खुद की नयी छवि गढ़ते रमेश पोखरियाल निशंक

दिसंबर, 2014 में रमेश पोखरियाल निशंक ने संसद में कहा था कि विज्ञान ज्योतिष शास्त्र के आगे बौना है। तब उनके इस बयान पर विवाद भी हुआ था। लेकिन पांच वर्ष बाद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में वे अपनी एक नयी छवि गढ़ते दिख रहे हैं

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक इन दिनों चर्चा में हैं। लोक सभा में हाल के दिनों में दिए गए उनके बयानों से लोग अंदाज़ा लगा रहे हैं कि उच्च शिक्षा के ढांचे में जल्द ही कुछ बड़े बदलाव हो सकते हैं। हालांकि ये अभी कयास हैं और जब तक नतीजे सामने न आ जाएं इस पर कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन फिर भी कुछ सकारात्मक सोच रखने में कुछ बुराई नहीं है।

केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की छवि एक ऐसे नेता के रूप में रही है जो विज्ञान को ज्योतिष शास्त्र के आगे बौना मानते हैं। इस तरह का उनका एक बयान दिसंबर 2014 में संसद में विवाद का विषय बन गया था। इस बार जब नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में उन्हें मानव संसाधन विकास विभाग का मंत्री बनाया गया तब सोशल मीडिया पर उनके उपर फब्तियां कसी गयीं। जाहिर तौर पर इन फब्तियों में उनके द्वारा पूर्व में दिया गया बयान का असर था। लोगों का कहना है कि बतौर मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पूर्व के जैसा ही बयान देंगे और उनके कारण उच्च शिक्षा जगत में गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे।

लेकिन, निशंक ने अब तक अपने पुरानी छवि को खुद से दूर रखा है। मसलन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री पद का संभालने के साथ ही रमेश पोखरियाल निशंक ने सबसे पहले 1 जुलाई 2019 को केंद्रीय शैक्षणिक संस्था (शिक्षक के काडर में आरक्षण) विधेयक-2019  को लोकसभा में पारित कराया। इसमें केंद्रीय उच्च शिक्षक संस्थानों में सीधी भर्ती में विभाग वार आरक्षण की बजाय संस्थान को इकाई मानने और 200 प्वाइंट पोस्टर प्रणाली को लागू करने का प्रावधान है। इस विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि इस विधेयक से यह बात साबित हो गई कि सरकार को कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की चिंता है। उन्होंने कहा कि अगर विभाग वार आरक्षण की व्यवस्था लागू होती तो अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ों को सामाजिक न्याय नहीं मिल पाता।

14 जुलाई, 2019 को प्रभाष जोशी व्याख्यानमाला को संबोधित करते केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक

इसी प्रकार प्रगतिशील सोच को आगे रखते हुए 15 जुलाई 2019 को मानव संसाधन विकास मंत्री ने लोकसभा में कहा कि सत्र 2020-21 से इंजीनियरिंग में ऐसे पाठ्यक्रमों को अनुमति नहीं दी जाएगी जिनमें रोज़गार पाने की संभावना कम है। शून्य काल में पूरक प्रश्नों के जवाब देते हुए निशंक ने कहा कि अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसे पाठ्यक्रमों को तरजीह मिलेगी जिनकी दुनिया भर में मांग बढ़ रही है। उन्होंने दावा किया कि इंजीनियरिंग के छात्रों को सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

बीजेपी सांसद रामचरण बोहरा के प्रश्न के जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्री ने बताया कि एआईसीटीई से अनुमोदित संस्थानों से वर्ष 2017-18 में कुल 7,92,970 छात्रों ने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की लेकिन इनमें से 3,59,193 का ही कैंपस प्लेसमेंट हो पाया। आईआईटी, आईआईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों के हालात हालांकि थोड़े बेहतर हैं लेकिन इन प्रीमियम संस्थानों के सभी छात्र नौकरी पाने में कामयाब नहीं हो पाते हैं। 2018-19 के सत्र में 23,298 छात्रों ने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की लेकिन इनमें से 5352 इंजीनियरिंग स्नातक अभी भी नौकरी की तलाश में हैं।

इन तमाम छात्रों को नौकरी न मिलने की कई वजहें हैं। इनमें ज़रुरी जानकारी का अभाव, नौकरी के लिए ज़रूरी योग्यता की कमी और ज़रुरत के हिसाब से ख़ुद को न ढाल पाना शामिल हैं। लेकिन इसके अलावा कई पाठ्यक्रमों में समय के हिसाब से बदलाव नहीं हुआ है और ये कोर्स उद्योग की ज़रुरतों के हिसाब से फिट नहीं हैं। ऐसे में मानव संसाधन विकास मंत्री का संसद में दिया बयान काफी अहम हो जाता है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने दावा किया है कि एनआईटी के पाठ्यक्रम में बदलाव के लिए बनी समिति की रिपोर्ट को भी मान लिया गया है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर देश के सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक

तो क्या उच्च शिक्षा में सुधार के लिए वाक़ई गंभीर हैं? हाल के दिनों में जिस तरह की सक्रियता मानव संसाधन विकास मंत्री ने दिखाई है और जिस तरह के बयान दिए हैं उसके मद्देनज़र ये सवाल उठना लाज़िमी है। इसकी बानगी ‘केंद्रीय विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2019’ पर चर्चा क दौरान भी देखने को मिली। 12 जुलाई को संसद में बीजेपी सांसद एस.पी. सिंह बघेल ने कहा कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आंध्र प्रदेश में जो जनजातीय विश्वविद्यालय स्थापित होने जा रहा है वो दूसरा जेएनयू नहीं बन पाए। इस पर केंद्रीय मंत्री ने जवाब दिया कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानि जेएनयू शोध के मामले में दुनिया के शीर्ष संस्थानों में से एक है। हालांकि जब केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कुछ लोगों ने जेएनयू को बदनाम किया है तो इसपर विवाद भी हुआ। बीएसपी सांसद कुंवर दानिश अली समेत कई सदस्यों ने आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्री ख़ुद एक केंद्रीय विश्वविद्यालय को बदनाम कर रहे हैं। हालांकि ये पुराना विवाद है लेकिन केंद्रीय मंत्री इससे बच सकते थे।

इसके अलावा शिक्षकों की भर्ती और विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलरों की नियुक्ति समेत तमाम मुद्दे हैं जिनपर केंद्रीय मंत्री ने सकारात्मक रुख़ दिखाया है। 15 जुलाई को निशंक ने लोक सभा में जानकारी दी कि दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के 165  पद, एसोसिएट प्रोफेसर के 428 पद और सहायक प्रोफेसर के 263 पद रिक्त हैं। इनमें सहायक प्रोफेसर के 263 पदों के लिए 02 जुलाई को विज्ञापन जारी कर दिया गया है।

इससे पहले 12 जुलाई को उन्होंने लोक सभा को आश्वस्त किया था कि केंद्र की वित्तीय सहायता से चलने वाले तमाम संस्थान और विश्वविद्यालयों में ख़ाली पड़े क़रीब 7 हज़ार शैक्षणिक पद जल्द भरे जाएंगे। केंद्रीय विश्वविद्यालय संशोधन अधिनियम, 2019 पर चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री ने दावा किया कि भर्ती प्रक्रिया को युद्धस्तर पर चलाया जाएगा।

भाषा के मुद्दे पर भी केंद्रीय मंत्री का रवैया आश्वस्त करने वाला है। तमाम हिंदू संगठनों की सक्रियता और हिंदी को देश भर में लागू करने को लेकर जारी विवाद के बीच उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार ऐसा कुछ नहीं करेगी। नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर उठे विवाद के बीच 2 जून को निशंक में भरोसा दिलाया कि किसी प्रदेश पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। इसके बाद उनके मंत्रालय के अफसरों ने सफाई दी कि यह मसौदा रिपोर्ट है और इसे लेकर अभी कोई नीति नहीं बनी है।

बहरहाल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में रमेश पोखरियाल निशंक अभी तक विवादों से बचते नज़र आए हैं लेकिन पार्टी की नीति और सहयोगी संगठनों के अलावा आरएसएस का दबाव झेलना उनके लिए आसान नहीं होगा। नई शिक्षा नीति लागू होने में देरी की वजह भी आरएसएस का दख़ल ही बताया जा रहा है। इसे लेकर संघ पिछले मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर से नाराज़ भी बताया गया था। ज़ाहिर तौर पर शैक्षणिक नियुक्तियां, आरक्षण, इतिहास में अनुकूल फेरबदल और पाठ्यक्रम में अंग्रेज़ी, वैदिक विज्ञान जैसे तमाम मुद्दे हैं जिनमें मानव संसाधन विकास मंत्री की असली परीक्षा होनी है।

(कॉपी संपादन : नवल)


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