जानिए बौद्ध धर्म-दर्शन और इसमें निहित विज्ञान के बारे में

लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि बौद्ध धर्म-दर्शन में विज्ञान मूल तत्व है। बुद्ध ने पहली बार कहा था कि कुछ भी स्थिर नहीं है और यह भी कि किसी भी चीज की उत्पत्ति बिना कारण के नहीं होती।अस्मिन सति इदं भवति। यह सापेक्ष कारणतावाद है

 

जन-विकल्प

बौद्ध धर्म, जिसे बौद्ध परंपरा में धम्म कहना अधिक युक्तिसंगत होगा, भारत का पहला व्यवस्थित और संगठित धर्म है। इसके पूर्व ब्राह्मण, जैन-मत और आजीवक जैसे कुछ सनातन पंथ चले आ रहे थे, जिनके अलग-अलग विचार थे, लेकिन वे व्यवस्थित और संगठित थे, ऐसा कहने में मुझे संकोच होगा। हालांकि मेरा यह कथन कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है। सनातन शब्द स्वयं में प्रकृतपरकता का बोध कराता है। सनातन अर्थात अकृत्रिम या प्राकृतिक। जैसे कुछ ज्ञान सनातन हैं, जो पशु-पक्षियों और यहां तक की वनस्पतियों तक में होते हैं . वैसे ही सनातन धर्म भी है। दरअसल मनु ने धर्म के दस अर्थ इसी रूप में गिनाये हैं। जब धर्म का निर्धारण प्रकृति करती है, तब वह सनातन हो जाता है। लेकिन जब इसका निर्धारण कोई व्यक्ति या समाज करता है, तब वह एक वैचारिक विमर्श हो जाता है। संहिता हो जाती है। बुद्ध ने यही विमर्श पेश किया था। मनुष्य का प्राकृतिक चरित्र जो भी हो, उसका एक सामाजिक चरित्र होना चाहिए। उसे समाज के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार वही होगा, जो पहले स्वयं के प्रति जिम्मेदार हो। इसलिए वह पहले नैतिक स्तर पर पूर्ण और मजबूत इंसान बनने का प्रस्ताव करते हैं। बुद्ध की नजर में समाज व्यक्तियों का समुच्चय है। समाज को दुरुस्त करने के लिए व्यक्ति को दुरुस्त करना आवश्यक है। यही बुद्ध का धम्म है। 

बुद्ध का जमाना सामाजिक स्तर पर आज से कुछ भिन्न तरह का था। एक सनातन धर्म जो वेदों से आरम्भ होकर ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों तक की विचार-यात्रा करता हुआ उस समय तक पहुंचा था, अब वैचारिक थकान महसूस कर रहा था। इस बीच उसमें पर्याप्त विकृतियां उभर चुकी थीं। स्मृतियाँ भले नहीं बनी थीं, लेकिन वर्ण-व्यवस्था कुछ अंशों तक सक्रिय हो चुका था। सनातन धर्म धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म होता जा रहा था। उपनिषदों का चिंतन काल गुजर चुका था। वेदों का मुख्य देवता इंद्र विकसित या विनष्ट हो कर उपनिषदों में ब्रह्म बन चुका था, लेकिन उसका ईश्वर रूप होना अभी बाकी था। जैनियों का जोर अहिंसा, अपरिग्रह और शुद्धता पर था। छोटी-छोटी बातों के तह में जाना, उन पर विमर्श करना जैनियों का प्रिय विषय था। बुद्ध के समकालीन महावीर अथवा निगंठ नाथपुत्त ने इस विमर्श को कुछ नए आयाम दिए और कुल मिला कर उस धर्म की जटिलता को और अधिक बढ़ा दिया। आजीवक पंथ के बारे में पहले ही बता चुका हूँ। इन सबके अलावा चार्वाक पंथ का भी जोर था, जो वेद-वेदांत को खुले तौर पर नकारते और उसे धूर्त-भांडों का छद्म अथवा जंजाल बताते थे। लेकिन ये तमाम पंथ-सम्प्रदाय प्रायः बौद्धिक स्तर पर थे। आम जनता की मुक्ति इनके कार्यक्रम में शामिल नहीं था। मसलन चार्वाकवादी वेदों का खुला विरोध करते थे, लेकिन वर्ण-व्यवस्था पर चुप ही रहते थे। 

बौद्ध धर्म-दर्शन

आजीवकों का भी यही हाल था। सब केवल व्यक्तिगत मुक्ति के आकांक्षी थे,सामाजिक मुक्ति के नहीं। समाज का बहुजन हिस्सा इनके लक्ष्य में नहीं था। आजीवक मक्खलि गोसाल में उत्पीड़ित समाज के लिए गहरी चिंता अवश्य थी, लेकिन वह किसी नतीजे पर पहुंचे बिना एक त्रासदी के शिकार हो गए। 

बुद्ध और बौद्ध दर्शन पर आधारित एक कलाकृति

विचार कर देखें तो भारतीय दर्शन में आस्तिकता और नास्तिकता ईश्वर सापेक्ष नहीं रहा। यही कारण है कि हमारे दर्शन में ईश्वर केंद्रीय तत्व कभी नहीं रहा। केन्द्रीय तत्व वेद और वर्ण-व्यवस्था या केवल वर्ण-व्यवस्था ही रहा। आप ईश्वर को मानें या नहीं मानें, या वेद को मानें या नहीं मानें, यदि आप वर्ण-व्यवस्था को मानते हैं, तो ब्राह्मण धर्म के निकष पर सही हैं। इस वर्ण-व्यवस्था के आधार पर ब्राह्मण धर्म ने एक सामाजिक साम्राज्यवाद विकसित किया था और उसका लाभ पुरोहित तबका ले रहा था। पुरोहितों ने वैदिक कर्मकांडों के आधार पर एक यज्ञ-संस्कृति का विकास किया था और उसे दिन-रात की कोशिशों से उत्तर भारत के बड़े हिस्से में फैला दिया था। बेशक, इस यज्ञ-संस्कृति पर पहले कई प्रकार के पुरोहितों का प्रभाव था। लेकिन धीरे-धीरे ब्राह्मणों ने अपने को इस यज्ञ-संस्कृति का केंद्रीय पात्र बना लिया। ऋत्विकों के अन्य समूह निस्तेज कर दिए गए और उन्हें निम्न वर्णों में धकेल दिया गया। यह सब सामाजिक वर्चस्व का ऐसा सिलसिला था, जो तीव्र गति से बढ़ता जा रहा था। इस वर्चस्व के फैलने का सीधा अर्थ था कि इस का भार वहन करने वाला एक तबका अस्तित्व में आता। यह तबका समाज का उत्पादक तबका था, जिसे यज्ञ-संस्कृति को अपने कंधे पर ढोने की विवशता थी। परलोक के धार्मिक भय से वह इसे ढोने के लिए विवश था। दरअसल सनातन धर्म मानव-मुक्ति की जगह एक धर्मसत्ता के रूप में जनता के दिलों पर हावी हो गया। स्वाभाविक ही था कि सनातन धर्म की इस पूरी यज्ञ -संस्कृति के विरुद्ध समाज में आक्रोश आकार ले रहा था। 

समाज की उत्पादन प्रणाली धीमी गति से निरंतर बढ़ रही थी। कला-कौशल का अपनी गति से विकास हो रहा था। उत्पादक वर्ग मुख्य रूप से किसान और कारीगर थे। इन्ही के साधनों के बूते यज्ञ संपन्न होते थे। इन्हें प्रभावित करने के लिए पुरोहितों ने परलोक का एक ऐसा आकर्षक किन्तु भयाच्छादित लोक विकसित किया था, जिसकी ओर यह उत्पादक तबका भयभीत स्तर पर उत्सुक रहता था। हर देश-समाज में धर्म-मजहब इसी परलोक को केंद्र में रख कर विकसित किया गया है। उत्पादक तबके के पूरे लौकिक जीवन को परलोक के प्रति समर्पित कर देने से समाज के अनुत्पादक पुरोहित वर्ग की चांदी हो जाती है। यह परलोक एक विचित्र मायालोक था। राजा और राजन्य वर्ग लोक पर हुकूमत करता था और पुरोहित तबका परलोक पर, जो कि एक कपोल-कल्पना के सिवा कुछ नहीं था। लेकिन परलोक का प्रबंधन अधिक लाभ का सौदा था। दुखी जनता पर इस विचार का प्रभाव इतना अधिक था कि आम तौर पर पूरे समाज का लक्ष्य परलोक का सुरक्षित जीवन हासिल करना हो गया था। यह जन्म तो सामने है। इसमें हम कुछ कर सकते हैं। जहाँ कुछ नहीं कर सकते, उसके लिए प्रयास करना जरुरी प्रतीत होता था। ये यज्ञ और दूसरे कर्मकांड परलोक में स्थान सुरक्षित करने में सहायक होते हैं, यह विश्वास स्थापित किया गया था। अतएव एक मनोवैज्ञानिक भय के वातावरण में यज्ञ-संस्कृति विकसित होती जाती थी। जैसे भविष्य सुरक्षित करने का भय दिखा कर आज बीमा कम्पनियाँ मालामाल हो रही हैं, तब पुरोहित हो रहे थे।

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किसान तबके का सबसे बुरा हाल था। राजन्यों को इन किसानों से कर (टैक्स) चाहिए था और पुरोहितों को यज्ञ-व्यय। कुछ राजन्य बड़े यज्ञ करते थे। पुरोहित ऐसे राजन्यों की प्रशंसा में कसीदे बुनते थे। लेकिन सारा व्यय-भार वस्तुतः किसानों के कंधे पर होता था। उसके अन्न, दूध, घृत तो इन यज्ञों को समर्पित हो ही रहे थे, बलि रूप में बड़े पैमाने पर उनके पशुधन मारे जा रहे थे। इन पशुओं का इस्तेमाल कृषि और गाड़ी खींचने में होता था। इनके नुकसान से कृषि और व्यापार का नुकसान हो रहा था। यह एक विशुद्ध आर्थिक मामला था, जो सनातन कर्मकांड और यज्ञ-प्रधान धर्म से हो रहा था।

यज्ञों की आलोचना उपनिषद -काल से हो रही थी। इन यज्ञों का स्वरुप ऐसा हो गया था, जिससे कुल मिला कर इससे केवल पुरोहित वर्ग भौतिक स्तर पर लाभान्वित हो रहा था। इसलिए धीरे-धीरे ये यज्ञादि कर्मकांड पुरोहितों और किसानों के बीच संघर्ष के कारण बन गए। कभी-कभार राजन्यों का भी साथ किसानों को मिल जाता था। क्योंकि राजन्य समझ रहे थे कि ये पुरोहित उनका भी आर्थिक शोषण कर रहे हैं। बुद्ध ने इन्ही किसानों और राजन्यों के अंतर्द्वंद्व को जुबान दी थी। उन्होंने स्थापित धर्म की आलोचना की और आलोचना को एक नया धर्म बना दिया। वह इस बात को शिद्दत से समझते थे कि जनता को एक धर्म की जरुरत होती है, ताकि वह अपनी आध्यात्मिक अभिरुचियों को व्यवस्थित-अनुशासित कर सके। परलोक-दर्शन से मुक्त करने के लिए यह आवश्यक था कि बहुजनों के आध्यात्मिक प्रश्नों का जवाब ढूँढ लिया जाय और उन्हें बताया जाय। बुद्ध ने यही किया। पिछली सदी में भारतवर्ष में डॉ. आंबेडकर ने यही काम किया किया था। उन्होंने हिंदुत्व के पुरोहितवादी पाखंड से बहुजन जनता को मुक्त करने के लिए ढाई हज़ार वर्षों के बाद एक बार फिर बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। हालांकि आंबेडकर के ज़माने में हिन्दू-पुरोहितवाद यज्ञों के पाखंड से मुक्त हो, सीधे राजनीति में दखल दे रहा था। आंबेडकर की चुनौती भी सीधे इसी क्षेत्र में थी। वह समझ रहे थे कि बहुत जल्दी यह पुरोहितवाद राजनीति में दखल देगा और फिर देश का लोकतान्त्रिक वितान खतरे में पड़ जायेगा। 

हम बुद्ध के ज़माने में लौटना चाहेंगे। हमें यह देखना है कि बुद्ध ने अपने धम्म को किस तरह प्रस्तुत किया। जैसा कि पहले भी कह चुका हूँ बुद्ध ने बहुत सीधे-सादे ढंग से अपनी बातों को रखा। हालांकि त्रिपिटकों में उनके अनुयायियों ने इतना कचरा इकठ्ठा किया हुआ है कि वहां से वास्तविक बुद्ध को निकालना एक चुनौती बन गया है। यह कहना मुश्किल है कि संस्कृत भाषा की उस वक़्त क्या स्थिति थी और यह भी कि बुद्ध उससे परिचित थे या नहीं। लेकिन अनुमान यही है कि वह संस्कृत से अनविज्ञ थे। उन्होंने मगही जुबान में अपनी बातें रखी, जिसे बाद में पलिया, या पालि कहा गया। 

बुद्ध ने बताया कि चार अरिय (आर्य) सत्य हैं। आर्यसत्य अर्थात प्रधान या बड़े सत्य। उन्होंने शाश्वत नहीं, आर्य सत्य बतलाया। ये आर्य सत्य हैं –

  1. दुक्खम अर्थात दुःख है। 
  2. समुदाय अर्थात दुःख के कारण हैं।
  3. निरोधः अर्थात दुःख के निवारण हैं।
  4. निरोधगामिनी प्रतिपदः अर्थात दुखों के समुदाय के नाश (निरोध ) हेतु मार्ग ( प्रतिपद ) हैं .यानि दुःख-निवारण के उपाय हैं। 

दुःख किसी पारलौकिक सत्ता या ईश्वर के कारण नहीं, भौतिक-अधिभौतिक कारणों से होते हैं। इन कारणों के विनष्ट हो जाने से उनका आधार ख़त्म हो जाता है और दुःख भी खत्म हो जाते हैं। बुद्ध ने इन्हें समाप्त करने के लिए आठ सोपानों अथवा सीढ़ियों वाले एक मार्ग, मग्ग या रास्ते को दिखाया-बताया। इसे अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है। इसका अर्थ है आठ अंगों वाला मार्ग। ये आठ अंग या सोपान हैं – 

  1. सम्यक- दृष्टि
  2. सम्यक- संकल्प
  3. सम्यक- वचन
  4. सम्यक -कर्म
  5. सम्यक -आजीविका
  6. सम्यक -व्यायाम
  7. सम्यक -स्मृति
  8. सम्यक -समाधि 

सम्यक का अर्थ दो अतियों के बीच माध्यमिक प्रतिपद है। दोनों तरह की अतियाँ बुरी हैं। बीच का रास्ता ही ठीक है। बुद्ध का कहना है जो व्यक्ति अपनी जीवन -परिदृष्टि ठीक (सम्यक ) रखेगा, जो सही संकल्प या इरादा रखेगा, जिसके बोलचाल दुरुस्त होंगे, जिसके अच्छे कर्म होंगे, जिन्होंने जीविका के लिए बेहतर अर्थात भ्रष्टाचार-मुक्त साधन चुने होंगे, जो अपनी इन्द्रियों को नियंत्रण में रखने के लिए ठीक व्यायाम करते रहेंगे, जिनकी स्मृति ठीक होगी और जो उचित समाधि का अनुसरण करेंगे वे दुःखमुक्त होंगे। इन अष्टांगिक मार्ग में शील, समाधि और प्रज्ञा का समावेश है। सम्यक दृष्टि और सम्यक संकल्प प्रज्ञा है। सम्यक वाणी, सम्यक कर्म और सम्यक जीविका शील है और सम्यक प्रयत्न, सम्यक स्मृति व सम्यक समाधि को समाधि कहते हैं। विभिन्न बौद्धग्रंथों में इसकी विवेचना की गयी है। जैसे शील पांच हैं ; जिन्हे ‘पंचशील ‘ कहा जाता है। कोई व्यक्ति संघ में शामिल होने के पूर्व इन पंचशील की शपथ लेता है। ये पांच शील हैं – प्राणियों को न मारना अर्थात अहिंसा , चोरी न करना, झूठ न बोलना, काम संबंधी व्यभिचार न करना, और नशा आदि नहीं करना। ये पांच- शील आम जनों के लिए हैं। लेकिन जो पूर्णकालिक कार्यकर्ता यानी भिक्षु हैं उनके लिए पांच और शील हैं। भिक्षुओं के लिए दिन में कई दफा भोजन, आभूषण या कीमती चीजें शरीर पर धारण करना, संगीत, स्वर्ण-रजत छूना और गद्देदार बिस्तर की मनाही है। इसी तरह सूक्ष्म से सूक्ष्मतम चीजों पर बौद्धों ने पर्याप्त विमर्श किया है। 

ये अरिय सत्य और अष्टांगिक मार्ग धम्म तो हैं लेकिन यह दर्शन या फलसफा नहीं है। प्रज्ञा ,शील और समाधि वह सत्कर्म है, जिस पर चल कर दुःखमुक्त हुआ जा सकता है। दुःखमुक्तता की इस स्थिति को ही निर्वाण कहा जाता है। बौद्ध मत के अनुसार निर्वाण इस जीवन में ही प्रज्ञा, शील,समाधि के सम्यक मार्ग (माध्यमिक प्रतिपदः) द्वारा हासिल किया जा सकता है। जब इस निर्वाण में महा उपसर्ग लगता है तब यह महानिर्वाण हो जाता है, जो मृत्यु का पर्याय है। बुद्ध ने आमजनों के बीच उपरोक्त दो चीजों की ही अधिक चर्चा की। लेकिन भिक्षुओं को उन्होंने उस विज्ञान को भी बताया कि आखिर जन्म-जरा-मरण के दुःख से मुक्ति कैसे संभव होती है। इस विज्ञान को पटिच्चसमुत्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) कहते हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ होता है किसी वस्तु की प्राप्ति होने पर अन्य वस्तु की उत्पत्ति होती है। अर्थात यह होने से वह होता है। अस्मिन सति इदं भवति। यह सापेक्ष कारणतावाद है। इसके अनुसार किसी भी चीज की उत्पत्ति बिना कारण के नहीं होती। दुःख है तो इसके कारण हैं। ये कारण एक श्रृंखला या समुदाय में हैं। एक दूसरे से जुड़े हुए। इसे द्वादश निदान कहते हैं। ये हैं जरा-मरण, जाति, भव, उपादान, तृष्णा, वेदना, स्पर्श, षडायतन, नामरूप, विज्ञान, संस्कार, तथा अविद्या। अब प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत के अनुसार अविद्या यानि अज्ञान को ज्ञान से हम अपदस्थ करते हैं। अविद्या के नाश से संस्कार का नाश या निरोध हो जाता है। फिर संस्कार के निरोध से विज्ञान, विज्ञान के निरोध से नामरूप, नामरूप के निरोध से षडायातन (पांच इन्द्रियां और मन), षडायातन के निरोध से स्पर्श, स्पर्श के निरोध से वेदना, वेदना के निरोध से आसक्ति, आसक्ति के निरोध से तृष्णा, तृष्णा के निरोध से उपादान (पांच कमेंद्रिय और बुद्धि ), उपादान के निरोध से भव, भव के निरोध से जाति (जन्म) और जन्म के निरोध से जरा-मरण का निरोध हो जाता है। 

बुद्ध के लिए दुःख-निरोध प्राथमिक समस्या थी। उन्होंने भिक्षुओं से कहा – 

इदं खो पन भिक्खवे दुक्खम अरिय सच्चं जाति पि दुक्खा, जरापि दुक्खा, मरणम्पि दुक्खा, सोक परिवेद-दोमनस्सुपायसापि दुक्खा, अप्पियेहि सम्पयोगो दुक्खो, पियेहि विप्पयोगो दुक्खो, यम्पिच्छं न लभति दुक्खम, सांख्यित्तेन पंचूपादानक्खन्धापि दुक्खा। 

– मञ्झिम -निकाय 

(भिक्षुओं ! दुःख आर्य सत्य है। जन्म दुःख, बुढ़ापा दुःख ,मरण दुःख, शोक, परिवेदन, उदासी, परेशानी दुःख। अप्रिय से जुड़ना और प्रिय से टूटना दुःख, इच्छित वस्तु का न मिलना दुःख, संक्षेप में यह कि राग द्वारा उत्पन्न पाँचों स्कंध यानी रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान दुःख है)

प्रतीत्यसमुत्पाद का यह सिद्धांत ढाई हजार वर्ष से अधिक पुराना है। तबसे विज्ञान और तकनीक ने बहुत उन्नति कर ली है। आज के नजरिये से देखने पर कुछ मामलों में यह अजीबोगरीब लग सकता है। लेकिन सापेक्ष-कारणतावाद युक्त प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत ही आधुनिक विज्ञान का आधार है, यह स्पष्ट दिखता है। सांख्य दर्शन का सत्कार्यवादी विचार कि कार्य अपनी उत्पति के पूर्व कारण में मौजूद होता है और वैशेषिक के इस विचार कि कार्य अपने कारण से सर्वथा भिन्न एवं पृथक है, से हट कर प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कार्य न तो कारण में पूरी तरह विद्यमान है न ही पूरी तरह भिन्न है, बल्कि कार्य अपनी उत्पति के लिए कारण पर आश्रित अथवा अवलम्बित है। 

प्रतीत्यसमुत्पाद की व्याख्या लगातार होती रही है, आगे भी होगी। बौद्ध दर्शन का यही केन्द्रक है। इसके कारण ही बौद्ध दर्शन का वैशिष्ट्य है। आश्चर्य यह होता है कि इतने पुराने जमाने में बुद्ध ने विज्ञान की बारीकियों को इस तरह समझा था। उनके अनुसार यह विश्व एक नैरंतर्य में बिना किसी स्थिरता के साथ है। कोई भी चीज यहां स्थिर नहीं है, न नाम और न ही रूप। मनुष्य को प्रज्ञा, शील और समाधि के सहयोग से इस निरंतरता के बीच ही दुःख-निरोध के प्रयास करने हैं। यह प्रयास बुद्ध को नहीं, व्यक्ति अथवा जातक को ही करने हैं –

तुम्हेहि किच्चं आतप्पं अक्खातारो तथागता।

पटिपन्ना पमोक्खन्ति झाइनो मारबंधना। 

 – धम्मपद (मग्गवग्ग 20 / 4) 

तुम्हें ही उद्यम करने होंगे। तथागत के उपदेश सुनने से दुःखनिरोध नहीं होंगे, चलने से होंगे। तथागत का काम केवल रास्ता बताना था, उस पर चलना तुम्हारा काम है। इस रास्ते पर चल कर ही कोई मार के बंधन से मुक्त होगा।

(कॉपी संपादन : नवल)


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