बुद्ध पर कुछ और 

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि बुद्ध ने अपने जीवन में अपने विचारों का संकलन नहीं होने दिया। वे नहीं चाहते थे कि उनके अनुयायी उनके विचारों पर आंख मूंद कर विश्वास करते रहें। वे त्रिपिटकों का सार भी बता रहे हैं कि कैसे बुद्ध का जीवन और उनके विचारों को संकलित किया गया। साथ ही यह भी प्रस्ताव करते हैं कि बुद्ध के दर्शन को त्रिपिटकों तक सीमित न रखा जाय

जन-विकल्प

हमने बुद्ध के जीवन और उनके दर्शन पर कुछ बातें की हैं। इसी सिलसिले में चाहता हूँ कि इस विषय या मुद्दे को भी उठाऊँ कि बुद्ध ने अपने ज़माने को कैसे ,और कितना प्रभावित किया? हमने दुःख दूर करने के उनके बतलाये हुए रास्तों पर बातें की और उनके बारीक से दिखने वाले दार्शनिक मुद्दे प्रतीत्यसमुत्पाद को भी हलके से ही सही, जानने की कोशिश की। मैंने यह भी बतलाया कि दूसरे धर्मों की तरह बौद्ध धर्म में भी पाखण्ड कम नहीं है और इस बारे में हम आगे भी बात करेंगे। ऐसा लगता है धर्मों और विचारों की तरह पाखंड की भी अहर्निश चलने वाली सत्ता होती है। अच्छे से अच्छे सद्विचारों के इर्द -गिर्द पाखण्ड उभर आते हैं। हमने देखा है कि आधुनिक ज़माने में भी वैज्ञानिक और सुचिंतित मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित जमातों या पार्टियों में भी पाखण्ड कम नहीं फैला हुआ है। इन पर विजय हासिल करने हेतु हमें अपने विवेक जाग्रत करने होते हैं। निःसंदेह यह मुश्किल भरा कार्य है, परन्तु ऐसा करने पर पाखण्ड के कीचड़ के बीच से भी बुद्ध का व्यक्तित्व कमल की तरह खिला दिखता है। फिलहाल चाहता हूँ कि हम इसे देखें और विचार करें कि आखिर कौन-सी बात थी कि बुद्ध अपने जमाने और जमाने के बाद आज तक लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। 

पिछले आलेख में हमने इस बात पर ध्यान देने की कोशिश की है कि बुद्ध-कथा से किस तरह कुछ लोगों द्वारा मनमानी छेड़छाड़ की गयी। काव्य रूप देने में इसे कुछ ऐसे अभिराम अंदाज़ में चित्रित किया गया कि उससे एक जादुई परिमंडल तो बना, लेकिन यथार्थ का विलोप होता चला गया। इन काव्य-कथाओं में सत्य और असत्य की अद्भुत मिलावट है। कपिलवस्तु के राजमहल में कोई चालीस हजार सुंदरियों से घिरा राजकुमार दुनिया से इस तरह आँखें मूंदे है कि अपने उन्तीसवें वर्ष में पहली दफा वृद्ध, रोगी और मृत को देखता है। यह अविश्वसनीय भले लगे। लेकिन बुद्ध पर लिखे काव्य -ग्रंथों का सच है। ऐसी जाने कितनी उल-जलूल चीजें हैं, जो हम बुद्ध के नाम पर बचपन से सुनते आये हैं। लेकिन इतना तो सच है, जैसा कि पहले ही हमने इस पर विचार किया है कि वह एक संपन्न पृष्ठभूमि से आये थे। आर्थिक अभाव जैसी कोई चीज उनने नहीं देखी थी। और जिस दुक्खं को उनने देखा-समझा-महसूस किया था, वे मनुष्य के शाश्वत दुःख थे, जो उनके ज़माने में भी थे और और आज हमारे ज़माने में भी हैं। आगे भी रहेंगे। बुद्ध ने इन पर ही विचार किया। किसी को भी यह कथा आकर्षक लगती है कि राज-घराने का एक युवा अपनी पत्नी, नवजात बेटे और माता-पिता, सगे-सम्बन्धियों, कुटुंब को छोड़ मनुष्य की मुक्ति केलिए ज्ञान की तलाश में निकल जाता है और छह वर्षों तक अनेक कष्टकारक साधना से गुजरता है। सेना, साम्राज्य और राज सत्ता विकसित करने में उसकी रूचि नहीं है। वह दुनिया में सुख का एक अविरल साम्राज्य विकसित करने की कोशिश करता है। मैत्री, प्रज्ञा और करुणा विकसित करने की बात करता है। विरुद्धों के बीच सामंजस्य विकसित करने की कोशिश करता है। धर्मग्रंथों और आर्ष वाक्यों को दरकिनार कर व्यक्ति को अपनी बुद्धि और मन से कुछ सोचने-विचारने का आग्रह करता है। किसी अलौकिक सत्ता या भाग्य भरोसे न रह कर लोगों को अपने पुरुषार्थ अथवा क्षमताओं को गतिशील करने पर जोर देता है। बुद्ध के नाम पर उनके अनुयायियों ने चाहे जितने पाखण्ड विकसित किये हों, बुद्ध ने पहली बार व्यवस्थित ढंग से बुद्धि-विवेकवाद की प्रस्तावना की और आडम्बरों पर यथासंभव चोट भी कर्म पर उनने जोर दिया और बतलाया कि यह न केवल इस जन्म में, अपितु अगले जन्मों में भी प्रभावी होता है। उनके पुनर्जन्म की इस अवधारणा को नहीं समझ पाने के कारण कुछ लोगों द्वारा इस पर प्रश्न चिह्न उठाया गया है। इस विषय पर 1974 में मैंने एक लेख लिखा था, जो महाबोधि सभा की पत्रिका ‘धर्मदूत ‘ में प्रकाशित हुआ था। उस व्याख्या पर मैं आज भी कायम हूँ। बुद्ध का पुनर्जन्म सिद्धांत दरअसल आधुनिक साइंस के जेनेटिक्स का आधार है, हालांकि यूरोप में विज्ञान व तकनीक की इस शाखा का जनक ग्राहम जॉन मेण्डल (1822-1884) है। मेण्डल ने प्रयोग किये थे, बुद्ध ने केवल बात की थी। बुद्ध का पुनर्जन्म मनुष्य की भावी पीढ़ियां हैं। यह सही है कि बुद्ध ने इस पर कोई प्रयोग नहीं किये थे। बस, उनकी एक परिकल्पना अथवा हाइपोथिसिस थी; जिसे आधुनिक विज्ञान ने पूर्णता दी। लेकिन इसे लेकर उनके अनुयायियों ने एक नयी पौराणिकता ही खड़ी कर दी। यह हमारे भारतीय समाज का दुर्भाग्य था। 

बुद्ध की एक प्रतिमा

बुद्ध ने अपने जीवन-काल में अपना कुछ भी संकलन नहीं होने दिया। उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायी आगामी वर्षावास में गिरिव्रज में महाकाश्यप नामक भिक्षु-प्रवर के नेतृत्व में बैठे और अपने शास्ता बुद्ध की बातों और उनके निदेश-अनुदेश को संकलित करने का संकल्प लिया। उनके प्रमुख भिक्षु उपालि और आनंद, जो प्रायः उनके साथ बने रहते थे, से पूछ-पूछ कर इन सब को संकलित किया गया। संघ के नियम-कायदों की अधिकांश बातें उपालि ने बतलायी और अन्य उपदेशात्मक बातें आनंद ने। अन्य भिक्षुओं ने भी इसमें योगदान दिया होगा। इन तमाम बातों के इकट्ठे स्वरुप को त्रिपिटक अर्थात तीन पिटारे कहा जाता है। ये जिस जुबान में हैं ,उसे पालि कहा जाता है। यह त्रिपिटक, जैसा कि मैंने बतलाया तीन भारी-भरकम पिटारे हैं। नहीं कहा जा सकता कि ये पूरे के पूरे सही हैं या गलत, क्योंकि ये आकार में बहुत बड़े हैं। लेकिन इस ज़माने में सम्पूर्ण गांधी वांग्मय को नब्बे से अधिक खण्डों में जब मैंने देखा तब त्रिपिटकों के आकार पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। 

त्रिपिटकों पर संक्षिप्त-सी चर्चा कर लेना बुरा नहीं होगा। मुख्य पिटक तीन हैं- सुत्त ,विनय और अभिधम्म। सुत्त और अभिधम्म को आकार देने में आनंद की भूमिका रही और विनय पिटक उपालि से पूछ कर सृजित किया गया। सुत्त पिटक बुद्ध और उनके समकालीन वरिष्ठ भिक्षुओं के उपदेशों और प्रवचनों का संकलन है। विनय पिटक में भिक्षुओं के लिए बनाये गए नियम और हिदायतें हैं। अभिधम्म पिटक में सुत्त पिटक में वर्णित खास प्रसंगों के विवेचन हैं। फिर इन तीन पिटकों के जाने कितने उपग्रन्थ हैं। जैसे सुत्त पिटक स्वयं में पांच निकायों का पोथा है। ये हैं- दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तर निकाय और खुद्दक निकाय। दीघ निकाय में चौंतीस बड़े आकार के सुत्तों का संकलन है। दीर्घ का मतलब ही है बड़ा। मझोले आकार के सुत्तों का संकलन मज्झिम निकाय में है। संयुक्त निकाय में मिले-जुले ढंग के सुत्त संकलित हैं। अंगुत्तर में एक-एक विषय के ग्यारह निपात संग्रह हैं। निपात अर्थात एक ही विषय के सुत्तों का संग्रह। खुद्दक का मतलब है खुदरा। इस निकाय में छोटे-होते पंद्रह प्रकरणों का संग्रह है – खुद्दक पाठ , धम्मपद, उदान, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक, बुद्धवंस, चरिया पिटक आदि भी इसी में है। अभिधम्म पिटक के सात प्रकरण हैं, जिनके नाम हैं – धम्म संगणी, विभंग, धातुकथा, पुग्गल पञ्चति, कथावस्तु, यमक और पट्ठान।

इन पिटकों की सभी बातों को हू-ब-हू सच मान लेने का आज कोई मतलब नहीं है। अनुयायियों में प्रायः समझ पर श्रद्धा हावी हो जाती है और यह श्रद्धा समझ को विकलांग बना देती है। त्रिपिटकों में सब कुछ वही नहीं है, जो बुद्ध ने कहा है। उसके विरोधाभासों से यह बात स्पष्ट होती है। लेकिन इतने दिनों बाद इसकी सम्यक समीक्षा शायद संभव नहीं है। यदि है भी तो यह कठिन श्रमसाध्यपूर्ण कार्य होगा, जिस पर कई लोगों को अनेक वर्षों तक काम करना होगा। इतने भर भी क्या निष्कर्ष निकलेगा, नहीं कहा जा सकता। इसलिए रास्ता यही है कि किसी भी धर्मग्रन्थ का हम अपने विवेक से अध्ययन-विश्लेषण करें। 

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बुद्ध ने निश्चय ही अपने समय और सम्पूर्ण मानव जाति को वैचारिक स्तर पर झकझोरा। उनने कोई ऐसी बात नहीं की जो आसमानी हो। वह किसी अल्ला-ईश्वर के दूत या पैगम्बर नहीं थे। उन्होंने कोई धर्मग्रन्थ रचने की सलाह नहीं दी। सदैव व्यक्ति को अंतस की ओर झाँकने और सोचने का आग्रह किया। लोगों से कहा – आप स्वयं के मालिक हो, तुम्हारा मालिक कोई अन्य नहीं हो सकता। स्वयं को प्रकाशमान करो। (अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परोसिया। अत्ता दीपो भव)। यह कहने वाला बुद्ध पारलौकिकता की बात कैसे कर सकता है? इसीलिए मैंने कहा, बुद्ध को होशियारी से समझने की जरुरत है, क्योंकि उनके इर्द-गिर्द काफी कचरा इकठ्ठा कर दिया गया है। बौद्ध पुरोहितवाद कम खतरनाक नहीं है। लामाओं के करतूतों और मूर्खता किसी अन्य मजहबी पुरोहित से कम नहीं है। इन पुरोहितों ने संघ का साइन-बोर्ड लगा कर लम्बे समय तक लोगों को उल्लू बनाया। बुद्ध द्वारा स्थापित बहुजन हिताय बहुजन सुखाय संघ को इन लोगों ने भिक्खु हिताय भिक्खु सुखाय बना दिया। कालांतर में भिक्षु संघ में मतभेद बढ़ते गए और नतीजा यह निकला कि अलग-अलग देशों में उनके अलग-अलग संप्रदाय विकसित हो गए। लंका, बर्मा और थाईलैंड में हीनयान तो बाकी देशों में महायान तेजी से फैला। महायानियों ने अनीश्ववादी बुद्ध को ईश्वर के रूप में स्थापित कर दिया। उनकी इतनी मूर्तियां और मठ बने कि बाकी सभी धर्मों के मठ बौने हो गए। ये मठ कब मिथ्याचार और भ्रष्टाचार के अड्डे बनने लगे, यह एक अलग ही अध्ययन का विषय है। लेकिन मठों में बहुत अधिक खामियां हैं, यह तो खुला सच है। जो पूजा-पाठ वहां हो रहा है, बुद्ध ने इन तमाम चीजों की सख्त मनाही की थी। लेकिन अब वह अपने अनुयायियों द्वारा ही नजरबंद हो चुके थे। कुछ अंशों में वह व्यापार की वस्तु बना दिए गए हैं। आज तो हाल यह है कि टोक्यो से शिकागो तक क्युरिओ की दुकान में और कुछ मिले न मिले बुद्ध की मूर्तियां जरूर मिल जातीं हैं। बुद्ध जैसा बिकाऊ ‘देवता’ आज कोई नहीं है।

मुझे बुद्ध के इस विकृत रूप पर दुःख होता है। जिस इंसान ने जीवन भर पाखण्ड, रूढ़िवाद और बाह्याडम्बरों का विरोध किया; वही यदि इन आडम्बरों की की कैद में आ जाय तो अफ़सोस व्यक्त करने के सिवा कोई क्या कर सकता है। बावजूद इसके बुद्ध आज तक हमारी धड़कनों में हैं, तो इसका अर्थ है उनमे कुछ ख़ास है, जो हमें उद्वेलित और प्रभावित करता है। एक शिक्षक के रूप में वह हमें बार-बार सतर्क करते हैं कि हर तरह के मिथ्याचार से बचो। वह हमें आस्थावान नहीं बनाते। हर चीज पर संशय करने और सोचने-विचारने की एक विलक्षण दृष्टि देते हैं। वह कभी नहीं कहते कि कोई बात इसलिए मान लो कि उसे किसी बड़े आदमी ने कहा है, वह किसी धर्मग्रन्थ में लिखा-कहा गया है, या उसे बहुत लोग मानते हैं। बल्कि किसी बात को इसलिए मानो कि क्या वह सचमुच तुम्हारे या बहुजनों के हित के लिए है। वह लगातार मनुष्य की वैचारिक चेतना और विवेक को जाग्रत रखने की सलाह देते हैं और हर बात को उसी के निकष पर देखने की सिफारिश करते हैं। उन्होंने इस बात की डींग नहीं मारी कि संसार का सत्य केवल वही जानते हैं; या उस पर उनका एकाधिकार है, या वे किसी परम सत्ता अथवा सृष्टिकर्ता के दूत या पैगम्बर हैं। एक बार बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन विहार में टहल रहे थे। उनके साथ भिक्षु प्रवर आनंद भी थे। आनंद ने उनसे पूछा – भंते, आपने जिन सत्यों के उद्घाटन किये हैं, क्या उसके अलावा भी कहीं कोई सत्य हैं ? बुद्ध ने आनंद को देखा ,मुस्कुराये, नीचे झुके और एक मुट्ठी सूखी पत्तियों को उठा लिया। आनंद ने पूछा – आनंद! क्या इन सूखी पत्तियों के अलावा भी कहीं सूखी पत्तियां हैं? आनंद ने कहा – यह पूरा जेतवन और दुनिया के जाने कितने जेतवन ऐसी सूखी पत्तियों से भरे हैं। बुद्ध ने कहा -आनंद! वैसे ही मैंने अपनी सीमा भर अपने समय का सत्य कहा है। आने वाले समय में उस समय के बुद्ध अपने समय का सत्य कहेंगे।

बुद्ध ने यह कभी नहीं कहा कि उनके अनुयायी उन्हें ढोते रहें। इस संबंध में त्रिपिटक के चुल्लवग्ग में एक रोचक प्रसंग है। अनुयायियों के बीच कुछ-कुछ बातों पर विमर्श होते रहते थे। किसी भिक्षु ने भक्ति का अतिरेक प्रदर्शित किया होगा। ऐसे भिक्षुओं के समूह को सम्बोधित करते हुए उन्होंने एक उदाहरण कथा सुनाई। कहा – कोई व्यक्ति कहीं जा रहा है और रास्ते में उसे जल-अर्णव मिलता है, नदी मिलती है। इसे देख कर व्यक्ति के मन में उसे पार करने की बात आती है और वह जुगत करता है। वनस्पतियों को इकठ्ठा कर वह एक नौका बनाता है। फिर उस नौके के सहारे नदी पार कर जाता है। उस पार जाने पर उसके मन में यह विचार आता है कि इस नौका की मदद से मैंने नदी पार की है। यह नौका न होती तो मैं क्या करता? इसका हमें कृतज्ञ होना चाहिए। इसे त्याग देना तो कृतघ्नता होगी। इस तरह के विचारों से गुजरने के बाद वह तय करता है कि नहीं, मैं इस नौका को यूँ ही छोडूंगा नहीं। वह नाव को सिर पर उठा लेता है और अगली यात्रा के लिए चल पड़ता है। बुद्ध भिक्षुओं से ही पूछते हैं – भिक्षुओ! ऐसे व्यक्ति को क्या कहोगे? क्या इस तरह की हरकत पूरा बचपना ही नहीं है? मैंने आप सब को दुखों से मुक्ति के कुछ उपाय बताये हैं, इसका यह अर्थ नहीं कि आप लोग मुझे ढोते रहो।

बुद्ध ने हमेशा तर्क और विवेक के साथ चीजों को देखने का आग्रह किया। एक बार किसी ने पूछा – क्या आप ईश्वर के विरोधी हैं? 

बुद्ध का उत्तर था – नहीं। 

उनके शिष्य आश्चर्यचकित थे। इसलिए कि उनके विचारों में कहीं कोई ईश्वर तत्व नहीं था। बुद्ध ने अपने अनुयायियों को उसे अव्याकृत श्रेणी में रखने का निदेश दिया था। ईश्वर है या नहीं, उस ज़माने की दर्शन परंपरा का केंद्रीय विषय था। ईश्वरवादी उसके अस्तित्व को सिद्ध करने में ही पूरी जिंदगी लगा देते थे। नास्तिकों का पूरा समय ईश्वर विरोध में लगता था। बुद्ध का कहना था, हमें इस चक्कर में नहीं पड़ना है। वह अव्याकृत तत्व है। उनके दर्शन में ईश्वर कहीं नहीं था। इसीलिए सब का आश्चर्य में पड़ना स्वाभाविक था। संघ के साथियों का संदेह भिक्षु-प्रवर आनंद ने बुद्ध के समक्ष प्रकट किया। बुद्ध ने भिक्षुओं से ही पूछा – मैंने क्या कहा है? 

भिक्षुओं ने एक स्वर में कहा – यही कि आप ईश्वर विरोधी नहीं हैं। 

बुद्ध ने फिर पूछा – आप किन चीजों के विरोधी होते हो?

भिक्षु चुप थे। बुद्ध ने कहा – आप किसी के विरोधी होते हो, मतलब उसकी सत्ता होती है, अस्तित्व होता है। यदि कोई ईश्वर-विरोधी है, इसका अर्थ ईश्वर का अस्तित्व है और वह उसका विरोधी है। मैं उस चीज का विरोधी कैसे हो सकता हूँ, जिसका कोई अस्तित्व नहीं हो।

ऐसे् प्रसंगों और परिकथाओं से बौद्ध-ग्रन्थ पड़े हैं। उन्होंने हमेशा विवेक, तर्क और प्रज्ञा-पूर्ण बातें कही। वह जड़ता का समर्थन नहीं करते। नियम संबंधी कई मामलों में उन्होंने अपनी ही बनाई व्यवस्था को कई दफा बदला। जैसे संघ में स्त्रियों के शामिल करने की मनाही थी। अंबपाली और गौतमी के प्रश्न ने उन्हें विचलित किया। उन्होंने नियम तोड़े और संघ में स्त्रियों का प्रवेश हुआ। एक प्रसंग में उन्होंने धम्म और नियम के बीच उधेड़बुन की स्थिति में धम्म का समर्थन किया। नियम की रक्षा के लिए धम्म की क्षति नहीं होनी चाहिए। हाँ, धम्म की रक्षा के लिए नियम ध्वस्त हो जाते हैं तब कोई बात नहीं। यह विवेक-दृष्टि है। 

एक प्रसंग में बुद्ध ने चार प्रकार के मनुष्य होने की बात कही। ये चार तरह के मनुष्य हैं – 

आत्मन्तप परन्तु परन्तप नहीं – यानी अपने को कष्ट देने वाला, दूसरों को नहीं। जैसे – तपस्वी।

परन्तप ,लेकिन आत्मन्तप नहीं – यानी दूसरे को कष्ट देने वाला, अपने को नहीं। जैसे – बहेलिया। 

आत्मन्तप और परन्तप – यानी अपने को भी कष्ट और दूसरे को भी कष्ट। जैसे – यज्ञकर्ता। 

न ही आत्मन्तप, न ही परन्तप – यानी न अपने को , न दूसरों को कष्ट। यानी बुद्धानुयायी।

इस सरल से दिखने वाले उदाहरण -कथा में उन्होंने अपने विचार को रख दिया कि एक तपस्वी, एक बहेलिये और याज्ञिक से हम किन अर्थों में भिन्न हैं। हम स्वयं भी सुखी रहें और दूसरे भी भी सुखी रहें, यह बुद्ध का रास्ता है। 

बुद्ध की इन बातों ने उनके ज़माने को प्रभावित किया। अपने विचारों से उन्होंने सभी वर्गों को प्रभावित किया। लेकिन मिहनतक़श किसान और कारीगर तबकों में उन्होंने खास तौर पर धम्म की रौशनी फैलाई। धर्म, चिंतन, आध्यात्मिकता जैसे तत्वों को धर्मग्रंथों से निकाल कर जनजीवन से जोड़ने से कोशिश की। आस्था की जगह प्रज्ञा और सतत चिंतन पर जोर दिया। आधुनिक अर्थों में वह वैज्ञानिक भले नहीं हों, लेकिन उन्होंने अपने ज़माने को एक वैज्ञानिक परिदृष्टि अथवा साइंटिफिक टेम्पर अवश्य दिया। इन विचारों का उनके ज़माने पर प्रभाव पड़ा और इससे इतिहास को नई दिशा मिली, जिस की व्याख्या हम यथासमय करेंगे। यह सही है कि राजाओं में कुछ उनके अनुयायी थे, लेकिन बुद्ध का झुकाव कभी राजतंत्रीय व्यवस्था की तरफ नहीं था। मगध के राजतन्त्र के मुकाबले वह वैशाली की गणतंत्रीय व्यवस्था को पसंद करते रहे। यूँ ,उनका दिल हिमालय के तराई इलाकों में फैले जनपदों के प्रजातंत्रीय व्यवस्था में बसता था। लेकिन उनके चाहने भर से क्या होने वाला था। जनपदीय ,प्रजातंत्रीय और गणतंत्रीय व्यवस्थाएं एक-एक कर मिटने लगीं और साम्राज्यों और सम्राटों का जमाना आ गया। इस पर हम आगे बात करेंगे।

 

(संपादन : नवल)

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