आरक्षण लागू न करने की हठधर्मिता के दर्शन करने हों तो जेएनयू आईये

संविधान संशोधन हो चुके हैं, नए कानून बनाये जा चुके हैं, अदालतें अपने फैसले सुना चुकीं हैं और सरकारें मार्ग-निर्देश जारी कर चुकी हैं। परन्तु इन सब के बाद भी, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अध्यापकों के लिए निर्धारित आरक्षण कोटा अब भी केवल कागजों पर है। विश्वविद्यालय प्रशासन एससी, एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों को बाहर रखने के लिए बहाने खोजने में अपने सिद्धस्तता का परिचय देता रहा है। बता रहे हैं अनिल वर्गीज

अगर आप यह समझना चाहते हैं कि आरक्षण की व्यवस्था – और प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों – को कार्यान्वयन के स्तर पर किस तरह दरकिनार किया जा सकता है तो जेएनयू की भर्ती प्रक्रिया आपके लिए एक बहुत शानदार केस स्टडी हो सकती है। जेएनयू अध्यापक संघ (जेएनयूटीए) ने हाल में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय (जो पहले मानव संसाधन मंत्रालय हुआ करता था) को दूसरी बार पत्र लिखकर इस मुद्दे की गंभीरता की ओर आला हुक्मरानों का ध्यान खींचने की कोशिश की है। संघ के पहले पत्र का मंत्रालय ने जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा है।  

बीते 1 अक्टूबर, 2020 को उच्च शिक्षा के सचिव अमित खरे को लिखे गए अपने पत्र में संघ के उपाध्यक्ष अजमेर सिंह काजल और सचिव सुरजीत मजूमदार ने लिखा, “जैसा कि हमने दिनांक 6 मार्च 2020 के अपने पत्र में कहा था, संघ की लम्बे समय से यह मान्यता रही है कि जेएनयू में राष्ट्रीय आरक्षण नीति का मखौल बनाने हुए प्राध्यापक और सह-प्राध्यापक काडर में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित पदों की संख्या में भारी कटौती कर दी गयी है और विश्वविद्यालय प्रशासन ने 2019 में रोस्टरों का पुनर्निर्धारण करते समय, बैकलॉग सम्बन्धी नियमों का पालन नहीं किया है।”   

विदित है कि सन 1997 तक, विश्वविद्यालय में रिक्त पदों पर भर्ती में एससी और एसटी के लिए निर्धारित कोटे की पूर्ति के लिए एक निश्चित प्रक्रिया का पालन किया जाता था। इसके बाद, इस व्यवस्था में परिवर्तन किया गया और एससी व एसटी के लिए आरक्षित पदों का निर्धारण शैक्षणिक विभागों को इकाई मानते हुए किया जाने लगा। सन 2006 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने विश्वविद्यालयों द्वारा अध्यापकों की भर्ती में आरक्षण हेतु संवर्ग (सहायक प्राध्यापक, सह-प्राध्यापक और प्राध्यापक के लिए पृथक-पृथक) को इकाई मानने का निर्देश दिया। सन 2007 में ओबीसी के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाने को कहा गया। सन 2006 में ही केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) विधेयक 2006 पारित हुआ। सन 2007 की शुरुआत में उसे अधिसूचित कर दिया गया। इसके अंतर्गत, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था थी। इस आरक्षण से अन्य वर्गों के विद्यार्थियों को उपलब्ध सीटों में कमी न आए, इस उद्देश्य से सरकार ने विश्वविद्यालयों की कुल सीटों में 54 प्रतिशत का इज़ाफा भी किया।

विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढने के साथ ही अध्यापकों की संख्या में भी आनुपातिक वृद्धि की जाना लाज़मी था। सन 2011 आते-आते, विद्यार्थियों के संख्या में निर्धारित वृद्धि हासिल कर ली गयी और यह भी तय हो गया कि अध्यापकों की संख्या में कितनी बढोत्तरी की जानी है। नई व्यवस्था में ओबीसी को केवल भर्ती के स्तर (सहायक प्राध्यापक) पर आरक्षण दिया गया और पदोन्नति में आरक्षण का लाभ केवल एससी व एसटी तक सीमित कर दिया गया। सार्वजनिक नियोजन में आरक्षण के संबंध में केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा जारी मार्ग-निर्देश, विश्वविद्यालयों पर भी लागू थे। इसमें यह प्रावधान शामिल था कि एक साथ विज्ञापित पदों (अर्थ तत्समय उपलब्ध रिक्तियों) में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। यह सीमा अदालतों ने सन 1980 के दशक की शुरुआत में मंडल आयोग द्वारा अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करने के पूर्व ही निर्धारित कर दी थी।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ व जेएनयू के कुलपति प्रोफेसर ममिदाला जगदेश कुमार

जहां तक जेएनयू का सवाल है, सन 2011 से लेकर 2016 तक कि अवधि में आरक्षित पद विज्ञापित और पुनर्विज्ञापित किये जाने के बावजूद रिक्त बने रहे। सन 2019 में उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायलय के 2018 के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें यह कहा गया था कि आरक्षित पदों का निर्धारण करते समय संपूर्ण विश्वविद्यालय की बजाय अलग-अलग विभागों को इकाई माना जाए. इस निर्णय का ज़बरदस्त विरोध हुआ क्योंकि इससे आरक्षित पदों की संख्या बहुत कम हो जाने की आशंका थी। इसके बाद, केंद्र सरकार ने केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) अध्यादेश, 2019 जारी कर विश्वविद्यालय संवर्ग को इकाई के रूप में पूर्व की व्यवस्था को बहाल कर दिया।

तत्पश्चात, संविधान (103वां संशोधन) विधेयक संसद में पारित हुआ, जिसके अंतर्गत आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत पद आरक्षित कर दिए गए। विश्वविद्यालयों में इसे लागू करने के लिए  केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) अध्यादेश, 2019 के बदले संसद में केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) 2019 विधेयक पारित किया गया।     

गौर तलब है कि विश्वविद्यालयों में भर्ती में आरक्षण, इस अधिनियम के अंतर्गत जारी दिशानिर्देशों और डीओपीटी व यूजीसी के मार्ग-निर्देशों से शासित है। जेएनयूटीए ने अपने पत्र में शिक्षा मंत्रालय का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया है कि इन सभी दिशा-निर्देशों व मार्ग-निर्देशों का विश्वविद्यालय द्वारा उल्लंघन किया जा रहा है। 

जैसे कि पहले बताया जा चुका है, पदोन्नति या सीधी भर्ती से भरी जाने वाले रिक्तियों में से 50 प्रतिशत तक को आरक्षित किया जा सकता है। परन्तु, विश्वविद्यालय ने प्राध्यापक और सह-प्राध्यापक के वर्तमान रिक्तियों को भरने के लिए सीधी भर्ती में एससी, एसटी व ओबीसी के लिए आरक्षित पदों की सीमा 22.5 प्रतिशत निर्धारित कर दी है। इसके पीछे यह तर्क दिया गया है कि सन 2011 में जब इन रिक्तियों की घोषणा की गई थी, उस समय केवल सहायक प्राध्यापक के पदों में ओबीसी के लिए आरक्षण था, सह-प्राध्यापक और प्राध्यापक के पदों में नहीं। अब, इन पदों में ओबीसी के लिए भी आरक्षण है परन्तु तीनों वर्गों (एससी, एसटी व ओबीसी) के लिए कुल आरक्षण को उपलब्ध पदों के 22.5 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है। मंडल आयोग प्रकरण में निर्णय के पूर्व ही, न्यायालय यह स्पष्ट कर चुके हैं कि संबंधित संवर्ग (इस मामले में सह-प्राध्यापक और प्राध्यापक) में एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों का उनके लिए निर्धारित क्रमशः 15 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 27 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए, यदि आवश्यक हो तो वर्तमान रिक्तियों में से 50 प्रतिशत तक को आरक्षित किया जा सकता है। सच तो यह है कि जब ये पद केवल एससी, एसटी के लिए आरक्षित थे, तब भी इनमें से 50 प्रतिशत को इन वर्गों के उम्मीदवारों के लिए छोड़ा जाना चाहिए था। अगर इसके बाद भी उनका कोटा पूरा नहीं होता तो कमी को अगली भर्ती के समय पूरा किया जाना था। कुल मिलाकर, इस समय सह-प्राध्यापक और प्राध्यापक पदों पर सीधी भर्ती में एससी, एसटी व ओबीसी के साथ अन्याय व धोखाधड़ी की जा रही है।     

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पदोन्नति के मामलों में भी वर्तमान रिक्तियों में से अधिकतम 22.5 प्रतिशत को एससी, एसटी के लिए छोड़ा जा रहा है, जबकि जबतक संबंधित संवर्ग (यहां सह-प्राध्यापक और प्राध्यापक) में उनका प्रतिनिधित्व क्रमशः 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत नहीं हो जाता, तब ऐसे पदों में से भी 50 प्रतिशत उनके लिए निर्धारित किए जाने चाहिए। 

बैकलॉग रिक्तियों के मामले में भी नियमों की धज्जियां उड़ाईं जा रहीं हैं। जो आरक्षित पद विज्ञापित किये जाने के बाद भी भरे नहीं जा सके हों, वे बैकलॉग कहलाते हैं। ऐसे पदों को फिर से विज्ञापित किया जाता है परन्तु वे उस समय पहली बार विज्ञापित किये जा रहे पदों का हिस्सा नहीं माने जाते और इस प्रकार 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा का नियम उन पर लागू नहीं होता। परन्तु जेएनयू केवल उन पदों को बैकलॉग मानता है जिनके लिए उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया गया, परन्तु उनमें से कोई भी नियुक्ति हेतु पात्र नहीं पाया गया। इस तरह उन पदों को अनारक्षित घोषित किया जा रहा है, जिन पर नियुक्ति के लिए साक्षात्कार नहीं लिए गए हों। 

जेएनयूटीए ने जेएनयू प्रशासन द्वारा अध्यापकों की भर्ती में संबंधित कानूनों और मार्ग-निर्देशों का उल्लंघन किये जाने के संबंध में केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय को भी लिखा है। अब तक उसे दोनों की पत्रों का कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है। साफ़ है कि विश्वविद्यालयों में सामाजिक न्याय, भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। 

जेएनयूटीए के सचिव प्रो. सुरजीत मजूमदार कहते हैं, ‘हमने अभी अपनी अगली कार्यवाही के बारे में कुछ नहीं सोचा है। परन्तु इस व अन्य मुद्दों पर चर्चा के लिए एसोसिएशन ने यूजीसी के अध्यक्ष से मिलने का समय मांगा है। हम इस मामले में कुछ लोगों द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर प्रकरण में फैसले का इंतज़ार भी कर रहे हैं। 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन: नवल)


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