भारत में मानवाधिकारों का सच बताता है दलित साहित्य

मानवाधिकारों की पैरवी हालांकि हर प्रगतिशील साहित्य करता आया है लेकिन दलित साहित्य, दलित समाज में हुए मानवाधिकार के हनन और इससे उपजी पीड़ा का धधकता दस्तावेज है। यह केवल समस्या को उजागर करने वाला साहित्य ही नहीं है बल्कि समस्या के निवारण का भी साहित्य है। बता रही हैं अनामिका अनु

हम मानव एक निश्चित गुणसूत्र संख्या के साथ पैदा होते हैं।  हम सब की मूलभूत आवश्यकताएं भी एक सी हैं। इसलिए मानव के रूप में जन्म लेते ही मानवाधिकार हमें मिल जाने चाहिए (नहीं मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है)। फिर चाहे हम किसी भी समाज का हिस्सा क्यों न हो। हम सबों में  प्रेम और सम्मान पाने की एक सी लालसा होती है। हम सब की आंखों में  शिक्षा और रोजगार के समान अवसर के स्वप्न भी एक से ही हैं। हमारी भूख और प्यास एक है। फिर भी जन्म से मृत्यु तक लगातार रंग, जाति, अर्थ, धर्म, देश, लिंग के आधार पर मूलभूत मानवीय गरिमा का हनन किया जाता है। 

सवाल यह है कि हम कहां पैदा होंगे, हमारी चमड़ी का रंग कैसा होगा, यह हम तय नहीं करते। हमारे माता-पिता कौन होंगे और लिंग, जाति और धर्म क्या होगा, यह सब हम तय नहीं करते। लेकिन इनके कारण हमारे मानवाधिकार कम नहीं होते। ये न ही हमारे महिमामंडन का कारण बन सकते हैं और ना ही उपहास का। मगर इन चीजों का सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक प्रभाव चौंकाने वाला है और ये चीजें समतामूलक लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में बारंबार रोडे़ अटकाती रही हैं। इन्हीं कारणों से वंचित और संचित दो वर्ग उभर कर सामने आए हैं जिनके बीच गंभीर आर्थिक और सामाजिक खाई है। जिसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस विभेद की प्रक्रिया ने वंचितों के मानवाधिकार का गंभीर हनन किया है। इन्हीं वंचितों की श्रेणी में हमारा दलित समाज भी आता है, जिसे जन्म से मृत्यु तक शोषण के अमानवीय कुचक्रों में लम्बे समय से फंसा कर रखा गया है। इसी जातिगत विभेद ने उच्च जातियों को संसाधनों का मालिक और अनुसूचित जातियों को मजदूर और मजबूर बना दिया । 

दमन ने दलितों में आक्रोश तो पहले से ही भर रखा था। शिक्षा, औद्योगिकीकरण, समाज सुधार आंदोलनों और दलित जागरण ने इन्हें अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। दलित चेतना आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई। दलित साहित्य इसी दलित विमर्श से पैदा हुआ और दलित जागरण ने इसके लिए ठोस जमीन तैयार की।आज यह दलित आंदोलन की एक जीवंत और महत्वपूर्ण धारा बन चुकी है। सबसे पहले दक्षिण भारतीय भाषाओं में ऐसा साहित्य आया, फिर मराठी भाषा में इस साहित्य की प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की गयी और बाद में यह हिंदी साहित्य में  भी एक बुलंद आवाज के साथ इसका आगमन हुआ। 

मानवाधिकार की पैरवी हालांकि हर प्रगतिशील साहित्य करता आया है लेकिन दलित साहित्य, दलित समाज में  हुए मानवाधिकारों के हनन और इससे उपजी पीड़ा का धधकता दस्तावेज है। यह केवल समस्या को उजागर करने वाला साहित्य ही नहीं है, बल्कि समस्या के निवारण का भी साहित्य है। 

समाज प्रारंभ से ही दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित रहा है। पहला मजबूत / ताकतवर वर्ग यानी संसाधनों से संपन्न

दूसरा कमजोर वर्ग यानी संसाधनों से वंचित। पहले (ताकतवर) वर्ग ने यथासंभव दूसरे वर्ग का उपयोग, शोषण अपने संसाधनों के संवर्धन और विकास के लिए किया है और उसका एक वाजिब हिस्सा इन श्रमजीवी वर्ग को देने से बचते भी रहे हैं। इस सतत प्रक्रिया ने एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक खाई पैदा कर दी है। आज का समय इस खाई को पाटने की मांग करता है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि साहित्य, धर्म और राजनीति में दलित विमर्श आदिकाल से चला आ रहा है। बुद्ध, कबीर, रैदास, नानक इस सब ने समय-समय पर जाति व्यवस्था की आलोचना की है। जोतीराव फुले, डाॅ. आम्बेडकर, पेरियार, नारायण गुरु आदि ने दलित विमर्श को नये आयाम प्रदान किये हैं। दक्षिण केरल के एक साधारण परिवार में जन्मे नारायण गुरू ने नैयर नदी के किनारे देश का संभवत: पहला ऐसा मंदिर बनाया जहां बिना किसी जातिगत भेदभाव के लोग पूजा कर सकते थे। उन्हें सवर्ण जाति के जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। उन्होंने इससे विचलित हुए बिना सामाजिक आंदोलन का सूत्रपात किया और जातिविहीन समाज, सहभोज और अंतर्जातीय विवाह की वकालत की। यह भी अपने आप में एक अनूठा आंदोलन था, जो सभी मनुष्यों को एक ही जाति का मानता था, वह जाति थी – मानवजाति। 

दलित साहित्य में  स्वानुभूति और सहानुभूति

पहले दलित साहित्य ने दक्षिण भारतीय भाषाओं और मराठी भाषा में दस्तक दी। धीरे-धीरे यह हर भाषा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी। इस दौरान कुछ बेहद संवेदनशील आत्मकथाएं लिखी गयी, जिनने इस वर्ग के दर्द, संघर्ष और संवेदना को साहित्य के जरिए लोगों तक पहुंचाया। अनुभूति का यह सिक्का मोल लाया हृदय का वह कोर और मस्तिष्क का वह छोर जो अब तक चाह कर भी सहानुभूति के नोट नहीं मोल पाया था। ये वे कहानियां थीं, जो भोगे हुए लोगों ने लिखी थीं। इन कहानियों को उन्होंने जीया था। इन कहानियों ने साहित्य के मर्म में वह स्वर जोड़ दिया जो अब तक मूक था।

(बायें से दायें) ओमप्रकाश वाल्मिकी, रजनीतिलक, जयप्रकाश कर्दम, तुलसीराम, मोहनदास नैमिशराय

बिना भोगे उस यथार्थ के जड़ों में पैठ बना पाना दुर्लभ कार्य है। हालांकि परकाया प्रवेश की विद्या से कभी-कभी साहित्यकार यह संभव कर पाता है। परंतु यह विद्या दुर्लभ है। इसलिए यह सही ही है कि दलित साहित्य जब दलित साहित्यकारों के द्वारा लिखा जाता है तो यह ज्यादा यथार्थपूर्ण, प्रभावी और संवेदनशील होता है।

दलित आत्मकथाओं का साहित्य

दलित साहित्य, दलित विमर्श से पैदा हुआ है और यह दलित आंदोलन की एक धारा है। यह महज साहित्य ही नहीं है यह संवाद, विमर्श, चिंतन, संघर्ष और समतामूलक, लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण टूल (औजार) है। दलित साहित्य में लिखी गयी आत्मकथाओं ने स्वानुभूति को जन-जन तक पहुंचाया है। इससे हर वर्ग में न केवल सहानुभूति का माहौल बना है, बल्कि इस क्रूर व्यवस्था को बदलने का प्रण भी मजबूत हुआ है। मसलन, मोहनदास नैमिशराय की ‘अपने-अपने पिंजरे’, ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’, सूरजपाल चौहान की ‘तिरस्कृत’, तुलसीराम की ‘मुर्दहिया’ और कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’। ये आत्मकथाएं दलित जीवन के दर्द और मूलभूत जरूरतों की पूर्ति हेतु किये गए संघर्ष का बोलता दस्तावेज़ हैं जो मानवाधिकारों के गंभीर हनन की घटनाओं से भरा पड़ा है। इस संदर्भ में उपन्यासों यथा ‘छप्पर’ (जयप्रकाश कर्दम), ‘मुक्तिपर्व’ (मोहनदास नैमिशराय), ‘नरवानर’ (शरणकुमार लिम्बाले), ‘मिट्टी की सुगंध’ (प्रेम कपाड़िया) और ‘काला पहाड़’ (भगवान दास मोरवाल) का अवलोकन किया जा सकता है। 

दलित आंदोलन को नई धार देतीं कविताएं 

गद्य की तरह पद्य में भी दलित वर्ग के संघर्ष की मुखर अभिव्यक्ति सामने आई है। काव्य संग्रह सामाजिक विसंगतियों को सामने लाने में  सफल रहे हैं। इन विसंगतियों के निराकरण की ज़मीन गढ़ कर और संघर्ष को स्वर देकर इन कविताओं ने दलित आंदोलन को मुकम्मल आवाज दी है। ये कविताएँ दलित आंदोलन के सूत्र वाक्य गढ़ती हैं। ये दलित आंदोलन का नारा बनती हैं। ये दलित आंदोलन का गंभीर स्वर हैं। महत्वपूर्ण काव्य संग्रहों में ओम प्रकाश वाल्मीकि का काव्य संग्रह ‘सदियों का संताप’ ‘बस्स बहुत हो चुका’ के अलावा कुसुम वियोगी का काव्य संग्रह ‘टुकड़े-टुकड़े दंश’ और जयप्रकाश कर्दम का काव्य संग्रह ‘गूंगा नहीं था मैं’ का उदाहरण दिया जा सकता है। 

दलितों के मानवाधिकारों का किस तरह उल्लंघन हुआ है, इसकी मुखर अभिव्यक्ति ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुँआ’ में हुई है। यह कविता सभी संसाधनों पर नाग की तरह कुंडली डाल कर बैठे सवर्ण समाज की पोल खोलती है। यह कविता बताती है कि कैसे दलितों की प्यास और भूख भी संपन्न सवर्णों के यहां बंधक बनी हुई है। बिना सवर्णों की इजाज़त के न वे पानी पी सकते हैं और ना ही अन्न पा सकते हैं। उनकी मेहनत मूल्यहीन और उनकी दशा सदैव विपन्न बनी रही। उन्हें मालिकाना हक मिलना तो दूर उनके साथ पशुवत व्यवहार किया गया है। 

चूल्‍हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का।

भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का।

बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की।

कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्‍ले ठाकुर के
फिर अपना क्‍या?
गाँव?
शहर?
देश?

इसी प्रकार मलखान सिंह की आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखी गयी कविताएं दलित विमर्श की आवश्यकता के प्रश्न का सटीक उत्तर हैं। ये कविताएं बताती हैं कि कैसे दलित भाई-बहनों के साथ अमानवीय व्यवहार होता रहा है। ये दलित समाज पर हो रही हिंसा को सीधे व्यक्त करते हैं जो सरलता से मानव मन को छूती और आंदोलित करती है। एक जगह ये लिखते हैं –

“मैं आदमी नहीं हूँ स्साब
जानवर हूँ
दो पाया जानवर” 

वे दलित समाज पर उठे हिंसक हाथों का जिक्र अपनी कविता में करते हुए कहते हैं –

मेरी ख़ुद की थूथन पर
अनगिनत चोटों के निशान हैं”  

मलखान सिंह की कविता ‘सुनो ब्राह्मण’ दलित साहित्य में एक नजीर है जो वर्णवादियों को पूरी ताकत से ललकारती है। 

सुनो ब्राह्मण 

सुनो ब्राह्मण,
हमारे पसीने से बू आती है, तुम्हें।
तुम, हमारे साथ आओ
चमड़ा पकाएंगे दोनों मिल-बैठकर।
शाम को थककर पसर जाओ धरती पर
सूँघो खुद को
बेटों को, बेटियों को
तभी जान पाओगे तुम
जीवन की गंध को
बलवती होती है जो
देह की गंध से।

मानवाधिकार की कसौटी पर दलित साहित्य

दस दिसम्बर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक मानवाधिकार का घोषणापत्र जारी करते हुए यह माना था कि यह मानव के मूलभूत अधिकारों की रक्षा करेगा। दुनिया के हर कोने में रहने वाले लोगों को बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता, समानता और न्याय मिलेगा। जिस समय मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्वीकृति मिली, इस समय भारत अपने संविधान के निर्माण की प्रक्रिया में लगा था। भारतीय संविधान निर्माताओं ने मानवाधिकारों को ध्यान में रख कर हमारे मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों का निर्माण किया ताकि इन अधिकारों को अंगीकृत व आत्मसात किया जा सके। ये मौलिक अधिकार वास्तव में मानवाधिकार को महत्वपूर्ण कवच प्रदान करते हैं। मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों में जिस तरह से हमने मानवाधिकार को अंगीकृत और आत्मसात किया है वह न्यायप्रिय और समतामूलक समाज में मजबूत मानवीय अधिकारों की अनिवार्य आवश्यकता को बताता है। 

दलित साहित्य, दलित समाज के मानवाधिकार हनन की घटनाओं को सामने लाया है। इसे कुछ उदाहरण द्वारा सरलता से समझा जा सकता है। एक उदाहरण है प्रेम कपाड़िया का उपन्यास ‘मिट्टी की सौगंध’। इसमें मानवाधिकार के अनुच्छेद 3 और 5 में वर्णित मूलभूत अधिकार के हनन को दर्शाया गया है और दलितों पर हो रहे अत्याचारों की तरफ समाज, सत्ता और न्याय व्यवस्था का ध्यान आकर्षित करने की साहित्यिक चेष्टा की गयी है। इस उपन्यास में दलित महिलाओं के शारीरिक, मानसिक शोषण पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है। जबकि मानवाधिकार घोषणापत्र के अनुच्छेद 5 में कहा गया है किसी को भी शारीरिक यातना न दी जाएगी और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानुषिक या अपमानजनक व्यवहार होगा।

एक दूसरा उदाहरण ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘शवयात्रा’ है। यह कहानी उच्च जातियों के दोष को ही नहीं, बल्कि जातियों में बंटे दलित समाज में भी हो रहे मानवाधिकार हनन को भी बड़े मार्मिक तरीके से प्रस्तुत करती है। इस कहानी में मृत बच्ची के शव को सहारा देने के लिए भी कोई तैयार नहीं था। शव को जलाने के लिए लकड़ी और जमीन तक नहीं देने वाले समाज की काष्ठ निर्ममता पर से पर्दा उठाती यह कहानी पाठकों को झकझोर कर रख देती है। अपने श्रम के पैसे से भी अपना घर पक्का करने के लिए जिस तरह से ऊँची जाति के ठेकेदारों के दरवाजे पर गुहार लगानी होती है और फिर भी अनुमति न मिलने पर मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। इस कहानी के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि किस तरह  दलित समाज को दबाया जाता रहा है। उच्च जाति का हर कमजोर तबके को डराना, धमकाना ताकि उनकी मंशा के विरूद्ध कोई भी इन कमजोर लोगों की मदद न करे। यह दलित समाज के पिछड़ेपन में तथाकथित ऊँची जातियों की भूमिका को इंगित करता है। मानो मूलभूत जरूरत और हर सुख केवल ऊँची जाति का अधिकार हो और वे किसी शोषित को उस तक नहीं पहुँचने देने हेतु किसी भी प्रकार की नाइंसाफ़ी और नृशंसता पर उतर आते हैं। 

ऐसे असंख्य उदाहरण दलित साहित्य में मिल जाएंगे जो मानवाधिकार के हनन को न केवल इंगित करते हैं बल्कि उससे उत्पन्न विसंगतियों, मनोवैज्ञानिक प्रभाव, विमर्श, क्रांति और न्याय के लिए उठे कदमों को भी बड़े जीवंत और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करते हैं। 

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, समाज मानव समुच्चय है। मानव है तो उसके नैसर्गिक मानवीय अधिकार हैं। इन अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़, अमानवीय और अनैतिक मानी जानी चाहिए। 

दलित, मानवाधिकार और वर्तमान भारत

भारत की जनसंख्या का लगभग 16.6 प्रतिशत दलित हैं। इनमें से अधिकतर भूमिहीन मजदूर हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक कानून के बावजूद इनके मानवाधिकारों का हनन होता आया है और हो रहा है। संविधान द्वारा पाए अधिकार को समाज बड़ी निर्ममता से छीन रहा है और सत्ता, पुलिस, न्याय-व्यवस्था आज भी लगभग मूक ही है। इन्हें जितने प्रभावी ढंग से इन घटनाओं का संज्ञान लेते हुए कारवाई करनी चाहिए, वे वैसा नहीं करे राजे हैं। आज भी हरियाणा, आंध्रप्रदेश, गुजरात, उड़ीसा, बिहार, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि में अस्पृश्यता का प्रचलन  है। रोहित वेमुला, गुना, भीम आर्मी, भीमा काेरेगांव की घटनाएं दलितों के साथ हो रहे गैरवाजिब व्यवहार को स्पष्टता के साथ इंगित करती है। बारात निकालने के प्रश्न पर, शादी में कार, घोड़े, कोट-टाई, शामियाना के प्रयोग पर, पक्का मकान बनाने पर जिस तरह से सवर्ण जाति के ठेकेदारों ने जुर्म किये हैं, वह भी कम अमानवीय नहीं है। दलित महिलाओं का बलात्कार कर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश, उन्हें डायन बताकर मैला पिलाने और नंगा करने की घटनाएं हमसे छिपी नहीं है। बलात्कार को जिस तरह नीचा दिखाने के औजार के रूप में  इस्तेमाल किया जा रहा है वह बेहद खतरनाक है। इन बलात्कारों पर जिस तरह से सवर्ण महिलाओं ने चुप्पी साध रखी है वह वास्तव में महिला अस्मिता के लिए लड़ने वाली पढ़ी लिखी सवर्ण महिलाओं की चेतना पर गंभीर प्रश्नचिन्ह है। 

बहरहाल, मानव के रूप में जन्म लेने भर से ही कुछ अधिकार उसकी झोली में आ जाते हैं या आ जाने चाहिए क्योंकि मनुष्य के रूप में यह उनका नैसर्गिक अधिकार है जिन्हें देने से कोई सभ्य समाज इंकार नहीं कर सकता। यही अधिकार मानवाधिकार कहलाते हैं। ये अधिकार मनुष्य को मनुष्य बने रहने के लिए बेहद जरूरी हैं और समतामूलक समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भारत के मौलिक अधिकार मानवाधिकार की आत्मा को अंतर्निहित किये हुए हैं, मगर रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था ने इनके क्रियान्वयन में गंभीर चुनौतियाँ खड़ी की है। दलित साहित्य ने समाज में हो रहे मानवाधिकार के हनन की घटनाओं को उजागर कर प्रशासन, न्याय-व्यवस्था और समाज को सचेत करने का काम किया है।

(संपादन : नवल/अमरीश)


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