जी न्यूज पर खबर के बाद रतन लाल को जान से मारने की धमकी

“जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे/ कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे जो विरोध में बोलेंगे/ सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना/ जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे।” देश के प्रतिष्ठित जनवादी, मार्क्सवादी कवि राजेश जोशी की कविता के आईने में पढ़ें कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट

प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू काॅलेज के प्रो. रतन लाल को उनके मोबाइल पर जान से मारने की धमकी दी गयी है। उन्हें यह धमकी जी न्यूज के टीवी शो के बाद दी गयी। टीवी शो में दलित-बहुजनों के सवालों को लेकर मुखर रहने वाले प्रो. रतन लाल को “टुकड़े टुकड़े गैंग” के “टोल फ्री एजेंडा” चलाने वालों में शामिल बताया गया। साथ ही उन्हें ‘देश की बदनामी का सूत्रधार’ कहा गया। यह शो जी न्यूज द्वारा 16 जुलाई 2019 को शाम में प्रसारित किया गया।

इस टीवी शो के बाद प्रो. रतन लाल को घर से उठा लेने और जान से मारने की धमकी मिली है। दलित परिवार से आने वाले प्रोफेसर रतन लाल को धमकी देने वाले शख्स ने फोन पर यह भी कहा कि किसी भी दलित को सत्तर और अस्सी के दशक की तरह रहना सीखना होगा नहीं तो घर से उठा लिया जाएगा। पूरे मामले में प्रो. रतन लाल ने 18 जुलाई 2019 को मॉरिस नगर पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दर्ज कराई है।

इस संबंध में प्रो. रतन लाल ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि उन्होंने मामला दर्ज करा दिया है और अब उन्हें पुलिस के द्वारा की जाने वाली कार्रवाई का इंतजार है। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज के प्रो. रतन लाल और जी न्यूज द्वारा प्रसारित कार्यक्रम का स्क्रीन शॉट

ध्यातव्य है कि प्रो. रतन लाल देश के उन सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों में शामिल रहे हैं जिन्होंने हाल के वर्षों में पूरे देश में एक बहुजन सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान बनायी है। फिर चाहे वह 200 प्वाइंट रोस्टर का सवाल हो या फिर मॉब लिंचिंग के विरोध का, वे मुखर रहे हैं। अभी हाल ही में 15 जुलाई 2019 को दिल्ली में मॉब लिंचिंग के खिलाफ देशभर में हेल्पलाइन शुरू की गयी। इसमें भी प्रो. रतन लाल की अहम भूमिका रही।

फारवर्ड प्रेस से बातचीत में प्रो. रतन लाल ने हैरानी जाहिर की है कि कैसे एक चैनल खुलेआम मॉब लिंचिंग को बढ़ावा देने का काम कर रहा है और उस पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं हो रही है। उलटा उनको कहा जा रहा है कि वो देश को बदनाम करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह महज संयोग नहीं है कि उग्र तरीके से हिंदुओं को उकसाने वाले ज़ी न्यूज के कार्यक्रम के प्रसारण के कुछ ही समय बाद उनको धमकी भरा फोन मिला। उन्होंने कहा कि टीवी शो के संबंधित कार्यक्रम के पैनल डिस्कसन में वो शामिल नहीं थे लेकिन उनका नाम जिस तरह से लगातार फ्लैश किया गया, जान से मारने और घर से उठा लेने वाला फोन आना इसी की नतीजा है।

प्रो. रतन लाल, हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में प्रो. रतन लाल ने कहा है, “16 जुलाई 2019 को जी न्यूज (समाचार चैनल) ने उनके खिलाफ एक आपत्तिजनक खबर चलाई (स्क्रीन शॉट और फोटो कापी संलग्न) और कल रात 17-7-2019 को देर शाम 9.20 बजे 4 मिनट 56 सेकेंड तक एक व्यक्ति 8826997334 नंबर से मुझे लगातार गाली और धमकी देता रहा। उसने कहा कि “सत्तर और अस्सी के दशक का बिहार याद है ना… औकात में रहो नहीं तो धरती से उठा लेंगे। संबंधित व्यक्ति ने अपना नाम और पता नहीं बताया।

प्रो. रतन लाल ने लिखित शिकायत में यह भी कहा है कि “महोदय, मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू काॅलेज के इतिहास विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हूं और दो दशक से शिक्षण कार्य और लेखन के अलावा सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहता हूं। मेरी सामाजिक पहचान सार्वजनिक है और फोन करने वाले की ‘सोच’ को समझा जा सकता है। उनके अनुसार हम दलितों को 70 और 80 के दशक की तरह रहना चाहिए नहीं तो धरती से उठा लेंगे…।” 

शिकायत में प्रो. रतन लाल ने जी न्यूज और फोन पर धमकी देने वाले के खिलाफ केस दर्ज करके जांच शुरू करने और परिवार को सुरक्षा देने की मांग की है।

दिल्ली पुलिस की सुस्ती या फिर अभियुक्त को बचाने की कोशिश 

हालांकि इस संबंध में मॉरिस नगर पुलिस द्वारा कोई ठोस पहल नहीं की गयी है। फारवर्ड प्रेस ने इस मामले को लेकर मॉरिस नगर थाने के प्रभारी से बातचीत की। उन्होंने कहा कि मामले की जांच की जा रही है। इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

फारवर्ड प्रेस ने जब उस नंबर पर फोन किया जिसके जरिए प्रो. रतन लाल को धमकी दी गयी तो घंटी जाती रही, लेकिन इसे किसी ने उठाया नहीं। मोबाइल एक ‘ट्रू कॉलर’ के द्वारा जो नाम प्रदर्शित की जा रही है, वह ‘फिक्लाफिकडज फी फा जी डा’ है। इस प्रकार पहली ही नजर में यह नंबर संदिग्ध जान पड़ता है। 

जी न्यूज के द्वारा प्रसारित कार्यक्रम का स्क्रीन शॉट

हालांकि इसी संदिग्ध नबंर से वापस इन पंक्तियों के लेखक को कॉल आई लेकिन फोन करने वाले ने कोई बात नहीं की और दो-तीन बार हैलो सुनकर फोन काट दिया। जाहिर है ऐसे नंबर को पुलिस को ट्रेश करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। 

लेकिन, पुलिस को मानो कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। प्रो. रतन लाल के द्वारा कराए गए प्राथमिकी में उद्धृत है कि यह मामला मॉरिस नगर के सब इंस्पेक्टर रोहित को सुपूर्द कर दिया गया है। फारवर्ड प्रेस ने जब उनसे संपर्क कर अब तक हुई कार्रवाइयों के बारे में जानना चाहा तो उनका नंबर पहले तो व्यस्त आता रहा लेकिन फिर कवरेज क्षेत्र से बाहर हो गया। वहीं मॉरिस पुलिस स्टेशन में तैनात अधिकारी ने दूरभाष पर कहा कि वे इस पूरे मामले से अनजान हैं।

सनद रहे कि दिल्ली में पुलिस की व्यवस्था केंद्र सरकार के जिम्मे है।

अभियान में शामिल होने का नतीजा

बहरहाल, प्रो. रतन लाल को धमकी दिये जाने की खबर से देश भर के बुद्धिजीवी चिंतित हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की बिरादरी से लेकर छात्र जगत ने इस बारे लगभग एक राय है कि इसके पीछे वे तत्व सक्रिय हैं जो मॉब लिंचिंग को लेकर किसी तरह से भी फ्रिक्रमंद नहीं हैं बल्कि उसे बढ़ावा देने के संलिप्त रहे हैं। भीड़ की हिंसा के खिलाफ 15 जुलाई को जो नंबर देश के बुद्धिजीवी समाज और संस्कृतिकर्मियों ने जारी किया है, उससे प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की देश-विदेश में खासी किरकिरी हुई है। जाहिर है, इस सबसे सरकार से जुड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी और उसके कथित धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन के कार्यकर्ताओं को ये रास नहीं आ रहा है और वो किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं।

आखिर कौन रोकेगा हिंसक भीड़ को

लेकिन सच्चाई यही है कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से लेकर अब तक मॉब लिंचिंग में जितने लोग मारे जा चुके हैं उनकी संख्या किसी उत्तर प्रदेश के मेरठ या बिहार के भागलपुर के दंगों में मारे गए लोगों से कहीं ज्यादा है। ध्यान देने योग्य वाली बात एक ये भी है कि भारत सरकार का अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो इस तरह की हिंसा के कोई रिकॉर्ड नहीं रखता या फिर आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करता। मॉब लिंचिंग के शिकार लोगों में मुसलमानों के अलावा दलित भी हैं जो पशुओं के शरीर से चमड़े उतारने का काम करते हैं।

टीवी टुडे की एक रिपोर्ट में मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के शुरुआती तीन साल के आंकड़ों के मुताबिक मोहम्मद अखलाक से लेकर रकबर खान तक मॉब लिंचिंग के 134 मामले आए। 2015 से 2017 तक 68 लोगों मारे गए। इनमें दलितों के साथ हुए अत्याचार भी शामिल हैं। लेकिन गोरक्षा के नाम पर 2015 में 12 मामलों में 10 लोगों की पीट-पीट कर मार डाला गया जबकि 48 लोग ज़ख्मी हुए। 2016 में गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्डी की वारदातें दोगुनी हुईं जब 24 ऐसे मामलों सामने आए, 8 लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं जबकि 58 लोगों को पीट-पीट कर बदहाल कर दिया गया। 2017 में तो गोरक्षा के नाम पर गुंडई करने वाले बेकाबू ही हो गए। रिपोर्ट के मुताबिक, 37 ऐसे मामले हुए जिनमें 11 लोगों की मौत हुई. जबकि 152 लोग ज़ख्मी हुए। 2018 में शुरू के दो महीने में 9 मामले सामने आए जिनमें 5 लोग मारे गए और 16 लोग ज़ख्मी हुए। तीन सालों के भीतर गोरक्षा के नाम पर कुल 85 गुंडागर्दी के मामले सामने आए जिनमें 34 लोग मरे गए और 289 लोगों को अधमरा कर दिया गया। 

अब जबकि मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल है और अहिंसा के पुजारी बापू की जयंती धूमधाम से मनाए जाने की तैयारी है, तब खबर आई कि उत्तर प्रदेश में मॉब लिंचिंग के खिलाफ राज्य सरकार कानून बना रही है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके फौरन बाद यानी इसी महीने जुलाई 2019 में केंद्र सरकार ने साफ किया है कि भीड़ हिंसा के खिलाफ कोई कानून नहीं लाया जा रहा है।

ऐसे में स्थिति यथावत रहेगी। भीड़ को उकसाया-भड़काया जाता रहेगा। धार्मिक उन्माद में अंधी बेकाबू भीड़ किसी निर्दोष को मौत के घाट उतारती रहेगी। लेकिन कानून खामोश रहेगा। जाहिर है, इस स्थिति में प्रो. रतन लाल ही नहीं, भारत के कई रत्न हिंसा की धमकी से डरे-सहमे रहेंगे या फिर हिंसा का शिकार होकर मारे जाएंगे।

इन परिस्थितियों में राजेश जोशी की कविता की पंक्तियां याद कर सकते हैं- “जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे/ कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे…जो विरोध में बोलेंगे/ जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे…/ जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे/ धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में/ गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएँगे/ सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना/ जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे।”

(कॉपी संपादन : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply