इन कारणों से करें आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध, युवा दलित-बहुजन विचारक का आह्वान

आरक्षण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला लोकतंत्र विरोधी है। लोकतंत्र में कोर्ट सुप्रीम नहीं होता, जनता सुप्रीम होती है। जनता का फैसला कोर्ट को मानना ही होगा। देश संविधान से चलेगा न कि मनुवादी कोर्ट से। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जनता नहीं मानेगी

[उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे लक्ष्मण यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में हिंदी के अध्यापक हैं। इनकी छवि एक सक्रिय युवा सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक की रही है। खासकर दलित-बहुजन सवालों को लेकर ये हमेशा मुखर रहे हैं। प्रस्तुत आलेख उनके द्वारा 10 फरवरी, 2020 को एक यूट्यूब चैनल ‘बहुजन टीवी’ पर दलित-बहुजनों के हक-हकूक से संबंधित दिए गए संबोधन का संपादित स्वरूप है। उनके मुताबिक, आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लोकतंत्र की मूल भावना को खारिज करने वाला है। वे यह भी मानते हैं कि दलित-बहुजन अपने उपर हो रहे इस हमले से बेखबर रहे, इसके लिए राष्ट्रवाद के सवाल खड़े किए जा रहे हैं] 

दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और महिलाओं के हक़-हुक़ूक़ पर सबसे बड़ा हमला 

  • लक्ष्मण यादव

सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहा जाना कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है, अत्यंत ही निंदनीय है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह अधिकार हमें संविधान से मिला है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साबित कर दिया कि सत्तासीन दल संविधान से नहीं बल्कि मनु के विधान से सरकार चला रहे हैं, जिसके मुताबिक वे हमें हिन्दू नहीं शूद्र मानते हैं। हम एकलव्य और शंबूक के वंशज हैं। वे मानते हैं कि हम शूद्र पैर से पैदा हुए लोग हैं। आज़ादी के सात दशक बाद भी यह वर्णाश्रम व्यवस्था कायम है। हमारे पुरखे खप गए, तब जाकर हमें आरक्षण मिला। दूसरी ओर आरक्षण विरोधियों ने साबित कर दिया कि ये माफीवीर सावरकर, गोडसे और आरएसएस के वंशज हैं, जिनकी जिंदगी अंग्रेजों की दलाली करते बीती। मूल बात यह है कि इनके जेहन में सिर्फ मनुस्मृति बसती है, लेकिन हमारे ज़ेहन में संविधान बसता है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मूलतः संविधान विरोधी संगठन है। पिछले 90 वर्षों से लगातार यह इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं। इनके काम करने के तरीके व इनकी बुनियादी विचारधारा को समझना बेहद जरूरी है। ये “एकात्म मानववाद” की विचारधारा पर चलते हैं, जिसकी मूल मान्यता है “देश एक शरीर की तरह है, शरीर के हर अंग का काम बंटा हुआ है। हाथ का काम हाथ करे, पैर का काम पैर करे, दिमाग का काम दिमाग करे।” अर्थात् जिस प्रकार सनातनी वर्ण-व्यवस्था में जातियों का काम विभाजित है, ठीक उसी के अनुसार आधुनिक राष्ट्र भी काम करे। इनके ग्रंथ कहते हैं- ब्राह्मण मुख से पैदा हुए हैं, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघे से और शूद्र पैर से। पूरी दुनिया यह पढ़कर हंसती होगी कि दुनिया में एक ऐसा देश भी है जहां लोग मुख से पैदा होते हैं। 

संघी विचारधारा के लोग चाहते हैं कि वर्णाश्रम व्यवस्था पुनः स्थापित हो जाए। आज़ाद भारत के राष्ट्र बनने की प्रक्रिया संविधान बनने से शुरू हुई, जिसके मूल में समानता व न्याय है। यही इनकी असली दिक्कत है, जिसे वे आज तक छोड़ नहीं पाए हैं। संविधान के अनुसार जाति और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को शिक्षा और रोज़गार में उनकी संख्या के अनुसार आरक्षण मिलेगा। आजादी के समय इनमें से 1 फीसदी लोग भी शासन-प्रशासन में हिस्सेदार नहीं रहे । बाबासाहेब ने प्रावधान किया कि ओबीसी की कुछ जातियां हैं, जो शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़ी हुई हैं, इनके लिए भी आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। जिसके चलते काका कालेलकर कमीशन और फिर मंडल कमीशन बना।

2 अप्रैल, 2018 को भारत बंद की तस्वीर

संविधान आधुनिक भारत की बुनियाद है। संविधान कोई एकात्म मानववाद की विचारधारा पर आधारित नहीं है, न ही किसी गोडसे और गोलवलकर की सोच से तय होता है। संविधान इस मुल्क को चलाने का मुकम्मल दस्तावेज है। यही कारण है कि इनके हिन्दू राष्ट्र बनाने का स्वप्न पूरा नहीं हो पा रहा है। संविधान इनके लिए बाधा पैदा करता है। दलित, पिछड़े और आदिवासी, जो कल तक पैर से पैदा होकर पैर पर ही पड़े रहते थे, वे आज इनसे आंख में आंख डाल कर सवाल कर रहे हैं। बहुजन संसद में जा रहे हैं, ब्यूरोक्रेसी में जा रहे हैं, प्रोफेसर बन रहे हैं, मीडिया में जा रहे हैं, आरक्षण के चलते जितना उनका स्पेस बन पा रहा है, वे उतनी हिस्सेदारी ले पा रहे हैं। सामाजिक न्याय का बुनियादी विचार है कि संसाधनों पर सबका हिस्सा होना चाहिए। “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी,” यह इनका प्रमुख सवाल है। बाबू जगदेव प्रसाद कहते थे कि–

    सौ में नब्बे शोषित हैं
    शोषितों ने ललकारा है,
    धन, धरती और राजपाट में
    नब्बे भाग हमारा है। 

आज बहुजन अपनी आइडेन्टिटी को री-क्लेम कर रहे हैं। धन, धरती और राजपाट में अपनी हिस्सेदारी की पुरजोर मांग कर रहे हैं। धन यानी सम्पत्ति और धरती यानी जमीन का रि-डिस्ट्रीब्यूशन होना चाहिए। इन सवालों का जवाब आरएसएस के पास नहीं है। ये सवाल आरएसएस को भीतर से खोखला कर रहे हैं। बहुजनों में यह आत्मविश्वास बहुजन नायकों और बाबासाहेब के कारण ही आया है।

वे हमें इसलिए रोकना चाहते हैं, क्योंकि हम राजनीति में अपनी दावेदारी दर्ज करा रहे हैं। हर उस जगह, जहां हमारी पहुंच हो रही है, अपनी दावेदारी दर्ज करा रहे हैं। सीधे इन सवालों से टकराने की बजाय संघी बार-बार कोर्ट को सामने खड़ा कर रहे हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट इस देश के संचालन का अहम तंत्र है, तो यह तय करना होगा कि 85 प्रतिशत बहुजन जिसमें दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाएं हैं, निर्णय लेने वाले पदों पर कहां हैं? दूसरी बात, अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही था तो सबरीमाला के संदर्भ में उसके फैसले का विरोध भाजपा और आरएसएस क्यों कर रही थी? जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति एक्ट को कमजोर किया तो पूरे देश में आंदोलन हुआ, भारत बंद हुआ था। इसके बाद सरकार नया संशोधन विधेयक लेकर आई और पूर्व की स्थिति को बहाल किया गया। इसी प्रकार जब विश्वविद्यालयों में विभागवार (13 प्वाइंट) रोस्टर कोर्ट के ज़रिए आया था, तब भी पूरे देश में आंदोलन हुआ। सरकार को झूकना पड़ा  और संसद ने अध्यादेश के ज़रिए पुनः 200 प्वाइंट रोस्टर लागू हुआ।

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इस बार आरक्षण पर हमला कोर्ट के जरिए किया जा रहा है। यह संविधान की मूल भावना पर अब तक का सबसे बड़ा हमला है। संविधान ने हमें हक दिया है कि आरक्षण हमारा मौलिक अधिकार है। इसकी अवहेलना करने वाले को सजा देने का प्रावधान भी है। आज दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं को रोककर उनपर सवर्णों को नौकरियां दी जा रही। जिनको नियुक्ति का लेटर मिल गया है, उनकी नियुक्तियां नहीं की जा रही है। इनके हिस्सेदारी को निरंतर कम किया जा रहा है। 

देश भर में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से प्रोफेसरों तक सभी सीटों पर यही हालात हैं। 496 कुलपतियों में से 6 एससी, 6 एसटी और 36 ओबीसी हैं। यह 2018 का आंकड़ा है। जिस ओबीसी की आबादी 54 फीसदी है उनकी हिस्सेदारी सभी विश्वविद्यालयों में अधिकतम 12 फीसदी हैं। दलितों का 6 फीसदी से कम जबकि आदिवासियों का 2 से 3 फीसदी हैं। अभी भी पूरी हिस्सेदारी तय नहीं हुई और वे कहते हैं कि आरक्षण तुम्हारा मौलिक अधिकार नहीं है। ये आरएसएस के एजेंडे को ही तवज़्ज़ो दे रहे हैं। यह देश आज अपर कास्ट- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मिलकरचला रहे हैं। इसलिए ऐसी बहसें हो रही हैं। 

इन हालातों में बहुजन समाज को एक बात क़ायदे से समझनी होगी। असम में एनआरसी से इसी वर्ग के  लोगों को ही छांटा गया है। सीएए, एनपीआर और एनआरसी के लिए उन्हें आगे खड़ा किया जा रहा है। दरअसल ऐसे फ़ैसले बहुजन सवालों को पीछे धकेलने के लिए लाए जाते हैं। आज बहुजनों को जागना होगा। उन्हें अपने आप से सवाल करना होगा, राममंदिर बनाने के लिए दंगे में उन्हें हिन्दू कहकर आगे किया जाएगा, लेकिन मंदिर बन जायेगा तो पुजारी कौन होगा? विश्वविद्यालय में प्रोफेसर कौन होगा? सुप्रीम कोर्ट में जज कौन होगा? ब्यूरोक्रेसी में रिजर्वेशन के खत्म होने से वे कहां जाएंगे? आज ओबीसी से आए हुए लोगों को ब्यूरोक्रेसी में ज्वाइन तक नहीं होने दिया जा रहा है। वे अपने नियुक्ति पत्र लिए मारे-मारे फिर रहे हैं।

आज गांव में भैंस चोरी वाली कहावत को चरितार्थ किया जा रहा है। रात को जब चोर भैंस चोरी करने आते हैं, तो उनमें से एक भैंस की बंधी घंटी लेकर एक तरफ भागता है तो दूसरा भैंस को लेकर दूसरी तरफ भागता है। गांव वाले अंधेरे में घंटी की आवाज़ के पीछे दौड़ते हैं और भैंस चोर भैस लेकर भाग जाते हैं। आज ये शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, जनता के पैसे से खड़े किये गये सभी संस्थानों रूपी भैंस को लेकर भाग रहे हैं, अडाणी और अम्बानी को सौंप रहे हैं और आपको भैंस की घंटी के पीछे भगा रहे हैं। साझी शहादत, साझी विरासत, हिन्दू-मुस्लिम एकता सबमें पलीता लगा रहे हैं। आपको सिखा रहे हैं कि तुम मंदिर की लड़ाई लड़ो, सीएए और एनआरसी के पक्ष में लड़ाई लड़ो, तुम मुस्लिमों के खिलाफ खड़े हो जाओ। जबकि वे आपके हक़ हुक़ूक़ और संसाधन आपके हाथ से लगातार छीनते जा रहे हैं।

दरअसल, आरक्षण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला लोकतंत्र विरोधी है। लोकतंत्र में कोर्ट सुप्रीम नहीं होता, जनता सुप्रीम होती है। जनता का फैसला कोर्ट को मानना ही होगा। देश संविधान से चलेगा न कि मनुवादी कोर्ट से। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जनता नहीं मानेगी। हमारे पुरखों ने बड़े संघर्षों से वंचितों-शोषितों को उनका अधिकार दिया है। ये तुम्हारे आगे नहीं झुकेंगे। नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ कैम्पसों से लेकर तमाम शाहीनबागों में जो लड़ाई चल रही है, हम उस लड़ाई को सामाजिक न्याय से जोड़ेंगे और शिक्षा और रोज़गार पाने की लड़ाई तक ले जाएंगे। 

जिसकी जितनी, संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी। हम आरक्षण के सवाल पर एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे और न ही एक भी व्यक्ति को सीएए, एनपीआर और एनआरसी से बाहर जाने देंगे। हम कागज भी नहीं दिखायेंगे। सबको शिक्षा, स्वास्थ्य व रोज़गार और धन-धरती (जमीन और सम्पत्ति) का समान वितरण, जाति जनगणना आदि ये सब हमारे असली सवाल हैं। देश को सरकार अडाणी-अंबानी को बेच रही है। तमाम सार्वजनिक निकायों का  निजीकरण किया जा रहा है। ये वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने कहा था कि “सौगंध मेरी इस मिट्टी की, मैं देश नहीं बिकने दूंगा” और ये कर क्या रहे हैं? यह ठीक वैसे ही है जैसे एक कार मालिक ने पहिया बेच दिया, सीट बेच दिया, इंजन बेच दिया, हैंडिल बेच दिया और कार के सामने खड़ा होकर कह रहा है कि मैं कार नहीं बिकने दूंगा। आज देश के चौकीदार ने बीएसएनएल, एमटीएनएल, एयर इंडिया, रेलवे बेच दिया, यूनिवर्सिटी और लाल किला बेच दिया और अब एलआईसी बेचने जा रहा है। उलटे कहा यह जा रहा है कि मैं देश नहीं बिकने दूंगा। यह अब नहीं चलेगा। हम अब निजीकरण  के खिलाफ भी लड़ेंगे और सोशल जस्टिस के लिए भी लड़ेंगे। अगर आरक्षण पर कोई आंच भी आया तो उसके खिलाफ भी लड़ेंगे। हम हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ सेकुलर, डेमोक्रेटिक देश और संविधान को बचाने के लिए संविधान की प्रतियां और तिरंगा हाथ में लेकर सारी लड़ाइयों को एक करेंगे। छात्र, बेरोज़गार, किसान, मजदूर सभी को एकजुट करेंगे। हम आरएसएस के नफरत की एजेंडे- एंटी सोशल जस्टिस, एंटी सेकुलर, एंटी कॉन्स्टिट्यूशन एजेंडे को पूरे देश में नहीं चलने देंगे।

मेरे हिसाब से बहुजन समाज की मूलभूत समस्याएं हैं – सवर्ण मीडिया, अशिक्षा व बेरोज़गारी। मीडिया में पूरी तरह से सवर्णों का बोलबाला है। लोकतंत्र में मीडिया का धर्म है कि जनता के सवालों को सत्ता तक पहुंचाना, ताकि सत्ता उनके हित में फैसले करें, उनके हक-हकूक को सुरक्षित करें। मगर मीडिया अपने दायित्वों को भूल गयी है और ठीक इसके उलट काम कर रही है। आज पत्रकार सरकार के भोंपू बने हुए हैं। उनका [सरकार समर्थक] बस एक काम है – जनता की आवाज को दबाओ और आरएसएस की आवाज जनता तक पहुंचाओ। बहुसंख्यक जनता शिक्षित नहीं हो पाई है, ये हमारे लिए सबसे बड़ी दिक्कत की बात है। संविधान आखिरी व्यक्ति तक पहुंच नहीं पाया है, इसलिए वह अपने हक-हकूक के लिए जागरूक नहीं हो सका है। यही कारण है कि धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वालों को हमें अधिकारों से वंचित करने में आसानी हो जाती है। आज बहुसंख्यक बहुजन जनता गांव में हिन्दू बनी फिरती है। उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्हें इससे क्या मिलने वाला है। दलित घोड़ी पर चढ़ा तो मार खाया और मूंछ रखा तो मारा गया, जब आदिवासी जल, जंगल और जमीन में हिस्सेदारी की बात किया तो घर से बाहर निकाला गया। पिछड़े तबक़े के लोग मंदिर बनाने के लिए यहां से वहां मारे-मारे फिर रहे हैं। उनकी सीटें नहीं आ रही हैं, नौकरी उनसे छीन ली गयी। निजीकरण के चलते भविष्य में शिक्षा उनको मिलेगी नहीं! बहुजन समाज से मेरी एक अपील है कि बहुजन समाज मुख्य धारा की  मीडिया के भरोसे नहीं रहना चाहिए। आरएसएस के प्रोपेगेंडा पर भरोसा नहीं करनी चाहिए। अपने बच्चों को पढ़ाई और लड़ाई की तालीम दें। वह शिक्षा और रोजगार के सवाल को, किसान, मजदूर और महंगाई के सवाल को लेकर सजग हों। अपने पुरखों सावित्रीबाई फुले, जोतीराव फुले, फ़ातिमा शेख, पेरियार, बाबासाहेब आंबेडकर को पढ़ें। जिन्होंने हमारे अधिकारों के लिए अपने पूरे जीवन को खपा दिया। एक झटके में हम इस अधिकार को नहीं जाने देंगे।

मेरा भरोसा है कि बहुजन समाज के लोग आरएसएस के एजेंडे को नहीं मानेगी और सारे दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाएं एक सुर में सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ खड़ी होगी। इनके मंदिर-मस्जिद के सियासत में नहीं फंसेंगे। मुझे अपने आवाम पर पूरा भरोसा है।

(संपादन : नवल/इमानुद्दीन)

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