राष्ट्र-निर्माण की चिंता और फणीश्वरनाथ रेणु

महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की जयंती के मौके पर उनकी रचनाओं का पुनर्पाठ कर रहे हैं सुरेंद्र नारायण यादव। उनके मुताबिक, रेणु के लेखन के केंद्र में भारत का नवनिर्माण रहा, जिसमें समाज के उपेक्षित और कमज़ोर वर्ग के लोग मुख्य पात्र रहे। उन्हें आँचलिक कहना सही नहीं है और उन्हें रोमांटिक रचनाकार कहना भी उतना ही ग़लत है

[हिंदी साहित्य में दलितबहुजन विमर्श को केंद्रीय विषय बनाने वाले साहित्यकारों में फणीश्वरनाथ रेणु अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं को प्रभु वर्गों/द्विजों ने आंचलिक साहित्य कहकर सीमित करने का प्रयास किया। इसके बावजूद रेणु ने बिना किसी की परवाह किए विषयों को व्यापक विस्तार दिया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के आलोक में फारवर्ड प्रेस उनकी रचनाओं और विमर्शों पर आधारित लेखों का प्रकाशन कर रहा है। इसकी शुरूआत हम डॉ. सुरेंद्र नारायण यादव के लेख से कर रहे हैं। इस लेख में उन्होंने यह बताया है कि रेणु के लिए राष्ट्र, राष्ट्र का निर्माण और राष्ट्र के निर्माण में दलितों, पिछड़ों और आदिवासी की भूमिका क्या रही। ऐसा करते हुए वह रेणु के विभिन्न रचनाओं का पुनर्पाठ भी कर रहे हैं।]

फणीश्वरनाथ रेणु (4 मार्च, 1921 – 11 अप्रैल, 1977) पर विशेष

फणीश्वरनाथ रेणु एक सरोकारी एवं महान राष्ट्र-निर्माता रचनाकार थे। एक लेखक के रूप में उनकी चिंता भारत को सुखी, समृद्ध एवं समुन्नत राष्ट्र बनाने की थी। वे भारत को सामंतवादी मानसिकता से मुक्त एक सफल और श्रेष्ठ गणतंत्र बनाना चाहते थे। उनकी रचनाएँ राष्ट्र-निर्माण की उनकी चिंताओं और योजनाओं से लबरेज हैं। बावजूद इसके उन्हें आँचलिक रचनाकार माना जाता रहा है। इस तरह की मान्यता उनके महत्व को कमतर आँकने की कुत्सित प्रवृत्ति का परिचायक भी है। साहित्य कलावस्तु है। इसलिए उसकी पद्धति विज्ञान और शास्त्र की पद्धति से भिन्न होती है। शास्त्र तथ्यों और आँकड़ों में बोलता है। जबकि साहित्य संकेतों, घटनाओं और स्थितियों के माध्यम से बोलता है। साहित्य सबकुछ खोलकर नहीं कहता। यह उसकी संविदा के विरुद्ध है। सबकुछ खोलकर कह देनेवाला साहित्य साहित्य नहीं रहता, वह घोषणा-पत्र हो जाता है।

रेणु एक महान साहित्यकार इस कारण से हैं कि उनकी रचनाओं में उच्च कोटि के साहित्यिक गुण मौजूद हैं। किंतु साहित्य का वस्तुगत मूल्य उसमें निहित विचारों, दर्शन और चिंताओं की श्रेष्ठता-अश्रेष्ठता पर निर्भर करता है। साहित्य को समझने में पाठक का विवेक महत्वपूर्ण होता है। समीक्षक इस कार्य में उसकी सहायता करता है। रेणु को दुख इस बात का भी है कि उनकी चिंताओं और सरोकारों को ठीक से समझा नहीं गया। अपनी रचनाओं में वे अपने दुखों को कभी सीधे तो कभी प्रकारांतर से व्यक्त करते रहे हैं। राष्ट्र-निर्माण से जुड़ी उनकी चिंताएँ और योजनाएँ भारत के राष्ट्रीय यथार्थ के सूक्ष्म और गहन पर्यवेक्षण पर आधारित हैं। इस कारण उनमें समाजशास्त्रियों की गहन वैज्ञानिकता उपलब्ध होती है और निष्कर्षों की फलप्रदता का बहुत ऊँचा गणनात्मक मान भी पाया जाता है।

फणीश्वरनाथ रेणु (4 मार्च, 1921 – 11 अप्रैल, 1977)

उदाहरणों से देखें तो उनके लेखन की शुरुआत ही राष्ट्र-निर्माण के उपक्रम से होती है। मैला आँचल (1954) उनका पहला उपन्यास है और उसकी शुरुआत मेरीगंज नामक गाँव में मलेरिया सेंटर की स्थापना की कोशिशों से होती है। रेणु ने अपनी भूमिका में ही स्पष्ट कर दिया है कि मेरीगंज भारत के पिछड़े गाँवों का प्रतीक है। अतः मेरीगंज सिर्फ एक गाँव नहीं है। उसके संदर्भ में कही गयी बातें भारत के उन तमाम गाँवों के संदर्भ में कही गयी मानी जानी चाहिए जिनको मेरीगंज प्रतीकित कर रहा है और जिनका कि प्रतिनिधि बनकर वह “मैला आँचल” में उपस्थित है। पर भारतीय समाज की यह सच्चाई नहीं है–वहाँ कोई योजना लागू की जानी हो और सहजता से वह लागू हो ही जाय। राष्ट्र की प्रगति के मार्ग में जो अवरोध रहे हैं, वे यहाँ भी मौजूद ही हैं। रेणु के चिंतन और पर्यवेक्षण की वैज्ञानिकता इससे साबित होती है कि वे राष्ट्र-निर्माण के साधक तत्वों की पहचान करने में सफल रहे हैं तो उन्होंने उन तत्वों को पहचानने में भी कतई भूल नहीं की है, जो उसके मार्ग में बाधक सिद्ध हो रहे हैं। सेंटर की स्थापना सरकारी योजना है। जिन्हें उससे लाभ मिलना है, यह उनका दायित्व है कि सरज़मीन पर उसे उतरने देने में मदद करें और सहूलियतें जुटाएँ। मलेरिया सेंटर की स्थापना से सबसे ज़्यादा लाभ तो गरीबों को मिलना था। पर क्या यह मानना नैतिक होगा कि उसकी स्थापना में केवल गरीब लोग ही मदद करें? रेणु का दृढ़ मत है कि लाभ समाज के चाहे जिस वर्ग, समूह या व्यक्ति को मिले, पर राष्ट्र-निर्माण में उनका दायित्व ज़्यादा है, जिनके पास सामर्थ्य और संसाधन ज़्यादा हैं। बालदेव गाँव के टोलों में घूम रहा है–सहयोग जुटाने के लिए (रेणु, 1954: 16)।

भगमान भगत की दूकान पर [बालदेव की] तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद से भेंट होती है पर तहसीलदार की बातों से उनकी अगंभीरता साफ झलकती है। किंतु एकांत में ले जाकर सुमरित दास उनके कान में कुछ गुरुमंत्र देता है। रेणु के इस पाठक को यह समझने में ज़रा भी कठिनाई नहीं है कि सुमरित दास ने क्या कहा होगा? तहसीलदार की समझ में अब यह बात आ गयी कि अगर मदद में आनाकानी की तो सारा श्रेय सिपैहिया टोली वाले ले जाएँगे। जहाँ श्रेय की लूट हो वहाँ कोई क्यों पीछे रहना चाहे? समय की नज़ाकत को देखते हुए तहसीलदार साहब की इतनी उदारता भी महनीय है। राष्ट्र-निर्माण में सबसे बड़ा खतरा तो हरगौरी है, हरगौरीवादी मानसिकता है, जिसे ग्वाला के लीडरी करने में आपत्ति है। इसलिए उसे बेईमान भी कहा जा रहा है और यह भी कि आप तो अब लीडर ही हो गए हैं, काँग्रेस ऑफिस का चैाका बरतन कौन करता होगा? (वही: 18)। बालदेव गाँधी का चेला है, इसलिए वह किसी कार्य को “श्रेय” के लोभ से नहीं करता, सेवाभाव से करता है। यह तो समाज का दायित्व है कि वह उसे श्रेय दे, जो वास्तव में उसका हकदार है, जो निस्वार्थ भाव से योजना को सरजमीं पर उतारने में जुटा हुआ है। हरगौरी की कोशिश श्रेय की लूट में हिस्सेदारी की नहीं है क्योंकि उसकी वैसी कोई भूमिका मेरीगंज में देखने में नहीं आयी है। वास्तविक अधिकारी को श्रेय से वंचित करना श्रेय की लड़ाई का एक दूसरा पहलू है।

दूसरे-दूसरे रचनाकार भी इस लड़ाई की तसदीक करते हैं। प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना “ठिठुरता हुआ गणतंत्र” और श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास “राग दरबारी” भी यही कहता है और इतिहास भी इससे अछूता नहीं है। राष्ट्रीय एसेंबली के चुनाव में कुर्मियों को टिकट देने के सवाल पर बाल गंगाधर तिलक का बयान कि “क्या एसेंबली के भीतर हल चलवाना है?” दर्शनीय है। पंडित नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल और बाबासाहब भीमराव आंबेडकर को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने को तैयार नहीं थे। उन दोनों को मंत्रिमंडल में जगह दिलाने के लिए गाँधीजी को अनशन की धमकी देनी पड़ी थी। जाहिर है कि रेणु राष्ट्र-निर्माण के संदर्भ में जो कुछ कह रहे हैं, वह उनके “लेखकीय मन” की उपज नहीं है, भारतीय राष्ट्र का वास्तविक यथार्थ है।

अगर पटेल न होते तो राष्ट्र के एकीकरण का क्या होता, अगर बालदेव न होता तो मेरीगंज में मलेरिया सेंटर की स्थापना का क्या होता? लछमी दासिन की बेबाक आलोचना ने गाँव के मुखिया लोगों को अपनी बेजा हरकतों से बाज आने को बाध्य कर दिया (वही: 28)। रेणु के लेखन का प्रस्थान-बिंदु भारत का राष्ट्रीय यथार्थ है। उन्हें आँचलिक कहना सही नहीं है और उन्हें रोमांटिक रचनाकार कहना भी उतना ही ग़लत है। रेणु मानते थे कि भारत को एक “लोकतांत्रिक” ही नहीं “गणतांत्रिक” देश भी बनाना हैं जो कि गणतंत्र का आधा गुण है, उसमें कुल-गोत्र और जाति-वंश की कोई भूमिका नहीं होती। अतः जिसमें भी गुण है और जिसके भीतर भी राष्ट्र-निर्माण के प्रति निष्ठा है, वही राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण और मूल्यवान है। अस्तु, बालदेव उपयोगी है, चाहे वह ग्वाला ही क्यों न हो?

रेणु मानते हैं कि “देश को स्वाधीन हुए एक दशक हो रहा है, किंतु प्रवीण चिंतन की परंपरा हमारे देश में अभी अंकुरित ही नहीं हुयी है। अन्य क्षेत्रों में जो कुछ भी हुआ है–चिंतन के क्षेत्र में कोई अग्रगति नहीं हुयी है” (यायावर, 1984: 29)। “नवीनता” को स्वीकार करने की सलाहियत जिनमें नहीं है, वे उल्टे-सीधे फतवे भी जारी करते हैं। रेणु ने एक घटना का उल्लेख किया है – “हमारे एक प्रतिष्ठित लेखक-बंधु कोई डैम देखने गए थे। नवनिर्माण को देखकर रचनाकार प्रभावित अवश्य हुआ किंतु “डैम” के पास ही एक किसान से उसकी भेंट हो गयी। किसान ने कहा – “क्या देख रहे हैं बाबू साहेब? यह नदी तो विधवा हो गयी।” और हमारे मित्र कलाकार के मन में यह बात बैठ गयी। उसका सारा उत्साह शेष हो गया। उसने देखा–वास्तव में नव-निर्माणकर्ताओं ने नदी का सुहाग लूट लिया है। नदी विधवा हो गयी है। कवि का हृदय कातर हो गया और संभवतः नव-निर्माण-विमुख भी। उपर्युक्त कातरता यदि राजनीतिक पूर्वाग्रह की उपज नहीं तो नाबालिग चिंतन का अकाल परिपक्व फल अवश्य है” (वही: 32)।

जोतखीजी का यह प्रचार कि डाॅक्टर लोग ही कुएँ में दवा डालकर हैजा फैलाते हैं और यह कि कुआँ में दवा डालकर सचमुच में हैजा फैलाया है (रेणु, 1954: 255)। जब परती परिकथा का जितेंद्र टैक्टर चलाकर परती को उधेड़ता है तो गाँव के ठाकुरबाड़ी के पुजारी सरबजीत चौबे भोले ग्रामीणों को यह समझाते हैं कि जित्तन गऊ माता के पेट पर छुरी चला रहा है। उसके नाश के लिए ग्रामीणों से गौ ध्वनि करवाते हैं–बाँ….(रेणु, 1957: 100)। नाबालिग चिंतन मानकर ऐसे चिंतनों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए बल्कि राष्ट्र-निर्माण के मार्ग के ये मुख्य अवरोधों में से हैं। इनकी खूब मजम्मत की जानी चाहिए। यथास्थितिवाद के ये शीर्ष पुरुष हुआ करते हैं। नयी स्थिति और नयी भूमिका के लायक कोई योग्यता इनमें नहीं है। इसलिए आज के ये शीर्ष पुरुष कल फर्श-पुरुष होनेवाले हैं। अपने को शीर्ष पर बनाए रखने के लिए ये लगातार चेष्टारत हैं। कल को इन्हें कौन पूछने वाला है? इनकी वास्तविक चिंता यह है। समाज और राष्ट्र को इनकी चिंता और इनके फतवों से सतर्क सावधान रहने की ज़रूरत है।

बालदेव जोतखीजी की बातों को और नहीं सुन सकता – “नहीं जोतखी काका…। सिमरबनी के बारे में आप जो कह रहे हैं सो आप इधर सिमरबनी गए हैं? नहीं। तब क्या देखिएगा। एक बार वहाँ जाकर देखिए–इसपिताल, इस्कूल, लड़की-इस्कूल, चरखा सेंटर, रायबरेली, क्या नहीं है वहाँ? घर-घर में ए-बी-सी-डी पास” (रेणु, 1954: 38)। “बालदेव के पास बेकार बहस करने के लिए समय नहीं है” (वही: 39)।

वर्तमान में पोशाक योजना, साइकिल योजना एवं मध्याह्न भोजन योजना आदि ऐसी योजनाएँ हैं जिनकी आलोचना खूब हो रही है। पर जिन तर्कों के आधार पर आलोचनाएँ हो रही हैं, वे वैसे ही हैं जैसा डैम बनाए जाने से नदी का विधवा हो जाना बताया गया है। पर डायन[1] कोशी के साधने से ही परानपुर अंचल में जीवन विहँस पाया है, बंध्या धरती आसन्न प्रसवा हो सकी है। जहाँ क्षणिक आशा की तरह सिर्फ दूब जम पाती थी, अब वहाँ की धरती तीन-तीन फसलें देने लगी है और इलाके में फूस की छप्परों की जगह केरोगेटेड टिन की छप्पर चमचमाने लगी है। रेणु नदी के विधवा होने के तर्क की न सिर्फ मज़म्मत करते हैं वरन् पूरे समरंभ के साथ डायन कोशी को साधने के उपक्रम के साथ खड़े हो जाते हैं।

डायन कोशी को ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू साधते हैं तो साहित्यिक रचना में (परती परिकथा) जितेंद्र मिश्र के प्रयास से दुलारी दाय की धारा को बाँधने और नहर प्रणाली निकाले जाने के रूप में रचा गया है। मिस्टर रायचौधुरी के मुँह से रेणु की आशीर्वाणी ही जितेंद्र के प्रति फूटी है – “तुमी पारबे, तुमी पारबे” (रेणु 1957: 244)। जिस निस्वार्थता और दिल की गहरायी से उपजी निष्ठा के साथ जितेंद्र कोशी डैम योजना को पूरा करने के उपक्रम से जुड़ा है, वह भारतीय समाज का एक दुर्लभ उदाहरण है। डाॅक्टर रायचौधुरी को यह युवक नील अमलतास जैसा लगता है! (वही: 244) “…..तुमी जे निजेई एक विरल वनस्पति” (वही: 245)। रेणु की नज़र में जितेंद्र विरल क्योंकर है? इसलिए कि इलाके में लोग तो बहुत हैं – पतनीदार, जमींदार से लेकर राजे-महाराजे तक। किंतु किसी के भीतर डायन कोशी को साधने और इलाके के लोगों को कष्ट से स्थायी मुक्ति दिलाने की कामना जन्म तक नहीं लेती।

ऐतिहासिक सच्चाई भी यही है कि भारत में जितेंद्र जैसे लोगों के लेहड़ें नहीं हैं। जैसे शिवाजी विरल थे, कुछ उसी प्रकार जितेंद्र भी विरल हैं। अगर उस जैसे राष्ट्र-निर्माताओं के लेहड़ें होते तो संभव था जितेंद्र को कम जद्दोजहद करनी होती। जिस उत्कटता के साथ उसे विरोध झेलना पड़ा था, उतना विरोध नहीं होता और समर्थकों-सहकारियों के बाहुल्य के कारण जितेंद्र अपने को कुछ अधिक मजबूत स्थिति में पाता। जितेंद्र अपने प्रयत्न में अकेला है और अकेला पाकर ही राष्ट्र-निर्माण की विरोधी शक्तियाँ (यथा सरबजीत चौबे, लुत्तो, गरुड़धुज झा आदि) उसका अंदर-बाहर से उतना विरोध नहीं कर पाते। दूसरी तरफ भारत जैसे देश की सरकार और उसकी मशीनरी- नौकरशाही अपने को भारतीय जनता का भाग्य विधाता मानकर बर्ताव करती है। बंद कमरे में योजना बनती है और उसे एकाएक सरजमीं पर उतारने का काम शुरू हो जाता है। योजना क्या है, उसकी लाभ-हानि क्या है – बिना यह कुछ बताए। उचित यह है कि जिस जनता के लाभ के लिए योजना बनायी गयी है उनके बीच उसे प्रचारित कर लोगों को योजना से वाकिफ कराया जाय, उन्हें योजना की लाभ-हानि बतलाया जाय और इस प्रकार जिन्हें लाभ पहुँचाने के लिए योजना बनायी गयी है, उन्हें उसके कार्यान्वयन का पहले समर्थक बनाया जाय, जनमत तैयार किया जाय और तब उन्हें योजना का भागीदार बनाया जाय। एकाएक आसमान से उतरी योजना को स्वाभाविक है कि लोग शक की निगाह से देखें किंतु जनता की भागीदारी से नौकरशाही को भय हैं वे गैलन भर पेट्रोल फूँककर एक कप चाय नहीं पी सकेंगे (वही: 326)। आज के दिन भी बहुत-सी योजनाएँ ऐसी हैं जिनकी जानकारी उनको नहीं है, जिनके लिए वह है। विज्ञान के माध्यम से राष्ट्र का कायापलट करने की मंशा रखने वाले पंडित नेहरू का रेणु-संस्करण है यह जितेंद्र मिश्र। पर पंडित नेहरू की नफासत आम जन के बीच उनकी अघुलनशीलता और वैशिष्ट्य से उपजा अलगाव–ये चीजें रेणु अपनी कल्पना के राष्ट्र नायक में नहीं देखना चाहते थे। परिणामतः आरंभ का जितेंद्र, पंडित नेहरू की नफासत और वैशिष्ट्य की छायाप्रति बना हुआ था। रेणु ने उसके परवर्ती चरित्र को जनता संस्करण तक प्रसंस्कृत कर दिया है। जितेंद्र के चरित्र का यह जनता संस्करण रेणु की काम्य गणतांत्रिकता को भी चरितार्थ और उद्धृत करता है।

यह प्रकल्पित राष्ट्र नायक पंचचक्र नाटक को अभिनीत करता है तो गाँव भर के कलाकारों को यथायोग्य भूमिका आबंटित करता है। गणतांत्रिकता सामंतवाद का ठीक विलोम है। सामंतवाद भूमिका का बँटवारा वंश और जाति के हिसाब से करता है जबकि गणतंत्र में भूमिका के आबंटन में व्यक्ति की योग्यता प्रधान होती है। नेतृत्व के स्तर पर यह योग्यता अगर जितेंद्र मिश्र में है तो लुत्तो को नायक क्यों होना चाहिए? और कार्यकर्ता के स्तर पर बालदेव और कालीचरण बखूब हैं तो हरगौरी की सहमति की मुखापेक्षा क्यों ज़रूरी हो? ताजमनी और मलारी अपनी फन की माहिर हैं। इसलिए पंचचक्र नाटक में डायन कोशी और उसकी सौतेली बहन दुलारी दाय जैसी महत्वपूर्ण भूमिका इन निम्न कुलोत्पन्न कन्याओं को दे दी जाती है, न कि जाति और वंश की श्रेष्ठता के आधार पर लिलिया को (रेणु, 1957: 336)।

संदर्भ:

  1. रेणु, फणीश्वरनाथ. (1954). मैला आँचल. पटना: समता प्रकाशन.
  2. यायावर, भारत. (1984). श्रुत अश्रुत पूर्व. (समपदित) दिल्ली: राजकमल प्रकाशन
  3. रेणु, फणीश्वरनाथ. (1957). परती परिकथा. दिल्ली, राजकमल प्रकाशन

(संपादन : नवल/गोल्डी)

[1] यह शब्द अब कई राज्यों में प्रतिबंधित है। लेख में इसका उपयोग रेणु के साहित्य से उद्धृत है।

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