बिहार में प्रभावी होने लगे फुले-आंबेडकर के विचार

अभी हाल ही में बेगूसराय में गिरिराज सिंह द्वारा डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद प्रतिमा को राजद और सीपीआई के कार्यकर्ताओं ने तथाकथित तौर पर पवित्र किया। इस मौके पर आंबेडकर और फुले के नाम के नारे लगाए गए। नवल किशोर कुमार बता रहे हैं कि बिहार में फुले और आंबेडकर की वैचारिकी कैसे प्रासंगिक बनती जा रही है

बीते 15 फरवरी, 2020 को बिहार के बेगूसराय जिले में एक घटना घटी। ऊंची जातियों के लोगों की दबंगई की वजह से चर्चा में रहने वाले बेगूसराय में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा को “गंगाजल” से धोया गया। यह एक प्रतिकार के जैसा था जिसे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के कार्यकर्ताओं ने मिलकर अंजाम दिया। सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे फेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप आदि पर इसका एक वीडियो वायरल हुआ। ऐसे ही एक वीडियो जिसे ताज बाबू नामक यूजर ने फेसबुक पर शेयर किया है, जिसके मुताबिक डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को धोने की वजह यह रही कि एक दिन पहले यानी 14 फरवरी को केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के समर्थन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था। वीडियो में वे कहते दिख रहे हैं कि गिरिराज सिंह आये दिन आंबेडकर के द्वारा बनाए गए संविधान का अपमान करते हैं। इसलिए उनके द्वारा माल्यार्पण किए जाने से प्रतिमा अपवित्र हो गई। खास बात यह रही कि जब वे प्रतिमा को तथाकथित तौर पर गंगाजल से धोकर पवित्र रहे थे तब वे जय भीम और जय जोती का नारा लगा रहे थे। 

गौरतलब है कि फुले और आंबेडकर की वैचारिकी गंगाजल के जरिए शुद्धिकरण को सिरे से खारिज करता है। परंतु, इसे बिहार के लिहाज से देखें तो यह अपनेआप में एक नई परिघटना है। वजह यह कि बिहार में अबतक किसी दलित-बहुजन के मंदिर में प्रवेश किए जाने के बाद द्विज अपने देवताओं को गंगाजल से तथाकथित रूप से पवित्र करते आए हैं। बेगूसराय में हुई उपरोक्त घटना आज तक के प्रवृति के विपरीत एक नई उदहारण के रूप में सामने आई है। एक तरह से यह घटना इतिहास उलटने के जैसा है जब ऊंची जातियों के दबदबे वाले बेगूसराय में दलित-बहुजनों ने एक ऊंची जाति के व्यक्ति के द्वारा माल्यार्पण किए जाने के बाद आंबेडकर की प्रतिमा को धोया। 

करीब 6 वर्ष पहले सितंबर, 2014 को एक और घटना हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को मधुबनी में द्विजों ने अपमानित किया था। मांझी एक मंदिर में गए थे और उनके साथ उनके कबीना सहयोगी नीतीश मिश्र भी थे। उनके जाने के बाद मंदिर में स्थापित देवता और पूरे मंदिर को गंगाजल से पवित्र किया गया था। मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के साथ ऐसी घटना को अंजाम देना, भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत मानसिकता की एक छोटी सी झलकी मात्र है। 

बेगूसराय में आंबेडकर की प्रतिमा को गंगाजल से धोते राजद व सीपीआई के कार्यकर्ता

इन दोनों परिस्थितियों में बदलाव दरअसल फुले और आंबेडकर के विचारों के बढ़ते प्रभाव का नतीजा है। मुझे वह 28 नवंबर, 1992 का दिन याद आता है, जब मैंने पहली बार जोतीराव फुले के बारे में सुना था। तब मेरी उम्र 9 वर्ष थी। तब मैं बिहार की राजधानी पटना के एक प्राइवेट स्कूल का छात्र था। मेरा स्कूल था नक्षत्र मालाकार उच्च विद्यालय जिसके प्रधानाचार्य अरविंद प्रसाद मालाकार थे। उस दिन पटना के दारोगा प्रसाद राय पथ में माली कल्याण समिति के द्वारा जोतीराव फुले की आवक्ष प्रतिमा का अनावरण तत्कालीन  मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने किया था। इस मौके पर मुझे मेरे सहपाठियों के साथ जोतीराव फुले को समर्पित तीन गीतों को गाने के लिए ले जाया गया था। यह पहला अवसर था जब मेरे कानों में जोतीराव फुले का नाम और उनके विचार पड़े।

बिहार की राजधानी पटना के दारोगा प्रसाद राय पथ में स्थापित जोतीराव फुले की आवक्ष प्रतिमा

इस घटना को करीब 28 वर्ष बाद याद करने का उद्देश्य यह है कि आज बिहार सहित पूरे उत्तर भारत में जोतीराव फुले व सावित्रीबाई फुले अपरिचित नहीं रह गए हैं। बिहार में इनके विचारों की प्रासंगिकता इतनी बढ़ गई है कि कई पार्टियां इनकी जयंती व पुण्यतिथि के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। इसके अलावा राजनीतिक मंचों पर प्रतीक के रूप में इनकी तस्वीरें शामिल होती हैं।

बिहार के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार करें तो यह एक अहम बदलाव है। जिस कार्यक्रम में जोतीराव फुले से मेरा प्रथम परिचय हुआ था, वह माली कल्याण समिति के द्वारा आयोजित था। यानी उन दिनों बिहार में फुले को याद करने वाले केवल एक जाति के थे। लेकिन बाद के दिनों में बिहार में राजनीतिक नेतृत्व पिछड़े वर्ग के हाथ में रहने के कारण परिस्थितियां बदलीं। एक बड़ा बदलाव यह कि बिहार में फुले अब केवल एक जाति के नायक नहीं रह गए हैं। पिछड़ा वर्ग उन्हें अपना महानायक मानने लगा है जबकि दलितों के बीच वे बहुजन एकता के प्रेरणास्रोत हैं।

हालांकि इसके पीछे सत्ता की राजनीति भी है। बिहार में पिछड़े वर्गों के नेता के रूप में जगदेव प्रसाद के अलावा रामलखन सिंह यादव, दारोगा प्रसाद राय, बी.पी. मंडल, कर्पूरी ठाकुर मुख्य तौर पर याद किए जाते हैं। वर्तमान में लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा हैं। परंतु, इन तीनों नेताओं की अपनी-अपनी जाति है और कहना गैरवाजिब नहीं कि इनकी जातियां ही इनके आधार वोटर भी हैं।

जोतीराव फुले की जयंती के मौके पर एक कार्यक्रम के दौरान उपेंद्र कुशवाहा

बिहार में फुले की प्रासंगिकता बढ़ने की एक वजह यह भी है कि इन्हें पिछड़े वर्ग का महानायक माना जाने लगा है। हालांकि इनके नाम का सबसे अधिक इस्तेमाल उपेंद्र कुशवाहा ने किया है। इसके जरिए वह कुशवाहा जाति के लोगों को एकजुट करने में कामयाब भी हुए हैं। वहीं राजद भी अपने खेमे को केवल यादव और मुस्लिम तक सीमित नहीं रखना चाहता है। अति पिछड़ी और अत्यंत पिछड़ी जातियों के अलावा दलित जातियों के लोगों को अपने पक्ष में गोलबंद करने के लिए राजद के नेता फुले और आंबेडकर का उपयोग कर रहे हैं।

बिहार के युवा साहित्यकार अरूण नारायण बताते हैं कि सूबे में फुले और आंबेडकर के विचार प्रासंगिक हुए हैं। राजनीतिक दलों द्वारा केवल इनका उपयोग किया जा रहा है। सच्चाई यह है कि अभी भी फुले-आंबेडकर के विचारों को लोगों तक पहुंचने ही नहीं दिया जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक पार्टियां ईमानदारी से इन दोनों महापुरूषों के विचारों का अनुसरण करें। 

सावित्रीबाई फुले की जयंती पर राजद नेता तेजस्वी यादव द्वारा ट्विटर पर जारी संदेश

वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के पूर्व विधायक एन. के. नंदा बताते हैं कि बिहार में जोतीराव फुले के विचारों को फैलाने में जगदेव प्रसाद की बड़ी भूमिका थी। वे कार्यक्रमों में संबोधन के दौरान लोगों को जोतीराव फुले के बारे में बताते और उनके मार्ग पर चलने का आह्वान करते थे। जगदेव प्रसाद की 1974 में हत्या के बाद शोषित समाज दल ने एक कैलेंडर निकाला था। इस कैलेंडर में जोतीराव फुले के अलावा डॉ. आंबेडकर, पेरियार और बुद्ध की तस्वीरें थीं। नंदा बताते हैं कि बाद के दिनों में जोतीराव फुले को लेकर लोगों की जानकारी बढ़ी। लेकिन अभी भी यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस तरीके से जगदेव प्रसाद को कुशवाहा जाति का नेता के रूप में बताने की साजिश रची गई, उसी तरीके से जोतीराव फुले को भी जाति विशेष से जोड़कर देखा जा रहा है। जबकि इन दोनों महापुरुषों ने समग्र रूप से पिछड़े और दलितों के लिए आजीवन काम किया।

मूर्धन्य साहित्यकार, चिंतक व बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य प्रेमकुमार मणि के अनुसार जाेतीराव फुले, पेरियार और आंबेडकर आदि नायकों के बारे में पहले लोगों को पढ़ाया ही नहीं गया। न तो इनके बारे में जानकारी स्कूली पाठ्यक्रमों में थी और न ही कॉलेजों में। लेकिन, 1970 के बाद शोषितों, पीड़ितों में जागरूकता बढ़ी। गैर सरकारी संगठनों व उनके प्रयासों से अब यह स्थिति बन गयी है कि लोग गांधी की छाया से बाहर निकले हैं। अब वे जानने लगे हैं कि चाहे वह फुले हों, आंबेडकर हों या फिर पेरियार, इन सभी के सोच गांधी की तुलना में अधिक वैज्ञानिक व मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाला है। यही वजह है कि आज शोषित-पीड़ित फुले-आंबेडकर-पेरियार का नाम लेने लगे हैं। यह सकारात्मक संकेत है।

(संपादन : गोल्डी)

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  1. RAHUL GAUTAM Reply

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