वेबिनार : समग्र जाति विमर्श के बगैर दलित साहित्य अधूरा

वेबिनार में कमलेश वर्मा ने सवाल उठाया कि दलित विमर्श का अछूत कही जाने वाली जातियों पर हो रहे अत्याचारों, शासन एवं सत्ता में राजनीतिक हिस्सेदारी तथा आरक्षण जैसे प्रश्नों तक सीमित रहना कहां तक उचित है। इमानुद्दीन की खबर

बीते 13 मई, 2020 को आत्माराम काॅलेज (दिल्ली) के तत्वावधान में (जूम एप से लाइव) वेबिनार के माध्यम से साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में डॉ. कमलेश वर्मा की पुस्तक ‘जाति के प्रश्न पर कबीर’ एवं डॉ. श्रीधरम की रचनाओं [कहानी संग्रह- ‘की रे हुकुम’; ‘स्त्री: सृजन और संघर्ष’, ‘महाभारत’ (पाठ्य-पुस्तक); ‘स्त्री: स्वाधीनता का प्रश्न] और नागार्जुन’ के उपन्यास’, ‘चन्द्रेश्वर कर्ण ग्रंथावली’ पर चर्चा की गयी। 

वेबिनार में डॉ. कमलेश वर्मा ने ‘जाति के प्रश्न पर कबीर’ के बारे में बताया कि दलित विमर्श में कबीर को लेकर चिंतन की समस्याओं ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया। “मैंने देखा कि हिन्दी साहित्य के प्रमुख आलोचकों द्वारा ऐसा बहुत कुछ लिखा जा रहा है जिसकी पृष्ठभूमि में जाति है लेकिन उस पर खुलकर बातचीत नहीं होती। हिन्दी साहित्य में जो स्थापनायें की गयी हैं, वो तर्कसंगत नहीं लगती, ” उन्होंने कहा। 

डॉ. कमलेश वर्मा के मुताबिक, हिन्दी के प्रमुख आलोचक कबीर को सिर्फ धर्म में छुपी बुराइयों का विरोध करने वाला बताते हैं जबकि वे भी ईश्वर पर विश्वास करते थे। धर्म, अध्यात्म का संस्थागत रूप है। धर्म को जाति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। कबीर जब धर्म के खोखले आडंबरों का विरोध करते हैं, दोनों ओर के पुरोहितों ललकारते हैं, तो इसमें धर्म के साथ-साथ जाति के प्रश्न भी अंतर्निहित हैं।

वेबिनार में डॉ. कमलेश वर्मा व डॉ. श्रीधरम ने रखी अपनी बात

उन्होंने पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की’ की स्थापनाओं पर भी सवाल उठाये। पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर को व्यापारी वर्ग से जोड़कर देखते हैं जबकि कबीर की जाति जुलाहा थी, जो मध्यवर्ती जाति है। वे शिल्पी एवं कारीगर वर्ग से आते हैं। डॉ. कमलेश वर्मा ने पुरुषोत्तम अग्रवाल की इस बात के लिए प्रशंसा की कि वे कम से कम कबीर को मध्यवर्ती जाति का तो मानते हैं भले ही वे यह बात व्यंग्य में कहते हैं, जैसे ‘भविष्य में कोई ओबीसी आलोचक अवतार लेगा’। मतलब सामान्य तरीके से कोई आयेगा तो स्वागत नहीं किया जायेगा?

डॉ. कमलेश वर्मा ने वर्तमान दलित विमर्श की सीमाओं की ओर संकेत किया। उन्होंने सवाल उठाया कि दलित विमर्श का सिर्फ अछूत कही जाने वाली जातियों पर हो रहे अत्याचारों, शासन एवं सत्ता में राजनीतिक हिस्सेदारी तथा आरक्षण जैसे प्रश्नों तक सीमित रहना कहां तक उचित है? “आप दलितों की बात करेंगे लेकिन पिछड़ी जातियां, जो मंडल कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार आबादी का 52 प्रतिशत है, उन्हें आप छोड़ देंगे। बिना ब्राह्मणों पर बात किये दलितों पर कैसे बातचीत हो सकती है? एक जाति के संघर्षों का फल किसी दूसरे के झोले में चला जाये, इससे कैसे आंख मूंदी जा सकती है? अगर जाति पर बात करनी है तो सभी जातियों पर बात करनी होगी,” उन्होंने कहा। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में पिछड़ी जातियों के लेखकों राजेंद्र यादव, वीरेंद्र यादव, चौथीराम यादव आदि ने पिछड़ा विमर्श नहीं खड़ा किया बल्कि वे हिंदी साहित्य में मार्क्सवादी लेखक के रूप में जाने जाते हैं। मगर दलित विमर्श के कुछ लेखकों को वे उच्च जाति के लठैत के रूप में दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जाति विमर्श का निर्धारण रचनाकारों के साहित्य के मूल्यांकन से ही हो सकता है न कि किसी जाति विशेष में पैदा होने से।

डॉ. कमलेश वर्मा ने पसमांदा मुसलमानों पर केंद्रित विमर्श की कमी की ओर संकेत किया। दलित विमर्श के विपरीत, पसमांदा विमर्श अपने नायक, साहित्यकार एवं लेखक नहीं पैदा कर सका है। दलित विमर्श की तरह पसमांदा विमर्श, पुरोहित वर्ग के मुखर विरोध पर आधारित नहीं है। उन्होंने बताया कि कबीर जुलाहा जाति से थे, लेकिन उन्होंने पसमांदा की समस्याओं पर कुछ नहीं लिखा। उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि किसी की रचना के मूल्यांकन के लिए सिर्फ जाति ही मानक नहीं होनी चाहिए। दलितों पर प्रेमचंद ने कबीर की तुलना में काफी कुछ लिखा है। हालांकि डॉ. कमलेश वर्मा ने कहा कि मार्क्सवाद वर्ग विमर्श पर आधारित है, वह जाति विमर्श की इजाज़त नहीं देता। जबकि जाति भारतीय समाज की सच्चाई है, उच्च जातियों एवं निचली जातियों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अंतर है। 

वहीं डॉ. श्रीधरम ने अपने वक्तव्य में साहित्य से जुड़ाव एवं अपने रचना-प्रक्रिया के उद्भव पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जब वे कक्षा आठ में थे तब उन्होंने गांव में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रहसन प्रस्तुत किया था। “उसमें मैंने अपने पिता की बुराई की थी। गांव में उस प्रहसन को लोगों ने खूब पसंद किया, घर आने पर पिटाई भी हुई। लेकिन मेरा हौसला बढ़ चुका था। गांव में एक नाटक मंडली बनी जिसके कारण हम लोगों को चंदा मिल जाता था और हमने इस तरह से कई आयोजन किये। लोग हमसे डरते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि कहीं हम लोग नाटक के बीच उनकी बुराई न कर दें”, उन्होंने कहा.

कथा शिल्प पर बात करते हुए डॉ. श्रीधरम ने कहा कि कहानी बहुत समय की मांग करती है। कहानी लेखन में कथ्य के साथ-साथ कला का भी होना अत्यंत अनिवार्य है। विषय के साथ-साथ उसका प्रस्तुतिकरण भी प्रभावशाली होना चाहिए। अगर विषय से जुड़ी अनुषांगिक चीजों पर ठीक से विचार न किया जाये तो वह रचना बहुत उबाऊ हो जाती है। 

‘गिरगिट’, ‘फंदा’, और ‘की रे हुकुम’ जैसी कहानियों में नायक एक्टिविस्ट के रूप में दिखाई देता है। “आप नागरिक एवं लेखक की भूमिका को कैसे देखते हैं?” अरविंद मिश्र के इस  प्रश्न के जवाब में डॉ. श्रीधरम ने बताया कि लेखक सिर्फ लेखक ही नहीं होता बल्कि वह एक नागरिक भी होता है। उस पर परिवेश एवं समाज का प्रभाव होता है, जाति और धर्म जैसी चीजें मौजूद होती हैं। कई बार कहानी लिखने वाला लेखक भी अन्याय का शिकार हो जाता है। जैसे प्रेमचंद ने मुलवा के लिए तुम का ही प्रयोग किया है। परन्तु अगर सूदखोर बहुत बेईमान भी है तो भी उसके लिए प्रेमचंद आप का प्रयोग करते हैं। ऐसी गलतियां लेखक के परिवेश कारण होती हैं।  

वेबिनार में राजकुमार, ज्ञानेंद्र कुमार, डा. राजमोहिनी सागर, सोनिया मांगे, राजेश चंद आदर्श, तरूण सिंह, करूणाकर पाण्डेय आदि कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम का संचालन अरविंद मिश्र और समापन अजीत कुमार ने किया। 

(संपादन : नवल/अमरीश)

(आलेख परिवर्द्धित : 25 मई, 2020 7:46 PM)

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