भंगी या चमार होना कोई गुनाह नहीं है युवराज सिंह

पूनम तूषामड़ बता रहीं हैं कि जातिगत द्वेष के जहर में डूबे शब्दबाण उन पर भी छोड़े जाते हैं जो दलित जातियों से आते हैं और उन पर भी जो इन जातियों से नहीं होते। दरअसल, शोषक व सामंती वर्ग गैर-दलितों को अपमानित करने के लिए इन शब्दों का प्रयोग करता है।

हाल ही में सोशल मीडिया पर भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व सदस्य युवराज सिंह का एक वीडियो वायरल हुआ है। इसमें वे अपने एक साथी क्रिकेटर के लिए जातिसूचक शब्द का प्रयोग करते दिख रहे हैं। हरियाणा के हांसी निवासी युवा अधिवक्ता व सामाजिक कार्यकर्ता रजत  कल्सन द्वारा इस संबंध कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।

आखिर द्विजों के अवचेतन में गैर-द्विजों के प्रति इतनी नफरत क्यों है? यह सवाल इसलिए क्योंकि दलित जातियों से जुड़े शब्दों का गाली के रूप में प्रयोग कोई नई बात नहीं है। यह प्रवृति सामंती व शोषक वर्ग में हमेशा से है। वर्ण व्यवस्था जनित भेदभाव की शिकार रही जातियों को आज भी अपमान, हिकारत और अवमानना की दृष्टि से देखा जाता है और इनके नाम गाली की तरह प्रयोग किये जाते हैं। जैसे, “क्या भंगन बनी हुई है”, “चल चूड़ी सी”, “कंजर न होए तो”, “कंजरी सी”, “चमारी सी”, ”क्या डूमणी सी फिरती है”, “चूहड़े की औलाद”, “भंगी की औलाद”,”मिरासी  कही का” या फिर “तू तो पूरा भांड है” आदि।

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व सदस्य युवराज सिंह : खेल भावना से बढ़कर जाति

जातिगत द्वेष के जहर में डूबे ये शब्दबाण उन पर भी छोड़े जाते हैं जो इन जातियों से आते हैं और उन पर भी जो इन जातियों के नहीं होते। गैर-दलित जातियों के लोगों को भी जब शोषक व सामंती वर्ग अपमानित करना चाहता है तो वह इन शब्दों का उपयोग करता है। किन्तु यहां अपमान करने वाले की मंशा दोहरी होती है। किसी को चूहड़ा, भंगी, चमार, मिरासी या डोम कहने से केवल उस व्यक्ति का अपमान नहीं होता बल्कि उस कौम का भी अपमान होता है जिसका नाम गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है।

महत्वपूर्ण यह है कि आज 21वीं सदी में और संविधान और कानूनों  के रहते हुए भी गांव से लेकर शहर तक तथाकथित उच्च वर्ण के पढ़े-लिखे, सभ्य और शालीन सदस्यों में जातिवादी मानसिकता इस कदर जड़ जमाए बैठी है कि वे इन जातियों के प्रति हिकारत के अपने भाव को कभी मजाक के रूप में तो कभी गाली के रूप में अभिव्यक्त करते हैं।

सबसे पहले यह देखते हैं कि यह मानसिकता नामी क्रिकेटर युवराज सिंह के मामले में कैसे सामने आई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में युवराज सिंह अपने क्रिकेटर दोस्तों के साथ चैट कर रहे हैं। इस क्रम में वे क्रिकेटर रोहित शर्मा से चर्चा में किसी तीसरे दोस्त का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि “ये भंगी लोगों को और कोई काम नहीं है”। ये शब्द जिस क्रिकेटर के बारे में कहे जा रहे है वे दलित हैं और उनका नाम यदुवेन्द्र चहल हैं। वे भारतीय क्रिकेट टीम में गेंदबाज हैं। युवराज उन्हें यूज़ी कहकर संबोधित कर रहे हैं।

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ध्यातव्य है कि युवराज सिंह का संबंध जाट समुदाय से है और जिस रोहित शर्मा के साथ वे अपने साथी क्रिकेटर के लिए अपमानजनक शब्द का उपयोग कर रहे हैं, उनके बारे में ऐसी जानकारी सामने आयी है कि वे ब्राह्मण हैं। हरियाणा के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता रजत कल्सन ने अपने जिले के पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग गाली के रूप में कर दलित जातियों का अपमान करने के लिए युवराज सिंह को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की है.

सवाल एक बार फिर यही है कि आखिर वे कौन से कारण हैं जिनसे एक वर्ग स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर अन्यों से धर्म, नस्ल, रंग, जाति और लिंग के आधार पर घृणा करने लगता है और उन्हें हीन, तुच्छ और निम्न मान कर उन पर तरह-तरह के अत्याचार और अन्याय करता है।

अधिवक्ता रजत कल्सन द्वारा हरियाणा पुलिस को दी गयी सूचना की प्रति

दरअसल एक वर्ग अथवा जाति द्वारा दूसरे वर्ग अथवा जाति के शोषण, उत्पीड़न और अत्याचार के पीछे हमारी सभ्यता के प्रारम्भ का वह काला दौर है जिसके कारण हम आज भी मानसिक और सामाजिक जातीय पूर्वाग्रहों  का शिकार हैं। इसे समझने के लिए इसकी जड़ की तलाश आवश्यक है। मसलन, संस्कृत के विद्वान लंबे समय से यह प्रचारित करते आए हैं कि विश्व की ज्यादातर भाषाएं संस्कृत से मिलती-जुलती हैं। संस्कृत से जुड़ी भाषाएँ बोलने वालों को एक ही परिवार अथवा एक ही नस्ल का  माना गया। इस नस्ल को आर्य नाम दिया गया। उनका दावा है कि आर्यों ने ही भारत, यूनान, रोम आदि में स्वयं को उच्च जाति के रूप में स्थापित किया। इसके अलावा यह भी प्रचारित किया गया है कि सभ्यता का विकास आर्यों के बिना संभव नहीं है क्योंकि उसके लिए जिन गुणों, प्रतिभाओं और क्षमताओं की आवश्यकता होती है, वे केवल आर्यों के ही पास हैं।[1]

आर्यवाद की इस अवधारणा का विस्तार हम जर्मनी के ‘नॉरडिसिस्म’ में देखते हैं।   इसमें यह प्रचारित किया गया कि विशुद्ध आर्य जाति उत्तर दिशा (जिसे जर्मन भाषा में नॉर्ड कहा जाता है) में रहती है और इस जाति को ‘नॉर्डिक जाति कहा गया। इसी आधार पर नाज़ियों ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ आर्य जाति घोषित कर दूसरी जातियों से अपना मिश्रण रोकने तथा अपनी ‘शुद्धता’ बरकरार रखने के लिए अपने ही देश के यहूदियों पर तरह-तरह के अन्याय व् अत्याचार किये। उन्हें देश से बाहर निकालने और समाप्त करने के लिए हिटलर ने गैस चैम्बर तथा कत्लगाहें तैयार कराईं।

नॉरडिसिस्म केवल जर्मनी तक सीमित न रहा और बल्कि इंग्लैंड में  एंग्लो-सेक्सिस्म तथा फ्रांस में गेलिकवाद (गलिसिस्म )के रूप में विकसित और प्रचारित हुआ। इस प्रकार के नस्लवाद को हम अमेरिका में श्वेत और अश्वेत के बीच भेदभाव के रूप में देख सकते हैं। यहां यह जातिवाद, रंगभेद के रूप में सामने आता रहा है। अभी हाल ही में अमेरिका के एक श्वेत पुलिसकर्मी ने 46 वर्ष के एक अश्वेत अमेरिकन जार्ज फ्लॉएड को उसकी गर्दन पर घुटना रख कर मार डाला।

दरअसल यह वही नस्लभेद और श्रेष्ठता बोध है जिसका ज़िक्र हम जर्मनी के सन्दर्भ में कर चुके हैं। भारत में यह ‘नस्लवाद’ वर्णव्यवस्था के रूप में सामने आया। चूँकि भारतीय समाज को नस्ल और रंग के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता था इसलिए मनु ने उसे चार वर्णों में विभाजित कर दिया। इतना ही नहीं इसमें भी केवल तीन वर्णों को ही श्रेठ मानकर बाकी सभी को अनार्य घोषित कर शूद्र कहा गया।

द्विज या सवर्ण कही जाने वाली जातियों में अपने ही देश और समाज के लोगों के प्रति घृणा, अवमानना और अत्याचार की जडें ‘मनुस्मृति’ है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से श्रेष्ठ बताकर उसे दूसरों से घृणा करना और उनके विरुद्ध हिंसा करना सिखाती है। मसलन –

सर्व स्वयं ब्राह्मणस्येद यत्किं चिज्जगतिगतम |
श्रेष्ठणयेणाभिजननेन्द्म  सर्व ब्राह्मणों अहरति  ||

भावार्थ यह कि समस्त सृष्टि में प्राणधारी जीव श्रेष्ठ हैं, प्राणियों में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ हैं, बुद्धिजीवियों में मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्यों में ‘ब्राह्मण’ श्रेष्ठ है। एक श्लोक में तो खुलकर कहा गया है – सर्वथा ब्राह्मणः पूज्या परमं देवतां हितत

मनु कहते हैं कि जिस प्रकार वैदिक और अवैदिक रीति स्थापित हुई है, अग्नि महान देवता है उसी प्रकार ब्राह्मण मूर्ख हो या विद्वान वह महान देवता है। इस कारण से ब्राह्मण को हमेशा देवता की तरह पूजना चाहिए।

दूसरी तरफ मनु अपने संतानों को बताते हैं कि शूद्र तिरस्कार के अधिकारी हैं। उन्हें ज्ञान और धन दोनों से वंचित रखा जाना चाहिए। वह कहते हैं कि शूद्र अयोग्य, अशिक्षित, निर्धन और अपमानित व्यक्ति के रूप में ही अपना जीवन व्यतीत करेगा। यदि कोई शूद्र अभिमान पूर्वक ब्राह्मण को धर्म का उपदेश देने कि जुर्रत करता है तो राजा का कर्त्तव्य है कि उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवा दे।

धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः |
तटमास्चततैलम वक्त्रे  श्रोते च पार्थिवः ||

मनु शूद्रों को केवल सेवा के योग्य पाते हैं। कहते हैं –

एकं एव तु शुदृश्य प्रभु : कर्म समादिशत |
एतेषां एव वर्णानां शुश्रूषाणम अनसूयया ||

यानि ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए केवल एक कर्म निर्धारित किया है और वह यह कि वह विनम्र होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णों की सेवा करे।

ऐसे ही अनेकानेक अमानवीय श्लोकों से मनुस्मृति भरी पड़ी है, जो इंसान को इंसान के साथ घृणा और हिंसा करना सिखाती है। बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘मनुस्मृति दहन’ इसीलिए किया था क्योंकि वे जान गए थे कि ‘मनुस्मृति’ शूद्रों यानि दलित और अस्पृश्य बना दी गई जातियों के लिए एक अभिशाप है तथा स्वयं को द्विज अथवा आर्य कहने वाली जातियों द्वारा बाकी जातियों को गुलाम बनाए रखने का क्रूर षड्यंत्र।

बहरहाल, भारतीय संविधान में सभी के सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए विधान हैं। लेकिन इन सबके बावजूद यदि युवराज सिंह जैसे लोग दलितों के लिए अपमानजनक शब्दों का उपयोग करते हैं तो इसके पीछे मूल कारण यही है कि कानून का अनुपालन कराने वाले तंत्र जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है, ने अपना काम ईमानदारी से नहीं किया है। आवश्यकता है कि इनका विरोध सामाजिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हो और बौद्धिक जगत भी हस्तक्षेप करे जैसा कि कबीर ने किया था।

सूरा सो पहचानिये जो लड़े दीं के के हेत
पुर्जा पुर्जा कटी मरै कबहुँ न छाड़े खेत।
जिनको होत मिटन का चाव
दंगल गली गली बोरियाव।

(संपादन : नवल/गोल्डी/अमरीश)

—–
[1] ‘ऐन एसे ऑन दी इनइक्वलिटी ऑफ दी ह्यूमैन रेसेज’ (1853-1855), जोसेफ आर्थर कोम्त डे गोबिन्यो,  मार्क गुई वैलेरियस टायसन, लंदन, 2016

[2] ‘कल्चरल सोसियोलॉजी’, जॉन लेविस गिलीन एंड जॉन फिलिप गिलीन, मैकमिलन, 1950

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