अनुच्छेद 370 : माफ कीजिए, आपके पास बहुमत नहीं, बहुसंख्या है; मत नहीं, मतविहीन मुंड हैं

महात्मा गांधी के विचारों पर चलने वाले प्रमुख संगठनों व बुद्धिजीवियों ने कश्मीर के मुद्दे पर अपनी चिंताएं देश के सामने रखी हैं। उनका कहना है कि बहुमत के गुमान में डूबी सरकार ने भारत को एक ऐसी अंधी सुरंग में डाल दिया है, जिससे निकलना संभव नहीं होगा

दिन-दहाड़े एक पूरा राज्य ही देश के नक्शे से गायब हो गया है – भारतीय संघ के 28 राज्य थे, अब 27 ही बचे! यह कोई जादू नहीं है कि अचंभित हो कर हम इसका मजा लें। जादू के खेल में हमें पता होता है कि हम जो देख रहे हैं वह यथार्थ नहीं है, जादू है, माया है। लेकिन यहां जो हुआ है वह ऐसा यथार्थ है जो अपरिवर्तनीय-सा है, कुरूप है, क्रूर है, अलोकतांत्रिक है और हमारी लोकतांत्रिक राजनीति की दारिद्रय का परिचायक है।

आपातकाल के दौरान भी लोकसभा का ऐसा अपमान नहीं हुआ था, और न तब के विपक्ष ने उसका ऐसा अपमान होने दिया था। यह लोकतांत्रिक पतन की पराकाष्ठा है। कहा जा रहा है कि लोकतंत्र बहुमत से  चलता है, और बहुमत हमारे पास है। लेकिन यह बात बड़ी आसानी से छिपायी जा रही है कि ‘बहुमत’ शब्द में ही उसका यह मतलब निहित है कि वहां बहु-मत होना ही चाहिए – विभिन्न मतों का विमर्श! लोकतांत्रिक संसद की यही पहचान है। राज्यसभा और लोकसभा में उन दो दिनों में क्या मतों का कोई आदान-प्रदान हुआ? बस, एक आदमी चीख रहा था, तीन सौ से ज्यादा लोग मेजें पीट रहे थे और बाकी पराजित, सर झुकाए बैठे थे। यह बहुमत नहीं, बहुसंख्या है। आपके पास मत नहीं, मतविहीन सर हैं।

  इतिहास ने हमें कश्मीर सौंपा था इस चुनौती के साथ कि हम इसे अपने भूगोल में समाहित करें। दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण शायद ही होगा कि जिसमें एक भरा-पूरा राज्य समझौता-पत्र पर दस्तखत कर के किसी देश में सशर्त शरीक हुआ हो। कश्मीर ऐसे ही हमारे पास आया था और हमने उसे स्वीकार किया। अनुच्छेद-370 इसी संधि की व्यवहारिकता का नाम था। जब यह बना था तब मूल संकल्पना में भी और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की घोषणा में भी इसे एक अस्थाई व्यवस्था बताया गया था जिसे समय के साथ घिस-घिस कर कालातीत हो जाना था। ऐसा ही हो भी रहा था। इसका फायदा उठाने वालों और इस कारण कश्मीर का फायदा न उठा सकने वालों को छोड़ दें तो कितनों को पता था कि कोई ऐसी धारा भी है? लोकतंत्र अपने नागरिकों के साथ व्यवहार की ऐसी कला का ही नाम है।

बहुत कठिन चुनौती थी वह, क्योंकि इतिहास ने कश्मीर ही नहीं सौंपा था हमें, साथ ही सौंपी थी मूल्यविहीन सत्ता की बेईमानी, नीतिविहीन राजनीति की लोलुपता, सांप्रदायिकता की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कुचालें तथा पाकिस्तान के रास्ते साम्राज्यवादी ताकतों की दखलंदाजी! कश्मीर भले स्वर्ग कहलाता हो, वह हमें स्वार्थ के नर्क में लिथड़ा मिला था। और तब हम भी क्या थे? अपना खंडित अस्तित्व संभालते हुए, एक ऐसे रक्तस्नान से गुजर रहे थे जैसा इतिहास ने पहले देखा नहीं था। भारतीय उपमहाद्वीप के अस्तित्व का वह सबसे नाजुक दौर था। एक गलत कदम हमारा अस्तित्व ही लील जाती! 

हम चाहते तो कश्मीर के लिए अपने दरवाजे बंद कर सकते थे। हमने वह नहीं किया। सैंकड़ों रियासतों के लिए नहीं किया, जूनागढ़ और हैदराबाद के लिए नहीं किया, तो कश्मीर के लिए भी नहीं किया। वह साहस था, एक नया ही राजनीतिक प्रयोग था. आज इतिहास हमें इतनी दूर ले आया है कि हम यह समझ नहीं पाते हैं कि जवाहरलाल-सरदार पटेल-शेख अब्दुल्ला की त्रिमूर्ति ने कैसे वह सारा संभाला, एक संतुलन बनाया और उसे एक आकार भी दिया। ऐसा करने में गलतियां भी हुईं, मतभेद भी हुए। बेईमानियां भी हुईं, राजनीतिक अनुमान गलत भी निकले लेकिन ऐसा भी हुआ कि हम कह सके कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है; और जब हम ऐसा कहते थे तो कश्मीर से भी उसकी प्रतिध्वनि उठती थी। आज वहां बिल्कुल सन्नाटा है। कश्मीर का मन मरघट बन गया है।

महात्मा गांधी (2 अक्टूबर 1869 – 30 जनवरी 1948)

भारत में विलय के साथ ही कश्मीर हमें कई स्तरों पर परेशान करता रहा है। जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री हों और उनके आदेश से उनके परम मित्र शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी हो, उनकी सरकार की बर्खास्तगी हो तो परिस्थिति कितनी नाजुक रही होगी, इसे समझा जा सकता है। यह तो भला था कि तब देश के सार्वजनिक जीवन में जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, राममनोहर लोहिया जैसी सर्वमान्य हस्तियां सक्रिय थीं कि जो सरकार और समाज को एक साथ कठघरे में खड़ा करती रहती थीं और सरकारी मनमानी और अलगाववादी मंसूबों के पर कतरे जाते थे। आज वहां भी  रेगिस्तान है। 

यह अंधी सुरंग है!

कहा जा रहा है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों ने और तीन परिवारों ने कश्मीर में सारी लूट मचा रखी थी! हो सकता है, तो उन पर मुकदमा चलाएं, उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दें आप; यहां तो आपने सारे राज्य को जेल बना दिया! क्या यह सरकार इतनी कमजोर है कि तीन परिवारों का मुकाबला नहीं कर सकती थी? कल तक तो इन्हीं परिवारों के साथ मिल कर कांग्रेस ने, अटलबिहारी वाजपेयी ने और आपने भी सरकारें चलाई थीं! तब क्या इस लूट में आपकी साझेदारी भी चल रही थी? और कौन कह सकता है कि यह पूरा राजनीतिक-तंत्र बगैर लूट के चल रहा है? केंद्र या राज्यों की कौन-सी सरकारी परियोजना ऐसी है कि जिसकी आवंटित पूरी राशि उसी में खर्च होती है? कौन-सा राज्य है जो इस या उस माफिया के हाथ में बंधक नहीं है? अब तो माफियाओं की सरकारें बना रहे हैं हम! कोई यही बता दे कि राजनीतिक दलों की कमाई के जो आंकड़े अखबारों में अभी ही प्रकाशित हुए हैं, उनमें ये अरबों रुपये शासक दल के पास कैसे आए? ऐसा क्यों है कि जो शासन में होता है धन की गंगोत्री उसकी तरफ बहने लगती है? बात कश्मीर की नहीं है, व्यवस्था की है। महात्मा गांधी ने इसे इसलिए ही चरित्रहीन कहा था।


हम कश्मीर को इसी तरह लंबे समय तक बंद तो रख नहीं सकेंगे। दरवाजे खुलेंगे, लोग बाहर निकलेंगे। उनका गुस्सा, क्षोभ सब फूटेगा। इसकी खबरें आपके बहुत रोकने-दबाने के बाद भी बाहर आने लगी हैं। बाहरी ताकतें पहले से ज्यादा जहरीले ढंग से लोगों को उकसाएंगी। और हमने संवाद के सारे पुल जला रखे हैं, तो क्या होगा? विपक्ष के वे सारे नेता, जो आपकी कार्रवाई से एक दिन पहले तक कश्मीरी अवाम से शांति व सद्भाव बनाए रखने की अपील कर रहे थे, आपकी जेल में बंद हैं। कुल मिला कर तस्वीर खुशनुमा बनती नहीं है।

सरकारी दल के लोग जैसी बयानबाजी कर रहे हैं और कश्मीर के चारागाह में उनके चरने के लिए अब क्या-क्या उपलब्ध है, इसकी जैसी बातें लिखी-पढ़ी व सुनाई जा रही हैं, क्या वे बहुत वीभत्स नहीं हैं? प्रधानमंत्री ने ठीक कहा है कि यह छाती फुलाने जैसी बात नहीं है, नाजुक दौर को पार करने की बात है। लेकिन प्रधानमंत्री के शब्दों की विश्वसनीयता बची ही कहां है! राज्यसभा में बिल पारित हो जाने के बाद संसद को जिस तरह रोशनी से जगमग किया गया, वह छाती फुलाने की ही बात तो थी! अगर यह लाचार हो कर की गई कार्रवाई थी तो इसका जश्न मनाने जैसा क्या था? यह जख्म को गहरा करने की योजनाबद्ध कोशिश थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मास्क लगाए उनके समर्थक

राज्यसभा और लोकसभा में चली दो दिनों की बहस, प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन और तब से लगातार कश्मीर में बन रहे हालात को देखने के बाद, हम गांधी-प्रेरित नागरिक यह कहने को विवश हुए हैं कि सरकार ने देश को एक ऐसी अंधी सुरंग में डाल दिया है जिसका दूसरा सिरा बंद है। जिस बंदूक के बल पर सरकार ने कश्मीर को चुप कराया है, अब उसी बंदूक की दूरबीन बना कर देश को उसका कश्मीर देखा और दिखाया जा रहा है। यह किसी भी सरकार के लिए शर्मनाक, किसी भी संसद के लिए दुर्भाग्यपूर्ण और भारत देश के लिए अपशकुन है।


इसलिए भारत के लोगों पर, जो भारत को प्यार करते हैं और भारत की प्रतिष्ठा में जिन्हें अपनी जीवंत प्रतिष्ठा महसूस होती है, आज के शून्य को भरने की सीधी जिम्मेवारी है। संसद में जो हुआ है वह स्थायी नहीं है। कोई भी योग्य संसद उसे पलट सकती है। जो नहीं पलटा जा सकेगा वह है मन पर लगा घाव; दिल में घर कर गया अविश्वास! इसलिए इस संकट में कश्मीरियों के साथ खड़े रहने की जरूरत है। जो बंदूक और फौज के बल पर घरों में असहाय बंद कर दिए गये हैं, उन्हें यह बताने की प्रबल जरूरत है कि देश का ह्रदय उनके लिए खुला हुआ है, उनके लिए धड़कता है। और सरकार को चाहिए कि वह कानून-व्यवस्था संभाले लेकिन देश में हर स्तर पर विमर्श व अभिव्यक्ति को आजाद करे। यह परिस्थिति को संभालने में मददगार होगा।


[कुमार प्रशांत, अध्यक्ष, गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, रामचंद्र राही, अध्यक्ष, गांधी स्मारक निधि, नई दिल्ली,  डॉ. आशीष नंदी, सेंटर फॉर स्टडीज  ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, नई दिल्ली, डॉ. अशोक वाजपेयी, अध्यक्ष, रजा फाउंडेशन, नई दिल्ली ,सत्यपाल ग्रेवर, सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी, नई दिल्ली,डॉ. विश्वजीत, राष्ट्रीय संयोजक, राष्ट्रीय युवा संगठन, वर्धा,  डॉ. आनंद कुमार, समाजशास्त्री, नई दिल्ली, प्रो. अपूर्वानंद, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, नई दिल्ली , पुण्यप्रसून वाजपेयी, नई दिल्ली,विजय प्रताप एवं ऋतु, नई दिल्ली, प्रो. कुर्बान अली, नई दिल्ली, प्रो. अनन्या वाजपेयी, नई दिल्ली , आत्माराम सरावगी, बंगाल सर्वोदय मंडल, कोलकाता,  प्रो. चमन लाल, मानद सलाहकार, भगत सिंह आर्काइव एंड रिसोर्स सेंटर, नई दिल्ली , शबनम हाशमी, सामाजिक कार्यकर्ता, नई दिल्ली , गौहर रजा, वैज्ञानिक व कवि, कपिल शाह, जिला सर्वोदय मंडल, वडोदरा, गुजरात, डॉ. भरत शाह, नेचर क्योर, वडोदरा, गुजरात , डॉ. वीरल देसाई, वडोदरा, गुजरात , फैसल खान, खुदाई खिदमतगार/ एनएपीएम, शम्मशुल इस्लाम ,नीलिमा शर्मा, महेंद्र शर्मा, नई दिल्ली,  आनंद चोखावाला, सूरत, गुजरात की ओर से जारी

(कॉपी संपादन : फारवर्ड प्रेस)


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