h n

संसद में ओबीसी के लिए 50% आरक्षण ज़रुरी क्यों?

लोकसभा में कुल 543 सदस्य होते हैं। वर्तमान में 232 हिंदू सवर्ण जातियों के हैं। जबकि 50 फीसदी से अधिक आबादी वाले ओबीसी जातियों के सांसदों की संख्या महज 120 है। वाईएसआर कांग्रेस के सांसद विजय साई रेड्डी के गैर सरकारी विधेयक को भले ही संसद की मंजूरी न मिले, लेकिन बहस की शुरुआत हो चुकी है। जै़ग़म मुर्तजा की रिपोर्ट

विजय साई रेड्डी के गैर सरकारी विधेयक को अनेक दलों के सांसदों ने दिया समर्थन

विधायिका में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 50 फीसदी आरक्षण मिले। हाल ही में वाईएसआर कांग्रेस सांसद विजय साई रेड्डी ने इस संबंध में एक ग़ैर सरकारी विधेयक पेश किया जिसे तमाम दलों का समर्थन मिला। इसके साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग या ओबीसी के लोगों को आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व दिये जाने की मांग फिर ज़ोर पकड़ती नज़र आ रही है। हालांकि सरकार से लेकर विपक्ष तक सभी ओबीसी के हित की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या वाक़ई में ये दल आगे बढ़कर इस तरह के आरक्षण का समर्थन करेंगे?

हालांकि ओबीसी वर्ग को पंचायती राज की तरह संसद और विधानसभाओं में आरक्षण की मांग लंबे समय से उठती रही है। लेकिन ताज़ा बहस की शुरुआत 21 जून , 2018 को हुई। लोक सभा में विजय साई रेड्डी ने संविधान (संशोधन) विधेयक (नये अनुच्छेद 330 क और 332क का अंत:स्थापन) पेश करते हुए कहा कि देश की आबादी में 50% से ज़्यादा हिस्सेदारी होने के बावजूद संसद और राज्य विधानसभाओं में इस वर्ग का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि अनुपात के लिहाज़ से आरक्षण की व्यवस्था के अभाव में संविधान की व्यापक भागीदारी वाले लोकतंत्र की अवधारणा साकार नहीं हो पा रही है।

विधायिका में ओबीसी को मिले 50 फीसदी आरक्षण। इस संबंध में संसद में गैर सरकारी विधेयक पेश करने वाले वाईएसआर कांग्रेस के सांसद विजय साई रेड्डी

द्रमुक सांसद टी.के.एस. ईलनगोवन, कांग्रेस के. एल. हनुमंतैया और छाया वर्मा, सपा के विश्वंभर प्रसाद निषाद, अन्नाद्रमुक के एन. गोकुलकृष्णन, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, के अलावा बीजेपी सांसद रामकुमार वर्मा, अजय प्रताप सिंह और अमरशंकर साबले ने भी इस बिल की भावना का समर्थन किया। हालांकि ग़ैर सरकारी विधेयक होने के नाते इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना बिल्कुल भी नहीं है लेकिन इससे इस मुद्दे पर चर्चा तो शुरु हुई ही है।

वर्तमान लोकसभा में ओबीसी

वर्गसदस्यप्रतिशत
एसटी*529.5
एससी*8615.8
ओबीसी12022.09
हिंदू सवर्ण23242.7
*विधायिका में आरक्षण

अब बड़ा सवाल यह है कि ओबीसी आख़िर संसद या विधानसभाओं में आरक्षण क्यों चाहते हैं। विधेयक पेश करने वाले विजय साई रेड्डी का कहना है कि संविधान में नए अनुच्छेद 330 क तथा 332 क शामिल किए बिना ओबीसी को उनका अधिकार नहीं मिलने वाला है। वे हाल ही में हुए लोक सभा चुनाव का हवाला देते हैं। 2019 में हुए चुनाव में ओबीसी सांसदों की हिस्सेदारी 23 फीसदी से भी कम है।

मनोज झा, राजद सांसद, राज्यसभा

इस मुद्दे पर आरजेड़ी सांसद मनोज झा कहते हैं कि देश में 3,743 जातियां ओबीसी के तहत आती हैं। इनमें से 2 हज़ार से ज़्यादा ऐसी हैं जिन्हें संसद में आज तक हिस्सेदारी नहीं मिली। हालांकि जातीय आधार पर जनगणना के आंकड़े सामने नहीं आए हैं लेकिन इस बात से किसी को इंकार नहीं है कि देश की आबादी में ओबीसी की तादाद 52% फीसदी से ज़्यादा है। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसे क़रीब 52 फीसदी माना था। इसके बावजूद ओबीसी को आरक्षण में हिस्सेदारी मिली महज़ 27 फीसदी। उसपर भी क्रीमी लेयर जैसी तमाम शर्तें लागू होती हैं।

दरअसल, जीत कर आए कुल 543 सांसदों में से महज़ 120 ओबीसी हैं, 86 अनुसूचित जाति से जबकि 52 अनुसूचित जनजाति के हैं। एससी और एसटी सांसद आरक्षित सीटों से ही जीतकर आए हैं। यानि सामान्य सीट पर इनकी जीत की कल्पना करना भी आसान नहीं है। जबकि कुल जीते सांसदों में हिंदू सवर्ण जातियों से आने वालों की गिनती 232 है। ऐसे में आनुपातिक आरक्षण की मांग ग़ैर-वाजिब नहीं लगती है। विजय साईं रेड्डी ने चर्चा शुरु तो की है लेकिन इस मुद्दे पर लड़ाई अभी लंबी है। ख़ासकर जिस तरह सवर्ण जातियों का तंत्र में दबदबा है, उसके मद्देनज़र ज़रुरी हिस्सेदारी हासिल करने में अभी काफी वक़्त लग सकता है।

(कॉपी संपादन : नवल)

परिवर्धित : 27 जुलाई, 12.30 रात्रि


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

संबंधित आलेख

जातिवादी व सांप्रदायिक भारतीय समाज में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता
डॉ. आंबेडकर को विश्वास था कि यहां समाजवादी शासन-प्रणाली अगर लागू हो गई, तो वह सफल हो सकती है। संभव है कि उन्हें यह...
किसान आंदोलन के मुद्दों का दलित-भूमिहीनों से भी है जुड़ाव : मुकेश मलोद
‘यदि सरकार का नियंत्रण नहीं होगा तो इसका एक मतलब यह भी कि वही प्याज, जिसका वाजिब रेट किसान को नहीं मिल रहा है,...
कह रहे प्रयागराज के बहुजन, कांग्रेस, सपा और बसपा एकजुट होकर चुनाव लड़े
राहुल गांधी जब भारत जोड़ो न्याय यात्रा के क्रम में प्रयागराज पहुंचे, तब बड़ी संख्या में युवा यात्रा में शामिल हुए। इस दौरान राहुल...
उत्तर प्रदेश में राम के बाद कल्कि के नाम पर एक और धार्मिक ड्रामा शुरू
एक भगवाधारी मठाधीश ने हमारे प्रधानमंत्री को कल्कि भगवान के मंदिर के लिए भूमि-पूजन का न्यौता दिया, और उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया, पलट...
महाराष्ट्र : दो अधिसूचनाओं से खतरे में एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण, विरोध जारी
सरकार ने आरक्षण को लेकर 27 दिसंबर, 2023 और 26 जनवरी, 2024 को दो अधिसूचनाएं जारी की। यदि ये अधिसूचनाएं वास्तव में लागू हो...