दलित-बहुजन नाटककार सतीश पावडे को मिला उत्कृष्ट साहित्य निर्मिती पुरस्कार

अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय के सतीश पावडे पिछले 37 वर्षों से मराठी रंगमंच से जुड़े हैं। दलित-बहुजन सरोकारों को नाटकों के रूप में प्रस्तुत करने वाले पावडे इन दिनों बहुजन नायकों के जीवन पर आधारित नाटकों के लेखन में सक्रिय हैं। उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने सम्मानित किया है

महाराष्ट्र सरकार के द्वारा यशवंतराव चव्हाण उत्कृष्ट साहित्य निर्मिती पुरस्कार (2019-20) डॉ. सतीश बाबारावजी पावडे को दिया गया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के प्रदर्शन कला विभाग में सहायक प्रोफेसर पावड‍े को यह सम्मान बीते 27 फरवरी को मुंबई में मराठी भाषा गौरव दिवस के उपलक्ष्य में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की उपस्थिति में प्रदान किया गया। उन्हें यह पुरस्कार “द थिएटर आँफ द अँब्सर्ड”  समीक्षा ग्रंथ के लिए दिया गया। यह “असंगतवाद का दर्शन” पर आधारित नाटकों की समीक्षात्मक आलेखों का संग्रह है।

37 वर्षों से जारी है सतीश की रंगयात्रा

पावडे पिछले 37 वर्षों से मराठी और हिंदी रंचमंच को समृद्ध कर रहे हैं। उन्होंने अपनी रंगयाात्रा की शुरूआत 1983 में दलित रंगमंच से जुड़े नुक्कड़ नाटकों से की थी। इनमें शहर (लेखक – अमर रामटेके), जागड़ (अंधविश्वासों के उन्मूलन हेतु लोक विज्ञान संगठन द्वारा प्रस्तुत), दुष्कार (लेखक व निर्देशक -सतीश पावडे) आदि नाटक शामिल थे।

एक नाटक के मंचन के दौरान कलाकारों को निर्देशित करते सतीश पावडे

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय से आने वाले पावड़े ने अब तक पचास से अधिक नाटकों की रचना की और उन्हें निर्देशित किया है। उनके नाटकों में मुख्य तौर दलित-बहुजनों के विमर्श होते हैं। इनमें नत्था खड़ा बाजार में (किसानों द्वारा आत्महत्या पर आधारित व श्रीकांत श्राफ द्वारा लिखित), एक बार फिर गोदो, हे राम, दर्शन, वह गंदी गली, मृच्छकटीक, हानुश, राज से स्वराज तक, गुलाम, काला सूरज, सकुबाई, कमला, ईडिपस आदि शामिल हैं।

फुले-आंबेडकर के विचारों से मिलती है प्रेरणा

सम्मान मिलने के संबंध में सतीश पावडे बताते हैं कि उनके लिए यह सम्मान प्रेरणा देने वाला है। इससे उनके इस विचार को मजबूती मिलती है कि रंगमंच के जरिए समाज के लोगों तक जागरूकता का संदेश प्रभावी तरीके से संप्रेषित किया जा सकता है। यह सम्मान रंगमंच के प्रति प्रतिबद्धता का सम्मान है। उन्होंने बताया कि उनके नाटकों में दलित-बहुजन विमर्श रहते हैं, जिनके केंद्र में फुले-आंबेडकर की विचारधारा है। इसी को ध्यान में रख उन्होंने कई नाटकों का लेखन व निर्देशन किया है। इनमें शिवकुलभूषण राजा संभाजी (मराठी, लेखक-निर्देशक – सतीश पावडे), शिवकल्याणी माँ जिजाऊ (मराठी नाटक, लेखक-निर्देशक सतीश पावडे), क्रांतियोगी गाडगेबाबा (मराठी नाटक, लेखक – नाना ढाकुलकर, निर्देशक व सहलेखक सतीश पावडे), अंधार पाहिलेला माणूस (मराठी नाटक लेखक-निर्देशक सतीश पावडे), युगनिर्माता डॉ. पंजाबराव देशमुख (लेखक-निर्देशक सतीश पावडे) आदि शामिल हैं। इनके अलावा उनकी योजना दलित-बहुजन महानायकों यथा शिवाजी महाराज, तुकाराम, ताराबाई, शाहू जी महाराज, कबीर और बिरसा मुंडा आदि पर सीरीज के रूप में नाटक लिखने व मंचन करने की है।

(संपादन : अनिल)

About The Author

Reply