनी तो जाति छुपाते ही हैं, दूसरों को छुपाने के लिए प्रेरित भी करते हैं। क्या इससे दलित समस्या का कोई निदान हो पाएगा?

ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950 -17 नवम्बर 2013)

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य-सृजन का प्रारम्भ कविता से ही किया था। उन्होंने कविता के संबंध में अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि – “मेरे लिए कविता कला से ज्यादा, जीवन की अदम्य लालसा, गतिशीलता की संवाहक है, जो हमारी पीड़ा, हमारे सुख-दुःख की अभिव्यक्ति है, जिसमें हम अपने वर्तमान का प्रतिबिम्ब शिद्दत के साथ देख सकें। जो जीवन की विद्रूपताओं से जूझने का हौसला दे… सच्ची और सही कविता है, जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला रखती हैं।” और हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ने छद्म चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक, उसका पर्दाफाश करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उनकी कविताएं हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तो ससम्मान छपती ही रही हैं, उनके तीन काव्य संग्रह ‘सदियों के संताप’ के अतिरिक्त ‘बस्स! बहुत हो चुका’ तथा ‘अब और नहीं’ भी प्रकाशित हुए हैं। ‘सदियों का संताप’ की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए श्रीकृष्ण शलभ ने लिखा है कि – “ओम का कवि तिक्तता में जीता है, स्थितियों पर दूर तक सम्यक दृष्टि रखकर अपने धारदार चिन्तन से उन्हें विश्लेषित करता है। परन्तु हुंकार के साथ। उसमें वर्तमान से संघर्ष करने का उच्छाह है, भविष्य के प्रति आश्वस्ति है। अंधेरों को मात्र जुगनुओं के सहारे नहीं, सूरज के सहारे धकियाने का सार्थक प्रयास है- ओम का रचना संसार। जिसके शब्द-चिन्तन में कहीं एक प्रकाश-पर्व अन्तर्निहित है।” (सुमन लिपि, नवम्बर-1995, पृ.40) निश्चय ही ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिन्दी दलित कविता को एक नई दिशा दी है। इसके अतिरिक्त उनका एक और कविता संग्रह ‘बस्स! बहुत हो चुका’ भी प्रकाशित हुआ है। उन्हें सबसे अधिक प्रतिष्ठा अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ तथा ‘जूठन’ (दूसरा खण्ड) के कारण मिली। जिसके कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि का कविता संग्रह ‘सदियों का संताप’

कथाकार के रूप में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है और हिन्दी साहित्य में अपना एक अलग और महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। सच तो यह है कि उनकी कहानियां शिल्प के दृष्टिकोण से हिन्दी के किसी भी बड़े कथाकार की तुलना में रखी जा सकती है। हिन्दी कहानी के सुप्रसिद्ध आलोचक जानकी प्रसाद शर्मा ने अपने लेख ‘कहानीः परम्परा से रिश्ता और समकालीन दृष्टि’ (आजकल-मई-1995) में उन्हें हिन्दी दलित कथा का प्रमुख कथाकार माना है तथा उनकी कहानी ‘भय’ पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं कि – “ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘भय’ कहानी काबिले जिक्र है। यह कहानी वर्ण और वर्ग के अन्तर्विरोधों को बड़ी बारीकी से उद्घाटित कर देती है। यहां दलितों की समस्या का एक विशिष्ट आयाम मौजूद हैं। वह यह है कि एक ओर मझोले नौकरी पेशावर्ग की कृत्रिम सम्भ्रान्तता है। यह सम्भ्रान्तता की ग्रंथि इतनी प्रबल हो जाती है कि व्यक्ति वर्ण को लेकर अतिरिक्त रूप से सजग हो जाता है और ऊंची जातियों से मिलने वाले अपमान के कारण वह अपनी वर्णगत पहचान को छुपाना चाहता है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह वर्गीय पहचान से जुड़ना चाहता है बल्कि एक मिथ्या चेतना से मुक्त होकर वह दूसरी मिथ्या चेतना से जुड़ जाते हैं। दूसरी ओर अपनी जाति के रीति-रिवाज प्रेत की तरह उसके पीछे लगे रहते हैं। ‘भय’ कहानी का दिनेश इन्हीं अन्तर्विरोधों की गिरफ्त में कसमसाता रहता है। उसे माई मदारन की पूजा के लिए सुअर के बच्चे का ताजा मांस भी चाहिए और उसे इस बात का भय भी है कि कहीं पड़ोसी ब्राह्मण को उसकी जाति का पता न चल जाए। कथाकार की निरीक्षण क्षमता अद्भुत है, ‘भय’ के अतिरिक्त उनकी ‘ग्रहण’, ‘बैल की खाल’, ‘कहां जाए सतीश’, और ‘कुचक्र’, आदि दलित चेतना की अद्भुत कहानियां हैं, जो उनके ‘सलाम’ तथा ‘घुसपैठिये’ कहानी संग्रहों में संकलित हैं। ‘सफाई देवता’ भी उनका एक अन्य महत्वपूर्ण कथा संग्रह है। उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए प्रतिष्ठित दलित लेखक कंवल भारती ने लिखा है कि “हालांकि ओमप्रकाश वाल्मीकि को सबसे ज्यादा सफलता उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ से मिली, पर सत्य यह है कि अनुभूतियों का सर्वाधिक विस्तार उनकी कहानियों में हुआ है। उन्होंने नई कहानी के दौर में दलित कहानी की रचना करके नई कहानी के अलम्बरदारों को यह बताया कि नई कहानी में व्यक्ति की अपेक्षा समाज तो अस्तित्व में है पर दलित समाज उसमें भी मौजूद नहीं है। ‘सलाम’, ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’, ‘रिहाई’, ‘सपना’, ‘बैल की खाल’, ‘गोहत्या’, ‘ग्रहण’, ‘जिनावर’, ‘अम्मा’, ‘खानाबदोश’, ‘कुचक्र’, ‘घुसपैठिये’, ‘प्रमोशन’, ‘हत्यारे’, ‘मैं ब्राह्मण नहीं हूं’ और ‘कूड़ाघर’ जैसी कहानियों ने यह बताया कि यथार्थ में नई कहानी वह नहीं है जिसे राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे बल्कि वह है जिसमें हाशिये का समाज अपने सवालों के साथ मौजूद है।” इसके अतिरिक्त हिन्दी दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र को स्पष्ट करने में उनकी पुस्तक “दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अतिरिक्त उनकी – “मुख्य धारा और दलित साहित्य’, “दलित साहित्य : अनुभव संघर्ष एवं यथार्थ” पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं। इसके अलावा ओमप्रकाश वाल्मीकि को नाटकों में अभिनय, निर्देशन एवं लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त हुई।

उन्हें दर्जनों पुरस्कार एवं समान मिले। भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली ने भी उन्हें “डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार-1993’’ प्रदान किया और वे प्रथम हिन्दी दलित लेखक साहित्य सम्मेलन नागपुर के अध्यक्ष पद पर आसीन भी रहे। उन्हें ‘परिवेश सम्मान-1995’ मिला। इसके अतिरिक्त उन्हें, कथाक्रम सम्मान (2001), न्यू इंडिया बुक पुरस्कार (2004), 8वां विश्व हिन्दी सम्मेलन (2007), न्यूयार्क, अमेरिका सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान (2008) से भी सम्मानित किया गया।

(संपादन- सिद्धार्थ/ इमामुद्दीन)


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