अध्यादेश लाकर तत्काल आरक्षण बचाए सरकार, बिहार के दलित-आदिवासी विधायकों ने राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को लिखा पत्र

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी सहित राज्य के 22 दलित-आदिवासी विधायकों ने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। उनके मुताबिक आरक्षण के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से देश के दलित-आदिवासी सशंकित और अपमानित महसूस कर रहे हैं

अनुसूचित जातियों व जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण की समीक्षा संबंधी सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी का विरोध शुरू हो गया है। इस संबंध में बिहार के दलित विधायकों ने दलगत भावना से ऊपर उठकर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अनुरोध किया है कि आरक्षण और पदोन्नति में आरक्षण को ठीक ढंग से लागू करने एवं न्यायपालिका में आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन आदि के लिए अध्यादेश जारी किया जाए। 

इससे पहले 8 मई, 2020 को इन विधायकों ने बिहार विधानसभा की लॉबी में बैठक की। इस बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के अलावा बिहार सरकार के मंत्री श्याम रजक, ललन पासवान, रामप्रीत पासवान, शिवचंद्र राम, प्रभुनाथ प्रसाद, रवि ज्योति, शशिभूषण हजारी, निरंजन राम, स्वीटी हेंब्रम सहित कुल 22 दलित/आदिवासी विधायकों ने हिस्सा लिया। 

अपने पत्र में विधायकों ने उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण एवं सामाजिक न्याय के अधिकार के विरूद्ध दिए गए निर्देशों को निरस्त करते हुए आरक्षण के प्रावधान को संविधान को नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की।  

गौरतलब है कि बीते 22 अप्रैल, 2020 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, इंदिरा बनर्जी, विनीत सरन, एम.आर. शाह और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद कहा, “अब आरक्षित वर्ग के अंदर भी यह माँग उठने लगी है। अब अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में भी आर्थिक रूप से उन्नत वर्ग अस्तित्व में आ गया है। वंचित लोग अनुसूचित जाति/जनजाति के अंदर सामाजिक उन्नति की बात उठा रहे हैं, पर अभी भी उन लोगों तक इसके लाभ को पहुंचने नहीं दिया जा रहा है। इस तरह, इस (वर्ग) के अंदर ही यह बात उठ रही है जिसमें अनुसूचित जाति/जनजाति के वर्ग के जो लोग इसका लाभ उठा रहे हैं उस पर सवाल उठाया जा रहा है”।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी व बिहार सरकार के मंत्री श्याम रजक। पार्श्व में बिहार विधान सभा की तस्वीर

बिहार के दलित विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी पर सवाल उठाया है। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट भारतीय संविधान का संरक्षक और अंतिम व्याख्याकार है। परंतु,  2017 से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट ने लगातार अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को प्राप्त आरक्षण एवं प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में निर्णय सुनाए हैं। विधायकों ने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के पास इस तरह के ठोस आंकड़े हैं कि आरक्षित वर्ग के कितने लोग सामाजिक वंचना और शैक्षणिक पिछड़ेपन से बाहर निकल चुके हैं, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। बिना ठोस आंकड़ों के सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी  केवल अनुचित बल्कि भ्रामक भी है। 

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विधायकों ने कहा है कि भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में तथा सरकारी सेवाओं की नियुक्तियों में विशेष प्रावधान किया जा सकेगा। इसी के तहत उपरोक्त सभी श्रेणियों को शिक्षण संस्थानों में प्रवेश, राज्य के अंतर्गत सेवाओं और प्रमोशन में आरक्षण दिया जा रहा है। 

ज्ञातव्य है कि इसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात नहीं कही गई है।

विधायकों ने कहा है कि उत्तराखंड सरकार ने 2019 में अनसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पूर्व से जारी पदोन्नति में आरक्षण को लागू नहीं करने का निर्णय लिया। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा जारी इस अधिसूचना को निरस्त कर दिया। उत्तराखंड सरकार ने हाईकोर्ट का निर्णय स्वीकार करने की बजाय  सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने सुनवाई करते हुए 7 फरवरी, 2020 को निर्णय दिया कि पदोन्नति में आरक्षण करने हेतु न्यायालय राज्य सरकार को कोई आदेश नहीं दे सकता और यह मामला राज्य के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह आरक्षण लागू करे या न करे।

बिहार विधानसभा की लॉबी में बैठक करते दलित-आदिवासी विधायक

बिहार के दलित-आदिवासी विधायकों के मुताबिक, उपरोक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी संवैधानिक सीमा  और संविधान की रक्षा करने के अपने दायित्व का उल्लंघन करते हुए कहा है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। जबकि सभी जानते है कि पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 16.4(क) और 16.4 (ख) में निहित है और मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है। 

विधायकों ने अपने पत्र में कहा है कि कोरोना के संकट से वे भी चिंतित हैं और यह समझते हैं कि संसद का सत्र शुरू होने के बाद ही इस विषय को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जा सकता है। परंतु, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोग सशंकित व अपमानित महसूस कर रहे हैं। इस विशेष परिस्थिति के मद्देनजर विधायकों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस आशय का ठोस आश्वासन देने की मांग की है कि संसद के आगामी सत्र में इस मामले का निराकरण हो जाएगा। उन्होंने यह मांग भी की है कि तब तक एक अध्यादेश जारी कर एससी व एसटी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। 

(संपादन : अनिल/अमरीश)

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