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सीपीएम विचार की धनी है जबकि सीपीआई कंगाल : राम बहादुर राय

राम बहादुर राय वरिष्ठ पत्रकार हैं। सियासी गलियारे में उनकी उपस्थिति मायने रखती आयी है। वर्तमान में वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक हैं। मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार से जुड़े मसलों और अतीत से उठ रहे सवालों को लेकर फारवर्ड प्रेस के प्रतिनिधि कुमार समीर ने उनसे खास बातचीत की

परदे के पीछे 

(अनेक ऐसे लोग हैं, जो अखबारों की सुर्खियों में भले ही निरंतर न हों, लेकिन उनके कामों का व्यापक असर मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक व राजनीतिक जगत पर है। बातचीत के इस स्तंभ में हम पर्दे के पीछे कार्यरत ऐसे लोगों के दलित-बहुजन मुद्दों से संबंधित विचारों को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं। इस कड़ी में  प्रस्तुत है, वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय से पत्रकारिता और वर्तमान में देश के समक्ष चुनौतियों पर विस्तृत बातचीत। फारवर्ड प्रेस के लिए यह बातचीत कुमार समीर ने की है। इसे हम दो किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। स्तंभ में प्रस्तुत विचारों पर पाठकों की प्रतिक्रिया का स्वागत है : प्रबंध संपादक)


भारतीय मीडिया में कुछ घरानों की मोनोपॉली पर बहस होनी चाहिए’

  • कुमार समीर

कुमार समीर (कु.स.) : आज पत्रकारिता का तौर-तरीका बदल चुका है, ऐसे में अपने जमाने की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता पर आपका क्या कहना है?

राम बहादुर राय (आर. बी. राय) : पत्रकारिता के जो मूल्य हैं, वे तो शाश्वत हैं। जब समय बदलता है, पत्रकारिता के तौर-तरीकों में भी बदलाव होते हैं। हमारे यहां भारत में हिन्दी पत्रकारिता की एक परंपरा रही है और वह पत्रकारिता का मूल्य है जिसमें सत्य-निष्ठा है और उसके लिए आग्रह है। आजादी के बाद जो पत्रकारिता हुईं है, उसमें तीन दौर आते हैं। पहला दौर 1964-67 का  है। जिन संस्थाओं, पत्रकारों ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, लिखा-पढ़ा और उनमें से कुछ जेल भी गए। आजादी के बाद भारत के नवनिर्माण में इन्होंने सहयोग करने को अपना फर्ज समझा और जरूरत महसूस करने पर सरकार के खिलाफ आलोचना, आंदोलन का समर्थन किया। इस तरह 1977 आते-आते एक दौर जेपी आंदोलन का और फिर 90 के दशक में दूसरा मंडल आयोग का शुरू हुआ और उसी के आसपास भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन भी शुरू हुआ। भ्रष्टाचार जवाहरलाल नेहरू के समय में भी था लेकिन बाद के समय में यह काफी बढ़ गया और पहली बार राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा बना जो राजनीतिक बनता गया और उसी मुद्दे पर 1989 में चुनाव लड़ा गया।

1989-2013 का एक दूसरा दौर रहा जिसमें पत्रकारिता ने अपना रोल यह समझा कि मूर्तिभंजन करना है। जो मूर्तियां बनी हुई हैं और उनमें कोई भी दोष दिखाई दे रही है तो उसमें सुधार करने की बजाय उसे तोड़ देना है। जबकि मूर्तिभंजन की पत्रकारिता की जरूरत रही है लेकिन 2014 के बाद अब फ़िर से वो दौर आया है जो आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू के समय तक था। वह दौर नवनिर्माण का दौर था और वही दौर फिर शुरू हुआ है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि तब नवनिर्माण का दौर था, अब पुनर्निर्माण का दौर शुरू हुआ है। पुनर्निर्माण के इस दौर में पत्रकारिता ने स्वयं अपनी भूमिका बदल ली है। जितनी आलोचना जरूरी है, उतनी हो रही है लेकिन मूर्तिभंजन नहीं हो रहा है। जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल की तरह जब मीडिया का फोकस मूर्तिभंजन पर नहीं था बल्कि भारत के नवनिर्माण में सहयोग करना था, ठीक नेहरू की तरह मोदी को सहयोग करना चाहिए मीडिया को, तभी भारत की पुरानी समस्याएं हल हो सकती हैं। आप देखें कौन सी ऐसी समस्याएं हैं जो लगातार तीन सदियों 19वीं, 20वीं व 21वीं सदी से चलती आ रहीं हैं और जिसका हल नहीं निकल पा रहा। इसकी एक सूची बनाएं तो आप पाएंगे 15-20 ऐसी समस्याओं की एक सूची है। जबकि सच्चाई यह है कि दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जहां तीन सदियों से एक ही समस्या बनी हुई है। लेकिन अब चेतना जगी है और पुरानी समस्याओं को हल करने की ईमानदार कोशिश शुरू हुई है, इसलिए जहां जरूरी है वहां आलोचना करें लेकिन मोटे तौर पर आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का समर्थन करना चाहिए क्योंकि लीक से हटकर फिलहाल इनके द्वारा ईमानदार प्रयास किये जा रहे है। सिद्धांतों की एक राजनीति होती है, इसलिए यथार्थ में समस्याएं हल करें, वाद में ना पड़े। पूंजीवाद, समाजवाद के कई बाड़े बन गए थे, उससे ऊपर उठकर यथार्थ में समस्याएं हल करें। और हां, जिस दिन लगेगा कि ईमानदार कोशिश नहीं हो रही है, उस दिन से मूर्तिभंजन का दौर फिर से वापस आ सकता है। यह सच्चाई है।

राम बहादुर राय, वरिष्ठ पत्रकार

कु.स. : पत्रकारिता में कारपोरेट घरानों सहित राजनीतिक दखलंदाजी बढ़ी है, इसे आप किस रूप में लेते हैं? क्या इससे विश्वसनीयता खतरे में नहीं पड़ी है?

आर. बी. राय : जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के समय प्रेस फ्रीडम तो था, लेकिन इन तीनों के कार्यकाल में प्रेस फ्रीडम से संबंधित 19-20 कानून ऐसे बने जिससे प्रेस का फ्रीडम संकुचित हुआ। जबकि नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में प्रेस फ्रीडम को रोकने वाला एक भी कानून नहीं बना है। लेकिन इससे पूर्व पोस्ट एंड टेलीग्राफ कानून में परिवर्तन करने की कोशिश की गई। विरोध में सारी मीडिया जंतर-मंतर पर एकत्रित हुई। हमलोग जनसत्ता के रिपोर्टर थे, वहां पहुंचे थे। हमारे साथ जनसत्ता अखबार के मालिक रामनाथ गोयनका भी जंतर-मंतर गए थे और तत्कालीन केंद्र सरकार को बदलाव वापस लेने पर मजबूर किया था। उस समय बिहार में जगन्नाथ मिश्र सरकार ने भी प्रेस फ्रीडम को संकुचित करने का प्रयास किया था। जहां तक मौजूदा सरकार की बात है तो मोदी की सरकार ने प्रेस फ्रीडम को कम करने की कोशिश नहीं की है। 2015 में पूर्व चीफ जस्टिस जे.एस भगवती की स्मृति में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप ने एक व्याख्यान करवाया था, जिसमें तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली का प्रेस फ्रीडम पर व्याख्यान था, जिसे टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप ने हू-ब-हू छापा भी था। अपने व्याख्यान में अरुण जेटली ने कहा था कि मौजूदा केंद्र सरकार प्रेस फ्रीडम की हिमायती है लेकिन प्रेस में जो मोनोपली है, उस पर बहस होनी चाहिए। राष्ट्रीय प्रेस रजिस्ट्रार के दफ्तर में एक लाख 45 हजार से अधिक रजिस्टर्ड अखबार हैं; लेकिन प्रिंट को कौन लोग कंट्रोल कर रहे हैं। हकीकत में 13-14 अखबार, उसको भी छोटा करें तो 8-10 अखबार ही। हमें इस पर गौर करना होगा और इस तरह के एकाधिकार को खत्म करने की दिशा में पहल करनी होगी। भारतीय मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश किसी से छिपा नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश है जबकि दूसरे कई सेक्टर में तो सौ-सौ फीसदी विदेशी पूंजी निवेश है और इससे भारतीय राजनीति के समक्ष भी खतरा है। सामान्य सी बात है कि पूंजी मुनाफे के लिए लगाया जाता है ना कि परोपकार के लिए। समय के साथ बड़ा फर्क महसूस किया जा रहा है। विचारहीनता के दौर में विचार के लिए नहीं, सत्ता के लिए प्रयास हो रहे हैं जो पत्रकारिता के लिहाज से सरासर ग़लत है। 


कु.स. : पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीति का भी तौर-तरीका बदला है। यहां भी आपसी विश्वास में कमी आयी हैं, ऐसे में आज के दौर की राजनीति और पहले की राजनीति में क्या कुछ खास फर्क आप महसूस करते हैं?

आर. बी. राय : समय के साथ राजनीति का भी तौर-तरीका बदला है जो लाजिमी है, लेकिन आपसी विश्वास में कमी ठीक नहीं है। पहले के राजनेताओं के बीच संबंध पार्टी से उपर उठकर होते थे। आपसी संबंध आड़े नहीं आता था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पार्टी छोड़ चुके नेता के लिए उनके हिसाब से भाषण तक तैयार करवाते थे। लेकिन अब क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है। नेताओं की भाषा में काफी गिरावट आई है। आपसी संबंधों की बातों को आज के अधिकांश नेता तवज्जो नहीं देते और व्यक्तिगत लाभ के चक्कर में लगे रहते हैं। 

कु.स. : आपके आडवाणी जी, वाजपेई जी से भी अच्छे संबंध रहे हैं, उनके बारे में थोड़ा बताएं और साथ ही इस जोड़ी की तुलना आज के दौर की जोड़ी मोदी-शाह से की जाए तो इन दोनों जोड़ी में क्या क्या समानताएं व फर्क आप महसूस करते हैं?

आर. बी. राय.: वाजपेई और आडवाणी के संबंध एक-दूसरे के पूरक के रूप में धीरे-धीरे विकसित हुए। वाजपेई के पूरक थे आडवाणी। वाजपेई को पार्टी के अंदर कोई चुनौती मिलती थी तो आडवाणी को आगे कर देते थे। यह सिलसिला 1973 में शुरू हुआ जब कानपुर में जनसंघ का अधिवेशन हुआ और बलराज मधोक पार्टी से बाहर गए। इसके बाद से 1991 तक आडवाणी की भूमिका वाजपेई के पूरक के रूप में रहीं। वाजपेई को बलराज मधोक से चुनौती मिलती थी और मधोक को हटाकर आडवाणी के जनसंघ प्रमुख बन जाने से यह समस्या भी खत्म हो गई। 1973 के कानपुर अधिवेशन से पहले तक आडवाणी दिल्ली के नेता थे।


1991 में अयोध्या आंदोलन के बाद स्थिति बदली, समीकरण बदले। वाजपेई दूसरे पायदान पर आ गए और आडवाणी सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे। लोगों की नजर में भी सबसे बड़े नेता बने। 1989 में आडवाणी पहली बार लोकसभा में चुनकर आए और 1991 में लोकसभा में वाजपेई की जगह आडवाणी दल के नेता बने। 1991 से 1995 तक लोकसभा में दल के नेता रहे आडवाणी और इन चार सालों में मीडिया को भनक नहीं लगी; अलग बात है लेकिन बीजेपी के अंदर वाजपेई बनाम आडवाणी के बीच सत्ता संघर्ष चला। हालांकि 1995 में जब मुंबई अधिवेशन हुआ तो आडवाणी समझ गए कि पार्टी का नेतृत्व भले ही उनके पास है लेकिन जनता वाजपेई के पक्ष में है। उन्होंने मुंबई अधिवेशन में किसी से भी सलाह नहीं ली और मंच से एकाएक यह घोषणा कर दी कि 1996 में लोकसभा चुनाव के बाद अगर बीजेपी की सरकार बनती है तो पार्टी वाजपेई को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करेगी। इस घोषणा के बाद सत्ता संघर्ष को लेकर जो तनाव था, वह खत्म हुआ और उसके बाद आखिरी समय तक ये एक-दूसरे के पूरक बने रहे। हां, 2001 में जरूर एक बार फिर थोड़ा तनाव हुए जब आडवाणी के समर्थकों ने दबाव बनाकर आडवाणी को डिप्टी पीएम बनवाया। तनाव का यह पीरियड 2001-2004 तक चलता रहा। कुल मिलाकर देखें तो इन कुछ सालों को छोड़ दें तो दोनों के बीच लंबे विश्वास का संबंध बना रहा। 2004 में वाजपेई जी ही नेता थे और उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा गया था लेकिन बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार नहीं बन सकी। उसके बाद वाजपेई जी बीमार भी हो गए तो 2009 में आडवाणी ही पार्टी के सबसे बड़े के रूप में रहे। 

कु.स. : मोदी-शाह की जोड़ी पर आपका क्या कहना है?

आर. बी. राय : नरेंद्र मोदी और अमित शाह के संबंध दूसरे तरह के हैं। साल 2013-14 का समय है, उसमें भारतीय राजनीति में एक नया प्रयोग हुआ। जनता ने दबाव डाला कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया जाए। बीजेपी के अंदर अड़चनें बहुत थी लेकिन जनता के दबाव के कारण अड़चनें खत्म हुई। ये सब चल ही रहा था कि इसी बीच अमित शाह उत्तर प्रदेश के बीजेपी प्रभारी बने। लोगों को लगा कि यह प्रयोग सफल नहीं होगा लेकिन अमित शाह ने सफल करके दिखाया। अपनी खास शैली वह मेहनत के बल पर अमित शाह ठीक वैसे ही स्थापित हुए जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हुए। दोनों के संबंध विश्वास के हैं। मोदी मास लीडर हैं तो वहीं अमित शाह में संगठन का कौशल है। सरकार और संगठन में बेहतर तालमेल हुआ है जिसका परिणाम सकारात्मक रहा है जबकि 1977 के बाद समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं कि सरकार पार्टी के अनुसार चले या सरकार के अनुसार पार्टी चले। वाजपेई बनाम कुशाभाऊ ठाकरे के दौरान जैसा तनाव बिल्कुल नहीं है और पार्टी व सरकार दोनों सामंजस्य बिठाकर काम कर रहे हैं। अमित शाह का कार्यकाल आगामी जनवरी माह तक है।

कु.स. : समाजवादी और मार्क्सवादी राजनेताओं से भी आपका प्रगाढ़ परिचय रहा है। इन विचारधाराओं के राजनेताओं के सामाजिक योगदान को आप कैसे देखते हैं?

आर. बी. राय : समाजवादी नेताओं की बातें होंगी तो डॉ. राममनोहर लोहिया, राजनारायण व मधु लिमये का नाम जरूर आएगा। समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में  उपरोक्त तीनों नेताओं की अग्रणीय भागीदारी रही है। राजनारायण की बात करें तो वे संघर्ष के बेमिसाल योद्धा थे। अहंकार पर चोट पहुंचाने में वह सबसे आगे रहते थे। आचार्य नरेन्द्र देव, एस.एन. जोशी, अशोक मेहता जैसे नेता यथार्थ परक थे और इन्होंने भी विचारधारा की लड़ाई लड़ी और समझौता नहीं किया। विचारधारा की लड़ाई लड़ने वालों के संबंध इतने प्रगाढ़ होते थे कि पार्टी बदलने के बाद भी संबंध जस के तस रहते थे। एक-दूसरे के भाषण तक तैयार करने में सहयोग देते थे लेकिन आज इस तरह की बातें देखने सुनने को नहीं मिलती है। वहीं समाजवादी की तरह वामपंथी नेताओं की बात करें तो केरल के नम्बूदरीपाद व गोपालन और पश्चिम बंगाल में प्रमोद दास गुप्ता व ज्योति बसु का नाम जरूर चर्चा में शामिल करना होगा। ये विचारधारा की लड़ाई लड़ने वाले थे लेकिन आज स्थितियां वैसी नहीं है। वामपंथी पार्टियों के  बारे में सार में कहें तो सीपीएम विचार की धनी है और उसमें वैचारिक तेज है। दूसरे शब्दों में कहें तो विचारधारा के रास्ते पर चलने वाली अकेली पार्टी है, वहीं विचारधारा के लिहाज से सीपीआई कंगाल हो चुकी है और इसकी एकमात्र वजह उसका कांग्रेस का पिछलग्गू बनना रहा। 

कु.स. : मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के सौ दिन से अधिक बीत चुके हैं। सामाजिक, आर्थिक औा राजनीतिक दृष्टि से सरकार के कामकाज पर आपका क्या नजरिया है? 

आर. बी. राय-  मोदी सरकार से लोगों की उम्मीदें बहुत हैं। पिछ्ला कार्यकाल और इस बार इन दोनों कार्यकाल में कई फ्रंट पर सरकार द्वारा जो हुए हैं, वह सराहनीय रहे हैं और कुछ काम तो ऐतिहासिक रहे हैं। जैसे जो बेकार के कानून थे, उसे इस सरकार ने खत्म किया। ये ऐसे कानून थे जिन कानूनों का उपयोग नहीं था। इनसे सिर्फ शोषण ही होता था। ऐसे एक-एक कानून को देखें और उनके इतिहास पर गौर करें तो पता चलेगा कि कुछ कानून तो जनता के हिसाब से बनें हैं लेकिन कुछ शासन अपने हिसाब से बनाए हैं। ऐसे कानूनों की औपनिवेशिक पृष्ठभूमि है। अंग्रेजों को जैसा लग रहा था, वैसा कानून बनाया। इन कानूनों की समीक्षा जरूरी है और यह काम सरकार नहीं विधि आयोग निरंतर करता रहता है। पिछली सरकार और इस सरकार में बुनियादी फर्क यही है, पहले भी सिफारिशें होती थीं लेकिन उसे अमल में नहीं लाया जाता रहा। जरूरत थी औपनिवेशवाद को बढ़ाने वाले ऐसे कानूनों को तत्काल खत्म करने की।

मोदी सरकार का दूसरा टर्म मई 2019 में शुरू हुआ तब गांठ बांध लिया गया कि जिन कानूनों से हमें काम लेना है, उसे संसद में सबसे पहले पास कराना है। पहला सत्र बजट सत्र-मानसून सत्र था और उसके अगले सत्र में जो नतीजे रहे, वह काफी सराहनीय रहा। संसद चली और काम भी हुए। संसद बाधित नहीं हुए जबकि बाधित होने की समस्या से संसद सालों से जूझती आ रही थी। मौजूदा सरकार इस लिहाज से भी काफी सफल रही है और सरकार की नीतियों को कानून बनाकर उसे बहाल करने में सफल रहीं हैं। विलंबित कानूनों को पारित कराया। नर-नारी के समानता के विषय को ही लें तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की गुलाम वाली स्थिति को लेकर इस पर लंबे समय से बहस हो रही थी, लेकिन इसमें सुधार के लिए कदम बढ़ाने का पहले की सरकारें साहस नहीं जुटा पा रही थी लेकिन मौजूदा सरकार ने तलाक कानून बनाकर यह साहस कर दिखाया। तलाक़ कानून पास कराने से सामाजिक सुधार होना शुरू हो गया है। 

उसी तरह से अनुच्छेद 370 का विषय है। इसके बारे में बहुत सारे लोगों ने कहा कि सपने में किसी ने नहीं सोचा था कि यह समाप्त हो सकता है। किसी ने स्लोगन के अलावा इस पर सही मायने में होमवर्क नहीं किया। होमवर्क का मतलब यह हुआ कि किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि अनुच्छेद 370 की संवैधानिक स्थिति क्या है? मौजूदा सरकार ने इस पर होमवर्क किया और संविधान से बाहर जाकर उपाय नहीं किए और ना ही जोर-जबरदस्ती की गई। होमवर्क करने से पता चला कि संविधान में ही लिखा है कि यह अस्थाई उपबंध है और इसमें संवैधानिक परेशानी नहीं आई क्योंकि अस्थायी उपबंध था जिसे हटा दिया गया। सच यह है कि क्लाउज वन के अलावा सभी अस्थायी था, उसे हटा दिया गया और संविधान की व्यवस्था में जिसे रहना चाहिए, उसे रखा गया है। नई बात आई कि संवैधानिक तरीके से इसे हटाया जा सकता है, यह इस सरकार ने किया। संविधान के विशेषज्ञों ने भी यह सवाल उठाए कि संविधान की कसौटी पर यह खरा उतरेगा या नहीं? यह उनका इंटरप्रिटेशन है। 

कु.स. : अनुच्छेद 35ए पर आपका क्या कहना है?

आर. बी. राय : संविधान में अनुच्छेद 35 तो है लेकिन 35ए का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो यह संविधान के साथ फ्रॉड कर किया गया है। इस संदर्भ में बताना चाहता हूं कि छह-सात साल पहले इस सिलसिले में मैं लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल सी.के. जैन से मिला था और उनके शब्द थे कि संविधान के साथ फ्रॉड हुआ है। अनुच्छेद 35ए का संविधान में कहीं कोई उल्लेख नहीं है। 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति से इस आशय का आदेश जारी करवा दिया। राष्ट्रपति का यह आदेश कानून नहीं हो सका क्योंकि संसद से इसे पास नहीं कराया गया। इस तरह अब राष्ट्रपति के आदेश से ही इसे खत्म करा दिया गया। 

कु.स. : आर्थिक दृष्टि से देश के कमजोर होने की बात से आप कितना सहमत हैं ? सरकार द्वारा आरबीआई से पैसे लेने पर विपक्ष के आरोप पर क्या कहना है ?

आर. बी. राय.: आर्थिक मोर्चे पर समस्याएं हैं और मौजूदा सरकार के समक्ष यह सबसे बड़ी चुनौती भी है। सरकार की इस दिशा में सकारात्मक कोशिश होती हुई दिख रही है। इसमें दो राय नहीं कि मंदी का असर है, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि तीन-चार महीने में इस समस्या से भी छुटकारा पा लिया जाएगा। (क्रमश: जारी)

(संपादन : नवल)


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लेखक के बारे में

कुमार समीर

कुमार समीर वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सहारा समेत विभिन्न समाचार पत्रों में काम किया है तथा हिंदी दैनिक 'नेशनल दुनिया' के दिल्ली संस्करण के स्थानीय संपादक रहे हैं

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