शोषण और उत्पीड़न के अनुभव से खड़ा हुआ आर.एल. चंदापुरी का पिछड़ा वर्ग आंदोलन

राम लखन चंदापुरी भारतीय समाज के सभी दलित, आदिवासी, पिछड़ा और धर्मपरिवर्तित अल्पसंख्यकों को पिछड़ा-बहुजन समाज मानते थे। उन्होंने देश को आजादी मिलने के बाद असमतावादी व्यवस्था के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा। नवल किशोर कुमार बता रहे हैं कि यह बहुजनों का मुक्ति संग्राम था जो तब से लेकर आज तक देश के सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन की दिशा का निर्धारण कर रहा है

अमूमन यह कहा जाता है कि बिहार की धरती देश की राजनीतिक प्रयोगशाला रही है। इसके पीछे कुछ कारण भी हैं। पहला यह कि यहां की वैशाली में दुनिया के पहले गणराज्यों में से एक की स्थापना हुई थी, जिसकी बुनियाद लोकतांत्रिक व्यवस्था थी। दूसरा, गांधी का चंपारण सत्याग्रह, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम स्थान हासिल है। यह भी  बताया जाता है कि गांधी के नेतृत्व में बिहार ने अंग्रेजों से पहली लड़ाई जीती। साथ ही यह भी कि यहां प्रयोग किया गया सत्याग्रह देश की आजादी का कारण बना। तीसरा 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन जिसके कारण इंदिरा गांधी 1977 में सत्ता से बेदखल हो गईं। 

लेकिन यह सिक्के का सिर्फ एक पक्ष ही है। दूसरा पक्ष यह है कि बिहार में बहुसंख्यक वंचितों का संघर्ष ही वह चीज़ है जो बिहार को पूरे मुल्क से अलहदा करती है। इसमें 1930 के दशक में शुरू हुआ त्रिवेणी संघ आंदोलन शामिल है जिसने बिहार के दलितों और पिछड़ों को एक मंच पर लाकर शासक वर्ग के विरुद्ध खड़ा कर दिया। लेकिन यह आंदोलन अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहा। इसके संस्थापक सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जे. एन. पी. मेहता आदि ने जो सपना देखा था, वह पूरा न हो सका। हालांकि इस आंदोलन के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव को आज भी महसूस किया जा सकता है।

जिन दिनों बिहार में त्रिवेणी संघ राजनीतिक मोर्चे पर परवान चढ़ा और फिर विखंडन का शिकार हुआ, उस समय रामलखन चंदापुरी किशोर थे। उनका जन्म पटना के मसौढ़ी के चंदापुर नामक गांव में 20 नवंबर, 1923 को हुआ था। कुर्मी जाति (पिछड़े वर्ग) के मध्यम किसान परिवार में जन्मे चंदापुरी ने त्रिवेणी संघ की मशाल को जलाए रखा। 

उन्होंने पिछड़ा वर्ग आंदोलन चलाया, जिसका मकसद ही बहुसंख्यक वर्ग के हितों को लेकर आवाज बुलंद करना था। इस संबंध में 1949 में चंदापुरी ने कहा था, “जब कभी भारत में क्रांति का उद्घोष होगा तो उसका नेतृत्व पिछड़ी जाति के लोग ही करेंगे।” वे अपने “पिछड़ा वर्ग संघ” के बैनर तले संविधान निर्माण के समय से ही संविधान में पिछड़ों के लिए विशेष अवसर और आरक्षण संबंधी धारा 340 जुड़वाने, देश में पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन, उसकी सिफारिशों को देश में लागू करवाने एवं बिहार में पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिलवाने के लिए आंदोलनात्मक प्रयास करते रहे। इसके लिए वे संविधान  सभा और डॉ. भीमराव आंबेडकर के संपर्क में बराबर रहे।

सन् 1971 में पटना के गांधी मैदान में सभा को संबोधित करते आर. एल. चंदापुरी। इसी सभा में उन्होंने कहा था कि “मैं अपने जीवन में ही दलित पिछड़ा वर्ग राज देखूंगा”

वे चाहते थे कि जिस तरह महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी दलित चेतना जागृत हो। इसी मकसद से उन्होंने डॉ. आंबेडकर से पटना आने का अनुरोध किया और डॉ. आंबेडकर युवा आर. एल. चंदापुरी के अनुरोध को नहीं ठुकरा सके। वे 6 नवंबर, 1951 को पटना पहुंचे। हालांकि जब डॉ. आंबेडकर कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे तब सामंती ताकतों ने उनका विरोध किया। आंबेडकर के खिलाफ भीड़ जब हिंसक होने लगी तब चंदापुरी ने आगे बढ़कर उनकी रक्षा की। 

चंदापुरी पर आधारित इस लेख का उद्देश्य उन घटनाओं को उद्धृत करना है जिनके कारण उनके मन में बहुसंख्यक वर्ग पर होने वाले अत्याचार, शोषण और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने का विचार आया। इस संबंध में आर. एल. चंदापुरी ने 1996 में प्रकाशित अपनी किताब “भारत में ब्राह्मण राज और पिछड़ा वर्ग आंदोलन” में विस्तार से बताया है। अपने विचारों के प्रति उनकी दृढता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अपनी किताब के समर्मण पृष्ठ पर उन्होंने लिखा है – “समर्पित उनको, जो सामाजिक न्याय एवं अवैदिक व्यवस्था के पुनर्स्थापन के लिए मरे और जूझ रहे हैं”।

वह पहली घटना जिसने उन्हें इस बात का अहसास कराया कि वे उस जाति से नहीं हैं जो समाज में सम्मान पाती है, तब हुई जब वे महज सात वर्ष के थे। उनके मुताबिक, “जब मेरी उम्र करीब 7 वर्ष की थी, मेरे वयोवृद्ध पितामह (दादा) रामरूच महतो एक खटोली पर अपने गांव चंदापुर से मसौढ़ी जा रहे थे। मैं भी उनके साथ खटोली में था। उस समय पटना-गया रेलवे लाईन पर मसौढ़ी एक ग्रामीण बाजार था, जहां रेलगाड़ियां ठहरा करती थीं। खटोली के विपरीत दिशा से हाथी पर सवार एक रोबदार व्यक्ति आ रहा था। उसे देखते ही मेरे पितामह खटोली से उतर गए। उस व्यक्ति ने पूछा कि खटोली में बैठा बालक कौन है? मेरे पितामह ने कहा – यह बालक मेरा पोता है। यह कहते हुए उन्होंने मुझे भी खटोली से उतार दिया। हाथी के आगे बढ़ते ही मेरे पितामह ने मुझे खटोली पर बिठाया और मसौढ़ी में अपना कार्य पूरा कर गांव वापस लौट गए। मैं एक बालक था फिर भी उस घटना के प्रति मुझमें जिज्ञासा उत्पन्न हुई। मैंने अपने पितामह से पूछा कि हाथी पर सवार व्यक्ति को देखते ही आपको और मुझे खटोली से नीचे क्यों उतर जाना पड़ा। उन्होंने कहा कि हाथी पर सवार व्यक्ति जमींदार है और जाति का भूमिहार ब्राह्मण है। वह उच्च जाति का है। मैं उसके सामने खटोली पर बैठकर आना-जाना नहीं कर सकता हूं। मैंने सोचा कि इलाके भर में मेरे पितामह सबसे योग्य व्यक्ति हैं। इलाके के सभी रामायणी उनके शिष्य हैं, फिर वे छोटे कैसे हो गए?” 

युवा आर. एल. चंदापुरी

बता दें कि मसौढ़ी, पटना जिले का दक्षिणी इलाका है जहां बहुसंख्यक आबादी दलित व पिछड़े समाज की रही है। एक दूसरी घटना का जिक्र करते हुए चंदापुरी लिखते हैं कि “सन् 1934 में मैं मसौढ़ी के अपर प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा का छात्र था। मेरे सहपाठियों में यादव जाति का एक छात्र था। पढ़ने में उसकी गति मंद थी। स्कूल के प्रधानाध्यापक निर्धिन्न सिंह भूमिहार ब्राह्मण जाति के थे। वे उस छात्र से यह कहकर कि यादव जाति के माथे में गोबर भरा रहता है, बहुत मारपीट करते थे। और उसे कांटों पर मुंगली देकर घंटों सुला देते थे। कभी-कभी रात भर स्कूल के एक कमरे में लंगोटी पहनाकर वे उसे बंद कर दिया करते थे। इस दर्दनाक घटना से मैं मर्माहत हो जाता, किन्तु प्रधानाध्यपक को उस छात्र पर कुछ भी दया नहीं आती थी। अंत में उस छात्र को पढ़ाई ही छोड़ देनी पड़ी। उस समय मैंने सोचा था कि यदि वह छात्र यादव जाति का न होकर भूमिहार होता तो क्या उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया जाता?”

एक तीसरी घटना का जिक्र करते हुए चंदापुरी ने लिखा है कि “जब सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय पुलिस मेरा पीछा कर रही थी और मैं आजादी का दीवाना बना गांव-गांव भागा फिर रहा था। तब वीर गांव के नजदीक जो पटना जिला में है, मुझे मुसहरों (बिहार में दलित वर्ग की एक जाति) ने अपने यहां छिपाया था। मैंने तभी समझा कि हरिजन, आदिवासी, किसान और मजदूर ही सच्चे देशभक्त हैं और थोड़े से ब्राह्मण और सवर्ण जाति के लोग सत्ता और नेतागिरी के लिए ही आजादी के संग्राम में शामिल हैं। मैं उस समय इलाके में घोड़े के टाप वाला के नाम से जाना जाता था, क्योंकि पुलिस की पकड़ से बचने के लिए मैं घोड़े की चाल से भागता था।”

चंदापुरी जी की किताब “भारत में ब्राह्मणराज और पिछड़ा वर्ग आंदोलन” का मुख पृष्ठ

उन दिनों बहुसंख्यकों की मेधा को कैसे खारिज किया जाता था, इसका उदाहरण चंदापुरी ने अपने साथ हुई एक घटना से दिया है। वे लिखते हैं कि “सन् 1947 में पिताजी के जोर डालने पर मैंने डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद के लिए पब्लिक सर्विस कमीशन में साक्षात्कार दिया था। साक्षात्कार रांची में था। कमीशन के सदस्य रजनधारी सिंह ने मुझसे प्रथम प्रश्न किया, आप किस जाति के हैं? मैंने उत्तर दिया कि मैं अवधिया कुर्मी जाति का हूं। मेरे पहनावे और हाव-भाव को देखकर उन्होंने अंदाजा लगाया था कि मैं भूमिहार ब्राह्मण हूँ। उन्होंने दूसरा प्रश्न किया कि यदि आपको डिप्टी मजिस्ट्रेट बना दिया गया तो आप क्या करेंगे? मैंने जवाब दिया कि मैं अपने पद के उत्तरदायित्व को निभाने का प्रयत्न करूंगा। जनता की सेवा करने के साथ सबके प्रति एक समान बर्ताव और न्याय करूंगा। उन्होंने तीसरा प्रश्न किया था कि क्या आप प्रतिदिन मंदिर जाते हैं और भगवान राम, कृष्ण, हनुमान आदि देवताओं का दर्शन कर उनसे आशीर्वाद मांगते हैं? उत्तर में मैंने कहा था कि मैं मंदिर नहीं जाता हूं और पत्थर अथवा मिट्टी की मूर्तियों से आशीर्वाद नहीं मांगता हूं। इस पर कमीशन के दूसरे सदस्य मुझे अधिक बोलने से रोकने लगे। लेकिन मैं कैसे रूक सकता था? मुझे प्रश्नों का उत्तर तो देना ही था। डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद के लिए मेरा चयन नहीं हुआ। लेकिन इसके लिए मुझे कुछ भी खेद नहीं था। बिहार के मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, रजनधारी सिंह तथा कमीशन के सभी सदस्य ब्राह्मण ही थे।” 

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अपने संस्मरण में चंदापुरी लिखते हैं कि “देश में हुए सांप्रदायिक दंगे के बाद शांति मिशन के साथ महात्मा गांधी सन् 1947 में बिहार प्रांत के भीषण दंगाग्रस्त क्षेत्र मसौढ़ी आए थे तो उन्हें इस बात से हैरानी हुई थी कि वहां के मुसलमानों ने मेरे जैसे एक नवयुवक पर एकमत से विश्वास प्रकट किया और सवर्ण नेताओं पर दंगा भड़काने का आरोप लगाया था। इस पर गांधीजी ने मेरी काफी प्रशंसा की थी और कुछ दिनों के लिए शाहनवाज खान के आने तक मुझे पुनर्वास  के कार्य का उत्तरदायित्व सौंपा था। गांधीजी कट्टर हिंदू थे और उन्हें वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा में विश्वास था। किन्तु, मसौढ़ी की घटना के बाद उनके हृदय में परिवर्तन शुरू हो गया था। लेकिन तब तक पंडित नेहरू काे प्रधानमंत्री बनाकर वह देश का इतना बड़ा अहित कर चुके थे कि दलितों, शोषितों और पिछड़ों द्वारा सब प्रकार की कुर्बानी और त्याग किए जाने के बाद भी आज तक देश की स्थिति में किसी प्रकार का सुधार आना संभव नहीं हुआ है। मसौढ़ी की घटना के थोड़े दिनों के बाद ही गांधीजी ने देश में सच्चे सुराज के लिए एक किसान को प्रधानमंत्री तथा हरिजन की एक पुत्री को राष्ट्रपति बनाए जाने को लेकर अपने भाषण में बल दिया था। एक ‘यशस्वी’ ब्राह्मण युवक ने उनकी हत्या कर दी थी। ब्राह्मण समाज किसी शूद्र को तभी तक प्रचार द्वारा कागजी नेता बनाकर और पद देकर इस्तेमाल करता है जब तक वह उसके हित से बंधा रहता है।”

बहरहाल, ये वे चंद घटनाएं हैं जिनका आर एल चंदापुरी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ा वर्ग आंदोलन खड़ा किया। उनके बारे में आस्ट्रेलियाई विद्वान डॉ. स्टीफेन हेन्निंघम ने टिप्पणी की है – “आर. एल. चंदापुरी द्वारा संचालित दलित-पिछड़े समाज का मुक्ति-आंदोलन केवल सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है बल्कि यह विश्व-आंदोलन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य विश्व-बंधुत्व, भाईचारा, बराबरी एवं सामाजिक न्याय की स्थापना के जरिए एक उच्चतम मानव-संस्कृति का सृजन करना है।”

(संपादन: गोल्डी/अनिल/अमरीश)


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