पेरियार ललई सिंह यादव को छोड़ परशुराम के पीछे क्यों पड़े हैं अखिलेश-मायावती?

उत्तर भारत के शोषितों-पीड़ितों को द्विजवादियों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए पेरियार ललई सिंह यादव ने आजीवन संघर्ष किया। लेकिन आज उत्तरप्रदेश में दलित-बहुजनों की राजनीति करने वाले अखिलेश-मायावती के लिए परशुराम महत्वपूर्ण हो गए हैं। आर. के. गौतम का विश्लेषण

पेरियार ललई सिंह यादव (1 सितंबर, 1911 – 7 फरवरी, 1993) पर विशेष

भारतीय इतिहास में 19वीं व 20वीं शताब्दी पुनर्जागरण और समाजसुधार आंदोलनों का दौर रही है, जिसके प्रारंभ में मुख्य रूप से तीन केंद्र बने- पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्य। पश्चिम बंगाल में राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि समाजसुधार आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे थे। इन आंदोलनों के नेतृत्वकर्ता चूंकि द्विज थे अतः वे द्विज श्रेष्ठता को कायम रखने के उद्देश्य से
समाजसुधार का कार्यक्रम चला रहे थे। उन दिनों अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से एक ऐसा वर्ग तैयार हो रहा था जो द्विजवादी सामाजिक एवं धार्मिक शोषण व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करता अथवा दूसरे धर्म की ओर आकर्षित होता। बंगाल के समाज सुधारकों का मकसद इस वर्ग को संतुष्ट कर यथास्थिति बनाए रखना था। 

समाजसुधार आंदोलन का दूसरा केंद्र उर्वरा भूमि महाराष्ट्र में चल रहा था जो सीधे द्विज श्रेष्ठता एवं उनके सामाजिक-धार्मिक एकाधिकार को चुनौती दे रहा था। इसकी प्रथम क्रांतिकारी जोतीराव फुले थे और बाद में जिसे छत्रपति शाहूजी एवं डॉ. आंबेडकर ने आगे बढ़ाया। उधर दक्षिण भारत के राज्यों में वर्चस्ववादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष रंग ला रहा था।  बीसवीं सदी में इसका नेतृत्व करते हुए पेरियार ई. वी. रामास्वामी ने द्विजों को सीधी चुनौती दे डाली। रामास्वामी ने अपने ज्ञान और वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर  हिंदू धर्मशास्त्रों एवं शास्त्रों की उपज ईश्वर व देवी-देवताओं को एक सिरे से खारिज करते हुए आर्य श्रेष्ठता को नकार दिया। इनकी नज़र में रामायण धार्मिक नहीं बल्कि कल्पना आधारित एक ऐसी राजनीतिक पुस्तक है, जिसे द्विजों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व कायम करने हेतु लिखा है।

द्विजों के इन्हीं षड़यंत्रों का पर्दाफाश करने के लिए दक्षिणपूर्व एशिया के सुकरात कहे जाने वाले पेरियार ने 1944 में अनार्यदृष्टि से तमिल भाषा में ‘रामायण पादीरंगल’ नाम से पुस्तक लिखी, जिसका अंग्रेजी अनुवाद ‘द रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ नाम से 1959 में प्रकाशित हुआ। जब दक्षिण में पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर का द्रविड़ आंदोलन जोरों से चल रहा था, उसी समय उत्तर भारत में अगले पेरियार के रूप में एक सशक्त सामाजिक योद्धा ललई सिंह यादव सामने आए। ललई सिंह यादव ने 1933 में सशस्त्र पुलिस बल कंपनी जिला मुरैना मध्यप्रदेश में कांस्टेबल पद पर रहते हुए ‘नॉनग़ज़टेड मुलाजिमान पुलिस एंड आर्मी संघ’ की स्थापना की और उसके अध्यक्ष बने। ‘सोल्जर ऑफ दी वार’ की तर्ज पर ‘सिपाही की तबाही’ नामक किताब लिखी, जिसने सिपाहियों को क्रांति के पथ पर अग्रसर किया। 29 मार्च, 1947 को ग्वालियर राज्य स्वतंत्रता संग्राम हेतु पुलिस व आर्मी में हड़ताल करने के आरोप में वे बंदी बना लिये गए। वहां इन्होंने ‘कैदी महासभा’ बना डाली। बाद में वह 1948 में कैद से मुक्त हुए।

संघर्षों के आदी ललई सिंह यादव हिंदू धर्मग्रंथों यथा वेद -पुराण-स्मृति-रामायण और महाभारत आदि के स्वाध्याय में जुट गए। हिंदू शास्त्रों में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड और शोषण से वह तिलमिला उठे। उन्होंने पाया कि षडयंत्रपूर्वक शूद्रों के दो वर्ग बना दिए गए हैं- एक सछूत शूद्र और दूसरा अछूत शूद्र। अन्ततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सामाजिक विषमता का विनाश और शूद्रों की मुक्ति समाजसुधार से नहीं अपितु इस व्यवस्था से अलगाव में ही निहित है।

पेरियार ललई सिंह यादव (1 सितंबर, 1911 – 7 फरवरी, 1993) व सपा प्रमुख अखिलेश यादव व बसपा प्रमुख मायावती की तस्वीर

ललई सिंह यादव की सामाजिक और धार्मिक चेतना को और अधिक बल तब मिला जब वे 1968 में महामना रामस्वरूप वर्मा द्वारा स्थापित अर्जक संघ से जुड़ गए और एक लोकप्रिय सदस्य और कार्यकर्ता के रूप में घूम-घूम कर वैज्ञानिक एवं मानवतावादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने लगे। ललई सिंह यादव जब अर्जक संघ एवं आंबेडकरी आंदोलन से जुड़कर उत्तर भारत में शोषितों और पिछड़ों में सामाजिक चेतना जगाने का काम कर रहे थे, उसी समय दक्षिण भारत में द्रविड़ आंदोलन के अग्रदूत पेरियार के उत्तर भारत में भी कई दौरे हुए और उसी दरमियान ललई सिंह यादव उनसे मिले। जब ‘रामायण अ ट्रू रीडिंग’ पुस्तक की क्रांति के विषय में ललई सिंह यादव को जानकारी मिली तब पेरियार से उत्तर भारतीयों के लिए इसके हिंदी संस्करण के प्रकाशन की अनुमति मांगी। पेरियार ने उन्हें सहर्ष अनुमति दे दी।  दिनांक 1 जुलाई, 1969 को ‘सच्ची रामायण’ नाम से प्रकाशित इस पुस्तक से उत्तर भारत में तहलका मच गया। द्विज बौखला गए थे। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाकर  8 दिसंबर, 1969 को उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा इस पुस्तक की जब्ती का आदेश दे दिया गया। लिहाजा प्रकाशक ललई सिंह यादव ने हाईकोर्ट इलाहाबाद में अपील की। एडवोकेट बनवारीलाल यादव की बहस पर 19 जनवरी, 1971 को हाईकोर्ट  ने ‘सच्ची रामायण’ की जब्ती की आज्ञा निरस्त करते हुए उत्तरप्रदेश सरकार से ललई सिंह यादव को 300 रुपए खर्च भी देने का आदेश दिया। ‘सच्ची रामायण’ का प्रकरण अभी चल ही रहा था कि पुनः ललई द्वारा प्रकाशित डॉ. आंबेडकर की पुस्तक ‘जाति का विनाश’ और उनके कुछ भाषणों का दस्तावेज ‘सम्मान के लिए धर्मपरिवर्तन करें’ को उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा 12 सितंबर 1970 को ज़ब्त कर लिया गया। इस प्रकरण में भी ललई सिंह यादव ने बनवारीलाल यादव की पैरवी से ही 14 मई, 1971 को इन पुस्तकों की जब्ती निरस्त करवाने में सफलता पाई।

‘सच्ची रामायण’ को लेकर हाईकोर्ट में हारने के बाद उत्तरप्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। सुप्रीम कोर्ट में भी तीन जजों – न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर, पी .एन. भगवती और सैय्यद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली की खंडपीठ ने यह कहते हुए हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा कि “हम यह स्पष्ट करते हैं कि हम पुस्तक की गुणवत्ता या उसकी भड़काऊ और अपमानसूचक शब्दावली पर कोई विचार व्यक्त नहीं करते हैं। यह कई कारक तत्वों की पेचीदगी पर निर्भर करता है। जो विचार रूढ़िवादियों को ठेस पहुँचा सकता है, वह प्रगतिशील समुदायों के लिए हास्यास्पद हो सकता है। जनश्रुति के आधार पर किसी एक धर्म, संप्रदाय, देश या समय के लिए जो विचार या शब्द अपमानजनक हो सकता है, वह दूसरों के लिए उतना ही पवित्र हो सकता है।”

इस प्रकार ललई सिंह यादव द्वारा प्रकाशित ‘सच्ची रामायण’ की सुप्रीम कोर्ट में पुनः जीत हुई।

24 दिसम्बर 1973 को पेरियार ई.वी. रामस्वामी नायकर की मृत्यु के बाद शोकसभा में अगले पेरियार के रूप में लोगों ने ललई सिंह यादव को स्वीकार किया तो ललई अब पेरियार ललई सिंह यादव हो गए। पेरियार ललई सिंह यादव इस समय उत्तर भारत में ख़ासकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी प्रासंगिक हो जाते हैं, जब रामायण, उसके मुख्य पात्र राम और उनकी तथाकथित जन्मभूमि अयोध्या के साथ-साथ परशुराम की भी चर्चा जोरों पर है। 

ध्यातव्य है कि उत्तरप्रदेश सरकार जब ‘सच्ची रामायण’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी थी तो सच्ची रामायण की जीत इसी आधार पर हुई थी कि इसमें दिये गए सभी तथ्य प्रमाणिक हैं। किन्तु उसी सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के निर्णय के उलट 9 नवम्बर 2019 को सभी तथ्यों, तर्कों और सबूतों को दरकिनार करते हुए आस्था के आधार पर अयोध्या में राममंदिर बनाने का फैसला दिया। परिणामस्वरूप बीते 5 अगस्त 2020 को राममंदिर शिलान्यास के पूर्व ही परशुराम भी उत्तरप्रदेश की राजनीति में प्रवेश कर गए जब समाजवादी पार्टी की प्रबुद्ध सभा ने यह घोषणा की कि सरकार आने के बाद हर जिले में परशुराम की मूर्ति लगायी जाएगी। आश्चर्यजनक तो यह है कि डॉ. आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के आदर्शों पर चलने वाली बहुजन समाज पार्टी ने भी परशुराम की मूर्ति बनाने की घोषणा में पीछे नहीं रही। 

इन प्रकरणों पर सम्यक दृष्टिपात करने से पता चलता है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती दोनों उत्तर भारत के सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक योद्धा पेरियार ललई सिंह यादव एवं उनकी विरासत से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। 

बहरहाल, जब संपूर्ण भारत में डॉ. आंबेडकर का सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन बुलंदियों पर था तो उसी समय बाबासाहेब के विचारों से प्रभावित होकर पेरियार ललई सिंह यादव भी बहुजन समाज एवं साहित्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो गए थे। सामाजिक परिवर्तन की प्रबल इच्छा से उन्होंने 59 बीघा जमीन और 1 एकड़ कटहल का बाग बेचकर अशोक पुस्तकालय और सस्ता प्रेस खोला। यह सब उन्होंने उत्तर भारत के शोषितों, पीड़ितों को वर्चस्ववादी द्विजों के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गुलामी से मुक्त कराने के लिए किया। क्या अखिलेश और मायावती इतना भी समझने का सामर्थ्य नहीं रखते? या सिर्फ राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति ही उनके जीवन का उद्देश्य है?

(संपादन : नवल/अमरीश)


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