भिखारी ठाकुर : बहुजन चेतना के महान लोक कलाकार

भिखारी ठाकुर ने जब अपना नाच शुरू किया तब धर्म एवं धार्मिक कथाओं आधारित बिदापत नाच, रामलीला, रासलीला के साथ-साथ राजा-महाराजा के कहानियों से लैस नौटंकी विधा का चलन था। उस समय समाज में जाति और सामंती वर्चस्व, औपनिवेशिक विस्थापन सबसे बड़ी समस्या के रूप में विद्यमान थीं। बता रहे हैं जैनेंद्र दोस्त

भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर, 1887-10 जुलाई, 1971) पर विशेष

भारत में लोकनाट्य विधाओं की एक समृद्ध परंपरा है। उन्ही लोकनाट्य विधाओं की प्रचलित परंपरा में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है “नाच” विधा की परंपरा। नाच बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के हिस्सों में किया जाने वाला एक प्रचलित संगितिक लोकनाट्य है। बिहार में नाच विधा के सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध कलाकार भिखारी ठाकुर रहे हैं। भिखारी ठाकुर ने सन 1917 में अपने नाच मंडली की स्थापना कर भोजपुरी भाषा में बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-बिरोध, पिया निसइल, गंगा-स्नान, नाई-बाहर, नकल भांड आ नेटुआ सहित कई नाटक, सामाजिक-धार्मिक प्रसंग गाथा एवं गीतों की रचना की है। उन्होने अपने नाटकों और गीत-नृत्यों के माध्यम से तत्कालीन भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों को सहज तरीके से नाच के मंच पर प्रस्तुत करने का काम किया था। उनके नाच में किया जाने वाला बिदेसिया उनका सबसे प्रसिद्ध नाटक है। 1930 से 1970 के बीच भिखारी ठाकुर की नाच मंडली आसाम एवं बंगाल के कई शहरों में जा कर टिकट पर नाच दिखती थी। बिलकुल सिनेमा जैसा। सिनेमा के समानान्तर। भिखारी ठाकुर के नाटक आज भी प्रासंगिक हैं। 

तत्कालीन समाज एवं नाच

भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर, 1887 को बिहार राज्य के छपरा जिले के छोटे से गाँव क़ुतुबपुर के एक सामान्य नाई परिवार में हुआ था। पिता दलसिंगार ठाकुर एवं मां शिवकली देवी सहित पूरा परिवार जज़मानी व्यवस्था के अंतर्गत अपना जातिगत पेशा (हजामत बनाना, चिट्ठी नेवतना, शादी-विवाह, जन्म-श्राद्ध एवं अन्य अनुष्ठानों तथा संस्कारों के कार्य) किया करता था। परिवार में दूर तक गीत, संगीत, नृत्य, नाटक का कोई माहौल नहीं था। भिखारी ठाकुर ने अपनी जीवनी गीत में लिखा है कि जब वो नौ वर्ष के थे तब वे पढ़ने के लिए स्कूल जाना शुरू किया। एक वर्ष तक स्कूल जाने के बाद भी उन्हें एक भी अक्षर का ज्ञान नहीं हुआ तब वो अपने घर के गाय को चराने लगे। धीरे-धीरे अपने परिवार के जातिगत पेशे के अंतर्गत हजामत बनाने का काम भी करने लगे। जब हजामत का काम करने लगे तब उन्हें दुबारा से पढ़ने लिखने की इच्छा हुई। गाँव के ही भगवान साह नामक बनिया लड़के ने उन्हें पढ़ाया। तब जा कर उन्हें अक्षर ज्ञान हुआ। उनकी शादी हो गई। उसके बाद वो हजामत बना कर रोज़ी-रोटी कमाने की मक़सद से खड़गपुर (बंगाल) चले गए। वहाँ से फिर मेदनीपुर (बंगाल) गए तथा वहाँ रामलीला देखा। कुछ समय बाद वो बंगाल से वापस अपने गाँव आ गए तथा गाँव के लोगों को इकट्ठा कर रामलीला का मंचन भी किया। परंतु जल्द ही उन्होंने रामलीला को छोड़ कर अपनी नाच मंडली बना ली।

भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर, 1887-10 जुलाई, 1971)

तब के समय यानि भिखारी ठाकुर के नाच मंडली बनाने से पूर्व ही उस क्षेत्र में नाच निम्न जाति-वर्ग के अभिव्यक्ति एवं मनोरंजन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण विधा रहा है। नाच के अधिकतर कलाकार निम्न जाति-वर्ग से होते थे। स्त्री पात्र का अभिनय भी पुरुष ही करते थे, जिन्हें लौंडा कहा जाता था। समाज में इस विधा से जुड़े कलाकारों को कुछ ख़ास वर्गों द्वारा हमेशा हेय दृष्टि से देखा जाता था। इन सभी सामाजिक परिस्थितियों को जानते-समझते हुए भी भिखारी ठाकुर ने मनोरंजन के इस विधा को चुना एवं उसमें अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्ति किया। 

बहुजनों को किया शामिल

भिखारी ठाकुर ने जिस नाच विधा को चुना उस विधा में पहले से ही बहुजन समाज (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग तथा धार्मिक अल्पसंख्यक) लोग कार्य करते थे। उन्होंने अपनी मंडली में भी बिंद, यादव, लोहार, नाई, कहार, मनसुर, कनैया, रविदास, कुम्हार, गोंड, दुसाध, पासी, भांट जाति के कलाकारों तरजीह दी। इन निम्न जाति के कलाकारों को शामिल करने के पीछे कारण यह रहा है कि एक तो ये कि नाच विधा निम्न जाति के लोगों का ही जन्माया एवं बड़ा किया हुआ है तथा दूसरा यह भी की भिखारी ठाकुर यह चाहते थे कि कला के द्वारा समाज में हाशिए के लोग थोड़ा बेहतर ढंग से जीविकोपार्जन कर सके। यानि कहीं न कहीं भिखारी ठाकुर को इस बात की चिंता रहती थी कि बहुजन समाज का कल्याण हो। तभी तो भिखारी ठाकुर बिना पैसे लिए कोई भी कार्यक्रम नहीं करते थे। परफॉर्मेंस क्यों बना रहे हैं? किस तरह बना रहे हैं? और किसके लिए बना रहे हैं? जैसे आधारभूत प्रश्नों से भिखारी ठाकुर अवगत थे। भिखारी ठाकुर ही नहीं नाच विधा के सभी कलाकार यह मानते हैं कि “नाच जोड़ने-जोगाने की चीज है, तोड़ने-लुटाने की नहीं”। यहां पर जोड़ने का मतलब है कि समाज के सभी लोग कैसे एकजुट हो कर परफॉर्मेंस देखें। यानि सामूहिकता का भाव। जोगाने का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति चाहे वो अमीर हो या गरीब सबके मौके के लिए यह नाच उपलब्ध रहना चाहिए। सबका मान सम्मान बना रहना चाहिए। कई बार किसी दिन विशेष को नाच दल के सट्टा बयाना को ले कर पैसे वाले लोग पैसे के बल पर खूब ज़ोर आजमाइश करना चाहते हैं, परंतु भिखारी ठाकुर के नाच में यह देखा गया है कि जो सबसे पहले आ कर सट्टा बयाना कर जाता है मंडली उसी के यहाँ कार्यक्रम देने जाया करती थी। चाहे दूसरे लोग कितना भी पैसा दे मंडली उस तारीख पर नहीं जाती। इस तरह नाच सबकी इज्जत जोगाये (बनाए) रखता है। भिखारी ठाकुर के इस सोच में कहीं न कहीं का बहुजन यानि बहुसंख्यक के हित और सुख का भाव छिपा हुआ है। 

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भिखारी ठाकुर के नाटकों एवं प्रसंगों के विषय-वस्तु

भिखारी ठाकुर ने जब अपना नाच शुरू किया तब धर्म एवं धार्मिक कथाओं आधारित बिदापत नाच, रामलीला, रासलीला के साथ-साथ राजा-महाराजा के कहानियों से लैस नौटंकी विधा का चलन था। उस समय समाज में जाति और सामंती वर्चस्व, औपनिवेशिक विस्थापन सबसे बड़ी समस्या के रूप में विद्यमान थीं। जातीय भेदभाव, अशिक्षा, नशाखोरी, दहेज प्रथा, बेमेल विवाह, भाई-भाई में झगड़े जैसे बहुत सारी समस्याएँ थी। इसमें से अधिकतर समस्यायों में समाज का निम्न जाति-वर्ग यानि बहुजन समाज पिस रहा था। ऐसे सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति में भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में बहुजन समाज की समस्याओं को उजागर करने का तथा उन्हें जागृत करने का काम प्रमुखता से किया।  

बिदेसिया : यह भिखारी ठाकुर का सबसे प्रसिद्ध नाटक है। इस नाटक का मुख्य विषय विस्थापन है। इस नाटक में एक निम्न वर्ग के ऐसे परिवार को दिखाया गया है जो भूमिहीन है तथा परिवार का अकेला पुरुष रोजी-रोटी की तलाश में शहर विस्थापित होता है। यह एक प्रतिनिधिपरक कहानी है जो उस क्षेत्र में तब निम्न जाति-वर्ग के हर घर की सच्चाई थी। इस नाटक में घर में अकेली औरत का दर्द, शहर में पुरुष का पराए औरत के प्रति मोह को दिखाया गया है।

नाई बाहर : सामंतवादी समाज में यजमानी प्रथा के अंतर्गत नाई जाति के साथ क्या-क्या भेद-भाव होता है तथा इस विषय को भिखारी ठाकुर ने बहुत प्रमुखता से इस नाटक में उभारा है। 

बेटी-बेचवा : इस नाटक का मुख्य विषय तत्कालीन समाज में व्याप्त बेमेल विवाह है। इस नाटक में यह दिखाया गया है कि किस तरह अमीर ज़मींदार लोग बुढ़ापे में भी निम्न जाति-वर्ग के ग़रीबों की कम उम्र की लड़कियों को ख़रीद कर उनसे शादी कर उनकी ज़िंदगी बर्बाद करते थे। 

पिया निसइल : भोजपुरी समाज के बहुसंख्यक आबादी के लिए नशाखोरी एक बड़ी समस्या है। ख़ास कर औरतों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है जब उसका पति या बेटा शराबी हो जाता है। यह समस्या निम्न जाति-वर्ग में अधिक विद्यमान रहा है। इस नाटक में भिखारी ठाकुर ने बहुजन समाज की इस समस्या को रेखांकित किया है। 

बिरहा-बहार : इस नाटक की कहानी में दलित वर्ग के धोबी-धोबिन का मुख्य किरदार है। समाज में कपड़ा धोने वाले धोबी के महत्व को इस नाटक में दिखाया गया है। भिखारी ठाकुर ने इस नाटक में कपड़ा धुलने वाले धोबी-धोबिन की तुलना आत्मा धोने वाले ईश्वर से की है।  

नकल भांड आ नेटुआ के : भोजपुरी क्षेत्र में भांड एवं नेटुआ परफ़ॉर्मेंस का एक ऐसा फ़ॉर्म है जिसमें गीत-संगीत, नृत्य एवं अभिनय समाहित है। भिखारी ठाकुर इस इस लोकप्रिय फ़ॉर्म का इस्तेमाल अपने नाच में किया है। नकल भांड आ नेटुआ के एकपात्री नाटक है जिसमें सामाजिक कुरितों पर गहरा व्यंग है। भांड या भांट और नेटुआ आज भी हाशिए का समाज है। 

चौवर्ण पदवीं : यह भी गाथा गायन की शैली है जिसमें समाज में फैले जाति व्यवस्था पर गम्भीर कटाक्ष है। समाज के चारों वर्णों के मेल-मिलाप को भिखारी ठाकुर ने इस प्रसंग में उठाया है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि भिखारी ठाकुर सम्पूर्ण कार्यों का अधिकतम भाग बहुजन समाज के समस्याओं पर आधारित है। मनोरंजन, सामाजिक संदेश, जीवन-यापन, सबके लिए उपलब्धता, सबका प्रतिनिधित्व जैसे विविध पहलू भिखारी ठाकुर के नाच को एक ऐसी सामूहिक कला बनाती है जिसके मूल में ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ की अवधारणा निहित दिखाई पड़ती है। 

(संपादन : नवल)


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