मगध में विचारों का मेला

लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि मगध में पूरण कस्सप, अजित केशकम्बलि, पकुध कच्चायन, संजय वेलट्ठिपुत्त, मक्खलि गोसाल और निगंठ नाथपुत्त जैसे विचारकों का जमावड़ा था। निगंठ नाथपुत जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर थे। इन सभी की ख्याति ने ही बुद्ध को राजगीर आने के लिए आकर्षित किया था

जन-विकल्प

हम ने जिस मगध जनपद की चर्चा की है, उसकी राजतंत्रीय व्यवस्था अन्य जनपदों से कुछ पुरानी जान पड़ती है ( बद्ध जब पहली दफा यहां आये, तब यहां का राजा बिम्बिसार था, जो हर्यक राजवंश से संबंध रखता था। लेकिन हर्यक वंश कोई पहला राजवंश नहीं था। उसके पूर्व यहां वृहद्रथ-वंश का शासन था। यह वह वृहद्रथ नहीं है, जो मौर्य वंश का आखिरी राजा था, और जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी थी। वृहद्रथ के बारे में बहुत जानकारी नहीं मिलती, सिवा इसके कि वह वसु का पुत्र था। वृहद्रथ ने कोई छोटा-मोटा पराक्रम किया होगा और स्वयं को राजा घोषित कर दिया होगा, जो शायद बहुत लोगों की समझ में भी नहीं आया होगा कि यह क्या बला है। जो हो, वह राजा बन गया और उसने गिरिव्रज, जो आज राजगीर है, में अपनी राजधानी बनाई। इस रूप में वह ऐतिहासिक व्यक्ति था, जिसने मगध में पहली दफा राजतंत्रीय व्यवस्था कायम की ,एक राजसत्ता स्थापित की। मैंने पहले ही बतलाया है कि राजतंत्रीय व्यवस्था कायम होने के पूर्व जनपदों-महाजनपदों में जनसत्तात्मक व्यवस्थाएं थीं। ये एक-एक कर किन स्थितियों में ख़त्म हुईं और राजतन्त्र किन सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग थी, यह एक जटिल प्रश्न है, जिसे लेकर इतिहास के यक्ष-प्रश्न का संतोषजनक जवाब आज तक नहीं ढूंढा जा सका है। इस मामले पर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं हुई है।

बिहार के गया जिले के निकट बराबर पहाड़ी गुफाओं में आजीवकों की प्रतिमाएं

वृहद्रथ का पुत्र जरासंध बताया जाता है और जरासंध का पुत्र था रिपुंजय। इस रिपुंजय की इसी के मंत्री, जिसका नाम पुलक बतलाया गया है, ने हत्या कर दी और इसके बाद इस राजवंश का अंत हो गया। इस राजवंश का जरासंध ही महाभारत में वर्णित जरासंध है, या कोई अन्य, इस के बारे में निश्चित तौर पर नहीं बतलाया जा सकता। लेकिन महाभारत या किसी भी महाकाव्य की रचना में कुछ सत्य कथाएं और स्थान-पात्र होते हैं। लेकिन यदि यह नहीं भी हो, तो क्या फर्क पड़ता है।

वृहद्रथ के राजवंश के अंत के बाद हर्यक-वंश राजसत्ता में आया। बिम्बिसार इस राजवंश का संस्थापक था, और माना जाता है, 544 ईसापूर्व से लेकर 412 ईसापूर्व तक यह राजवंश सत्ता में रहा। 492 ईसापूर्व में अपने पिता बिम्बिसार को बंदी बना कर अजातशत्रु मगध का राजा बन बैठा। अजातशत्रु ने अपने पिता के समय से ही वज्जि देश के विरुद्ध चल रही कार्रवाइयों को अंजाम दिया और उसे आक्रमण कर अपने राज्य में मिला लिया। अंग महाजनपद को पहले ही मगध में शामिल कर लिया गया था। बिम्बिसार और अजातशत्रु दोनों में राज्य-विस्तार की बेलगाम लालसा थी। बिम्बिसार ने क़ुछ वैवाहिक संबंधों और राजनैतिक जोड़-तोड़ से अपने दब-दबे का विस्तार किया था। कोसल के राजा प्रसेनजित के यहाँ विवाह कर उस ने काशी का राज हासिल कर लिया था, तो अपने राजवैद्य जीवक को अवन्ति के बीमार राजा चंडप्रद्योत के यहाँ भेज कर उस ने अवन्ति पर भी एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव बना लिया था। अंगदेश का मगध में शामिल होना, बिम्बिसार के शासन-काल में ही हुआ था। इस तरह मगध का राज-विस्तार अंग, काशी, वज्जि में तो हो ही गया था; कोसल और अवन्ति भी मित्र राज्य बने हुए थे। इस तरह आज का लगभग पूरा बिहार और उत्तरप्रदेश का पूर्वी इलाका तब मगध का हिस्सा बन चुका था। 

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बुद्ध के आने के पूर्व मगध की राजधानी गिरिव्रज में विचारकों का अच्छा-खासा जमावड़ा था। कुल तिरसठ विभिन्न मतावलम्बी जमातों के विचारक यहां जमे हुए थे। इन में छह क़ुछ अधिक प्रसिद्ध थे। जैन और बौद्ध ग्रंथों में इन की चर्चा मिलती है। इनके नाम हैं – पूरण कस्सप, अजित केशकम्बलि, पकुध कच्चायन, संजय वेलट्ठिपुत्त, मक्खलि गोसाल और निगंठ नाथपुत्त। इन की ख्याति ऐसी थी कि सिद्धार्थ गौतम इन से मिलने या विचार-विनिमय के आकर्षण में गिरिव्रज आये। बौद्ध-ग्रंथ ‘ललित-विस्तर’ के अनुसार सिद्धार्थ पहले वैशाली गए, जहां उन्होंने आलार कालाम के साथ क़ुछ समय बिताया। कालाम के दो शिष्यों उद्द्क रामपुत्त और भरंडु से वह पहले मिल चुके थे और उन के गुरू से मिलने की उनकी लालसा थी। लेकिन कालाम के पास वह बहुत समय तक रूके नहीं। उनका अगला पड़ाव गिरिव्रज था, जहां विभिन्न मतों के परिव्राजकों का मेला था। स्वाभाविक है, उनकी यह ख्याति सिद्धार्थ को यहां खीँच लायी। लेकिन परिव्राजकों से संवाद के ब्योरे बौद्ध ग्रंथों में अप्राप्य हैं। 

गिरिव्रज के जिन छह दार्शनिकों की चर्चा मैंने ऊपर में की है, उनके वर्णन पालि ग्रन्थ ‘मज्झिम-निकाय’ और जैन ग्रन्थ ‘भगवती सूत्र’ में हैं। उपरोक्त छह में निगंठ नाथपुत्त दरअसल जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर हैं, जिनका साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, और जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। लेकिन पूरण कस्सप, अजित केसकम्बलि, पकुध कच्चायन, संजय वेलट्ठिपुत्त और मक्खलि गोसाल के बारे में बहुत साहित्य उपलब्ध नहीं है। इन पांचों को आजीवक मतावलम्बी कहा जाता है। यह आजीवक क्या है? सचमुच एक पेचीदा मामला है। बी .एम. बरुआ की किताब ‘आजीवक : अ शार्ट हिस्ट्री ऑफ़ देयर रिलिजन एंड फिलोसॉफी’ और भारत-विशेषज्ञ ब्रिटिश इतिहासकार ए. एल. बाशम की किताब ‘हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रिन ऑफ़ आजीवका ‘ज़ ‘ (1951)’ इस विषय को गंभीरता से उठाती है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की किताब ‘लोकायत’ ने भी आजीवकों, विशेष कर मक्खलि गोसाल पर गंभीरता पूर्वक विमर्श किया है। इधर हाल के वर्षों में क़ुछ विद्वानों का ध्यान आजीवकों की दार्शनिकता पर इसलिए गया कि इस से बुद्ध और महावीर के विचारों की पृष्ठभूमि का ज्ञान होता है। 

मक्खलि गोसाल का चित्र, (चित्रकार : डॉ. लाल रत्नाकर, फारवर्ड प्रेस के बहुजन साहित्य वार्षिकी मई, 2016 से

हमें एक नजर इस विषय पर देना चाहिए कि ये आजीवक किस सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर खड़े थे। मगध का इलाका सांस्कृतिक रूप से कीकट या किरात क्षेत्र है। इसी नाम से वैदिक-साहित्य में इसकी चर्चा है। ब्राह्मण और वैदिक परंपरा के ग्रंथों में कीकट-मगध को ब्रात्य देश माना गया है। ब्रात्य, अर्थात जो वैदिक परंपरा में नहीं आते। ऋग्वेद में तो नहीं, लेकिन अथर्व वेद में ऋषि ज्वर (बुखार) से यह निवेदन करते हैं कि कीकट देश चले जाओ, जहां हमारे विरोधी रहते हैं। इससे प्रतीत होता है कि बहुत पुराने ज़माने से यह क्षेत्र वैदिक-संस्कृति से दूर, अथवा वैदिक मान्यताओं के विरुद्ध था। यह सच्चाई है कि तथाकथित आर्य-संस्कृति का विस्तार किन्ही कारणों से कीकट-मगध में नहीं हुआ था। किसी भी काल में वेद-उपनिषदों का कोई भी ऋषि-महर्षि अथवा व्याख्याकार इस क्षेत्र से नहीं हुआ। हालांकि इसी के बगल के मिथिला में वेदान्तिक संस्कृत विद्वानों का मध्यकाल में जमावड़ा था। उपनिषद-काल में भी मिथिला क्षेत्र की विशिष्ट भूमिका रही थी। मगध का यह चरित्र उसकी वैचारिक विशिष्टता को रेखांकित करता है। यही विशिष्टता बुद्ध के ज़माने में भी थी और यही उनको यहां खीँच लायी थी। 

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यह विशिष्टता केवल वैचारिक क्षेत्र में ही नहीं थी। मगध के राजाओं और दार्शनिकों की पृष्ठभूमि भी ब्रात्य-जनों की ही थी। पुष्यमित्र शुंग के पूर्व यहां का कोई राजा विशिष्ट कुल का नहीं हुआ। वृहद्रथ, हर्यक, नन्द और मौर्य सब के सब तथाकथित अकुलीन थे। इन्हें कायदे से शूद्र भी नहीं कहा जा सकता। इसलिए कि वे ब्राह्मण वर्चस्व वाली वर्ण-व्यवस्था या परंपरा को स्वीकारते ही नहीं थे। 

मगध में विचर रहे, उपरोक्त ये दार्शनिक भी ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं थे। ये सब के सब श्रमण परंपरा में विश्वास करते थे। उनकी चेतना के मूल में ब्रह्म अथवा तेज नहीं, श्रम था। ऐसा लगता है वे पूरी तरह परिव्राजक अथवा भिक्षु भी नहीं होते थे, जैसा कि मक्खलि गोसाल के जीवन-चरित पर ध्यान देने से पता चलता है। इन दार्शनिकों ने कभी न वेद-उपनिषदों की चर्चा की है, न ही संस्कृत-भाषा से दूर या निकट का इनका कोई ज्ञान है। दुनिया का कोई नियंता है, या होना चाहिए, इस बिंदु पर इन लोगों ने बार-बार ध्यान अवश्य दिया है, लेकिन नियंता से अधिक नियति पर विश्वास किया है। जो होना होगा, वह तो होगा, इसे कोई रोक नहीं सकेगा। यदि ऐसा है, तो कर्म की क्या जरूरत है। ईश्वर अथवा नियंता की भक्ति या पूजा-वंदना भी मनुष्य का कोई भला नहीं कर सकता, क्योंकि प्रकृति के नियम अटल हैं। कमोबेश ऐसा ही इन सब का विश्वास था। 

अजीत केसकम्बलि का चित्र, (चित्रकार : डॉ. लाल रत्नाकर, फारवर्ड प्रेस के बहुजन साहित्य वार्षिकी मई, 2016 से)

पूरण कस्सप, जिसका संस्कृतिकरण पूर्ण कश्यप के रूप में किया जा सकता है, अकर्मण्यता की शिक्षा देते थे। क़ुछ मत करो। कर्म का कोई फल नहीं, इसीलिए कर्म करने से क्या लाभ हो सकता है, यही उनकी शिक्षा थी। मगध का राजा अजातशत्रु एक बार चांदनी भरे रात में तथागत से मिलने जाता है और उनके एक प्रश्न के जवाब में उपरोक्त छहों दार्शनिकों के विचारों की क्रमवार व्याख्या करता है। दीघनिकाय के ‘सामञ्जफल सुत्त’ में यह पूरा विवरण दर्ज है। इसके अनुसार अजित केसकम्बलि कहता है – ‘भिक्षा या बलि भेट देने जैसी कोई वस्तु नहीं है। अच्छे और बुरे कर्मों का कोई परिणाम और फल नहीं है। इहलोक-परलोक जैसा भी क़ुछ नहीं है। मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद सभी तत्व जहां से आये थे, वहां जा मिलेंगे। मूर्ख और ज्ञानी दोनों मृत्यु के बाद समाप्त हो जायेंगे। मृत्यु के बाद क़ुछ भी नहीं बचता।’

पकुध कच्चायन जिसे एक विद्वान ‘प्रश्न-उपनिषद’ का काकुध कात्यायन बतलाते हुए उसे उपनिषद-काल में खींच ले जाना चाहते हैं, कहते हैं, सात ऐसी वस्तुएं हैं, जिनका न सृजन होता है, न कराया जा सकता है। ये शाश्वत हैं। ये क्या हैं? इनमें से चार तो पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु हैं; शेष तीन सुख, दुःख और जीव हैं। इसलिए न कोई मृत होता है ,न कोई हन्ता होता है। पकुध निश्चय ही उपनिषद -युग के ऋषियों की तरह तर्क देते हैं। उनके अनुसार कोई व्यक्ति जब तेज धार वाली किसी तलवार से किसी के सिर के दो भाग करता है, तो उससे कोई मर नहीं जाता। बल्कि वह तलवार मूल तत्वों और उस व्यक्ति के अंतर के बीच प्रविष्ट कर जाती है। 

संजय वेठलिपुत्त क़ुछ काव्यात्मक डींग मारता है, जिसकी जलेबीनुमा व्याख्या किसी को भी क़ुछ समय के लिए चक्कर में डाल देगी। संजय, जर्मन परंपरा के किसी दार्शनिक की तरह एक अबूझ-जटिल शैली में अपनी बात कहता है। एक उदहारण देखिये – ‘यदि आप मुझ से पूछें कि क्या कोई दूसरा लोक है या नहीं, तो मेरे विचार में दूसरा लोक है, मैं ऐसा नहीं कहता। किन्तु मैं ऐसा नहीं कह रहा। और मैं यह भी नहीं समझता कि यह ऐसा है या वैसा है। और मैं नहीं समझता कि यह किसी अन्य प्रकार से ही है। और मैं इसका खंडन भी नहीं करता। और मैं यह भी नहीं कहता कि यह है; और न ही यह कहता हूं कि यह नहीं है। और यदि आप संयोग से उत्पन्न होने वाले प्राणियों के बारे में पूछते हैं; या कोई अच्छे या बुरे कर्मों का कोई परिणाम कोई फल है या नहीं है; या कोई व्यक्ति जिसने सत्य को पा लिया है, वह मृत्यु के पश्चात अस्तित्व में रहता है या नहीं, तो इन सभी प्रश्नों का उत्तर वही है, जो मैं दे चुका हूँ।’ (‘सामञ्जफल सुत्त’ से वाया लोकायत : देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, पृष्ठ 455) 

लेकिन उपरोक्त चारों अर्थात पूरण कस्सप, अजित केसकम्बलि, पकुध कच्चायन और संजय वेलट्ठिपुत्त से मक्खलि गोसाल की कहानी अधिक जटिल और कारुणिक है। मक्खलि इस आजीवक परंपरा के नेता-प्रणेता थे। मक्खलि का आत्मसंघर्ष आज भी हमारे मन में कई प्रश्न उठाते हैं और उनके जवाब तय करना किसी के लिए भी आसान नहीं हैं। अगली कड़ी में हम स्वतंत्र रूप से उन पर बात करेंगे। लेकिन मगध के इन आजीवक परिव्राजकों की बातें आज भी हमें कुछ सोचने के लिए बाध्य करती हैं। वैदिक परंपरा से अलग, उपनिषदों की पृष्भूमि से परे, इन परिव्राजकों की जीवन शैली और बीज वक्तव्य ही जैन और बौद्ध धर्म के मूलाधार रहे। बुद्ध ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा मगध में बिताया। गिरिव्रज तो मानो उनके लिए ईसाइयत के येरुशलम जैसा था। यह क्यों हुआ कि इन मूक दार्शनिकों की वैचारिकता और उनके सांस्कृतिक दाय को हम भूल बैठे। इस पर हमें विचार करना चाहिए।

(कॉपी संपादन : नवल)


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