आंबेडकर की तरह आधुनिक और गांधी के विपरीत जाति-विरोधी थे नारायण गुरु

नारायण गुरु मानते थे कि मुक्ति की राह शिक्षा से होकर जाती है और संगठन में ही शक्ति है। उनका यह संदेश हमें आंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, आन्दोलन करो और संगठित हो’ के नारे की याद दिलाता है। नारायण गुरु की मान्यता थी कि जाति एक ऐसी बुराई है जो मनुष्यत्व का नाश कर देती है और समतावादी समाज के निर्माण में बाधक है, बता रहे हैं अजय एस. शेखर

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में केरल में पुनर्जागरण आन्दोलन प्रारंभ हो चुका था और आधुनिक केरल का निर्माण भी। (सुगाथन 2016:7) इस आंदोलन की जडें पश्चिमी औपनिवेशिक आधुनिकता, मिशनरियों के प्रचार और आत्मसम्मान हासिल करने के लिए नाडरों के विद्रोह में थीं। इनके अतिरिक्त, इस आन्दोलन पर अय्या वैक्दुन्धर की ब्रिटिश राज और वर्णाश्रम पर आधारित त्रावणकोर राज्य की समालोचना और त्य्कड़ अय्या व चत्ताम्बी स्वामिकल की सामाजिक-सांस्कृतिक पहलों का प्रभाव भी था।(शेखर 2017: 8-27) परन्तु वह नारायण गुरु ही थे, जिन्होंने अपने बहुवादी लेखन और अन्य माध्यमों से अपने विचारों की अभिव्यक्ति के ज़रिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आधुनिक मूल्यों को शामिल करते हुए नैतिकता और करुणा पर आधारित एक ऐसे सामाजिक दर्शन को जन्म दिया, जो धर्मनिरपेक्ष और मानवीय था। (गुरु 2006; वेलायुधन 2015)

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