बिहार चुनाव : जिंदा हैं प्रवासी मजदूरों के सवाल

दूसरे राज्यों से वापस आए प्रवासी मजदूरों पर किए गए यूनिसेफ़ की एक रिपोर्ट बताती है कि इन मजदूरों में 70 प्रतिशत मजदूर सामाजिक रूप से पिछड़े हैं। इनके समक्ष रोजी-रोटी का संकट है। बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनके हालात के बारे में बता रहे हैं हुसैन ताबिश

जमीनी रिपोर्ट 

‘‘हमारा तीन माह से काम बंद था। सरकार से राशन तो मिल रहा था, लेकिन अन्य खर्चों के लिए घर में एक रुपया भी नकद नहीं था। हमें कोई कर्ज देने वाला भी नहीं बचा था। हमारे बीच सब अपने जैसे ही फटेहाल लोग थे। गांव से बकरी बेचकर जो पैसा मंगवाया था, वह भी खत्म हो चुका था। जब भूखों मरने की नौबत आ गई तो हम बच्चों के साथ कलकत्ता [कोलकाता] से पैदल निकल गए। रास्ते में दुर्गापुर में पश्चिम बंगाल पुलिस ने हम लोगों को दो-दिन हिरासत में भी रखा था।’’ रीता देवी अपना दर्द बयान करते-करते रो पड़ती है।

साड़ी के आंचल से आंसू पोछते हुए कहती है, “हम वह दिन कभी नहीं भूलेंगे।” रीता देवी 55 लोगों के उस समूह का हिस्सा रही हैं जो, लॉकडाउन के दौरान 22 मई को कोलकाता से 600 किमी की दूरी तय कर बिहार के समस्तीपुर के पैदल पहुंचे थे। रीता देवी जिले के उजियारपुर प्रखंड के सूरजपुर पंचायत की निवासी हैं। उजियारपुर संसदीय क्षेत्र से ही सांसद नित्यानंद राय केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री हैं। गांव में लगभग 30 घर धोबी जाति (अनुसूचित जाति) के लोगों का है। गांव में रोजगार का कोई अवसर नहीं होने के कारण सालों से इस गांव के लोग कोलकाता के अलग-अलग इलाकों में रहकर कपड़े धोने और उसे प्रेस करने का काम करते हैं। वहां किराए के एक-दो कमरे ही इनके घर होते हैं और मोहल्ले की सड़क किनारे पड़ी मेज इनकी दुकानें। लेकिन लॉकडाउन में कपड़े धोने का इनका कारोबार पूरी तरह ठप्प हो गया था। घर लौटने के पांच माह बाद भी रोजगार को कोई प्रबंध न होने पर रीता देवी के पति लालू रजक थक-हार कर वापस कोलकाता चले गए हैं।

लेकिन वहां अभी उनकी लाॅन्ड्री पर ग्राहक नहीं आ रहे हैं। रीता अपने दो बच्चों के साथ गांव में रहकर खेतों में मजदूरी करती है, लेकिन महीने में हफ्ता भर से ज्यादा काम नहीं मिल पाता है। रीता के पास जो भी आभूषण थे, वह बीते पांच माह में बिक चुके हैं।  

गांवों में नहीं है रोजगार, बता रही हैं उजियारपुर की रीता देवी(बायें)

अपने घर में रोजगार मिले तो कोई क्यों जाए परेदस

बेगूसराय के बलिया प्रखंड के सालेहचक निवासी लखन लाॅकडाउन में पंजाब के जालंधर से ठेला चलाकर घर आ गया था। कई माह गांव में रहने के बाद भी उसे रोजगार का कोई अवसर नहीं मिला। बीते सितंबर माह में 3500 रुपया ब्याज पर कर्ज लेकर वह विशेष ट्रेन से वापस जालंधर चला गया है। फोन पर बात करने पर लखन ने बताया कि उसे वहां काम मिल गया है। इसी गांव के विनोद शाह छह माह पहले पंजाब के पटियाला से गांव आए थे। उनके पास अभी कोई काम नहीं है। गांव के ही हनुमान मंदिर पर पुजारी जैसा वेश बनाकर बैठे राम प्रकाश गुप्ता ने बताया कि वह बरौनी रिफाइनरी में ड्राइवर की नौकरी करते थे। लाॅकडाउन में उनके अलावा करीब 600 लोगों को कंपनी ने नौकरी से निकाल दिया। तबसे उनके पास कोई काम नहीं है। 

बताते चलें कि बेगूसराय का बरौनी बिहार के विभाजन के बाद सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। यहां तेल रिफाइनरी, रासायनिक उर्वरक, थर्मल पावर स्टेशन, रेलवे यार्ड और दुग्ध उत्पादन के अलावा सौ से अधिक बड़ी-मंझोली-छोटी फैक्ट्रियां हैं, जहां हजारों की तादाद में मजूदर काम करते हैं। हालांकि स्थानीय बेरोजगार मजदूर विनोद साह कहते हैं, “इन फैक्ट्रियों में स्थानीय से अधिक बाहरी लोगों को काम पर रखा जाता है। अगर यहां काम मिलता तो जिले के लोग अपना घर-बार छोड़कर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और सूरत नहीं जाते।”

विदित है कि केंद्रीय पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्री गिरिराज सिंह बेगूसराय से ही सांसद हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह के बीच के चुनावी मुकाबले को लेकर बेगूसराय देश भर में सुर्खियों में रहा है।

लाॅकडाउन के दौरान ही मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड के बलहा गांव के बिजली पासवान, बहादुर पासवान, अर्जुन पासवान, राजेश और रवींद्र पासवान दिल्ली के नजफगढ़ से साइकिल चलाकर गांव आ गए थे। दरभंगा के सिंहवारा प्रखंड के बिरदीपुर गांव के प्रेमलाल बैठा, राकेश ठाकुर, सुमित यादव, निजाम अहमद और मोहम्मद तौहीद सहित दर्जनों प्रवासी मजदूर लाॅकडाउन के बाद से घर बैठे हैं। उत्तर बिहार के समस्तीपुर, बेगूसराय, वैशाली, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और चंपारण जैसे जिलों से लाखों की तादाद में श्रमिक पलायन कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं। ये वह लोग हैं, जिनके पास खेती की अपनी जमीन नहीं है न स्थानीय स्तर पर उनके लिए कोई रोजगार के मौके हैं।

लाॅकडाउन के बाद दूसरे राज्यों से वापस आए प्रवासी मजदूरों पर किए गए यूनिसेफ़ की एक रिपोर्ट बताती है कि इन मजदूरों में 70 प्रतिशत मजदूर सामाजिक रूप से पिछड़े हैं। कुल मजदूरों में 29 प्रतिशत ओबीसी, 25 प्रतिशत अति पिछड़ा वर्ग, 21 प्रतिशत सामान्य, 20 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 3 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखते हैं।    

घर वापस आए मजदूरों का क्या हुआ?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के विभिन्न हिस्सों से बिहार लौटने वाले श्रमिकों की संख्या लगभग 22 लाख थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि श्रमिकों को बाहर जाने की जरूरत नहीं है। उन्हें अपने घर के पास ही रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों से वापस बिहार लौटने की अपील की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” और भाषणों में लगातार कह रहे हैं कि सरकार बिहार के मजदूरों का पलायन रोककर उन्हें अपने प्रदेश में काम देगी।    

वहीं, प्रवासी मजदूरों का कहना है कि उन्हें सरकार की तरफ से पिछले छह-सात माह में कोई काम नहीं दिया गया। कुछ मजदूर स्वीकार करते हैं कि कोरोना संकट के दौरान घर लौटने पर उन्हें जाॅब कार्ड दिया गया था। बाद में मनरेगा में काम भी दिया गया, लेकिन वह उनके जीवन-यापन के लिए पर्याप्त नहीं है। एक माह में बमुश्किल सात से दस दिन ही काम मिल पाता है। मजदूरों के इन आरोपों पर मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड की बलहा गांव की मुखिया सुनीता देवी कहती हैं, मनरेगा के तहत गांव में काम और पैसे की कोई कमी नहीं है। इसका पैसा सीधे केंद्र सरकार से मजदूरों के खाते में आता है। समस्या यह है कि मनरेगा में एक दिन की मजदूरी सिर्फ 198 रुपये हैं, जबकि गांव में अभी बाहर से जो प्रवासी मजदूर लौटे हैं उन्हें यह रकम कम लगती है। इसलिए वह खुद काम करना नहीं चाहते हैं। 

राजद महागठबंधन उठा रहा मज़दूरों का सवाल, सरकार के पास नहीं है ठोस जवाब

दूसरी ओर बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के तीनों घटक दल राजद, कांग्रेस और वामदल लाॅकडाउन में प्रवासी मजदूरों के मामले और पलायन के मुद्दे पर नीतीश सरकार पर हमलावर हैं। राजद के नेता व सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने लाॅकडाउन में 40 लाख बिहारी मजदूरों के प्रदेश लौटने और सरकार द्वारा उनकी उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। वहीं जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पप्पू यादव भी लगातार इस मुद्दे पर सरकार पर आक्रामक रहे हैं। इस संबंध में सरकार में श्रम संसाधन मंत्री विजय कुमार सिन्हा कहते हैं, “सरकार निरंतर पलायन रोकने के लिए काम कर रही है। प्रवासी मजदूरों को कौशल प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। लाॅकडाउन के दौरान उन्हें पर्याप्त मात्रा में अनाज पहुंचाया गया है। अचानक पैदा हुई आपदा में सरकार ने मजदूरों को हर संभव सहायता पहुंचाया गया है।”

गहना-जेवर बेच चला रहे घर का खर्चा  

बाहर से लौटे अधिकांश प्रवासी मजदूरों के पास राशन कार्ड उपलब्ध है। इस कार्ड पर उन्हें सस्ते मूल्य पर हर माह पर्याप्त अनाज मिल जाता है। अभी कोरोना संकट और लाॅकडाउन में इसके अलावा अतिरिक्त अनाज भी उन्हें मुहैया कराया जा रहा है। गांव में खेतों में मजदूरी से भी उन्हें थोड़ा-बहुत काम मिल जाता है, जिससे अनाज खरीदने के पैसे हो जाते हैं। दिल्ली में घरों में झाड़ू-पोंछा का काम करने वाले दरभंगा के क्वेटी प्रखंड की सुधा देवी कहती है, “उसके अपने और बेटी के दहेज के लिए जोड़े गए सभी आभूषण पिछले छह माह में बिक चुके हैं। सुधा का पति दिल्ली के बसंतकुंज में सुरक्षा गार्ड का काम करता था और वह स्वयं घरों में साफ-सफाई का काम करती थीं। सुधा जैसे हालात बाहर से लौटने वाली तमाम महिला मजदूरों की है। घर के खर्चे चलाने के लिए सभी ने अपनी अर्जित की हुई छोटी-मोटी चीजों बेच दी है। बहुत सारे लोग कर्ज में जी रहे हैं।  

जान हथेली पर लेकर लौटने लगे हैं मजदूर

गांवों में काम ने मिलने पर बड़ी तादाद में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, गुजरात, हरियाणा और पंजाब से आए मजदूर वापस काम पर लौट रहे हैं। सामान्य ट्रेनें न चलने के कारण वह विशेष ट्रेन, बस, ट्रक और टैक्सी के सहारे प्रदेश जा रहे हैं। इसमें उन्हें 2500 से 3500 सौ रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। कई लोगों को उनकी कंपनी ही पैसे देकर बुला रही हैं जहां वह पहले काम करते थे। बाद में उनकी सैलरी से किराए के पैसे काट लिए जाएंगे। हरियाणा और पंजाब से कई किसान स्वयं बिहार में बसें भेजकर मजदूरों को बुला रहे हैं ताकि रब्बी के फसलों की ठीक से बुआई की जा सके। इससे पहले हरियाण और पंजाब में प्रवासी मजदूरों की अनुपलब्धता के कारण खरीफ फसलों की बुआई और कटाई काफी प्रभावित हुई थी।

क्यों पलायन करते हैं मजदूर?

मजदूर स्वयं बताते हैं कि उनके पलायन की सबसे बड़ी वजह बिहार में कार्य दिवसों का अभाव है। यहां खेतिहर मजदूरों को साल में मुश्किल से 4 से 6 माह ही काम मिल पाता है बाकी समय वह बेकार रहते हैं। अन्य अकुशल और असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों का हाल भी ऐसा ही है। एक तो उन्हें साल भर काम नहीं मिलता है और दूसरे यहां मजदूरी कम मिलती है।

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बिहार में खेतिहर मजदूरों (पुरुषों) को रोजाना 150 से 200 रुपए ही मिलते हैं, जबकि मजदूर अगर महिला हो तो उसे 125 से 150 रुपए ही रोज की दिहाड़ी मिलती है। बिहार में निर्माण कार्य में लगे राजमिस्त्री की मजदूरी 450 से 500 रुपए तक है जबकि सहायक श्रमिकों को 300 से 350 रुपए रोज की मजदूरी मिलती है।

यही मजदूरी दिल्ली में अलग हो जाती है। निर्माण क्षेत्र के राजमिस्त्री को रोजाना का 600 से 700 रुपये तक मिल जाते हैं जबकि अकुशल मजदूर को यहां 300 से लेकर 500 रुपये के बीच मजदूरी मिलती है। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों में भी निर्णाण स्थलों पर काम करने वाले मजदूरों का रेट लगभग सामान है। इन राज्यों में काम करना मजदूर इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि इन्हें यहां साल में आठ से दस महीने काम मिल जाता है। आमतौर पर वह निर्माण स्थल पर ही रहते हैं, इसलिए रहने का उन्हें खर्च नहीं लगता है।  

हरियाणा और पंजाब में खेतिहर मजदूरों के मजदूरी की बात करें तो हरियाणा में रोजाना 300 से 450 रुपये तक मजदूरी मिल जाती है। यहां पुरुष और महिला मजदूरों की मजदूरी में कोई भेद नहीं है। पंजाब में भी फसलों की बुआई और कटाई के समय 300 से 500 रुपये तक मजदूरी आसानी से मिल जाती है। यहां श्रमिकों को मजदूरी के साथ तीन वक्त का खाना और दो वक्त की चाय भी दी जाती है। हालांकि स्थाई रूप से काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी अपेक्षाकृत थोड़ी कम तय की जाती है। इन्हें रोजाना 250 से 300 रुपये तक ही मिलते हैं।

डिमांड में रहते हैं बिहार के मजदूर

हरियाणा के सिरसा से निकलने वाली पत्रिका “विलज एरा” के संपादक संदीप काम्बोज कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से हरियाणा और पंजाब में मजदूरी का ट्रेंड बदला है। प्रवासी मजदूर अब काम का ठेका ले लेते हैं। धान रोपनी का प्रवासी मजदूर 2500 से 3000 हजार रुपया प्रति हेक्टेयर लेते हैं जबकि पंजाब के मजदूर इसी काम का ज्यादा पैसा मांगते हैं। इसलिए किसान प्रवासी मजदूरों को ज्यादा पसंद करते हैं। प्रवासी मजदूर पैसा इसलिए कम लेते हैं क्योंकि वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ उस काम को कम समय में पूरा कर लेते हैं।

पंजाब के जालंधर से प्रकाशित “तर्कशील” नामक पत्रिका के संपादक और किसान हरजिंदर सिंह वागपुर कहते हैं, “पंजाब में यूपी, बिहार, झारखंड और उत्तराखंड के किसानों की ज्यादा डिमांड रहती है। पंजाब के अधिकतर लोग अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय देशों में रहते हैं। उनके घर और खेती की देखभाल करने के लिए घर के एक दो सदस्य ही पंजाब में रहते हैं। पंजाब के ऐसे किसान अपनी खेती और मवेशी के लिए प्रवासी मज़दूरों के भरोसे ही जीते हैं।

हरजिंदर कहते हैं, “प्रवासी मजदूरों को पंजाब में रहने के लिए पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता है। यह किसानों के कोठियों में बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते हैं। खेतों में भी मजदूरों को ठहरने के लिए बड़े-बड़े दालान बनाए जाते हैं। यहां मजदूरों को खाने-पीने की भी कोई दिक्कत नहीं होती है। बड़े किसानों के मजदूरों को काम के बाद रात में अच्छे ब्रांड का शराब भी पीने को मिल जाता हैै। मनरेगा के बाद हरियाणा-पंजाब में प्रवासी मजदूरों की जो किल्लत हुई थी, बिहार में शराबबंदी के बाद ये दिक्कत काफी हदतक दूर हो गई।”

सीतामढ़ी के डुमरा ब्लाॅक के मेहसौल निवासी रामपुकार साह पिछले 10 वर्षों से पंजाब के फरीदकोट में मजदूरी करते हैं। साल में एक लाख रुपये तक वह आसानी से बचत कर लेते हैं। रामपुकार की पत्नी कौशल्या कहती हैं कि गांव में रहकर कुछ नहीं बचता था। अब उनके पास गांव में पक्का घर है और दो लड़कियां स्कूल भी जाती हैं। समस्तीपुर के बेलारी निवासी बलदेव पंजाब में मजदूर भेजने का काम करते हैं। बड़े किसान और मजदूरों के ठेकेदार उन्हें फोनकर मजदूर भेजने की डिमांड करते हैं। कई बार दलाल के द्वारा भेजे गए मजदूर ठगी और कम पैसे मिलने की शिकायत करते हैं। जहांगीर की मां रेहाना कहती हैं अगस्त माह में बलदेव ने उनके बेटे को दस हजार महीना बोलकर ट्रक से पंजाब भेजा था, लेकिन वहां उसे सिर्फ छह हजार रुपए मासिक मिल रहे हैं।  

(यह रिपोर्ट सेंटर फाॅर रिसर्च एंड डायलग ट्रस्ट के बिहार चुनाव रिपोर्टिंग फेलोशिप के तहत प्रकाशित की गई है)

(संपादन : नवल)


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