ओबीसी के साथ न्याय हो, छल नहीं : जस्टिस व्ही. ईश्वरैया

आंध्र प्रदेश उच्च शिक्षा विनियामक व पर्यवेक्षण आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) व्ही. ईश्वरैया बता रहे हैं कि किस प्रकार क्रीमी लेयर के प्रावधान का उपयोग ओबीसी को उनके लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण का पूरा लाभ उठाने से वंचित करने के लिए हो रहा है और इस अन्याय को समाप्त करने के लिए उनकी क्या योजना है 

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद से अपनी सेवानिवृत्ति के बाद से ही व्ही. ईश्वरैया, पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए अथक लड़ाई लड़ रहे हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी वे इसी दिशा में प्रयासरत थे।

उन्हें हाल में आंध्रप्रदेश उच्च शिक्षा विनियामक व पर्यवेक्षण आयोग का प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। जस्टिस ईश्वरैया ने अपनी नई भूमिका के बारे में नवल किशोर कुमार से चर्चा की।

सर, आपको आंध्र प्रदेश उच्च शिक्षा विनियामक व पर्यवेक्षण आयोग का प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। सबसे पहले मैं इस नियुक्ति के लिए  फारवर्ड प्रेस की ओर से आपको बधाई देना चाहता हूं। आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी?

आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद। आंध्र प्रदेश विधानसभा ने आंध्रप्रदेश उच्च शिक्षा विनियामक व पर्यवेक्षण आयोग विधेयक 2019 पारित किया था और मुझे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के दर्जे के साथ, इस अधिनियम के अंतर्गत गठित आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इस आयोग की शक्तियों और कार्यों में शामिल हैं : सभी केन्द्रीय और राज्य विनियामक संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियमों का पालन सुनिश्चित करना, प्रवेश व परीक्षा प्रक्रिया का विनियमन, उच्च शैक्षणिक संस्थाओें की अधिसंरचनात्मक सुविधाओं, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात, मानकों, शिक्षा की गुणवत्ता आदि पर्यवेक्षण और शुल्क का इस तरह निर्धारण जिससे कोई उच्च शैक्षणिक संस्थान अत्यधिक शुल्क या कैपिटेशन फीस वसूल कर अनुचित मुनाफा न कमा सके। आयोग का एक कार्य शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकना भी है। आंध्र प्रदेश सरकार सभी जातियों के गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों के विद्यार्थियों का शिक्षण शुल्क अदा करती है। सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए सरकार कुछ अन्य कदम भी उठाने जा रही है। इनमें शामिल हैं नामित करके भरे जाने वाले सभी राजनैतिक पदों में एससी-एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यकों को 50 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करना। इस हेतु सरकार जल्दी ही कानून बनाएगी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगमोहन रेड्डी, जोतीराव फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के सपनों को साकार करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं।

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) व्ही. ईश्वरैया

 

आप राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रहे हैं। वर्तमान में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े वर्गों की भागीदारी की स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं? 

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष के रूप में अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि शिक्षा, राजनीति और रोजगार के क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों की विमुक्त जनजातियों की भागीदारी शून्य है और ओबीसी की भागीदारी उनकी आबादी का 50 प्रतिशत भी नहीं है।

आयोग के अध्यक्ष के रूप में आपने यह सिफारिश की थी कि या तो क्रीमी लेयर के मानक का सीमित प्रयोग किया जाए या फिर  चरणबद्ध ढंग से यह व्यवस्था ही समाप्त कर दी जाए। क्या आप बताएंगे कि इस सिफारिश के पीछे आपकी क्या सोच थी?

ओबीसी के लिए शासकीय सेवाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण है। परंतु क्रीमी लेयर के मानक को अनुचित व अन्यायपूर्ण ढंग से लागू करने के कारण वर्तमान में केवल 14 प्रतिशत पदों पर ओबीसी हैं। अपनी रपटों में मैंने सिफारिश की थी कि क्रीमी लेयर सिद्धांत को ऐसे पति-पत्नि के बच्चों के मामले में लागू न किया जाए जो 40 वर्ष की आयु के बाद ग्रुप ए व ग्रुप बी में पदोन्नत हुए हैं, भले ही उनका कुल वार्षिक वेतन 25 लाख रूपएसे ज्यादा हो। 

आज क्रीमी लेयर की नीति जिस ढंग से लागू की जा रही है वह सन् 1993 में प्रस्तुत विशेषज्ञ समिति की रपट, मद्रास व दिल्ली उच्च न्यायालयों के निर्णयों और ओबीसी कल्याण पर संसदीय समिति की रपट में की गई सिफारिशों के विपरीत है. ऐसे बच्चे, जिनके दोनों अभिभावक स्कूल शिक्षक हैं और जिनका कुल वार्षिक वेतन आठ लाख रूपये से ज्यादा है, उन्हें भी क्रीमी लेयर में माना जाता है और वे आरक्षण का लाभ उठाने के लिए पात्र नहीं होते। सच तो यह है कि जो वास्तव में आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, उन्हें आरक्षण नहीं मिल रहा है जबकि धनी लोग जोड़-तोड़ से पात्रता प्रमाणपत्र हासिल कर रहे हैं। ओबीसी के साथ न्याय होना चाहिए। उनके साथ धोखा नहीं होना चाहिए। उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। 


आपकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं?

मेरी योजना यह है कि मैं पिछड़े वर्गों को उनके संवैधानिक अधिकारों व कर्तव्यों के बारे में जागरूक करूं। हमें उपवर्गीकरण के अधीन शिक्षा, रोजगार, राजनीति और राज्य के तीनों अंगों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – में हमारी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। मैं यह भी चाहूंगा कि ऑल इंडिया बैकवर्ड क्लासिस फेडरेशन, जिसकी स्थापना मैंने की है, जमीनी स्तर पर सक्रियता से काम करे। मैं चाहूंगा कि यह ओबीसी की सबसे बड़ी संस्था बने और चरित्र निर्माण करे।

जेएनयू व शांतिनिकेतन में जो कुछ हो रहा है – शुल्क में बढ़ोत्तरी, नए नियम आदि – उसके बारे में आपका क्या विचार है? केन्द्र सरकार ऐसे कदम क्यों उठा रही है और इनका दलित-बहुजन विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्ग निर्देशन में चल रही केंद्र सरकार की यह स्पष्ट नीति है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों का निजीकरण कर कारपोरेट कंपनियों के खजाने भरे जाएं और पिछड़े वर्गों को वापस उसी स्थिति में ढकेल दिया जाए जिसमें वे स्वाधीनता के पहले थे।

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया)


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