25 वर्षों बाद भी अधूरा है आंबेडकर के लेखों-भाषणों का हिंदी अनुवाद  

25 साल पहले केंद्र सरकार ने 21 खण्डों में संकलित, डॉ. बी. आर. आंबेडकर की रचनाओं और भाषणों का अनुवाद, आठवीं अनुसूची में मान्य सभी भाषाओं में करने की घोषणा की थी। लेकिन सरकार और उसके तंत्र की लालफीताशाही के कारण यह परियोजना जल्द पूरी होती हुई नहीं दिख रही है

1990 के दशक में तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने बाबासाहेब आंबेडकर की संपूर्ण रचनाओं के संग्रह को सभी अनुसूचित भारतीय भाषाओं में अनूदित कराने की योजना घोषित की थी। उस समय तक, 21 खण्डों  में संकलित, उनकी रचनाएँ केवल अंग्रेज़ी में उपलब्ध थीं। राव सरकार ने कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया था। लिहाज़ा, यह स्पष्ट था कि बाबासाहेब आंबेडकर की रचनाओं का अनुवाद इन भाषाओं में भी किया जाएगा। कालांतर में, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के तहत आठवीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को भी शामिल किया गया।

वर्तमान सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के पूर्ववर्ती, तत्कालीन कल्याण मंत्रालय को इस परियोजना की नोडल एजेंसी बनाया गया था। परियोजना के कार्यान्वयन का भार 1992 में स्थापित, डॉ आंबेडकर फाउंडेशन को सौंपा गया। उस समय मंत्रालय में पदस्थ मंत्री इस संस्था के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किये गए।

डॉ. बी. आर. आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956)

एक चौथाई सदी का समय बीत चुका है, लेकिन इस परियोजना को अंजाम देना अभी भी बाकी है। उल्लेखनीय है कि फाउंडेशन ने खुद इस परियोजना को कार्यान्वित करने की बजाय, इसकी ज़िम्मेवारी ज़्यादा से ज़्यादा राज्य सरकारों और अन्य संस्थाओं को सौंप दी। मसलन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी  (एएमयू ) को ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडडकर : राइटिंग्स एंड स्पीचेस ’ का उर्दू अनुवाद करने का भार सौंपा गया।

अनुवाद-कार्यों में किसी एक मानक प्रारूप को नहीं अपनाया जा रहा है। आंबेडकर फाउंडेशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने इस परियोजना के तहत 37 खंड निकाले हैं जिनमें 31 वें खंड के दो भाग हैं। अभी तक कन्नड़ में इस संग्रह के 22 और हिंदी में 21 खंड तैयार हुए हैं। हिंदी में अनूदित 21 खंड अंग्रेज़ी के मूल 21 खण्डों से मेल नहीं खाते हैं। दरअसल वे अंग्रेज़ी के ही 10 खंड हैं जो अनूदित होकर 21  खण्डों में सामने आए हैं। अतः अनुसूचित भाषाओं के सन्दर्भ में इस परियोजना की स्थिति की गहन समीक्षा बेहद ज़रूरी है।

‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर : राइटिंग्स एंड स्पीचेस’, खंड 4

इनमें से कुछ भाषाओं में तो अनुवाद – कार्य काफ़ी पीछे छूट गया है। तेलुगु में 10 खंड हैं,  लेकिन खंड 10 को चार भागों में विभाजित कर दिया गया है। पंजाबी में अभी तक ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेस’ के केवल चार ही खंड उपलब्ध हैं। असमिया, उड़िया, सिंधी, उर्दू तथा नरसिम्हा राव और वाजपेयी सरकारों द्वारा आठवीं अनुसूची में शामिल की गयीं सात भाषाओं में इसके अनुवाद की कोई जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है। गहराई से छान-बीन करने पर पता चला कि असमिया और उर्दू,  दोनों भाषाओं में केवल चार-चार खंड ही तैयार किये गए हैं। 

इस धीमी प्रगति का कारण नौकरशाही अड़चनें हैं। अकथित नियम के मुताबिक़, किसी अनूदित खंड के प्रकाशन के बाद अनुवादक को उसका पारितोषिक दे दिया जाना चाहिए। इस लेखक ने 1998 में खंड 5 का उर्दू अनुवाद पूरा कर प्रकाशनार्थ भेज दिया था, लेकिन इसका प्रकाशन अभी तक नहीं हुआ है। जहां तक पारितोषिक का सवाल है, 15 साल बाद,  2013 में उसे उसका मेहनताना मिला, वह भी उर्दू अनुवाद के प्रबंध संपादक द्वारा बहुत आग्रह करने के बाद। खंड में 1931 में हुए द्वितीय गोलमेज़ सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर द्वारा दिया गया भाषण भी शामिल था।  

अनुवाद के लिए मौजूदा पारितोषिक 25 साल पहले की तुलना में थोड़ा सा ही बढ़ा है। अनुवादकों के हतोत्साहित होने और इस परियोजना के प्रति लगन न दिखाने के पीछे यह भी एक ठोस कारण है। इसके अतिरिक्त, एक समस्या कागज़ की आपूर्ति को लेकर भी है। प्रकाशन उद्योग में कागज़ की खरीद करना प्रकाशक की ज़िम्मेदारी है – इस मामले में डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन की। कानूनी तौर पर, कोई भी मुद्रक किसी भी प्रिंट कार्य के लिए बाज़ार से कागज़ नहीं खरीद सकता। लेकिन एक प्रिंटर ने मुझे उनका नाम न लिखने की शर्त पर बताया कि एक ख़ास खंड के मुद्रण के लिए उसे अंतिम रूप दिए जाने के करीब पाँच साल बाद कागज़ की आपूर्ति की गई।

लेकिन इन सब में सबसे ज़्यादा निरुत्साहित करने वाला तत्व मंत्रियों का रवैया है। जब एक खंड किसी भाषा में प्रकाशित होता है, तो उसके साथ सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के पदस्थ मंत्री का प्रशंसा पत्र संलग्न होना ज़रूरी होता है, जिसमें मंत्री लिखता है “मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि …….” इत्यादि। संबंधित भाषा का प्रबंध संपादक निर्धारित प्रारूप में पत्र का मसौदा तैयार करता है और उसे फाउंडेशन के सदस्य-सचिव को भेजता है, जो इसे मंत्री तक पहुंचाता है। लेकिन, भले ही मंत्री को पत्र के अंत में केवल अपने हस्ताक्षर ही करने होते हैं, फिर भी आम तौर पर शिकायत रही है कि इस कलमघसीट में पांच साल तक का समय लग जाता है! बाबासाहेब की विरासत के प्रति राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की इससे ज़्यादा उदासीनता और क्या हो सकती है?

(कॉपी संपादन : नवल, अनुवाद : डॉ. देविना अक्षयवर)


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