क्या आप गौतम बुद्ध के इन पहलुओं को जानते हैं?

लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं गौतम बुद्ध के बारे में। प्रस्तुत लेख में उन्होंने बुद्ध के जीवन के साथ उनके विचारों और उनके समकालीन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है। वे इस लेख के जरिए यह प्रस्ताव कर रहे हैं कि बुद्ध भी आलोच्य हैं 

जन-विकल्प

गौतम बुद्ध

संसार के किसी एक व्यक्ति की सबसे अधिक चर्चा यदि आज तक हुई है, तो वह बुद्ध हैं। ईसा के छह सौ साल पूर्व के जमाने में वह जन्मे और अस्सी साल की ठीक-ठाक उम्र जीकर वह 543 ईस्वीपूर्व में दिवंगत हुए। उनके जीवनचरित में कथा तत्वों की प्रचुरता है और जिन लोगों ने भी उनकी जीवनी लिखी है, उन्होंने अपनी काव्यात्मकता से उसे इतना ‘दिव्य’ बना दिया है कि लोगों को उनमें एक अलौकिकता का आभास होता है। एक समय ऐसा भी आया जब रूढ़ ब्राह्मणों ने उनका और उनके विचारों का तीखा विरोध किया, लेकिन इन्हीं लोगों ने अपनी सुविधा के लिए उन्हें विष्णु के दस अवतारों में भी शामिल किया। ईसा की पहली सदी में ही कवि अश्वघोष ने संस्कृत में ‘बुद्धचरितम’ लिखा था। इसका पाठ हमें एक ऐसे बुद्ध से हमारा परिचय कराता है जो बहुत हद तक अलौकिक और अवास्तविक प्रतीत होता है। बौद्धों के महायान पंथ ने ‘ललित विस्तर’ शीर्षक से एक जीवनी परक विस्तृत ग्रंथ की रचना की, जिसमें बुद्ध कुछ और अधिक ‘दिव्य’ हो गए प्रतीत होते हैं। 

आधुनिक ज़माने में यूरोपीय बुद्धिजीवियों की रूचि बुद्ध की ओर हुई। वेदों और उपनिषदों के पश्चात् जब इन यूरोपीय बुद्धिजीवियों ने बुद्ध को जाना, तब फिर वह उनके परम आकर्षण के केंद्र हो गए। पहली दफा एडविन अर्नाल्ड ने 1879 में लाइट ऑफ़ एशिया’ लिखा, तब यह यूरोप में चमत्कार की तरह चर्चित हुआ। 1894 में पॉल कारुस ने ‘गॉस्पेल ऑफ़ बुद्धा’ और 1903 में रिस डेविड्स ने ‘बुद्धिस्ट इंडिया’ लिख कर एक वैचारिक खलबली मचा दी। ताज्जुब तो यह कि अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवियों ने भी इन यूरोपीय लेखकों के माध्यम से ही बुद्ध को जाना। उपरोक्त ग्रंथों खास कर ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ और ‘गॉस्पेल ऑफ़ बुद्ध’ में भी बुद्ध की छवि मनुष्य से अधिक देवता या पैगम्बर जैसी ही दिखती है। एक सुकुमार राजकुमार का परिव्राजक सन्यासी बनना इन लेखकों के परम आकर्षण का विषय था। यह वही समय था जब यूरोप युद्ध की मानसिकता में जी रहा था। ऐसे में बुद्ध की करुणा और मित्रता के मानवीय सन्देश उन्हें नए वैचारिक आधार न सही, आश्वस्ति अवश्य प्रदान कर रहे थे। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध दो विश्वयुद्धों की भयावहता से भरा रहा और इसका उत्तरार्द्ध बुद्ध के विचारों से। पूरी दुनिया बुद्ध के आकर्षण में खिंची जा रही थी। बौद्ध अध्ययन पर पूरी दुनिया में नए सिरे से विचार हुआ। पालि ग्रंथों खास कर त्रिपिटक के प्रति विद्वानों का आकर्षण विकसित हुआ। अब एक नए बुद्ध की खोज आरम्भ हुई थी। वह एक विचार था, विश्व-दर्शन था। जिस भारत भूमि से एक समय बौद्धों को खदेड़ दिया गया था, वहां फिर से उन पर अध्ययन आरम्भ हुआ। धर्मानंद कोसंबी और राहुल सांकृत्यायन प्रभृति विद्वानों ने आधुनिक बौद्धिकता में बौद्ध विवेकवाद को नत्थी किया, जिससे एक नए विमर्श की शुरुआत हुई। 1940 के दशक में पालि के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान धर्मानंद कोसंबी और 1950 के दशक में भारत के विद्वान राजनेता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बुद्ध की उल्लेखनीय जीवनियां लिखीं।

गौतम बुद्ध की एक तिब्बती पेंटिंग

नए लेखकों का आग्रह बुद्ध के आत्मसंघर्ष और वैचारिक संघर्ष पर अधिक था। इन लोगों ने लिजलिजी भावुकता को परे रखते हुए एक ऐसे बुद्ध की खोज की, जिसके विचारों में करुणा का प्राधान्य है और जब कभी विचार और करुणा की टकराहट होती है, तो विचारों को करुणा की दृष्टि से देखा जाता है। बुद्ध विषयक नए संधान यह नहीं स्वीकार करते कि बुद्ध का जन्म किसी ऐसे राजघराने में हुआ जिसके पास अकूत सम्पदा थी और व्यापक प्रभाव था। हिमालय की तराई में शाक्यों के कुनबे या अधिक से अधिक एक छोटे जनपद कपिलवस्तु में उनके पिता राजा थे। तत्कालीन साहित्य के अध्ययन से प्रतीत होता है कि उनके पिता शुद्धोदन उस जनपद के चुने हुए राजा थे, जिनका शायद बारी -बारी से, यानी चक्रीय विधि से चुनाव होता था। संभवतः ऐसे राजाओं को ही चक्रवर्ती यानी चक्र की तरह चक्रानुक्रम से चलने वाला कहा जाता था। यह सम्राट से अलग राज-रूप था। सम्राट बड़े साम्राज्यों के पराक्रम या वंशानुक्रम से बने राजा होते थे। ऐसे गणतंत्रीय ढाँचे के राजा के पास इतना धन होना, जिसका चित्रण ‘बुद्धचरितम’ में है, मुश्किल और अविश्वसनीय लगता है। 

कहा जाता है उनकी माँ माया देवी जब प्रसव के लिए अपने मायके देवदह जा रही थीं, तब रास्ते में पड़ने वाले लुम्बिनी नामक जगह पर बुद्ध का जन्म हो गया। यह भी कथा है कि जन्म के सात रोज बाद ही उनकी माता का निधन हो गया और फिर उनकी मासी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया। इस कारण ही उनका नाम गौतम हो गया। धर्मानंद कोसंबी की मानें तो उनका मूलनाम गौतम ही है; क्योंकि सिद्धार्थ नाम बाद में लिखे गए एक ग्रन्थ ‘ललित विस्तर’ में पहली बार आया है। संभवतः वहीं से निदान-कथा में भी यह नाम लिया गया है। राजशेखर कृत ‘अमरकोश’ में बुद्ध के छह नाम दिए गए हैं। इनमें तीन विशेषण हैं – जैसे शाक्य सिंह, शौद्धोदनि और मायादेवी सुत। तीन अन्य नाम हैं- अर्कबंधु , सर्वार्थसिद्ध और गौतम। अर्कबंधु बुद्ध का गोत्रनाम है। शेष बचे दो सर्वार्थसिद्ध और गौतम उनके नाम हैं। यह सर्वार्थसिद्ध ही संभवतः सिद्धार्थ या सिद्धाथ्थ है। 

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बुद्ध के पिता शुद्धोदन खत्तिय थे। खत्तिय यानि खेती करने वाले। खत्तियों के कई प्रकार के कुल थे जिन में एक शाक्य था। शुद्धोदन इसी कुल से ताल्लुक रखते थे। जातक निदानकथा में रोपनी के आरम्भ वाले किसान-त्यौहार ‘वप्प मंगल’ का एक खूबसूरत वर्णन है जिसके अनुसार शुद्धोदन की खेती एक हज़ार हलों की थी। इससे अनुमान होता है कि चार या पांच बड़े गांवों पर उनकी मिल्कियत थी। यानी इतने प्रभाव का वह ‘राजा’ था। दरअसल यह किसी मझोले जमींदार की स्थिति बनती है। निदानकथा से यह भी सूचना मिलती है कि शुद्धोदन स्वयं भी हल चलाता था। रामायण कथा में जिस जनक का वर्णन है वह भी खत्तिय है, लेकिन ऐसे ही किसी वप्पमंगल अर्थात कृषि कार्य आरम्भ के रोज हल चलाते समय उसे एक घड़े में रखी नवजात सीता मिली थी। इतना तो तय है कि शाक्यों का मुख्य व्यवसाय खेती ही था और निदानकथा में एक हज़ार हलों की हैसियत को यदि बढ़ा-चढ़ा कर नहीं दर्शाया गया है तो बुद्ध का पिता एक ज़मींदारनुमा अमीर राजा किसान था। गांवों में अब तक किसी अमीर किसान को राजा आदमी कहने का रिवाज है। शुद्धोदन संभवतः इसी अर्थ में राजा था। ऐसे राजा के पास बड़ा घर या कई घर, तड़ाग-बाग़ और दास-दासियों का होना स्वाभाविक है, जिसकी कवियों ने अपनी कल्पना-शक्ति से बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन कर दिया है। बुद्ध उन्तीस साल की उम्र में गृहत्याग करते हैं। इस उम्र तक निश्चय ही उनने हल चलाना सीखा होगा; जैसे कि उनके पिता चलाते थे। हाल के कुछ सौ साल पहले तक बड़े से बड़े राजा या बादशाह स्वयं तलवार लेकर युद्धभूमि में उतरते थे, वैसे ही एक राजा किसान को भी अपने हल के साथ खेतों में उतरना पड़ता था। 


पिता शुद्धोदन की तरह बुद्ध की माता माया देवी का संबंध भी शाक्य कुल से ही था। पालि ग्रन्थ ‘अपदान ‘ में बुद्ध की मासी (माँ की बहन ) प्रजापति गौतमी का एक संवाद है – ‘ … मैंने देवदह में जन्म लिया। मेरा पिता अंजन शाक्य (अञ्जन सक्क) और माता सुलक्षणा (सुलक्खणा) हैं। मैं कपिलवस्तु के सुद्धोदन के घर गयी (यानि विवाही गयी )।‘ 

इस तरह ज्ञात होता है कि बुद्ध एक समृद्ध आर्थिक पृष्ठभूमि वाले किसान परिवार से आते थे। नतीजतन गृहत्याग के पूर्व उन्होंने सुखमय जीवन जिया। युवावस्था में ही उनका विवाह यशोधरा के साथ हुआ था। संस्कृत ग्रन्थ ‘ललित विस्तर’ के अनुसार उनकी पत्नी का नाम गोपा है, लेकिन पालि अपदान ग्रंथ के अनुसार उनका नाम ‘यसोधरा’ है। अधिकतर पालि ग्रंथों में उन्हें ‘राहुलमाता देवी’ के नाम से ही जाना गया है। किसी स्त्री को उसके पुत्र की माँ नाम से पुकारे जाने की प्रथा हाल तक रही है। पुत्रजन्म के पूर्व उसे पतिनाम की बहू कह कर पुकारे जाने का प्रचलन होता था। सामान्य तौर पर किसी स्त्री का नाम पिता के घर से विदा होते ही प्रायः विलुप्त हो जाता था। इसलिए यसोधारा को राहुल माता देवी के नाम से जाना गया है।

पालि और बाद के संस्कृत ग्रंथों में भी बुद्ध का जीवन इतने चमत्कारपूर्ण ढंग से चित्रित किया गया है कि किसी आधुनिक अध्येता को बहुत सावधानी बरतनी होती है। उनके जन्म लेते ही कुछ कदम चलना, जन्मोपरांत असित ऋषि का आना और नवजात बालक के शरीर पर विचित्र या अद्भुत चिह्नों का देखना और उनके महापुरुष होने की भविष्यवाणी करना जैसे प्रकरण बानगी भर हैं। इन चमत्कारों के लिजलिजे कीचड़ से उनके वास्तविक जीवनचरित को निकालना किसी के लिए भी श्रमसाध्य-कार्य होगा। लेकिन कुल मिला कर बुद्ध का जो जीवनचरित बनता है, वह यह कि किसान पृष्ठभूमि वाले कपिलवस्तु वासी शाक्यों के एक सम्पन्न परिवार में उनका जन्म हुआ। उनके पिता का नाम शुद्धोदन और माता का नाम माया देवी था। जन्म के कुछ ही रोज बाद उनकी माता का निधन हो गया। मासी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया। उन्हें गौतम कह कर पुकारा जाता था, अर्थात यह उनका नाम था। कुछ ग्रंथों के अनुसार सिद्धार्थ भी उनका नाम था। वह बचपन से अंतर्मुखी प्रवृत्ति के थे, इसलिए पालिग्रंथों में उनके बचपन के बारे में जो चित्रण है कि वह जब अपने पिता के साथ खेतों में जाते थे तो कृषि-कार्य देखने के बजाय किसी पेड़ के नीचे बैठ ध्यान में डूब जाते थे। ये अतिशयोक्तियां हमारे समाज में इसलिए गढ़ी जाती हैं कि किसी महापुरुष की महानता की पृष्ठभूमि बनाई जा सके कि उस व्यक्ति में महानता के लक्षण बचपन से ही थे। हालांकि बुद्ध का इस प्रवृत्ति का होना संभव है। सांसारिकता से अलिप्त रहने का स्वभाव कुछ लोगों का होता है। ऐसे इंसान का अपनी आध्यात्मिक उलझनों को सुलझाने-समझने के लिए गृहत्याग एक स्वाभाविक बात थी। बहुत संभव है कि इसका आभास उनके परिवार वालों को था। अन्यथा शुद्धोदन जैसा संपन्न व्यक्ति अपने जवान बिगड़ैल बेटे को ढूँढ लाता। तब की दुनिया आज की तरह व्यापक और जटिल नहीं हुई थी। 

गौतम बुद्ध की तिब्बती पेंटिंग। इसमें बुद्ध के जीवन को चित्रित किया गया है (साभार : बुद्धा म्यूजियम डॉट कॉम

पालि ग्रंथों से ही यह भी जानकारी मिलती है कि गौतम कुछ परिव्राजकों से नियमित मिलते रहते थे और उनका शांत मुक्त जीवन उन्हें आकर्षित करता था। ‘अत्तण्ड-सुत्त’ का एक बुद्ध संवाद उनके मिजाज या मनोदशा की व्याख्या करता है। उसे देखा जाना चाहिए – ‘शास्त्र धारण करना मुझे भयावह लगा। जनता कैसे झगड़ती है यह मैंने देखा। मैं बताता हूँ मुझ में संवेग (वैराग्य) कैसे विकसित हुआ। कम पानी में जैसे मछलियाँ छटपटाती हैं वैसे ही एक दूसरे से विरोध कर के छटपटाने वाली जनता को देख मेरे मन में भय हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखाई देने लगा। तमाम दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा अनुभव हुआ। सारी जनता को एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ते देख मेरा जी ऊब गया।’ 

‘सुत्तनिपात’ में पब्बज्जया सुत्त है। इस के आरम्भ में ही गौतम ने अपने परिव्राजक होने के कारण बताये हैं – ‘घर-परिवार विवादों और कूड़े-कचरे की जगह है, तथा प्रवज्या खुली जगह है, यह जान कर मैं परिव्राजक बन गया।’ 

‘अरियपरियेसन सुत्त’ में कुछ अधिक विस्तार से बुद्ध का ही संवाद है – ‘भिक्षुओं, ज्ञान होने से पूर्व मैं भी जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ी हुई चीजों के पीछे लगा हुआ था। स्वयं जराधर्मी, मरणधर्मी, और शोकधर्मी होते हुए जरा, व्याधि, मरण और शोक के चक्कर में फँसी हुई चीजों के पीछे पड़ा हुआ था। तब मेरे मन में ख्याल आया कि मैं स्वयं जन्म, रोग, मृत्यु और दुःख से बंधा हूँ और इन्ही से बंधे पत्नी-पुत्र के पीछे लगा हुआ हूँ। यह उचित नहीं है। उचित यह है कि इन सब से मुक्ति अर्थात निर्वाण का शोध करूँ।’ 

इसी सुत्त में यह भी वर्णन है कि गौतम रात्रि में चुप-चाप नहीं बल्कि परिवार और माता-पिता को जानते-देखते घर से बाहर हुए थे। ‘हे भिक्षुओं, ऐसा विचार करते हुए थोड़े समय के बाद, यद्यपि मैं युवा था और मेरे बाल काले थे और कि मेरे माता-पिता जाने की इजाजत नहीं दे रहे थे, वे रो रहे थे और उनके मुख अश्रु धारा से भीगे हुए थे, मैं मुंडन करा कर और काषाय वस्त्र धारण कर घर से बाहर हो गया।’ 

मुक्ति की इसी आकांक्षा से गौतम ने गृहत्याग किया और ज्ञान की खोज में वह वर्षों घूमते-भटकते रहे। वह अपने जमाने के प्रख्यात संत आलार कालाम और उद्द्क रामपुत्त से मिले। आलार कालाम के एक शिष्य भरंडु से वह पहले ही मिल चुके थे। लेकिन इन सब से उन की जिज्ञासा शांत नहीं हुई। इसके बाद वह गिरिव्रज (आज का राजगीर) पहुँचे, जो तब मगध की राजधानी थी और विभिन्न प्रकार के विचारकों का प्रसिद्ध अड्डा या गढ़ भी। इन पर पहले ही हमने चर्चा की है, अतएव इन्हें दुहराना ठीक नहीं होगा। कुल योग यह कि गिरिव्रज के सब से ख्यात बौद्धिक मक्खलि गोसाल के नियतिवाद से भी उन्हें कोई संतुष्टि नहीं मिली। नियतिवाद अधिक से अधिक जीवन और जगत की एक व्याख्या थी कि चीजें स्वाभाविक प्रक्रिया में गतिशील हैं; और कि यह कोई ईश्वरीय विधान या चक्र नहीं है, भी उन्हें केवल एक व्याख्या ही प्रतीत हुई। बुद्ध की समस्या इस बात की खोज थी कि क्या इसमें हस्तक्षेप किया जा सकता है। यदि सब कुछ स्वाभाविक और नियत है, तब मनुष्य के कर्म की कोई भूमिका नहीं रह जाती। पूरी तरह स्वयं को प्रकृति या नियति पर छोड़ देना सामाजिक अन्याय की पृष्ठभूमि भी गढ़ रहा था। स्वाभाविक गति से तो जनजातीय-जनपदीय जीवन तेजी से सिकुड़ता-सिमटता जा रहा था। महाजनपदों में वंशानुक्रम से से चलने वाली राजतंत्रीय व्यवस्था कायम होती जा रही थी इन महाजनपदों के शासकों में राज्य विस्तार की उद्दाम लालसा थी, जिसे देख बुद्ध विचलित थे। विचलित तो मक्खलि गोसाल भी थे, लेकिन प्रकृति और जीवन में ज्ञान के हस्तक्षेप की भूमिका उन्होंने नहीं समझी। गौतम इस हस्तक्षेप के लिए ही उत्सुक थे। उन्नीसवीं सदी में कार्ल मार्क्स की समस्या भी यही थी। अपने प्रसिद्ध निबंध ‘जर्मन आइडियोलॉजी’ में वह कहते हैं अब तक के दार्शनिकों ने विभिन्न तरीकों से विश्व की व्याख्या की है, लेकिन प्रश्न है कि उसे बदला कैसे जाय? जीवन और जगत को उनके अपने नियत स्वभाव पर ही नहीं छोड़ा जा सकता। अन्यथा प्रकृति में तो ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है’ का स्वाभाविक सिद्धांत लागू रहता है। ताकतवरों क़ी सत्ता फैलती-पसरती जाती है और कमजोर सिमटते-सिकुड़ते जाते हैं। नियतिवाद एक सामाजिक योग्यतावाद भी विकसित करता है, जो न्याय-केंद्रित नहीं, शक्ति-केंद्रित होता है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस का सिद्धांत चलने लगता है। प्राकृतिक न्याय पर सामाजिक न्याय की नकेल जरुरी है। इसलिए यह आवश्यक था कि स्वाभाविकता पर ज्ञान का हस्तक्षेप हो, चाहे यह अधिभौतिक पृष्ठभूमि का ही क्यों न हो। उत्पीड़ित मानवता के लिए यह आवश्यक था। गौतम को इसी ज्ञान की तलाश थी। 

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गिरिव्रज से चल कर वह उरुवेला आये, जो निरंजना नदी के किनारे अवस्थित था। आज यह जगह बोधगया के नाम से जाना जाता है। बौद्ध वांग्मय के अनुसार यहाँ गौतम ने शरीर को विविध रूप से कष्ट देने से ले कर विमर्श और चिंतन के अनेक प्रयोग किये, लेकिन वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके थे। यही समय था जब वह विचलित होने लगे। जंगल में मार से मानस-युद्ध के जो प्रसंग बौद्ध साहित्य में हैं, वे इंगित करते हैं कि कई बार पुरानी दुनिया में लौट चलने का विचार उनके मन में उभरा। इन पर काबू पाना कठिन था। पैंतीस वर्ष की उम्र युवा होती है, इसमें कामभाव आदि का उभरना स्वाभाविक था। लेकिन बुद्ध ने अंततः इन भावनाओं पर विजय पायी। एक रोज अनायास उन्हें सुस्वादु खीर से भरा एक थाल भेंट किया गया। यह एक नारी के द्वारा दी गयी भेंट थी। गौतम खा कर निहाल हुए। अब उनका मष्तिष्क सक्रिय हुआ। ग्रीष्म (बैशाख माह) के पूरे चाँद वाली रात को जब वह एक पीपल पेड़ के नीचे बैठे थे, तब वह एक वैचारिक निष्कर्ष पर पहुंचे। अपने निष्कर्ष से वह संतुष्ट और उत्साहित थे। उन्हें अनुभव हुआ, इस रास्ते से चल कर मनुष्य सुखी रह सकता है। कम से कम वह तो सुख अनुभव कर ही रहे थे। उस ज्ञान को उन्होंने प्राप्त कर लिया था, जिसके संधान में वह लगे थे। यह था सापेक्ष-कारणतावाद का सिद्धांत। कार्य-कारण सम्बन्ध की उस गुत्थी को उन्होंने अपने नजरिये से सुलझा लिया था, जिसे कपिल से लेकर अनेक दार्शनिक नहीं सुलझा पाए थे। ‘अस्मिन सति इदं भवति’ इसके होने से वह होता है। एक के होने से अन्य का जन्म होता है। एक का मिटना दूसरे का मिटना होता है। यही पतीच्च्समुत्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) है। चार आर्य सत्य और आठ सोपानों वाले एक रास्ते अथवा मार्ग की बात उन्होंने स्पष्ट की . अब वह सम्यक सम्बुद्ध थे। उन्होंने एक धम्म अथवा विचार का प्रारूप पा लिया था। इसे लोगों को बताने के लिए वह उत्सुक थे।

इस पूरी प्रक्रिया में गौतम एक नाटकीय घटनाक्रम से गुजरे। यह सब मिल मिला कर एक लीला बन गयी। गौतम बुद्ध की जीवन लीला। उनकी कथा किंवदंती के रूप में प्रचारित होने लगी। बुद्ध अकेले थे। निश्चय ही ज्ञान प्राप्ति की पूरी प्रक्रिया के बारे में लोगों को उन्होंने ही बतलाया। उन्होंने किंवदंतियां बनने दीं। वह रोक सकते थे। लेकिन नहीं रोका। यद्यपि उन्होंने व्यक्ति पूजा का हमेशा विरोध किया। उन्होंने धम्म को केंद्र बनाना चाहा। लेकिन त्रिशरण में बुद्ध शरण में सब से पहले जाना होता है। ये सब छोटे-छोटे ‘पाखण्ड’ उन्होंने स्वयं विकसित किये। अपने परिवार और शाक्य कुल से भी मुक्त होने का प्रयास उन ने नहीं किया। उनके अनुयायियों ने उन्हें शाक्यसिंह का विरुद दिया और वह चुप रहे, बल्कि कई स्थानों पर उन्होंने अपने सम्मानित कुल की चर्चा स्वयं की। मगध का बलशाली राजा बिम्बिसार उनकी धज देख कर ही प्रभावित हो गया था। अमीर राज परिवार से आने के कारण उनके हाव-भाव, चाल-ढाल और बोली-बानी में आभिजात्यपन अपने ही अंदाज़ में न्यस्त था। ऊँचे तबकों से जुड़ने में इसका उन्हें स्वाभाविक तौर पर लाभ मिला। उनकी प्रबंधन क्षमता बेजोड़ थी। इतना बड़ा सिस्टम बिल्डर उनके ज़माने तक शायद कोई नहीं हुआ था। ज्ञान प्राप्ति के बाद कुछ समय तक वह मुग्धास्था में अवश्य रहे, लेकिन एक बार जो स्वयं को क्रियाशील किया, मृत्युपर्यन्त बने रहे। उरुवेला से उठ कर वह पांव-पैदल बनारस के पास ऋषिपत्तन पहुंचे और उन पाँच परिव्राजकों को ढूँढ निकाला, जो किसी समय उनके साथी हुआ करते थे। इन पांचों को ही उन्होंने पहला उपदेश और प्रवज्या दी। इसे धम्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है। इसकी याद को अक्षुण्ण बनाने के लिए अशोक मौर्य ने यहां एक स्मृतिचिह्न (स्तूप ) बनाया, वही आज भारत सरकार का राजचिह्न है। इस धम्मचक्रप्रवर्तन के बाद अपने उम्र के अस्सीवें वर्ष तक, अर्थात बोधि-प्राप्ति के पश्चात् पैंतालीस वर्षों तक, बुद्ध लगातार घूमते हुए अपने धम्म का प्रचार करते रहे। उन जैसा व्यवस्था-निर्माता शायद ही कोई दूसरा हो। ज़माने के सभी प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण लोगों को उन्होंने अपने व्यक्तित्व के जादू से प्रभावित करने की कोशिश की। इसमें श्रेष्ठिजन यानि सेठ-महाजन से लेकर राजा, विद्वान, नर्तकी, वैद्य-चिकित्सक और डाकू तक थे। बिम्बिसार, प्रसेनजित और अजातशत्रु जैसे राजा, अनाथपिण्डक जैसा धन्नासेठ, जीवक जैसा चिकित्सक, अंबपाली जैसी नर्तकी, सारिपुत्र और मौदगल्यायन जैसे विद्वान और अंगुलिमाल जैसा डाकू उनके प्रभावमण्डल में था। ये सब उनके व्यक्तित्व से सम्मोहित थे। इसके साथ ही समाज के कमजोर और उपेक्षित लोगों को उन्होंने गले लगाया। सुनीत मेहतर, उपालि नाई, चुन्द लोहार तो कुछ थोड़े से उदाहरण हैं। बुद्ध ने समाज के उपेक्षित तबकों को सामाजिक गतिशीलता देकर समाज को रचनात्मक ऊष्मा से भर दिया। किसानों, सेठों, कारीगरों, श्रमिकों सब की सामाजिक भूमिका को उन्होंने रेखांकित किया। निम्न तबकों से लेकर ब्राह्मणों तक को एक ही धरातल पर खड़ा कर बंधुत्व और समता विकसित करने की कोशिश की। अपने संघ को उन्होंने वर्ण-जाति भेद से बहुत हद तक मुक्त रखा था। उनने कहा – ‘जैसे नदियाँ समंदर में जाकर अपना पूर्व नाम खो देती हैं, वैसे ही भिन्न वर्णों से आने वाले लोग संघ में आकर अपना पूर्व वर्ण-गोत्र खो देते हैं। सभी एकमेव हो जाते हैं।’ उस ज़माने में यह एक बड़ी बात थी। लेकिन बुद्ध ने ब्राह्मणों के विरुद्ध कोई अभियान चलाया, इसके कोई उदाहरण नहीं मिलते। आरम्भ में ही सारिपुत्र और मौद्गल्यायन जैसे ब्राह्मण परिवार से आने वाले भिक्षुओं ने संघ में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। बुद्ध ने आखिरी प्रवज्या भी सुभद्र नामक एक ब्राह्मण को ही दी थी। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उन ने किसी खास तबके का विरोध किया। हाँ, वह वर्ण धर्म के हिमायती नहीं थे। शायद वर्ण धर्म उस वक़्त तक इतना प्रभावशाली भी नहीं हुआ था, जितना कबीर के मध्यकाल में था।

विरुद्धों के बीच सामंजस्य विकसित करने की कला में बुद्ध को महारत हासिल थी। इसका उन ने पूरा का पूरा इस्तेमाल भी किया। वह दार्शनिक के साथ ही कुशल प्रबंधक भी थे। इस क्षमता का विकास कर उन्होंने अपने समय के लगभग सभी जनपदों में अपनी बात फैला दी। जगदीश्वर पांडेय की किताब ‘ऑन द फूटप्रिंट्स ऑफ़ द बुद्धा’ देखने से हैरानी होती है कि उन्होंने कितनी लम्बी यात्रा की थी। पांव-पैदल चल कर इतनी बड़ी यात्रा करने वाला शायद ही कोई संत, साधु या नेता इस देश में अब तक हुआ है। शंकराचार्य ने स्पर्धा अवश्य करनी चाही, लेकिन अव्वल तो यह कि वह पांव-पैदल ही नहीं चले और फिर यह भी कि वह चार कोनों को ही छू सके। गांव-कस्बे उनके यात्रा मानचित्र में कम ही हैं। 

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हर महान व्यक्ति में कुछ अंतर्विरोध होते हैं। बुद्ध में भी थे। उन्होंने कई बार छोटे-छोटे समझौते किये और अपने ही विचारों या बातों से पीछे हटे। पीछे हटना अच्छे मामलों में भी था और ख़राब मामलों में भी। आरम्भ में स्त्रियों के संघ में शामिल होने की उन्होंने मनाही कर रखी थी। लेकिन अपनी मासी गौतमी और अंबपाली को वह ना नहीं कह सके। पुनर्विचार किया और अपने ही वचनों से पीछे हटे। इसके लिए इतिहास ने बुद्ध की प्रशंसा की। लेकिन अनाथपिंडक और बिम्बिसार के कहने से उन्होंने कर्जखोरों और सैनिकों के संघ में शामिल होने की भी मनाही की। इन सब के लिए आज बुद्ध की आलोचना होती है और होनी चाहिए। हालांकि आलोचना का निंदा रूप उनकी जिंदगी में ही शुरू हो गया था। निरंतर और ‘व्यवस्थित’ निंदा-आलोचना उनकी जिंदगी में ही उनके रिश्ते के एक भाई देवदत्त ने जारी रखी थी। अजातशत्रु से मिल कर उसने समान्तर भिक्षु संघ बना रखा था और जैसा कि गोडसे का जोर था कि वह गाँधी से अधिक सही रास्ते पर है, देवदत्त की भी मान्यता थी की उसका भिक्षु संघ अधिक सही रास्ते पर है। उसने अधिक संयम, अधिक अहिंसा और अधिक अपरिग्रह की वकालत की थी। उसका कहना था इस गौतम के कारण समाज को नुकसान हो रहा है। बुद्ध की जान लेने की भी उसने कई दफा कोशिश की। ईर्ष्या-डाह में डूबे इस देवदत्त की अनेक कहानियां पालि-साहित्य में हैं। बुद्ध की परंपरा है तो देवदत्त की भी परंपरा है। देवदत्त की संततियां आज भी सक्रिय दिखती हैं। इनलोगों ने रात-दिन बुद्ध की बेसिर-पैर की आलोचना को ही अपना व्यसन बना लिया है।

जब बुद्ध अस्सी साल के हुए, उन्होंने स्वयं को समेटना आरम्भ कर दिया। ऐसा लगता है वह एक बार फिर कपिलवस्तु को लक्ष्य कर उस की ओर बढ़ रहे थे। पालि साहित्य के ब्योरे के अनुसार गिरिव्रज से चल कर वह वैशाली आये। वैशाली से अनेक छोटी-बड़ी बस्तियों में कुछ-कुछ समय के लिए डेरा डालते हुए वह पावा ग्राम आये,जहाँ चुन्द कारीगर के यहां भोजन किया। इसमें अन्य खाद्य सामग्रियों के साथ ‘सूकरमद्दव’ नामक एक पकवान भी था, जिसमें कुछ खराबी थी। इस पकवान की कई लोगों ने अलग-अलग व्याख्या की है। कुछ लोग इसे सामिष भोजन भी मानते हैं। बौद्धों का एक तबका स्वतः मर गए जानवर के मांस खाने से परहेज नहीं करता। पालि साहित्य में बुद्ध के शूकर मांस खाने का जिक्र पहले भी मिलता है। मांस-भक्षण से उनका सामान्य तौर पर परहेज नहीं था। लेकिन बुद्ध जैसा व्यक्ति जो जीवक जैसे वैद्य के संपर्क में रहा और जिसे स्वयं महाभैषज्य कहा जाता है, अस्सी साल की उम्र में मांस भक्षण करेंगे अथवा इसकी अनुमति देंगे, इस पर कम ही विश्वास होता है। कुछ लोगों के अनुसार यह सूकरमद्दव कुकुरमुत्ते (मशरूम ) की कोई प्रजाति थी या फिर किसी प्रकार का जमीकंद। अब जो हो। विवरण यही है कि इसे खा कर बुद्ध बुरी तरह अस्वस्थ हुए। यह उनका आखिरी भोजन था। इसके बाद मल्लों के नगर कुशीनारा में उन्होंने पड़ाव डाला और पास में अवस्थित कुत्थक नदी का जल पीकर वहीं आखिरी सांसें ली। यही उनकी देहमुक्ति थी। बौद्धों की भाषा में यह उनके शास्ता का निर्वाण या महापरिनिर्वाण था।

(कॉपी संपादन : नवल)


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