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सफाईकर्मियों के सवाल : नजरिया बदलें सरकारें

गंदे नालों और सेप्टिक टैंकों की सफाई करने वाले कौन हैं, यह सभी जानते हैं। इस घृणित कार्य को करने के लिए भारतीय समाज आज भी वाल्मीकि, मेहतर व भंगी जातियों को मजबूर करता है। इन समाजों के लोगों के पास रोजगार के दूसरे विकल्प नहीं हैं। यदि वे कुछ करने का प्रयास भी करते हैं तो उनकी जाति आड़े आती है। बता रहे हैं जनार्दन गोंड

सेप्टिक टैंक व सीवर में देश भर में सफाईकर्मियों की मौत का सिलसिला जारी है। सामाजिक संगठन सफाई कर्मचारी आंदोलन के अनुसार वर्ष 1993 से अब तक सेप्टिक टैंकों/सीवर में 1760 लोगों की मौत हो चुकी हैं। हाल ही में (14 अक्टूबर 2020 को) झारखंड के गढ़वा जिले में सेप्टिक टैंक में उतरे चार सफाईकर्मियों की दम घुटने से मौत हो गई। यह घटना कांडी थाना क्षेत्र के डूमर सोता गांव की है। मरने वालों में पिता-पुत्र और दो भाई शामिल है। इसके पहले 10 अक्टूबर, 2020 को दिल्ली के बदरपुर के मोलडबंद में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान एक सफाईकर्मी की मौत हो गई थी। इस घटना में सफाईकर्मी को बचाने के लिए टैंक में उतरे मकान मालिक की भी जहरीली गैस की चपेट में आने से मौत हो गई। 

किस जुर्म की सजा भुगत रही हैं सफाईकर्मी जातियां?

यह समझने की आवश्यकता है कि ये कौन लोग हैं और किस जुर्म की सजा भोग रहे हैं। आए दिन इनके मारे जाने की सूचनाएं आती हैं। इनकी पहचान एक खास तरह की पोशाक से होती है। ये अपने शरीर पर कवच के जैसा पीला रंग का जैकेट पहनते हैं। ये हर सुबह सड़क पर झाड़ू लगाते दिख जाते हैं। सफाई करते वक्त उनकी निगाहें सड़क पर झुकी रहती हैं, मानो ऐसा करने समय वे अपने भाग्य को पढ़ रहे हों। जबकि वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि सड़कें सुंदर और चलने लायक बनी रहें। बाबू लोगों को सड़क से गुजरते हुए किसी तरह की गंदगी या बदबू का सामना न करना पड़े।  लेकिन लोगों के पास इतना भी समय नहीं है कि वे दो पल ठहर कर सफाई करने वाले हाथों को देखें और सोचें कि आखिर इन हाथों ने कौन सा गुनाह किया है, जिसके कारण इन्हें अलसुबह कूड़ा-करकट, थूक–बलगम से लेकर मल-मूत्र की सफाई करनी पड़ती है। वे यह भी नहीं सोच पाते कि जूता-चप्पल, लोहा-लकड़ी और सोने-चांदी की दूकानें जातीय पहचान खो रही हैं मगर ऐसा क्यों है कि आज भी तन से पैदा मल की सफाई कराने वाले अपनी जातीय पहचान बनाए हुए हैं? 

मंदिर और शौचालय में बनी हुई है जातीय पहचान

भारत में दो जगह जातीय पहचान बनी हुई है। पहला मंदिर और दूसरा शौचालय। जिस तरह हर मंदिर का पुजारी ब्राह्मण जाति का होता है, उसी तरह हर सुलभ शौचालय की साफ-सफाई का काम मेहतर जाति का व्यक्ति करता है लेकिन आमदनी आदि का ख्याल दूसरे (अधिकांश ब्राह्मण) लोग रखते हैं। दोनों जगह जाति की जो घेराबंदी है, उसे टूटना चाहिए। समतामूलक समाज के लिए यह जरूरी है। 

साहित्य से लेकर समाजविज्ञान तक की ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में जाति और लैंगिक असमानता के प्रश्न पर खूब परिचार्चाएं तथा पर्चे लिखे-पढ़े जाते हैं (होनी भी चाहिए)। परंतु भारत को रहने लायक बनाने वाला मेहतर, हेला या भंगी समाज हर तरह की चर्चा से दूर क्यों है। हम देखते हैं कि शहरों को साफ-सुथरा रखने वाला मेहतर समाज शहर के बाहर गंदी बस्तियों में या सड़क के किनारे प्लास्टिक के तंबुओं में तमाम वंचनाओं के साथ गुजर-बसर करने को मजबूर है। 

गंदे नाले की सफाई करने के बाद अपने साथियों से सहयोग से बाहर आता एक सफाई मजदूर

इतिहास में भी अस्पष्टता

इनकी स्थिति में सुधार करने की जगह इनको लेकर कई प्रकार के अभिप्राय गढ़े जा रहे हैं (जाते रहे हैं)। सफाई करने वाली जातियों की उत्पत्ति और विकास के बहाने सांप्रदायिकता को हवा दी जा रही है। बताया जा रहा है कि इन जातियों का जन्म मुगल काल में हुआ। कहा यह भी जा रहा है कि ये क्षत्रिय जन हैं जिन्होंने मुगलों की सत्ता स्वीकार नहीं की। बताया जाता है कि मुगलों के आगमन के पहले ये जातियां बड़ी खुशहाल थीं। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है, “मुसलमानों के आगमन के पूर्वकाल में डोम-हाडी या हलखोर इत्यादि जातियां काफी संपन्न और शक्तिशाली थीं।” 

इस अभिप्राय में दो संदेह हैं– पहला यह कि मुगलों की सत्ता न स्वीकार करने वाली जातियों ने इतनी आसानी से उनका मल साफ करना कैसे स्वीकार कर लिया। और दूसरा यह कि यदि ऐसा है भी तो, उच्चवर्णीय हिंदू जातियां अपने बिछुड़े भाई-बहनों का सजातीय आत्मसातीकरण क्यों नहीं कर लेतीं। उनसे रोटी-बेटी का संबंध क्यों नहीं स्थापित करतीं? 

इन सबसे अलग इतिहासकार अलबरूनी दूसरी बात कहता है। वह कहता है कि ये लोग भारत की धरती पर पहले से थे। प्राचीन काल में इन्हें डोम, चांडाल और बधाथु कहा जाता था। अलबरुनी की बात सही जान पड़ती है। कालू डोम और राजा हरीशचंद्र की कथा हम सब जानते हैं। हालांकि राजा हरीशचंद्र और कालू डोम, दोनों पौराणिक पात्र हैं, इनकी ऐतिहासिकता संदिग्ध है, फिर भी यह तथ्य स्थापित हो जाता है कि डोम जाति उतना ही प्राचीन है, जितना ब्रह्मा के मुंह से पैदा हुई अन्य जातियां। 

इस संदर्भ में बहुत सारे प्रमाण प्राचीन साहित्य में भरे पड़े हैं। विषयांतर से बचने के लिए वैदिक साहित्य की चर्चा अनावश्यक है। हम इस बात पर अवश्य ध्यान दें कि नगरीयकरण से मेहतर, भंगी अथवा हेला समाज का कैसा संबंध था?

श्रमजीवी जातियां और भारतीय समाज

सर्वविदित है कि पूंजी जब वितान तानती है तो कई नई चीजें जन्म लेती हैं। हाट-बाजार से लेकर ठठेरा, लोहार, कहार, सोनार राजमिस्त्री और हलवाई जैसी जातियां शहरों की आर्थिक सक्रियता को गति देती हैं क्योंकि जिस तरह किसान और मजदूर गांवों को अपने खून-पसीने से सींचते हैं, उसी तरह ये जातियां शहरों को शहर बनाती हैं। परंतु जितना यह सत्य है कि पूंजी निर्माण में श्रमजीवी जातियों का योगदान सबसे ज्यादा होता है उतना ही सच यह भी है कि पूंजी पर अधिकार हमेशा ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के पास होता है।   

भारत में शहरों का सबसे प्राचीन नमूना हड़प्पा की सभ्यता से प्राप्त होता है। वहां की घरों में शौचालय के प्रमाण प्राप्त होते हैं। जलनिकासी की उन्नत व्यवस्था इस संस्कृति की खास विशेषता है। निश्चित ही हड़प्पा काल में सामुदायिक साफ-सफाई के लिए कर्मचारी या सफाईकर्मी नियुक्त होते रहे होंगे। परंतु यह व्यवस्था जातिगत थी अथवा श्रम आधारित नौकरी थी, जिसमें किसी भी जाति (समुदाय) के व्यक्ति की नियुक्ति हो सकती थी?। इस प्रश्न के उत्तर में कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि इतनी उन्नत व्यवस्था के लोगों के विषय में बहुत कम जानकारी प्राप्त हो पाई है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इस सभ्यता में जाति व्यवस्था थी भी या नहीं। 

यह भी पढ़ें : हाथों से मैला कब तक उठाएगा देश?

सिंधु सभ्यता के बाद विकसित हुई आर्य सभ्यता, पशुपालक-ग्रामीण सभ्यता थी। कृषि और पशुधन इस सभ्यता के प्रमुख आर्थिक आधार थे। पूरे समाज में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि का महत्व था। शहरों के अभाव की स्थिति में शूद्र वर्ग के लोगों से साफ-सफाई उस तरह नहीं कराई जा सकती थी, जैसा कि शहरों के विकास के बाद हुआ। हां, इनका उपयोग दूसरे तरह की साफ-सफाई वाले कामों में जरूर किया जाता था। प्राचीन काल में शरीर की सफाई से लेकर घर-आंगन गांव-गिरांव से लेकर पशुओं तक को स्वच्छ करने वाले कुछ 6 प्रकार के कार्यों का उल्लेख प्राप्त होता है – शरीर की सफाई, कपड़े की साफ-सफाई, घर को साफ–सुथरा रखना, पशुओं की देख-रेख और पशुओं की सफाई, रास्तों, नालियों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई तथा मरे पशुओं को उठाने और फेंकने का कार्य ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अलग-अलग सफाई के कामों के लिए शूद्रों में से अलग-अलग जातियों का निर्माण किया गया। कुछ लोग कहते हैं कि मुगलों के आने के बाद भंगी जाति अस्तित्व में आई, जो निराधार है। प्रमाण मिलता है कि आज से ढाई हजार साल पहले गौतम बुद्ध द्वारा एक सफाईकर्मी को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी गई थी। हां, यह जरूर है कि मुगलों के आने पर भारत की आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं। बाजार खड़े हुए। शिल्पकलाओं का विकास हुआ। निश्चित रूप से शहरों की रौनक ने नगर सफाई के कार्यों का विभेदीकरण किया, जिससे कुछ लोगों की जिंदगी जो पहले से अंधेरे में थी, वह गहन अंधेरे में समा गई। मुगलों के आने के बाद भंगियों को मेहतर जरूर कहा गया, किंतु बेहतर कुछ भी न हुआ। अंग्रेजों के समय में भी मेहतरों का कोई भला नहीं हुआ। अंग्रेजों के जाने के बाद अर्थात आजादी आने के बाद भी यह जाति मैला ढोने से आजाद नही हो सकी है। 

भयावह आंकड़े

बहरहाल, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़े हैं कि सीवर सफाई के दौरान सबसे अधिक मृत्यु तमिलनाडु में और उसके बाद गुजरात में हुई है। गौरतलब है कि ये दोनों राज्य प्रति ब्यक्ति आय और विकास की दृष्टि से भारत के दूसरे राज्यों से काफी बेहतर हैं। दोनों राज्यों में सीवर सफाई के दौरान सफाईकर्मियों की मृत्यु को देखते हुए कहा जा सकता है कि जिस तरह राष्ट्रीय आय के आंकड़ों तथा राष्ट्रीय समृद्धि से गरीबों के जीवन का कोई कोई संबंध नहीं है, उसी तरह राज्यों की समृद्धि से मल-मूत्र की सफाई करने वालों का कोई सामंजस्य नहीं है। हालांकि मारे जाने वाले सफाईकर्मियों के लिए मुआवजे का प्रावधान है। लेकिन, मनुष्य द्वारा हाथ से मैला साफ़ करने का अमानवीय कारोबार इन सफाई कर्मियों और उनके परिवार के सदस्यों को अंदर से इतना कमजोर, हताश और पराजित बना देता है कि कोई आश्चर्य नहीं यदि इन मृतकों के परिजन भी मुआवजा मिलने को ही अपना परम सौभाग्य मान लें और दोषियों के साधन संपन्न सहयोगियों के समक्ष शरणागत हो जाएं।

आरक्षण के विरोधी सफाई कार्य में क्यों नहीं चाहते आरक्षण?

आरक्षण पर हाय तौबा मचाने वाले मैला सफाई के इस कार्य में अपने लिए आरक्षण की मांग करते नहीं देखे जाते। इस घृणित काम में भंगी और वाल्मीकि समुदाय के लोगों को शतप्रतिशत आरक्षण है। 

स्थिति इतनी बदतर है कि सरकार ने अभी तक मैला सफाई करने वाले श्रमिकों की संख्या और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति के संबंध में कोई भी सर्वेक्षण नहीं कराया है। लोकसभा में 4 अगस्त, 2015 को एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में सरकार द्वारा यह जानकारी दी गई कि सन् 2011 की जनगणना के आंकड़ों से यह ज्ञात होता है कि देश के ग्रामीण इलाकों में 1,80,657 परिवार मैला सफाई का कार्य कर रहे हैं। इनमें सर्वाधिक 63,713 परिवार महाराष्ट्र में थे। इसके बाद मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा तथा कर्नाटक का नंबर आता है। निश्चित ही यह संख्या इन परिवारों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है। सीवर लाइन सफाई के दौरान होने वाली मौतों के विषय में राज्य सरकारें केंद्र को कोई भी सूचना साझा नहीं करतीं। वर्ष 2017 में केवल 6 राज्यों ने 268 मौतों की जानकारी केंद्र के साथ साझा की।

इस पर तुर्रा यह कि सरकारें दावा करती हैं कि अब इस देश में हाथों से मैला नहीं काछा / उठाया जाता है।

सच यह भी है कि सरकारें सीवर में हुई मौतों को साझा करने से परहेज करती हैं जबकि नेशनल कमीशन फ़ॉर सफाई कर्मचारी (एनसीएसके) ने यह बताया है कि सन् 2017 में हर पांचवें दिन कोई न कोई अभागा सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत का शिकार हुआ। हालांकि इन आंकड़ों में हाथ से मैला उठाने वाले वाल्मीकि समुदाय के स्त्री-पुरुषों की विभिन्न रोगों के कारण हुई मृत्यु के आंकड़े सम्मिलित नहीं हैं। असुरक्षित ढंग से मैला और गंदगी उठाते उठाते इन्हें कितने ही संक्रामक रोग हो जाते हैं और इनकी औसत आयु चिंताजनक रूप से कम हो जाती है। इसका आकलन बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है।

कानूनी प्रावधान हैं, लेकिन अमल में नहीं लाए जाते

ऐसा नहीं है कि इस संबंध में कानूनों की कोई कमी है। सन् 1993 में 6 राज्यों ने केंद्र सरकार से मैला ढोने की प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कानून का निर्माण करने का अनुरोध किया। तब द एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट 1993 पारित किया गया। इस एक्ट के बनने के बाद सीवर में होने वाली मौतों पर अंकुश लग जाना चाहिए था। परंतु ऐसा नहीं हुआ। इस कानून के पास के बाद अब तक 1,760 सफाई कर्मियों की मृत्यु सीवर में उतरने और जहरीली गैसों के कारण हुई है। इन मौतों का व्यौरा मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सफाई कर्मचारी आंदोलन के समन्वयक बेजवाड़ा विल्सन और उनके साथियों के पास सूचीबद्ध हैं। विल्सन के अनुसार, यह संख्या केवल उन मामलों की है जिनके विषय में दस्तावेजी सबूत मौजूद थे। वास्तविक संख्या तो इससे कई गुना अधिक है क्योंकि इस तरह की अधिकांश मौतों के मामलों को कुछ ले-देकर दबा दिया जाता है। हमारे देश में न्याय व्यवस्था न केवल धीमी और मंहगी है, बल्कि जातिवाद से भी ग्रसित है। ऐसी स्थिति में मृतक के परिजन न्याय की उम्मीद न करते हुए अपने रोजमर्रा के काम में लग जाते हैं। अगर कोई थोड़ा बहुत कानूनी प्रयास करता भी है, तो मौत के सौदागर (ठेकेदार) और अधिकारी अपने रसूख के बल पर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। यह मौतें प्रायः सेप्टिक टैंक के भीतर मौजूद मीथेन,  कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि जहरीली गैसों के कारण होती हैं। 

इन गैसों का स्वास्थ्य पर बहुत बूरा असर पड़ता है। डॉ. आशीष मित्तल (जो जाने माने कामगार स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं तथा इस विषय पर ‘होल टू हेल’ तथा ‘डाउन द ड्रेन’ जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं) बताते हैं कि सीवर सफाई से जुड़े अस्सी प्रतिशत सफाई कर्मी रिटायरमेंट की आयु तक जीवित नहीं रह पाते और श्वसन तंत्र के गंभीर रोगों तथा अन्य संक्रमणों के कारण इनकी अकाल मृत्यु हो जाती है। 

सीवरों में उतरना मौत के मुंह में उतरने जैसा है। नियमानुसार पहले तो किसी व्यक्ति का सीवर सफाई के लिए मेनहोल में उतरना ही प्रतिबंधित है। किंतु यदि आपात स्थिति में किसी व्यक्ति को सीवर में प्रवेश करना आवश्यक हो जाता है तो लगभग 25 प्रकार के सुरक्षा प्रबंधों की एक चेकलिस्ट होती है, जिसका पालन सुनिश्चित करना होता है। सर्वप्रथम तो यह जांच करनी होती है कि अंदर जहरीली गैसों का जमावड़ा तो नहीं है। एक विशेषज्ञ इंजीनियर की उपस्थिति अनिवार्य होती है। एम्बुलेंस की मौजूदगी और डाक्टर की उपलब्धता आवश्यक होती है। सीवेज टैंक में उतरने वाले श्रमिक को गैस मास्क, हेलमेट, गम बूट, ग्लव्स, सेफ्टी बेल्ट आदि से सुसज्जित पोशाक उपलब्ध कराई जानी होती है। उसके बाद मौके पर उपस्थित किसी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा यह प्रमाणित करने पर कि सभी सुरक्षा नियमों का शतप्रतिशत पालन कर लिया गया है, श्रमिक सीवर में उतर सकता है। मगर गरीबी और भुखमरी से जूझता सफाईकर्मी हर बार मौत से समझौता कर लेता है तथा ठेकेदारों के शोषण का शिकार हो जाता है। इनका मरना इतना आम हो गया है कि आए दिन सीवर के पास लाश दिखाई पड़ती हैं और लोग बिना देखे आगे निकल जाते हैं ! 

(इनपुट : राज वाल्मीकि, संपादन : नवल/अमरीश)


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जनार्दन गोंड

जनार्दन गोंड आदिवासी-दलित-बहुजन मुद्दों पर लिखते हैं और अनुवाद कार्य भी करते हैं। ‘आदिवासी सत्ता’, ‘आदिवासी साहित्य’, ‘दलित अस्मिता’, ‘पूर्वग्रह’, ‘हंस’, ‘परिकथा’, ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिकाओं में लेख ,कहानियां एवं कविताएं प्रकाशित। निरुप्रह के सिनेमा अंक का अतिथि संपादन एवं आदिवासी साहित्य,संस्कृति एवं भाषा पर एक पुस्तक का संपादन। सम्प्रति इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी व आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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