h n

दिल्ली चुनाव में ओबीसी : आबादी आधी और एक चौथाई से भी कम हिस्सेदारी

इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुल 12 ओबीसी उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है। इनमें से 11 आप व 1 भाजपा के उम्मीदवार शामिल हैं। कम हिस्सेदारी होने का एक असर ओबीसी से जुड़े मसलों पर भी पड़ता है। क्या इस बार केजरीवाल सरकार इस बहुसंख्यक वर्ग की सुधि लेंगे?

दिल्ली विधानसभा चुनाव-2020 का परिणाम बीते 11 फरवरी को सामने आया। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) 2015 में हुए चुनाव में अपने प्रदर्शन को दोहराने में कामयाब रही। हालांकि उसे 67 की तुलना में इस बार 62 सीटें मिलीं। वहीं भाजपा को पांच सीटें अधिक मिलीं, लेकिन वह दहाई का आंकड़ा नहीं पा सकी। चुनावी गणित के विभिन्न आंक़ड़ों के परे एक तथ्य यह है कि दिल्ली विधानसभा में इस बार भी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की हिस्सेदारी न्यूनतम रही है। आप की तरफ से 11 और भाजपा के टिकट पर एक ओबीसी उम्मीदवार जीतने में कामयाब हुए हैं। इस प्रकार 70 सीटों में ओबीसी के हिस्से में केवल 12 सीटें आई हैं।

दिल्ली में ओबीसी की आबादी कितनी है, इसके आंकड़े नहीं हैं। वजह यह कि 1931 में हुए जातिगत जनगणना के बाद जातिगत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में ओबीसी की आबादी 55-60 फीसदी है। 

यहां इस तथ्य का उल्लेख जरूरी है कि उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में ओबीसी मुखर होकर राजनीति में सामने आ रहे हैं। मसलन, बिहार और उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग के लोग राजनीति पर महत्वपूर्ण अधिकार रखते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान में भी ओबीसी निर्णायक हैं। केवल यूपी को छाेड़ दें तो बिहार में नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश में कमलनाथ, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और राजस्थान में अशोक गहलोत के रूप में ओबीसी मुख्यमंत्री हैं। लेकिन दिल्ली में निर्णायक संख्या होने के बावजूद ओबीसी वर्ग के लोगों की हिस्सेदारी समानुपातिक रूप से बहुत ही कम है।

जीत मिलने के बाद समर्थकों का उत्साह बढ़ाते अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम की बात करें तो आप के सभी 11 ओबीसी उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहे। ध्यातव्य है कि 2015 में पार्टी ने 7 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इस बार भाजपा की ओर से एकमात्र अभय वर्मा लक्ष्मीनगर विधानसभा से विजयी हुए हैं। इस प्रकार इस बार के दिल्ली विधानसभा में केवल 12 ओबीसी विधायक निर्वाचित हुए हैं।

दिल्ली के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के सामाजिक बुनावट पर सरसरी निगाह डालें तो विकासपुरी, मटियाला, नजफगढ़, मालवीय नगर, महरौली, हरिनगर जैसी दो दर्जन से ज्यादा सीटें हैं जहां यादवों और बहुजन समाज के वोटरों की अच्छी खासी संख्या है। इसके असर को चुनाव परिणाम में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मसलन, विकासपुरी विधानसभा क्षेत्र में आप के महिंदर यादव को 1 लाख 33 हजार से ज्यादा वोट प्राप्त हुए और वे विजयी रहे। वहीं नजफगढ़ में कैलाश गहलौत को 81 हजार वोट मिले। मटियाला में गुलाब सिंह यादव को 1 लाख 39 हजार वोट मिले। महरौली में नरेश यादव ने 62 हजार वोट लेकर बीजेपी की कुसुम खत्री को शिकस्त दी।

इसी प्रकार नांगलोई से रघुविंदर सिंह शौकीन, बादली से अजेश यादव , मुंडका से धर्मपाल लाकड़ा, हरिनगर से राजकुमारी ढिल्लों, जनकपुरी से राजेश ऋषि, उत्तम नगर से नरेश बाल्यान, बिजवासन से बीएस जून, जंगपुरा से प्रवीण कुमार, संगम विहार से दिनेश मोहनिया शामिल हैं।

बहरहाल, आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन इस मामले में भी खास है कि उसने सभी 12 सुरक्षित क्षेत्रों में जीते हैं। इस आधार पर यह बेशक कहा जा सकता है कि अरविन्द केजरीवाल को दलित-बहुजनों का व्यापक समर्थन मिला। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केजरीवाल अपने राजनीतिक विमर्श और चिंतन में दलित-बहुजनों के सवालों को शामिल करेंगे। इनमें से एक बड़ा सवाल तो यह भी है कि क्या केजरीवाल सरकार इस बार दिल्ली में ओबीसी वर्ग के लोगों को आरक्षण मिले, इसके लिए पहल करेंगे? यह इसलिए कि दिल्ली में ओबीसी के केवल उन लोगों को ही आरक्षण का लाभ मिल पाता है जो 1993 के पहले दिल्ली आए थे।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कमल चंद्रवंशी

लेखक दिल्ली के एक प्रमुख मीडिया संस्थान में कार्यरत टीवी पत्रकार हैं।

संबंधित आलेख

चुप्पी से प्रतिरोध तक का मेरा सफ़र
आंबेडकर और फुले के ज़रिए मैंने जाना कि अंधविश्वास किस तरह दमनकारी व्यवस्था को बनाए रखते हैं। पैकपेट से विदा लेते समय मैं बहुत...
स्मृतियां शेष : मुक्ति तिर्की के कारण झामुमो को मिला था ‘तीर-धनुष’
झामुमो की आज की पीढ़ी को इस बात का पता नहीं होगा कि यह मुक्ति तिर्की का कितना बड़ा योगदान था झामुमो को राजनीतिक...
पटना में अली अनवर की किताब के लोकार्पण के मौके पर जाति के सवाल के साथ जवाब भी
दरभंगा के कुशेश्वरस्थान की घटना का उल्लेख करते हुए हेमंत ने कहा कि खबर को वास्तविकता से काटकर उसे एससी-एसटी एक्ट के विरोध में...
दलितों के लिए बारात निकालना आज भी बड़ी चुनौती क्यों बनी हुई है?
दलितों ने कठिन परिश्रम और संघर्ष, साथ ही संविधान प्रदत्त अधिकारों के कारण समाज में अपने लिए बेहतर स्थान हासिल किया है। यही सफलता...
सावरकर बनाम हम : गांधी की जगह सावरकर को राष्ट्रपिता बनाना चाहते हैं आरएसएस-भाजपा
आरएसएस-भाजपा और दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी चाहते हैं कि गांधी-नेहरू की विरासत का स्थान सावरकर ले लें क्योंकि उन्हें पता है कि कांग्रेस का यदि आज...