व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अविभाज्य पहलू और किन्नरों में भी दलित-अल्पसंख्यक के हाशिए

समलैंगिकों, ट्रांससेक्सुअल और उभयलिंगियों को किन्नर, जोगता, जोगती, शिव-शक्तियां, हिजड़ा, अरावनी, कोठी, नेपुंसक जैसी पहचानों से जाना जाता है। लेकिन यहां भी भारतीयों में एकाधिक हाशिए हैं जहां दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के किन्नर, अलैंगिकों की स्थिति काफी अलग होती है। आईआईएएस शिमला में इस स्थिति पर खास कार्यक्रम का आयोजित किया है। दूसरे शिक्षण संस्थानों में भी कई अहम सेमिनार और सम्मेलन हो रहे हैं

महिला लेखन का मौजूदा दौर

पश्चिम बंगाल का मीदनापुर कॉलेज (स्वायत्त) राष्ट्रीय संगोष्ठियों के जरिए अपनी फैकल्टी और छात्रों को लगातार अपडेट करने में लगा रहता है और इसके लिए  कॉलेज की राज्य में खासी प्रतिष्ठा भी है। इस कड़ी में कॉलेज के हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली और संस्कृत विभाग ने 26-27 फरवरी को 21वीं सदी के परिप्रेक्ष्य में भारतीय महिला लेखन की मौजूदा और हाल की प्रवृतियों को समझने के लिए बडा सेमिनार आयोजित किया है।

देखा जाए तो महिला लेखन की तीन श्रेणियां हैं। एक, जो महिलाओं के वृहत्तर समाज के आसपास का लेखन है, दूसरी स्त्रीवादी लेखन और तीसरा जिसे महिला लेखिकाएं लिखती हैं। आयोजक मानते हैं कि यह कहना मुश्किल है कि पुरुष जो महिलाओँ के बारे में लिखते हैं वह महिलाओं के संसार से जुड़े भ्रमों को फैलाते हैं और महिलाएं जब लिखती हैं तो इनको समेट कर एक तरह से निराकरण देती हैं। दरअसल, हिंदी में आचार्य हजारी प्रसाद दिवेद्धी महिला लेखन को इसी अवधारणा के साथ नजदीकी से देखते थे। लेकिन आज के महिला लेखन में यह सब अदल-बदल गई है। इस संगोष्ठी के लिए दोनों तरह के लेखन से संबंधित आलेख और शोधपत्र लिखे जा सकते हैं।

विषय को लेकर अपना आलेख या शोधपत्र का सार 20 जनवरी 2020 तक भेजना चाहिए जबकि पूर्ण आलेख-शोधपत्र भेजने की अंतिम तिथि 18 फरवरी 2020 है। सार या पूर्ण आलेख litsemidcol@gmail.com पर भेजा जा सकता है। इस आयोजन में चारों विभागों की ओर से एसोसिएट प्रोफेसरों को संयोजन में रखा गया है। इनके मोबाइल नंबर हैं- 9434354724 (डॉ. एस. जाना), 9800045250 (डॉ. गिरधर पांडा), 9434392782 (डॉ. सैकत सरकार) और 9434153501 (डॉ. रंजीत सिन्हा)। सेमिनार कॉलेज स्थित विवेकानंद हॉल में होगा।

व्याख्या का विज्ञान

स्वामी केशवानंद प्रौद्योगिकी संस्थान, प्रबंधन और ग्रामोत्थान जगतपुरा, जयपुर के अंग्रेजी विभाग ने व्याख्या विज्ञान पर आज के हालात और साहित्य और भाषाओं में संस्कृतियों के पारम्परिक दृष्टिकोण को समझने के लिए 24-25 जनवरी, 2020 को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है। 

संगोष्ठी के उपविषय हैं- पारंपरिक हेर्मेनेयुटिक्स बनाम संदेह के हेर्मेनेयुटिक्स, पारंपरिक दृष्टिकोण के प्रभाव और सीमाएं, नए दृष्टिकोण की संभावनाएं और सीमाएं, धर्म और आध्यात्मिकता, वर्तमान परिदृश्य में पौराणिक कथाओं की प्रासंगिकता, वर्तमान परिदृश्य में लोक कथाओं की प्रासंगिकता, पवित्रता की व्याख्या। ग्रंथों, दार्शनिक ग्रंथों और ज्ञान साहित्य और वर्तमान परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता पर विमर्श, अनुवाद- अध्ययन और अभ्यास, एक शैक्षणिक पद्धति के रूप में अंतःविषय दृष्टिकोण की व्यवहार्यता, भाषा, संचार और साहित्य अध्ययन कितना सीमित, मौखिक और अशाब्दिक संचार, क्षेत्रीय भाषा बनाम अंग्रेजी भाषा शिक्षण के माध्यम के रूप में, व्याकरण: आधुनिक भाषा में इसकी भूमिका और प्रयोग।

संगोष्ठी की संयोजक डॉ. अनुप्रिया सिंह हैं। अन्य संयोजकों में कृष्ण दयाल शर्मा, प्रो (डॉ) नेहा पुरोहित, ललित गहलोत, डॉ. मुकुल शर्मा, डॉ. आई. बी. अबरोल, डॉ. निधि शर्मा, डॉ. शिखा अग्रवाल, गीतिका पाटनी, शीबा अंजुम हैं। अधिक जानकारी के लिए अनुप्रिया सिंह- 9983075000, डॉ. नेहा पुरोहित- 9549077755, प्रो. कृष्णा शर्मा 9414320800 (http://www.skit.ac.in) को संपर्क किया जा सकता है। लैंडलाइन फोन नंबर 0141-2752165/ 67 हैं जबकि फैक्स है- 0141-2759555। ईमेल एड्रेस- englishconference@skit.ac.in है।

किन्नरों का एक विरोध प्रदर्शन

भारत का ज्ञान भंडार

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर, नई दिल्ली) और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस) शिमला ने आगामी 13 से 15 मार्च 2020 को “रिइग्जामिन इंडोलॉजी: रेट्रोस्पेक्ट और प्रॉस्पेक्ट ओवरव्यू” विषयक 3 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है।

कार्यक्रम के अवधारणा नोट में कहा गया है कि प्रत्येक सभ्यता में अपने अतीत को याद करने और उसकी व्याख्या करने के लिए एक अंतर्निर्मित तंत्र है जो उसके इतिहास और संस्कृति का भंडार है। इससे परंपराओं के आधार पर निरंतरता का एहसास होता है। 18वीं शताब्दी में भारत के औपनिवेशिक के रूप में उभरने से बहुत पहले भारत में स्व-स्मरण, आत्म-पहचान और आत्म-प्रतिनिधित्व की अपनी बौद्धिक परंपराएं थीं। इन परंपराओं को आधारभूत ग्रंथों के साथ निरूपित किया गया था, जो कि खगोल विज्ञान और व्याकरण तक, परम वास्तविकता की प्रकृति और मानव जीवन के लगभग सभी पहलुओं के लिए उपयुक्त ज्ञान प्रणाली विकसित करने से संबंधित थी।

संगोष्ठी के उद्देश्य को लेकर संस्थान ने कहा है कि इसके जरिए भारतीय ज्ञान भंडार के अनुसंधान के समकालीन मूल्य/ प्रासंगिकता पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा इंडोलॉजी में कुछ प्रमुख बहसों को आगे बढ़ाने का काम किया जायेगा। इंडोलॉजी की अंतर-अनुशासनात्मक क्षमता पर जोर दिया जायेगा। जिन मुद्दों पर चर्चा होनी है उनमें भारतीय ज्ञान का पूर्व-संकेतात्मक विनियोग, भारतीय गणित्ता (गणित), आयुर्वेद (चिकित्सा), दर्शनशास्त्र और विज्ञान की प्रासंगिकता व राज्य की भारतीय अवधारणा को समझना है। सेमिनार के लिए सीमित संख्या में प्रतिभागियों को आमंत्रित किया जाएगा।

आयोजन संबंधी ज्यादा जानकारी के लिए प्रोफेसर शरद देशपांडे, पूर्व प्रोफेसर और प्रमुख, दर्शनशास्त्र विभाग, पुणे, ईमेल : sharad.unipune@gmail.com, प्रोफेसर सी. के. राजू, टैगोर फेलो, आईआईएएस शिमला, ईमेल : ckr@ckraju.net पर संपर्क करें। साथ ही रितिका शर्मा, शैक्षणिक संसाधन अधिकारी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला को भी सूचित करें। फोन नंबर है: 0177-2831385 ईमेल : aro@iias.ac.in। आलेख का सार जमा करने की अंतिम तिथि 13 जनवरी, 2020 है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस)

समलैंगिकों की जटिलताएं

भारत में समलैंगिकों को हाशिए से निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को छोड़ दें तो बहुत कोशिश नहीं होती दिख रही है। इस समाज की मौजूदा स्थितियों के सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और कानूनी चिंताओं को लेकर 20-22 अप्रैल, 2020 भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला ने 2 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। इसके संयोजन का दायित्व कौस्तव चक्रवर्ती, अंग्रेजी विभाग, साउथफील्ड (लोरेटो) कॉलेज, दार्जिलिंग को दिया गया है।

कार्यक्रम की रूपरेखा में कहा गया है कि भारत के समलैंगिक नागरिकों ने 6 सितंबर 2018 को एक ऐतिहासिक क्षण देखा, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पांच-न्यायाधीशों वाले पैनल ने घोषणा की कि किसी भी सामान्य रिश्ते के लिए समलैंगिकता का अपराधीकरण, जैसा कि भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “अतार्किक और मनमाना है”। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए. एम. खान विलकर दोनों ने माना कि “यौन स्वायत्तता” को “महत्वपूर्ण स्तंभ” के रूप में “व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अविभाज्य पहलू” हैं। “इतिहास इस समुदाय और उनके परिवारों के सदस्यों से देरी के लिए माफी चाहता है।… इस समुदाय के सदस्यों को प्रतिशोध और उत्पीड़न के डर से भरा जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया था।” न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा ने कहा कि यह बहुमत की अज्ञानता के कारण था। कामुकता मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा है।

उपविषय- समलैंगिक समुदाय पर डिक्रिमिनलाइजेशन का प्रभाव, भारतीय समलैंगिक की आकांक्षाएं- वर्तमान और ऐतिहासिक सैद्धांतिक बहसों का पुनर्वालोकन, भारतीय समलैंगिकों की रोजमर्रा की जटिलताओं को दर्शाते अनुभवजन्य कार्य। ऐतिहासिक समावेशन के उदाहरण; साहित्यिक और लोक अभ्यावेदन; कला, वास्तुकला और सिनेमा के विभिन्न रूपों में चित्रण, भारत में समलैंगिकों, ट्रांससेक्सुअल और उभयलिंगियों के सामने आने वाली समस्याएं; ‘किन्नर’, ‘जोगता’, ‘जोगती’, ‘शिव-शक्तियां’, ‘हिजड़ा’, ‘अरावनी’, ‘कोठी’, ‘नपुंसक’ जैसी पहचानों वाले भारतीयों की पश्चिमी श्रेणियों से तुलनाएं। एकाधिक हाशिए:  दलित, अल्पसंख्यक समुदायों के किन्नर, अलैंगिक व्यक्तिों की स्थिति आदि।होमोफोबिया के उन्मूलन में सरकार और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका, आदि।

अधिक जानकारी के लिए डॉ. कौस्तव, दार्जिलिंग से ईमेल एड्रेस kaustavchakraborty2011@gmail.com पर संपर्क करें साथ ही इसकी जानकारी रितिका शर्मा, शैक्षणिक संसाधन अधिकारी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला- 171005 को भी दें। फोन नंबर है- 0177-2831385. ईमेल एड्रेस है: aro@iias.ac.in। 

 गांधी की प्रासंगिकता

‘‘21वीं सदी के भारत में गाँधी-चिंतन की प्रासंगिकता’’ विषय पर 17-18 जनवरी 2020 को लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय ने दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। आयोजन में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के सहयोग करेगा। इस बारे में शोधार्थियों से 8 जनवरी 2020 तक शोधपत्र का सार संक्षेप मंगाया गया है जिसके बारे में स्वीकृति की सूचना 15 जनवरी 2020 को दे दी जाएगी।

संगोष्ठी के उपविषय हैं- शिक्षा में भारतीयता और गाँधी, पर्यावरण विमर्श और गाँधी, गाँधी के सपनों का स्वराज, सामाजिक समरसता और गाँधी, गाँधी की पत्रकारिता और आज का मीडिया, गाँधी का सांस्कृतिक चिंतन और भारतबोध, भाषा विमर्श और गाँधी, वैश्वीकरण और गाँधी के आर्थिक चिंतन की प्रासंगिकता, आदि। शोधपत्र अधिक से अधिक 3500 शब्दों का होना चाहिए।

संगोष्ठी के संरक्षक अतुल कोठारी हैं जो शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव हैं। सह-संयोजक न्यास के ही राजेश्वर कुमार हैं। संगोष्ठी के संपर्क सूत्रः डॉ. राहुल चिमुरकर हैं जिनका संपर्क नंबर 9711967397, 7827666712 है। इसके अलावा लक्ष्मीबाई कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के संयोजक डॉ. प्रत्यूष वत्सला, प्रमिला को 9968994324 पर संपर्क किया जा सकता है। शोधपत्र lakshmibai.shodhseminar@gmail.com में भेजे जाने चाहिए। यह पूरा आयोजन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में किया जा रहा है।

 

फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply