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रजनी तिलक : हम सोने के लिए नहीं, जागने के लिए बने हैं

दिन हो या रात रजनी तिलक हमेशा आंदोलन के मोड में रहीं। सावित्रीबाई फुले उनका आदर्श और उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा थीं। जैसे एक कुशल अभिनेता अपनी भूमिका में खो जाता है, वैसे ही रजनी ने अपने जीवन में सावित्रीबाई फुले को जीया। बता रहे हैं कंवल भारती जिनका रजनी तिलक से विशेष सरोकार रहा

रजनी तिलक (27 मई 1958 – 30 मार्च 2018) पर विशेष

रजनी तिलक से मेरा कब परिचय हुआ, इसकी न तारीख याद है और न वर्ष। यह भी पता नहीं कि वह अवसर क्या था? दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी मैं वर्ष और तारीख का पता लगाने में कामयाब नहीं हो सका। यादों का अंबार इतना बड़ा है कि उसे समेटना एक किताब में भी संभव नहीं। उसकी चिट्ठियां ही इतनी सारी हैं कि अगर मैं उनका संकलन कर दूँ, तो उसी से उसका जीवन-संघर्ष सामने आ जायेगा। कितनी सारी मुलाकातें हुई हैं, कि गिनती नहीं की जा सकती। दिल्ली में पीतमपुरा, रोहिणी, तीमारपुर, मॉडल टाउन और वजीराबाद के मकानों में, मुलाकतें हुई हैं, वहां ठहरा हूँ। राजघाट में गाँधी दर्शन केंद्र के उसके कार्यालय में, अनीता भारती के शालीमार बाग़ के घर में, दरिया गंज में, कनाट प्लेस में, पैदल टहलते हुए, होटलों में लंच करते हुए, कॉफी पीते हुए. रांची में, नागपुर में, हिंगनघाट में, हैदराबाद के सोशल फोरम में, लखनऊ में, कालका के एचएमटी परिसर में, मेट्रो में, ट्रेनों में, बसों में, और अनगिनत कार्यक्रमों में उसके साथ बोलने-बतियाने, लड़ने-झगड़ने और हास-परिहास के ढेरों किस्से हैं। कितनी ही बार मेरे दिल्ली जाने पर वह मुझे स्टेशन लेने आती और जब मैं वापिस आता, तो वह खुद भी स्टेशन या बस अड्डे तक साथ आती। जितना आत्मीय और पारिवारिक रिश्ता रजनी से मेरा बना, वैसा रिश्ता आज तक किसी व्यक्ति से नहीं बना। हम दोनों ऐसे दोस्त थे कि एक दूसरे से अपना सुख-दुःख साझा करते रहते थे। जब मोबाइल नहीं आया था, तब उसके पास पेजर हुआ करता था। एक बार दिल्ली के किसी टॉकिज में हम कोई पिक्चर देख रहे थे। उसके पेजर पर किसी का मैसेज आया। तब तक मैंने पेजर नाम के यंत्र को नहीं देखा था। संचार के हर आधुनिक माध्यम का वह उपयोग करती थी। पेजर ज्यादा आम नहीं हुआ था। कुछ कामकाजी लोगों के पास ही वह हुआ करता था। अभी तक वह पत्रों का ही युग था। और वह पत्र ही लिखा करती थी। जब मोबाइल युग आया, तो फिर हमारी बातें सामाजिक और व्यक्तिगत विषयों पर फोन पर होती रहती थीं। वह बहुत भावुक इंसान थी, जो अपने मिशन के साथ-साथ अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी। उसके जीवन में एक समय ऐसा भी आया था, जब उसके परिवार में दरार पड़ी। उसकी बहिन अनीता भारती से मुकदमेबाजी हुई, सत्या और उसके बीच, जो उसे मां मानकर उसके पैर छूता था, उसे अवैध सम्बन्धों के आरोप झेलने पड़े, जिसमें उसकी बेटी ज्योति तक ने माँ का साथ छोड़ दिया था। इन घटनाओं से वह इतनी विचलित और व्यथित हुई थी कि फोन पर बात करते हुए फफक पड़ती थी। तब मैं उसे कहता था, ‘रजनी, तुम्हारी कद्र ये लोग तुम्हारे बाद करेंगे।’ और सचमुच वह इस दुनिया से जाने के बाद सबको अपना कद बता गयी, परिवार के उन सदस्यों को भी, जो उसके महत्व को समझते ही नहीं थे। उसके परिवार के कई लोग मुझसे वैर रखते थे, शायद उसकी बेटी भी, और इसका कारण यही था कि मैं रजनी के साथ खड़ा था।

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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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