शिमला में नानक और पटेल, दिल्ली में फिल्मकार, इलाहाबाद के छात्र, मुबंई में रामजी और हमारी यादों के बा-बापू

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला गुरू नानक की 550वीं जयंती पर बहुत ताकत के साथ नया विमर्श सामने रखकर अकादमिक समाज से रूबरू हो रहा है तो इसी संस्थान ने सरदार पटेल की प्रशासनिक ढांचा बनाने में भूमिका पर व्याख्यान रखकर सरकार के नगाड़े को बजाया है। इस हफ्तावार कॉलम में देखें आगामी आयोजनों का पूरा कलेंडर

अकादमिक दुनिया में समाज व इतिहास

गुरुनानक की वाणी पर विस्तृत विमर्श

“गुरु नानक देव, वाणी और दृष्टि का पुनरावलोकन” विषय को लेकर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला ने 25-26 नवंबर 2019 को दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की है। 

कार्यक्रम की रूपरेखा में कहा गया है कि “गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक हैं, जो भारतीय उप-महाद्वीप की इंडिक सभ्यता (अर्थात् सनातन धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म) की चार प्रमुख धर्म परंपराओं में से एक के रूप में विकसित हुआ है। इस सभ्यता की सबसे खास बात यह है कि यह धर्म-केंद्रित और ज्ञान-प्रधान है। यह दुनिया की सबसे प्राचीन और जीवित सभ्यताओं में से एक भी है। भारतीय परंपरा में धर्म शब्द कई अर्थों के साथ एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका वैचारिक अर्थ धर्म से काफी अलग है। मुख्य रूप से, यह ब्रह्मांड में संचालित ब्रह्मांडीय नैतिक आदेश और जीवन जीने का एक सही तरीका संदर्भित करता है। उपरोक्त सभी चार धर्म परंपराएँ ‘विविधता में एकता’ के एक उत्कृष्ट मॉडल की मिसाल पेश करती हैं। वे वास्तविकता, ब्रह्मांड और मानव अस्तित्व की समग्र एकीकृत दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। वे विश्व दृष्टिकोण, जीवन के तरीके और इंडिक सभ्यता की मूल ज्ञान चिंताओं का भी निर्माण करते हैं। अपने समय के एक प्रतिष्ठित धर्म प्रचारक के रूप में, गुरु नानक इंडिक सभ्यता और इसकी धर्म परंपराओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।”

आयोजन की रूपरेखा के मुताबिक, “एक नए विश्वास के संस्थापक होने के अलावा, गुरु नानक भी एक प्रसिद्ध संत कवि थे, जिन्होंने मध्य युग के दौरान पैन भारतीय भक्ति आंदोलन द्वारा पुनर्जागरण की भावना को आत्मसात किया। भारतीय इतिहास का यह घटनापूर्ण युग विदेशी आक्रांताओं के हाथों सदियों से चली आ रही पराधीनता और दमन के बाद भारतीय मन के सांस्कृतिक जागरण और आत्म-गौरव के एक शक्तिशाली क्षण का द्योतक है। गुरु नानक ने खुद को सैदपुर (वर्तमान एमानाबाद) में बाबर के आक्रमण की भयावह घटना का गवाह बनाया।) वह अपने वाणी में इस तरह कहते हैं- खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ॥ दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ॥ मार पई करलाणे तैं की दरदु न आइआ ॥1॥”

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की भव्य इमारत। इस भव्य इमारत का निर्माण 1884-1888 के बीच हुआ। 1964 तक यह सर्दियों में राष्ट्रपति का निवास हुआ करता था। आज भी इसे राष्ट्रपति निवास ही कहा जाता है

संस्थान ने उम्मीद जाहिर की है कि गुरु की वाणी और दृष्टि काफी अकादमिक रुचि पैदा करने वाली होनी चाहिए। यह हमें गुरु के जीवन और उनकी दार्शनिक दृष्टि और मानवता के प्रति उनके संदेश को समझने में मदद मिलेगी।

सम्मेलन के अभिप्राय और उद्देश्य- आज के दौर में गुरु नानक देव के दर्शन और विचारधारा को समझने और पुन: व्यवस्थित करना, गुरु नानक वाणी के सामाजिक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतिमानों को समझना, गुरु नानक देव की लोक परंपराओं और भौगोलिक वृत्तांतों को समझना ताकि गुरु नानक देव के जीवन और शिक्षाओं के बारे में एक नया पाठ बन सके। 

संस्थान द्वारा सुझाए गए कुछ उपविषय हैं- गुरु नानक : सामाजिक-धार्मिक जीवनी, गुरु नानक : एक आध्यात्मिक तमाशा, गुरु नानक : पैन इंडियन और पैन-एशियन आध्यात्मिक प्रवचन, गुरु नानक वाणी की कविताएँ, गुरु नानक वाणी की राग प्रणाली, गुरु नानक वाणी का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व, गुरु नानक वाणी का नैतिक पहलू, गुरु नानक : सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन के संस्थापक, गुरु नानक देव की मानवीय विचारधारा, गुरु नानक वाणी में वैचारिक संरचनाओं का शब्दार्थ।


सेमिनार के लिए सीमित संख्या में प्रतिभागियों को आमंत्रित किया जाएगा। इच्छुक लोगों को अपने शोध या आलेख का सार (200 शब्दों में) नियमानुसार भेजना चाहिए। इस बारे में प्रोफेसर जगबीर सिंह जो कि पूर्व प्रोफेसर और दिल्ली विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग से संबद्ध रहे हैं, को 9871598125 नंबर पर संपर्क किया जा सकता है। उनका ई मेल एड्रेस है jagbir707@gmail.com। साथ ही प्रोफेसर परमजीत सिंह सिद्धू,  पूर्व प्रोफेसर और अध्यक्ष, पंजाबी अध्ययन स्कूल, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, फोन 98550 57639, ई मेल dr.pssidhu@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है। अपने सार की एक प्रति  शैक्षणिक संसाधन अधिकारी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में रितिका शर्मा को भेजें। यहां का फोन नंबर है 0177-2831385,  ईमेल एड्रेस: aro@iias.ac.in है। सार जमा करने की अंतिम तिथि 29 सितंबर 2019 है। संस्थान 14 अक्टूबर, 2019 तक चयनित प्रतिभागियों को निमंत्रण पत्र भेजेगा।

जनजातियों की चिंता में सेमिनार

प्रयागराज में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र ही नहीं, हर कॉलेज में इस सवाल को लेकर मामला गरमाया हुआ है कि कैसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अनुसूचित जाति एव जनजाति के छात्रों की निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों में निःशुल्क प्रवेश की सुविधा को समाप्त कर दिया। भाजपा सरकार के आदेश की छात्र और शिक्षक वर्ग ने कड़ी आलोचना की है। बता दें कि हाल में यूपी के समाज कल्याण निदेशक ने जिलाधिकारियों को राजकीय एवं अनुदानित शिक्षण संस्थाओं में निःशुल्क प्रवेश की व्यवस्था को बाध्यकारी नहीं बताने के साथ निजी शिक्षण संस्थानों में निःशुल्क प्रवेश सुविधा का अनुपालन न करने का आदेश जारी किया हैं। डर है कि स्नातक तथा परास्नातक और प्रोफेशनल कोर्सो में यह सुविधा बहाल नहीं हुई तो बड़ी संख्या में वंचित तबके के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा के रास्ते बंद हो जाएंगे। मांग की जा रही है कि इस वर्ग को उच्चशिक्षा से वंचित करने की जगह तत्काल पुरानी व्यवस्था लागू होनी चाहिए।


यह संयोग ही है कि इस बीच इलाहाबाद विश्वविद्यालय की राजीव गांधी पीठ ने प्रयागराज में “जनजाति, जाति और विकास: ग्रामीण स्तर का परिदृश्य” विषय को लेकर 29 सितंबर को सेमिनार आयोजित किया है। सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर प्रोफेसर एस.एन. चौधरी शिरकत कर रहे हैं जो समाजशास्त्र विभाग, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से ताल्लुक रखते हैं। जाहिर है शहर में छात्रों की चिंता पर भी प्रोफेसर चौधरी कुछ ना कुछ राय रखेंगे। 

अकादमिक क्षेत्र में और खासकर उच्च शिक्षा में शोध को लेकर प्रो. एन.एन. चौधरी काफी चिर-परिचित नाम है। उनका मानना रहा है कि उच्च शिक्षा में काम करने वालों को सामाजिक हितों का ध्यान रखना चाहिए। वे कहते हैं कि वर्तमान को संवारने में इतिहास की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

कार्यक्रम में हर विभाग के छात्र और शिक्षक, विषय पर सुनने के इच्छुक आम लोग भी सम्मिलित हो सकते हैं। कार्यक्रम सुबह 11 बजे से सेमिनार हॉल, राजनीति विज्ञान विभाग में है। इस पीठ के अध्यक्ष अरूप महारत्न हैं जिनका देश-विदेश में बहुत नाम है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में बा-बापू और 150 साल का लेखा-जोखा

दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में गांधी स्वाध्याय मंडल ने महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की 150वीं जयंती पर ‘बा-बापू 150’ नाम से तीन दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की है। इस कार्यक्रम में देश के कई गांधीवादी और अन्य नामी लोग विचार रखेंगे। गांधी और युवा विषय पर वरिष्ठ गांधीवादी राधा भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव, प्रोफेसर वी.के. कौल, आईपीएस इल्मा अफरोज और वैभव श्रीवास्तव वक्ता होंगे। गांधी और बेराजगारी विषय पर गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही, गांधी शांति प्रतिष्ठान के कुमार प्रशांत विचार रखेंगे। कार्यक्रम के तीसरे और अंतिम दिन 26 सितंबर को आईआईटी दिल्ली के विपिन त्रिपाठी, खुदाई खिदमतदार के संयोजक फैसल खान गांधी और सर्वधर्म पर विचार रखेंगे।

कार्यक्रम के दौरान आकाशवाणी के कलाकारों की संगीतमय प्रस्तुति और नाटक ‘दोस्त मोहनदास’ का मंचन होगा। गांधी के जीवन दर्शन और महात्मा गांधी और कला की दुनिया नाम से अंतर महाविद्यालयी प्रतियोगिताएं रखी गई हैं जिनमें अव्वल प्रदर्शन करने वालों को नगद पुरस्कार भी प्रदान किए जाएंगे।

कार्यक्रम के संयोजक डॉ. राजीव रंजन गिरि हैं। कार्यक्रम की अधिक जानकारी के लिए 9821217132, 9877807756, 9643463015, 9660927205 नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है।

सिविल सेवकों के सरदार पटेल

शिमला स्थित भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान के पूल थिएटर में 26 सितंबर को ‘सरदार पटेल एंड मेकिंग ऑफ आईएएस’ विषय पर विशेष व्याख्यान रखा गया है।

देश के गृहमंत्री के रूप में पटेल पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (आईसीएस) का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आईएएस) बनाया। अंग्रेजों की सेवा करने वालों अफसरों में विश्वास भरकर उन्हें राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ा। कहते हैं यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष जीवित रहते तो संभवत: नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता।

संस्थान ने कहा है कि हर देश में उसकी एक नौकरशाही होनी चाहिए- वो जो आकार लेती है, जैसी भी भूमिका निभाती है और राज&काज के भीतर जैसा ईको सिस्टम भरती है, यह उसके नजरिए और सामर्थ्य का खेल होता है। लेकिन बहुत कुछ उन पर भी निर्भर करता है] जिन्होंने इस सिस्टम और नौकरशाही की नींव रखी थी। यानी जिस नजरिए और विश्वास के साथ इनकी स्थापना के समय राह दिखाई गई थी, वह भी अहम होती है। 

जाहिर है इस व्याख्यान में में सरदार पटेल की भूमिका पर विशेष तौर पर प्रकाश डाला जाएगा। और ना केवल आईएएस बनाने में, बल्कि आईएएस के प्रति धारणा  और राजनीतिक नेतृत्व और स्थायी सिविल सेवा के बीच एक आदर्श संबंध की नींव रखने को लेकर रोशनी डाली जाएगी। दरअसल, यह भरोसा और आपसी विश्वास के एक दूसरे से गुंथे तत्व हैं जिनकी गारंटी संविधान से मिली है। जिसमें चयन के लिए एक बिल्कुल निष्पक्ष और पारदर्शी प्रणाली है और उसमें देशभक्ति और राष्ट्र निर्माण की भावना समाहित है। सृजित सिविल सेवा की भारत को एकजुट रखने की भूमिका केंद्र में रखकर, पटेल ने सिविल सर्वेंट को देश के विशाल कार्य के लिए जिम्मेदारी सौंपी, जिसे आज सभी स्वीकार करते हैं। लेकिन  आजादी का समय कई अनिश्चितताओं से भरा हुआ था। व्याख्यान में सार्वजनिक जीवन में पटेल के अनुभव को परखा जाएगा। वे अहमदाबाद कॉर्पोरेशन के मेयर थे, गुजरात कांग्रेस के खेवक थे और बाद में अंतरिम कैबिनेट में गृह मंत्री के रूप में जुड़े। जाहिर है इसके संभावित प्रभाव उनके विचारों पर पड़े थे, जब सिविल सेवाओं के लिए रूपरेखा तैयार की जा रही थी।

व्याख्यान के लिए जिस विषय को चुना गया है, वह अपने में नया नहीं है लेकिन शिमला का उच्च शिक्षा संस्थान आजकल सरकारी लाइन पर और उसी की वैचारिकी के ‘स्टैच्यू’ को स्थापित करने के काम में जमकर पसीना बहाता दिखाना चाहता है।

अतीत को लेकर फिक्रमंद कोलकाता 

‘वर्तमान में अतीत: विरासत का भविष्य’ विषय को लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के संग्रहालय विभाग ने दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। विश्वविद्यालय का कहना है कि वर्तमान समय में अतीत की निरंतरता के महत्व में एक भविष्यवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देना जरूरी हो जाता है। विशेष रूप से पोस्टमॉडर्न दौर में विरासत को डिजिटल युग ने शक्तिशाली तरीके से अपने में समेट लिया है। विशेषज्ञों के प्रबुद्ध विचारों का आह्वान करते हुए आयोजकों ने कहा है कि यह सही समय है जब हम अतीत को आगे ले जाने और उससे सीख लेने के स्तर पर अवधारणा में गहरी उपस्थिति दर्ज कर सकते हैं। नए समय में म्यूजियोलॉजी, विरासत से संबंधित मुद्दे के महत्व के प्रति चेतना, अध्ययन और डिजिटल मानविकी महत्वपूर्ण हो जाती है।

कार्यक्रम 28-29 नवंबर 2019 को संग्रहालय विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, अलीपुर परिसर कोलकाता के सभागार में होगा। संगोष्ठी के उप विषयवस्तु हैं- सामूहिक स्मृति और स्पेटिकल मेकिंग, वर्तमान में अतीत का दृश्य, विरासत पर मुद्दे और बहस, जीवित विरासत, डिजिटल विरासत, विरासत बचाने की प्रामाणिकता, सामुदायिक भागीदारी, संग्रहालय और विरासत।

विश्वविद्यालय का मानना है कि आधुनिक दौर में सामूहिक तौर पर स्मृतियों का बिखरना और टूटना नुकसानदायी घटना है। प्रासंगिक सवाल यह है कि अगर हम वर्तमान में रहते हैं, तो हमें अतीत के बारे में परवाह करनी चाहिए या नहीं? वर्तमान को समझने के लिए अतीत जरूरी है, क्योंकि अतीत वर्तमान में रहता है। आज के दौर में सक्रिय ताकतें वर्तमान में अतीत के निरंतर जीवन को छिपाती हैं। इस छिपाव का निर्माण म्यूजियोलॉजिकल तौर-तरीकों के जरिए किया जाता है।

विषय का सार अधिकतम 500 शब्दों में dmcmusl@caluniv.ac.in पर सबमिट किए जा सकता है। इसकी अंतिम तिथि 30.09.2019 है। सार स्वीकृति संबंधी सूचना 15.10.2019 तक दी जाएगी। चयनित पत्रों को जर्नल ऑफ़ डिपार्टमेंट ऑफ़ म्यूज़ियोलॉजी में प्रकाशित किया जा सकता है। ज्यादा जानकारी के लिए देखें- https://www.caluniv.ac.in/seminar/Seminar-Museology-18-9-19.pdf

अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन

मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की स्वर्ण जयंती के अवसर पर हिंदी विभाग और भागवत परिवार, मुंबई के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का आयोजन किया गया है। ये कार्यक्रम 28,29 और 30 नवंबर 2019 को मुंबई विश्वविद्यालय में किया जा रहा है। रामायण सम्मेलन का विषय  ‘वैश्विक परिदृश्य में रामकथा’ है।

विश्वविद्यालयों में धार्मिक आयोजनों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कहना ना होगा धर्मनिरपेक्ष भारत की यूनिवर्सिटियों को इस प्रकार के धर्म प्रचार का माध्यम बनना गलत है। चाहे वह हिंदू, इस्लाम या ईसाई धर्म हो। रामायण, गीता, पुराणों में जाति व्यवस्था के महिमामंडन के कारण, इस ग्रंथों के सार्वजनिक रूप से प्रचार-प्रसार से हिंदुओं के बहुसंख्यक तबके (दलित, आदिवासी, ओबीसी) की भावनाएं आहत होती हैं। इस प्रकार के आयोजन किसी को करनी ही हों तो उसे मंदिरों में, वह भी इन ग्रंथों से लाभान्वित तबके के बीच करने चाहिए।

लेकिन शायद आयोजक जानते हैं कि इन ग्रंथों में ऐसे ज्ञान नगण्य हैं, जो उनकी अगली पीढ़ी को आज की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे। दरअसल, यही कारण है कि वे अपने बच्चों को ज्ञान-विज्ञान की तलाश में यूनिवर्सिटियों में भेजते हैं और बहुजन तबकों को इन ग्रंथों की ओर धकेल कर अपनी बौद्धिक-सांस्कृतिक गुलामी के लिए प्रेरित करना चाहते हैं।

बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में शोध आलेख प्रस्तुत करने के लिए/भाग लेने के लिए/सम्मिलित होने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य है। प्रतिभागी मुंबई विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mu.ac.in पर जाकर सेमिनार लिंक में पंजीकरण कर सकते हैं। साथ ही निम्नलिखित लिंक से भी ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते हैं। पंजीकरण के लिए लिंक है- https://forms.gle/Ktmf1mtFCtvRRP5DA

ज्यादा जानकारी के लिए डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष से हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय मुंबई-400098 के पते पर पत्र भेजकर संपर्क किया जा सकता है। इनके मोबाइल नंबर हैं – 9167921043, 9869511876। ईमेल एड्रेस dr.krupadhyay@gmail.com है। साथ ही डॉ. सचिन गपाट सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग को मोबाइल नंबर 9423641663 और ईमेल एड्रेस dr.sachingapat@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

साहित्य क्षेत्रे

साहित्यिक कृतियों पर फिल्में  

‘हिंदी साहित्य औऱ उसका सिनेमाई रूपांतरण’ विषय को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ मिलकर 22-23 अक्टूबर को दो दिन की राष्ट्रीय सगोष्ठी आयोजित की है। इस संगोष्ठी के लिए शिक्षकों और शोधार्थियों से 15 अक्टूबर तक अपने शोधपत्र और आलेख का सार भेजने को कहा गया है।

आयोजकों ने बताया कि संगोष्ठी के कुछ उप विषय इस तरह हैं- साहित्य और सिनेमा का पारस्परिकता, हिंदी सिनेमा के बढ़ते आयाम और उसका भविष्य, नव सिनेमा आंदोलन और हिंदी साहित्य, साहित्य के सिनेमाई रूपांतरण की समस्याएं, सिनेमाई रूपांतरण औऱ कृति की आत्मा का प्रश्न, साहित्य का सिनेमाई रूपांतरण और पटकथा लेखन की समस्याएं, साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों की समीक्षा।

अपने शोध और आलेखों के लिए सूत्र पाने के लिए शोधार्थी और छात्र कुछ अहम उदाहरण चुन सकते हैं। मसलन फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ नाम से फिल्म बनी थी जबकि धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ पर इसी नाम से फिल्म बनी। इसके अलावा उनकी कृति ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ पर फिल्म बनी। सन 1963 में प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’, सन 1964 में ‘गबन’ उपन्यास पर जबकि ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर भी शानदार फिल्म बनी थी। भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’, कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ पर ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ नाम से फिल्म बनी थी। यशपाल के उपन्यास ‘झूठा सच’ पर ‘खामोश पानी’ फिल्म बनी थी जबकि अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर पर इसी नाम से फिल्म बनी। इसी प्रकार मोहन राकेश की कहानी ‘मलबे का मालिक’ पर ‘हिना’ फिल्म बनी। कृष्ण चंदर की कहानी ‘पेशावर एक्सप्रेस’ पर ‘वीर-जारा’ फिल्म बन चुकी है। इनके अलावा कई और साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों को संदर्भ की तरह लिया जा सकता है। 

शोधपत्र और आलेख का सार vijayvijaymishra@gmail.com पर भेजा जा सकता है। संगोष्ठी की संयोजक प्रोफेसर रमा हैं जबकि समन्वयक हैं डॉक्टर विजय कुमार मिश्रा। कार्यक्रम संबंधी ज्यादा जानकारी के लिए 8920116822, 9871907081, 9013002325, 9968993201 मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है।

नोएडा में इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल

नोएडा के सेक्टर 18 स्थित रेडिसन होटल में 16 और 17 नवंबर 2019 को इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल हो रहा है। इस फेस्टिवल में साहित्य, कला, संगीत, काव्य और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर विभिन्न तरह के कार्यक्रम होंगे।

आयोजकों के मुताबिक कार्यक्रम में दो दिन तक कुल 24 इवेंट्स आयोजित किए जाएंगे। इस दौरान कार्यशाला, पुस्तक वाचन, विमर्श, पैनल डिस्कसन, डिबेट, पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम हैं।

फेस्ट में देश और विदेश के ख्याति प्राप्त कई लेखकों के शामिल होने का दावा किया गया है। फेस्ट में 80 लेखक, कलाकार, अकादमिक जगत की हस्तियां, स्कॉलर्स और प्रकाशक शिरकत करेंगे। हिंदी, अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं के साहित्यकार एक मंच पर दिखेंगे। प्रकाशन उद्योग पर फेस्ट में खासा जोर होगा। लेखक और पाठक आपस में संवाद बनाएंगे। कार्यक्रम में मानववादी कार्यकर्ताओं और खेल की हस्तियों को भी देखा जा सकता है। इस साल का थीम- द वर्ल्ड ऑफ ड्रीम एंड इमेजिनेशन रखा गया है। पिछले वर्षों के आयोजन में देखा गया है कि इस कार्यक्रम में लोगों की खासी भीड़ उमड़ती है।

आईआईटी में कवि गोष्ठी

आईआईटी दिल्ली की हिंदी समिति ने नोजोटो के साथ मिलकर 4 अक्टूबर को एक कवि संगोष्ठी का आयोजन किया है। इसमें अच्छे कवियों और कहानीकारों को मौजूद श्रोताओं के बीच अपना हुनर दिखाने का बड़ा मौका मिल सकता है। आरडीवी इस कार्यक्रम का सह-संयोजक है।

कार्यक्रम आईआईटी दिल्ली के सभागार में दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक चलेगा। इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए 9643471938 पर संपर्क किया जा सकता है।

अग्नि और बरखा का मंचन

गिरीश कर्नाड (19 मई 1938-10 जून 2019) भारतीय रंगमंच के शीर्ष पुरोधा रहे। शुक्रवार शाम 27 सितंबर को दिल्ली के श्रीराम सेंटर में उनके नाटक ‘अग्नि और बरखा’ का मंचन होने जा रहा है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है। वैसे भी इतिहास, पुराण, जातक और लोककथाएँ गिरीश कर्नाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते थे।

कर्नाड की महत्त्वपूर्ण विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते थे। अग्नि और बरखा के लिए कर्नाड पुनः अतीत की ओर लौटे, इसके केन्द्र में है- महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कर्नाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के देश भर में कई दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।

गिरीश कर्नाड का जन्म महाराष्ट्र के माथेरान नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता पेशे से एक डाक्टर होते हुए भी नाटक देखने में रुचि लेने वाले थे। कर्नाड की मातृभाषा कोंकणी है किन्तु मराठी भाषा में निपुणता के कारण इनके जीवन पर मराठी साहित्य का गहरा प्रभाव पड़ा। अग्नि और बरखा’ कर्नाड द्वारा (1995) में कन्नड भाषा में ‘अग्नि मतु मले’ नामकर शीर्षक से लिखा गया था। नाटककार ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया और फिर अंग्रेजी से हिन्दी में रामगोपाल बजाज ने अनुवाद किया था।

नाट्य मंचन शाम 7 बजे शुरू होगा। टिकट और अन्य जानकारी के लिए 9599947637 पर संपर्क करना चाहिए। इस प्रस्तुति की परिकल्पना और निर्देशन मशहूर नाट्यकर्मी के.एस. राजेंद्रन ने किया है। श्रीराम सेंटर दिल्ली के मंडी हाउस में है।

भगत सिंह की शहादत

दिल्ली में 28 सितंबर को शहीद भगत सिंह (28 सितंबर 1907-23 मार्च 1931) जयंती समारोह में ‘उसने कहा था’  नाटक का मंचन हो रहा है। यह नाटक संगवारी समूह का नाटक है। इस प्रस्तुति को आगाज सांस्कृतिक केंद्र ने तैयार किया है। जयंती समारोह से जाने माने लेखक और चिंतक प्रो. आदित्य मुखर्जी और प्रो. लाल बहादुर वर्मा जुड़े हुए हैं।

नाट्य मंचन शाम 5 बजे से हिंदी भवन, विष्णु दिगंबर मार्ग नई दिल्ली में होगा।

अमृता प्रीतम की याद में

अमृता प्रीतम की जन्मशती के अवसर पर कार्यक्रमों का सिलसिला लगातार चल रहा है। इस कड़ी में परवाज़ संस्था ने 2 अक्टूबर को दिल्ली में ‘चानण दी फुलकारी’ नाम से एक महत्वपूर्ण आयोजन किया है। अमृता प्रीतम ने अपने जीवन काल में कविता, कहानी, निबंध और लोक साहित्य को लेकर 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं थीं। उनको साहित्य अकादमी से लेकर भारतीय ज्ञानपीठ सहित कई पद्म पुरस्कार मिले थे। प्रीतम की रचनाओं का तमाम देसी और विदेशी भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है।

कार्यक्रम जोबरा एंड बुद्धा, 7 ट्रौपिकल ड्राइव, घिटोरनी नई दिल्ली में होगी। घिटोरनी दिल्ली के साउथ वेस्ट में स्थित है। अमृता प्रीतम के जीवन और उनकी रचनाओं को समझने में यह कार्यक्रम काफी अहम है। रसीदी टिकट जो आत्मथाकथात्म रचना है उसका इसमें मंचन देखने को मिलेगा। अमृता प्रीतम की कहानी का पाठ भी कार्यक्रम में होगा। कार्यक्रम के वक्ताओं/कलाकारों में दलजीत अमी प्रमुख हैं जो पंजाबी के एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता और पत्रकार हैं। उन्हें कृषि श्रम, जन आंदोलन, मानवाधिकार, पर्यावरणवाद, सूफी परंपरा और पंजाबी विद्वानों जैसे विषयों पर वृत्तचित्र बनाने के लिए जाना जाता है। वे पंजाबी संस्कृति की वास्तविकता को ‘एक अंदरूनी सूत्र के दृष्टिकोण’ से चित्रित करते हैं उन्होंने अंग्रेजी से पंजाबी में चार पुस्तकों का अनुवाद किया है जिसमें निवेदिता मेनन द्वारा ‘सीइंग लाइक ए फेमिनिस्ट’ और अरुंधति रॉय के उपन्यास ‘अपार खुशियों घराना’ शामिल है।

उनके अलावा वाणी योगेश कुमार कार्यक्रम प्रस्तुति में शामिल हैं। वह शानदार रंगमंच कलाकार, कई हिंदी और उर्दू नाटकों में पिछले 15 वर्षों से एक थिएटर कलाकार के रूप में काम कर रहे। प्रियंका भास्कर, जो पेशे से इंजीनियर हैं, परवाज़ की सह-संस्थापक भी हैं, वह भी कार्यक्रम में शिरकत कर रही हैं। अधिक जानकारी के लिए 98192-66109 मोबाइल नंबर पर संपर्क किया जा सकता है।

विज्ञान की दुनिया में

जेएनयू में वैज्ञानिकों का जमावड़ा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में 26 सितंबर से 28 सितंबर 2019 तक तीन दिवसीय ‘30वीं राष्ट्रीय पैरासिटोलॉजी कांग्रेस’ में मलेरिया उन्मूलन को लेकर ग्लोबल समिट का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम में भारत और विदेशों से अग्रणी वक्ता भाग ले रहे हैं। इसमें मलेरिया उन्मूलन सहित परजीवी विज्ञान अनुसंधान की नवीनतम प्रगति संबंधी विभिन्न पहलुओं के बारे में चर्चा की जाएगी।

कार्यक्रम मे स्विटजरलैंड, अमेरिका, इज्राइल, आईसीएमआर, कोलंबो, फ्रांस, जापान और भारत के नई दिल्ली, मद्रास, मुंबई, हैदराबाद और तमिलनाडु के वैज्ञानिक शिरकत कर रहे हैं।

जेएनयू के कुलपति प्रो. एम. जगदीश कुमार इस सम्मेलन के संयोजक हैं। आयोजकों में जेएनयू की डॉ. शैलजा सिंह और द इंडियन सोसायटी फ़ॉर पैरासिटोलॉजी की अध्यक्ष सुखबीर कौर हैं। स्थानीय आयोजन समिति में गोबर्धन दास, प्रो. चिन्मय के. मुखोपाध्याय, प्रो. सुमन के. धार, विभा टंडन, डॉ. आनंद रंगनाथन, डॉ. सौविक भट्टाचार्य, प्रो. के. नटराजन, प्रो. रेंटला मधुबाला, प्रो. राणा पी. सिंह, प्रो. रोहिणी मुथुस्वामी, प्रो. पवन कुमार धर, प्रो. दीपक गौड़, प्रो. शंदर अहमद, एंड्रयू लिन, डॉ. अमित शर्मा, पवन मल्होत्रा, डॉ. आगम पी. सिंह, डॉ. पुष्कर शर्मा, डॉ. प्रज्ञान आचार्य, डॉ. अभिनव सिन्हा, डॉ. सौम्या पति, डॉ. अल्ताफ लाल हैं।

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए डॉ. शैलजा सिंह को ncpgsme@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। आयोजकों को 9911873353 और 9999029103 फोन नंबरों पर पर संपर्क किया जा सकता है।

कानपुर में स्वास्थ्य कल्याण पर जोर

स्वास्थ्य कल्याण को लेकर कानपुर में छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय ने 8, 9 और 10 नवंबर 2019 को अंतर्राष्ट्रीय वेलनेस कांफ्रेंस का आयोजन किया है। आयोजकों का कहना है कि स्वस्थ और संपूर्ण जीवन के प्रति जागरूक होने और विकल्प बनाने की एक सक्रिय प्रक्रिया में वेलनेस सम्मेलन का महत्व बढ़ जाता है। दरअसल, वेलनेस में अधिक जरूरी है बीमारी से मुक्त होना। जीवन को एक उच्च गुणवत्ता में जीने के लिए शीर्ष स्तर पर वेलनेस बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वेलनेस कई तरह से मायने रखता है। वेलनेस हमारी भलाई, हमारे कार्यों और भावनाओं को सीधे प्रभावित करती है। यह एक सतत चक्र है- तनाव कम करने के लिए, बीमारी के जोखिम को कम करने के लिए सकारात्मक विमर्श करना सुनिश्चित किया जाना जरूरी है।

वेलनेस के आठ आयाम हैं: सामाजिक, भौतिक, भावनात्मक, व्यावसायिक, वित्तीय, आध्यात्मिक, पर्यावरणीय और बौद्धिक। वेलनेस के प्रत्येक आयाम का एक-दूसरे के साथ संबंध है। बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक पहलू समान रूप से महत्वपूर्ण है। कहना ना होगा कि वेलनेस के प्रत्येक आयाम को बनाए रखने और अनुकूलित करने के तरीके को समझकर व्यक्ति वेलनेस के शीर्ष स्तर तक पहुंच सकता है। सामाजिक स्तर पर देखें तो वेलनेस समाज स्तर पर प्रभावी ढंग से मदद करता है। वेलनेस का यह आयाम न केवल प्रियजनों के साथ उत्साहजनक संबंधों को विकसित करने में मदद करता है बल्कि भागीदारों के साथ अंतरंग संबंध को भी विकसित करता है। शारीरिक सेहत स्वस्थ शरीर को बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर देखभाल करने से संबंधित है। शारीरिक स्वास्थ्य में व्यायाम, स्वस्थ भोजन, पर्याप्त नींद लेना आदि शामिल हैं। जो हमें संकेतों पर ध्यान देना और एकाग्रचित करना सिखाता है। भावनात्मक वेलनेस भावनाओं को समझने और तनाव से प्रभावी रूप से मुकाबला करने से संबंधित है। अपनी देखभाल, विश्राम, तनाव में कमी करने पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक वेलनेस मूल्यों के समूहों को विकसित करने में मदद करता है। अर्थ और उद्देश्य की तलाश करने में मदद करता है। आध्यात्मिक वेलनेस को विश्राम या धर्म के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। वित्तीय वेलनेस में खर्चों को सफलतापूर्वक प्रबंधित करने के तरीके सीखने की प्रक्रिया से है। पैसा जीवन में कई जगह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह पर्याप्त ना हो तो स्वास्थ्य के साथ-साथ शैक्षणिक प्रदर्शन पर भी असर पड़ता है। वित्तीय समस्याओं के कारण तनाव की शिकायत आम बात है।

आयोजकों का कहना है कि पर्यावरणीय वेलनेस हमें जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है जो हमारे परिवेश के लिए भी सम्मानजनक है। यह क्षेत्र हमें जीने के लिए प्रोत्साहित करता है। बौद्धिक वेलनेस नए विचारों का सामना करने और ज्ञान का विस्तार जारी रखने पर एक खुला दिमाग देगा है और यह प्रोत्साहित करता है।

विद्वानों, सांस्कृतिक और सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी से इसे हासिल किया जा सकता है।

कार्यक्रम में उपविषय हैं- हर्बल उत्पादों पर चर्चा, तनाव प्रबंधन, धन प्रबंधन, प्रदूषण प्रबंधन, स्वस्थ जीवन शैली और योग, पर्यावरण प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का प्रबंधन, फिजियोथेरेपी- स्वास्थ्य के लिए निवारक रणनीतियाँ, समय प्रबंधन, आध्यात्मिक प्रबंधन।

आयोजन समिति को लगता है कि वेलनेस सम्मेलन 2019 स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान बढ़ाने में मददगार होगा। विश्वविद्यालय ने प्रस्तुति और प्रकाशन के लिए शोध पत्र आमंत्रित किए हैं। इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए ईमेल एड्रेस: wellnesscon19@gmail.com, drpraveenkatiyar@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है। संबंधित फोन नंबर हैं- 9415132492, 9415510866, 6387048770 और 0512-2585180।

और अंत में

कोई ढाई-दो महीने से हम भारत की अकादमिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक जगत की गतिविधियों का यह कॉलम चला रहे हैं। बौद्धिक समाज की गतिविधियां हमारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जगत में हो रहे नए परिवर्तनों की ओर इशारा करते हैं। जाहिर है, इनमें अतीत की सीख मौजूद होती है। लेकिन सिर्फ अतीत की लकीर को नहीं पीटा जा सकता क्योंकि हर नए समय में चुनौतियां भी नए ढंग से सामने आती हैं। क्या ऐसा हो रहा है जिससे हम बेहतर भविष्य को लेकर आश्वस्त हो सकें? किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए हमें समय लेना चाहिए। इसलिए आप अपने संस्थान या आपके आसपास हो रही गतिविधियों का विवरण हमें जरूर भेजें। हमारा पता है – editor@forwardmagazine.in

 

(कॉपी संपादन : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

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