मन्दिर, राम और बहुजन  

लेखक कंवल भारती बता रहे हैं कि आरएसएस के लिए न सिर्फ पहला, बल्कि अन्तिम लक्ष्य भी मन्दिर है, क्योंकि वह मन्दिर में उलझाकर ही बहुजनों को सत्ता से दूर रखने में सफल हो सकता है। मन्दिर इसका बेहतर साधन है

भारतीय राजनीति में 1990 और उसके बाद का समय सामाजिक न्याय का समय है, क्योंकि इसी काल में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, और पिछड़ी जातियों को शासन-प्रशासन में भागीदारी हासिल हुई। इसी काल में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी काल में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनीतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया। उत्तर प्रदेश में दलित महिला को मुख्यमंत्री और केन्द्र में पिछड़े वर्ग की सरकार बनाने वाला भी यही काल है और अति पिछड़ा वर्ग तथा महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण की मांग भी इसी काल में मुखर हुई।

यही कालखण्ड भारतीय राजनीति में हिन्दुत्व के आन्दोलन का भी है, जिसमें रामलला का उन्माद, राम रथ यात्राएं, आरक्षण के खिलाफ सवर्ण छात्रों के आत्मदाह और बाबरी मस्जिद के ध्वंस की घटनाएं शामिल हैं। कहना न होगा कि यह काल भारत में एक क्रान्ति के विरुद्ध एक बड़ी प्रतिक्रान्ति का साक्षी है।

आइए, इस क्रान्ति-प्रतिक्रान्ति के कालखण्ड की वीथियों में घूमते हैं और मण्डल-कमण्डल, राम भक्ति और बहुजन समाज के सवालों पर कुछ चर्चा करते हैं। 

इन वीथियों में उतर कर, जब हम गहराई से विचार करते हैं, तो हमें राम मन्दिर आन्दोलन भारत के दलित-पिछड़े वर्गों के विरुद्ध एक हिन्दू प्रतिक्रान्ति की घटना प्रतीत होती है। 1990 के दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यक समुदायों को एक पृथक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभारने के लिए कांशीराम ने उत्तर भारत में जिस बहुजन चेतना का निर्माण किया था, उसी के विरुद्ध आरएसएस की कमण्डल राजनीति अस्तित्व में आई थी। कारण बहुत साफ है: क्योंकि कांशीराम की बहुजन चेतना ब्राह्मणवाद के लिए विनाशकारी थी। 

आरएसएस दलित-पिछड़ी जातियों को हिन्दू तो मानता है, पर उनकी शैक्षिक उन्नति नहीं चाहता

इसका थोड़ा खुलासा करते हैं। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा पिछड़ी जातियों की 52 प्रतिशत आबादी (1931 में हुए जातिगत जनगणना के आधार पर मंडल कमीशन द्वारा अनुमानित) को वैधानिक अधिकार दिए जाने के लिए, 31 दिसंबर, 1980 से लम्बित, मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के निर्णय ने आरएसएस को इस कदर उत्तेजित कर दिया था कि सदैव समरसता का राग अलापने वाले इस भगवा संगठन ने अपने सारे हिन्दू बलों को हिंसा करने के लिए सड़कों पर उतार दिया था, जिसके परिणामस्वरूप, काॅलेजों और छात्रावासों में दलित-पिछड़े छात्रों को बेरहमी से मारा जाने लगा था और सवर्ण छात्रों से आत्मदाह कराए जाने लगे थे। यह वह हिन्दू आक्रोश था, जो पिछड़ों के अधिकारों के विरुद्ध उपजा था। दूसरे शब्दों में, यह आक्रोश पिछड़ों को हिन्दू तो मानता था, पर उनकी उन्नति नहीं चाहता था। इस सम्बन्ध में 27 सितम्बर 1990 के नवभारत टाइम्स में शरद जोशी ने अपने ‘प्रतिदिन’ स्तम्भ में बहुत ही मारक टिप्पणी लिखी थी- ‘क्यों नहीं, वर्णव्यवस्था में ऊॅंचे पायदान पर बैठे वर्ण यह कह देते कि निम्न जातियाॅं और पिछड़े वर्ग हिन्दू नहीं हैं? नहीं, जब वे जोड़ लगाते हैं, तब वे उन्हें हिन्दू ही कहते हैं। जो सही भी है, क्योंकि सब समान देवी-देवता और ग्रन्थों को मानते हैं। पर, जब आरक्षण का सवाल उठता है, तो एक ही धर्म को मानने वाले अपने ही धर्म के लोगों की उन्नति की कल्पना से इतने उत्तेजित, निराश और चिड़चिड़े क्यों हो जाते हैं? क्या श्रेष्ठ हिन्दू होने की पहली शर्त यह है कि निम्न जातियों को किसी तरह ऊपर न उठने दिया जाए? इन दिनों धर्म के प्रमुख क्या सोच रहे हैं? वे धर्म पर सोच रहे हैं या जाति और वर्ण पर? शास्त्रों में लिखा होगा कि ‘नीच’ जाति का छुआ पानी न पिएं। पर क्या यह भी लिखा है कि उसे नौकरी मिल रही हो, तो सिर पीटने लगें? यह कौन सा बसुधैव कुटुम्बकम है, जो अपने ही हिन्दू कुटुम्ब की दाल-रोटी की सुरक्षा से परम व्यथित हैं?’

मंडल रथ यात्रा – भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ शरद यादव व अन्य

लेकिन आरएसएस के ब्राह्मण भेजे में शरद जोशी की यह बात नहीं घुसी। कारण आरएसएस जिस हिन्दुत्व को लाना चाहता है, उसमें शूद्रों को शिक्षा की मनाही है। वह हिन्दुत्व वर्णव्यवस्था पर खड़ा है। 

संघ परिवार ने, जो प्रामाणिक हिन्दू होने का प्रमाण-पत्र बाॅंटता है, ऐसे ही हिन्दुत्व का परिचय दिया है, जो दलित-पिछड़ी जातियों को हिन्दू तो मानता है, पर उनकी शैक्षिक उन्नति नहीं चाहता। जब शरद यादव ने मण्डल रथ निकाला, तो उसकी प्रतिक्रान्ति में भाजपा ने अपनी आरक्षण विरोधी संघर्ष समितियों को सड़कों पर उतार दिया और विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने देश के सोलह हजार गाॅंवों में राम पादुका यात्रा आरम्भ कर दी। लालकृष्ण आडवाणी ने राम रथ यात्रा निकाली, और देश भर में दंगे भड़काए। जब पत्रकारों ने आडवाणी जी से पूछा कि उन्होंने रथ यात्रा क्यों निकाली, तो उनका दो टूक जवाब था : ‘क्योंकि मण्डल को लागू कर दिया गया।’ इसी बीच जब जनता दल ने (सितम्बर, 1992 में) मंडल महासम्मेलन करके केन्द्र सरकार को 26 जनवरी 1993 तक आयोग की सिफारिशें लागू करने का अल्टीमेटम दिया, तो विहिप ने 30 अक्टूबर, 1990 से अयोध्या में कारसेवा शुरु करा दी। और 1992 में 26 जनवरी का दिन आने से पहले, 6 दिसम्बर को ही कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद तोड़ दी। उस दिन उन्होंने मस्जिद नहीं, बल्कि संविधान का धर्मनिरपेक्ष ढाॅंचा तोड़ा था। 

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मिथक और किंवदन्तियों में अन्तर है। मिथक मिथ्या होते हैं, जिन्हें शासक वर्ग गढ़ता है। परन्तु किंवदन्तियाॅं जनता के बीच निर्मित होती हैं, जो जनभावनाओं की अभिव्यक्ति होती हैं। ब्राह्मणों ने बनारस, हरिद्वार, अयोध्या, मथुरा, उज्जैन आदि धार्मिक नगरों के बारे में बहुत से मिथक गढ़े हैं, जो बिन सिरपैर के हैं, पर वे उनके लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे ब्राह्मणों के लिए एक सुखमय लोक का निर्माण करते हैं, जिसकी बुनियाद में जनता का शोषण होता है।  

ब्राह्मणों ने मिथक गढ़ा कि जिस स्थान पर अयोध्या में राम का जन्म हुआ, वहाॅं राम मन्दिर था, जिसे तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। इस मिथक का व्यापक स्तर पर प्रचार किया गया। उन्होंने उस स्थान को राम लला का जन्मस्थल कहना शुरु किया और मस्जिद को विवादित ढाॅंचा। यह इसी बीसवीं सदी में गढ़ा गया आधुनिक मिथक है और सभी मिथकों की तरह इसका भी कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। पर इसने आस्था के नाम पर पूरे देश में हिन्दू उन्माद खड़ा कर दिया। 

आरएसएस ने एक तीर से दो निशाने लगाए और दोनों सही जगह लगे। पहला निशाना संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढाॅंचे को तोड़ना था और दूसरा भारतीय समाज को हिन्दू और मुसलमान में विभाजित करके हिन्दू समाज का सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण करना था। कहना न होगा कि ये दोनों निशाने कामयाब हुए। भारतीय लोकतन्त्र का धर्मनिरपेक्ष ढाॅंचा भी टूटा और भारत हिन्दू राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर भी हो गया। 

इसी माह 9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने रामलला के पक्ष में फैसला देकर मस्जिद की जगह मन्दिर बनाने का रास्ता भी साफ कर दिया। यह निर्णय तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि आस्था से किया गया है। जजों ने न केवल राम लला के मिथक को ऐतिहासिक माना, बल्कि राम को एक न्यायिक ईकाई भी स्वीकार किया, जो न्यायिक प्रक्रिया में सम्भवतः पहली बार हुआ है। यह सचमुच हास्यास्पद ही है कि वादी के रूप में उस न्यायिक ईकाई ने स्वयं कोई गवाही नहीं दी। यह भी एक विडम्बना है कि मस्जिद तोड़ने वालों के खिलाफ चल रहे मुकदमे में कोई फैसला नहीं आया, पर विवाद का पटाक्षेप कर दिया गया। निर्णय में यह भी आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि न्यायालय ने धर्मनिरपेक्ष सरकार को राम का मन्दिर बनाने के लिए निर्देशित गया है, जैसे भारत में कोई हिन्दू सरकार काम कर रही हो। किन्तु एक दृष्टि से इस निर्णय का जरूर स्वागत किया जाना चाहिए कि न्यायालय ने हिन्दुओं के पक्ष में फैसला देकर, देश को एक बड़े खूनखराबे से बचा लिया। यदि यह फैसला हिन्दुओं के विरोध में आता, तो हिन्दू उन्माद पूरे देश में दंगा-फसाद करता और जो आग लगती, वह कई दिन तक नहीं बुझती।

सवाल उठता है कि राम मन्दिर किनके लिए बनाया जा रहा है? आरएसएस के लोग तुरन्त जवाब देंगे कि राम हिन्दुओं के आराध्य हैं, इसलिए उनका मन्दिर बनाया जाना जरूरी है। पर, जब उनसे यह पूछा जायेगा कि अयोध्या में तो राम के कई मन्दिर हैं, फिर एक और क्यों, तो उनका जवाब होगा कि यह रामलला का मन्दिर होगा। ठीक है, आप रामलला को, भव्य मन्दिर बनाकर विराजमान कीजिए, पर यह बता दीजिए कि रामलला किनके लिए प्रकट हुए थे? इसका जवाब वे नहीं दे सकेंगे। लेकिन इसका सही जवाब सारे हिन्दुओं को, खास तौर से बहुजन समाज के लोगों को, जानना बहुत जरूरी है। राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं, और विष्णु के अवतार हैं। राम के रूप में विष्णु ने अवतार क्यों लिया था? यही वह प्रश्न है, जिसके जवाब में आरएसएस का बहुजन-विरोधी एजेण्डा, दूसरे शब्दों में हिन्दू राष्ट्रवाद छिपा हुआ है। आदि कवि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसी दास दोनों ने ही इस सत्य को खुलकर कहा है कि राम का अवतार ब्राह्मणों और गऊओं की रक्षा के लिए हुआ था। वाल्मीकि के अनुसार, देवताओं ने विष्णु से प्रार्थना की थी कि उन्हें देवद्रोही रावण का वध करने के लिए राम के रूप में जन्म लेना चाहिए। इस प्रकार राम ने जन्म लेकर रावण आदि देवद्रोहियों का वध किया, और ब्राह्मणों का साम्राज्य स्थापित करने में सहायता की। 

अतः कहना न होगा कि राम ब्राह्मणों के रक्षक और ब्राह्मण-द्रोहियों के संहारक हैं। फिर ऐसे राम की ब्राह्मण जय-जयकार क्यों नहीं करेंगे, जो ब्राह्मणों की रक्षा के लिए हथियार उठाते हैं? ऐसे राम के मन्दिर से ब्राह्मणों की मुक्ति और ब्राह्मणों का ही कल्याण होगा। ऐसे राम से लोगों को जोड़ने का मतलब है, उन्हें ब्राह्मण-भक्त बनाना। वे दलित-पिछड़ी जातियों को ब्राह्मण-भक्त बनाने के लिए ही राम से जोड़ रहे हैं। अतः जो भी बहुजन समाज का व्यक्ति राम-भक्त बनेगा, वह ब्राह्मण-भक्त पहले होगा। इसलिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि राम मन्दिर का मुद्दा हिन्दू राष्ट्र का अनिवार्य मुद्दा है। बिना राम के हिन्दू राष्ट्र का रथ आगे बढ़ ही नहीं सकता। राम हिन्दू राष्ट्र के आधार-स्तम्भ हैं और राम का राज्य वर्णव्यवस्था का राज्य है, जिसमें ब्राह्मण मुख्य कर्ता-धर्ता है। आप रामायण पढ़ लीजिए, रामराज्य में ब्राह्मण की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है और ब्राह्मण के शाप का इतना आतंक है कि राम तक उससे डरते हैं। ब्राह्मण और वर्णव्यवस्था की यह प्रतिष्ठा राम के नाम से ही हो सकती है, कृष्ण और शिव के नाम से नहीं। कोई अन्य देवता भी हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में सक्षम नहीं है, जितना कि राम हैं।

मन्दिर-प्रवेश को लेकर दलित और पिछड़ी जातियों की स्थिति समान नहीं है, बल्कि अलग-अलग है। दलित अवर्ण हैं और अवर्णों का प्रवेश हिन्दू मन्दिरों में वर्जित है। किंतु पिछड़ी जातियां अवर्ण नहीं है, वे वर्ण-व्यवस्था में चौथे वर्ण के रूप में शामिल रही हैं। उन्हें अस्पृश्य भी नहीं माना जाता है, उनका मंदिर-प्रवेश भी प्रतिबंधित नहीं है। इसके उलट दलित जातियां वर्ण-व्यवस्था से बाहर रही हैं। उन्हें अंत्यज का दर्जा दिया गया और अस्पृश्य कहा गया । उनका मंदिर-प्रवेश प्रतिबंधित रहा है। इसी आधार पर राम मन्दिर आन्दोलन से दलितों की अपेक्षाकृत, पिछड़ी जातियाॅं ज्यादा जुड़ीं हुई हैं। पिछड़ी जातियों के नेता कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार तो आरएसएस के मन्दिर आन्दोलन के आक्रामक चेहरा ही रहे हैं। लेकिन, जब मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, और पिछड़ी जातियों को अधिकार मिले, तो देशभर में उसका हिंसक विरोध आरएसएस ने ही किया था। वह पिछड़ी जातियों को हिन्दुत्व से तो जोड़ना चाहता है, परन्तु उन्हें नौकरियों में आरक्षण देना नहीं चाहता। तब आरएसएस के पिछड़े नेता भी पिछड़ों के खिलाफ बोल रहे थे। ब्राह्मण नेता और बुद्धिजीवी योग्यता का प्रश्न खड़ा करके दलित-ओबीसी सबको अयोग्य ठहरा रहे थे, क्योंकि आरएसएस नहीं चाहता कि शासन-प्रशासन में ब्राह्मणों के वर्चस्व में कोई कमी आए। राम भक्ति ने पिछड़े वर्ग के नेताओं को पूरी तरह गुलामों में बदल दिया था।

जब डॉ. आंबेडकर ने 1930 में नासिक में काला राम मन्दिर में दलितों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह आरम्भ किया, तो उसका उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय राजनीति में भागीदारी के दो पक्षों-हिन्दू और मुसलमान के समानान्तर, दलितों की भागीदारी का एक तीसरा पक्ष खड़ा करना था, क्योंकि गाॅंधी और हिन्दू नेता दलित जातियों को हिन्दू मानकर अपनी विशाल संख्या होने का दावा कर रहे थे। डॉ. आंबेडकर यह दिखाना चाहते थे कि दलित हिन्दू नहीं हैं, क्योंकि हिन्दू उन्हें अछूत मानते हैं और उनकी छाया से भी बचते हैं। यह साबित करने में वे सफल हुए, क्योंकि हिन्दुओं ने काला राम मन्दिर में प्रवेश के लिए जा रहे दलितों पर हमला कर दिया था, और उन्हें बलपूर्वक मन्दिर में जाने से रोक दिया था। दलितों का सत्याग्रह अहिंसक था, पर हिन्दुओं ने हिंसक विरोध किया था, जिसमें आंबेडकर सहित अनेकों दलित लहुलुहान हुए थे।

इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने मन्दिर-सत्याग्रह वापिस ले लिया था। किन्तु यह एक ऐसा बम था, जो स्वराज का दावा पेश करने वाले हिन्दू नेताओं के ऊपर जाकर गिरा था। उसने उनके राजनीतिक दावे की पोल खोल दी थी। तब राजनीतिक लाभ के लिए गाॅंधी को स्वयं मन्दिर प्रवेश आन्दोलन चलाना पड़ा। गुरुवयूर का मन्दिर सत्याग्रह हिन्दुओं की ओर से शुरु किया गया पहला मन्दिर सत्याग्रह था, जो  कामयाब नहीं हुआ था। डॉ. आंबेडकर ने इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया था, जिसका उल्लेख करना यहाॅं आवश्यक है। उन्होंने पूछा था कि क्या मन्दिर प्रवेश दलितों के लिए पहला लक्ष्य है? अगर यह पहला लक्ष्य है, तो अन्तिम लक्ष्य क्या है? डॉ. आंबेडकर ने कहा कि दलितों के लिए न सिर्फ पहला, बल्कि अन्तिम लक्ष्य भी मन्दिर नहीं, अपितु सत्ता में भागीदारी चाहिए। 

किन्तु आरएसएस के लिए न सिर्फ पहला, बल्कि अन्तिम लक्ष्य भी मन्दिर है, क्योंकि वह मन्दिर में उलझाकर ही बहुजनों को सत्ता से दूर रखने में सफल हो सकता है। मन्दिर इसका बेहतर साधन है।

 

(कॉपी संपादन : नवल/सिद्धार्थ)


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