बिहार : क्या इंसेफेलाइटिस को गंभीरता से लेगी नई सरकार?

उत्तर बिहार के आधा दर्जन से अधिक जिलों में इंसेफेलाइटिस हर साल बड़ी संख्या में मासूम बच्चों को अपना शिकार बनाता है। इनमें से अधिकांश दलित-बहुजन होते हैं। इसका एक कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली है, बता रहे हैं हुसैन ताबिश

जमीनी रिपोर्ट

इंसेफेलाइटिस को बिहार में चमकी बुखार के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर बिहार के अनेक जिलों में सैकड़ों की तादाद में बच्चे इस बीमारी के शिकार होते हैं। हालांकि राज्ये में विधानसभा चुनाव में इंसेफेलाइटिस सीधे मु्द्दा नहीं बन सका लेकिन इसकी अनुगूंज राजद नेता तेजस्वी यादव के नारे पढ़ाई, कमाई, दवाई और सिंचाई में सुनाई दी। 

किन हालातों में रहते हैं इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों के परिजन

वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुजफ्फरपुर के पानापुर हवेली गांव में चमकी बुखार से पीड़ित परिवारों के घरों का दौरा किया था। उन्हें 4 लाख रुपये मुआवजे के अलावा सरकार की तरफ से एक गाय और दुकान खोलने के लिए पैसे भी मिले थे। पानापुर हवेली गांव के नुनू महतो और सुबोध पासवान खुशनसीब थे कि उनके घर मुख्यमंत्री के कदम पड़े और देश भर की मीडिया भी वहां पहुंची थी। अधिकारियों ने सीएम के दौरे के पहले नुनू महतो के घर तक कंक्रीट की पक्की गली भी बनवा दी थी। हालांकि चमकी बुखार से मरने वाले सभी बच्चों के परिजनों का भाग्य नुनू और सुबोध जैसा नहीं है। उन्हें कोई सरकारी सहायता मिलना तो दूर मुआवजे की रकम भी नहीं मिली।  

टूटी-फूटी, कच्ची-पक्की सड़कों और बांस के एक चचरी पुल को पार कर हम चुन्नू मांझी का पता पूछते-पूछते सीतामढ़ी जिले के रूनीसैदपुर प्रखण्ड के मेहसा गांव के अंतिम छोड़ पर बसे मांझी टोला में पहुंचे। चुन्नू मांझी के घर पहुंचते-पहुंचते उस मोहल्ले के ढेर सारे बच्चे और कुछ लोग मेरे पीछे-पीछे वहां तक आ गए थे। यह उसी चुन्नू मांझी का घर है जिसकी 3 साल की बेटी वर्षा कुमारी की 14 अगस्त 2020 को मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल काॅलेज एंड हाॅस्पीटल में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार के उपचार के दौरान मौत हो गई थी। जब हम वहां पहुंचे उस वक्त चुन्नू मांझी के घर पर कोई नहीं थी। पास ही में बनी एक झोपड़ी से पड़ोसियों ने बुखार में तप रही चुन्नू मांझी की बूढी मां कमला को सहारा देकर बाहर बुलाया। कमला ने बताया कि अभी दो दिन पहले ही चुन्नू अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ काम की तलाश में गया चला गया है। चुन्नू एक दिहाड़ी मजदूर है। कमला ने अपनी पोती की मौत पर सरकार की तरफ से किसी तरह का मुआवजा मिलने से इंकार किया। चुन्नू मांझी का कच्चा मकान है और उसमें कोई दरवाजा नहीं लगा है। उसे किसी सरकारी योजना का लाभ भी नहीं मिला है। मोहल्ले में धोबी, हजाम, धानुक, माझी और राम की मिली-जुली आबादी है जबकि मेहसा गांव के एक दूसरे हिस्से में ओबीसी और सवर्ण जातियों की भी आबादी है। मांझी मोहल्ले में पक्की कंक्रीट की गली के अलावा विकास के नाम पर कुछ और नहीं दिखता। अन्य माहादलित जाति के लोगों का हाल भी चुन्नू माझी से बहुत बेहतर नहीं है। 

 सीतामढ़ी के बाद पूर्वी चंपारण के चकिया प्रखण्ड के शेखी चकिया गांव में हम शाहबाज आलम के घर पहुंचे। यहां जून 2020 में शाहबाज की छह साल की बेटी खुशी की चमकी बुखार में मौत हो गई थी। बीमार पड़ने पर उसे पहले चकिया से 50 किमी दूर मुजफ्फरपुर के केजरीवाल अस्पताल ले जाया गया था। वहां से डाॅक्टरों ने उसे पटना मेडिकल काॅलेज अस्पताल रेफर कर दिया जहां उसकी मौत हो गई। शाहबाज पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं और चेन्नई में मजदूरी करते हैं। शहबाज की पत्नी मरियम कहती हैं, “उन्हें सरकार की तरफ से कोई मुआवजा नहीं मिला है अब तक।” मरियम कहती हैं कि उनके घर में कोई मर्द नहीं है जो इसके लिए किसी सरकारी दफ्तर से पता लगाए। मरियम का कच्चा मकान है। घर में पक्का शौचालय और पानी का कोई इंतजाम नहीं है। 

इंसेफेलाइटिस के शिकार होते हैं दलित-बहुजन बच्चे

हम बेगूसराय जिले के बलिया प्रखण्ड स्थित सालेह चक गांव के असलम के घर भी पहुंचे। असलम की पांच साल की बेटी फातिमा की पिछले साल 15 जून, 2019 को संदिग्ध चमकी बुखार से मौत हो गई थी। बीमार पड़ने पर फातिमा को पहले बलिया के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाया गया था जहां से डाॅक्टरों ने उसे बेगुसराय के सिविल अस्पताल में रेफर कर दिया। चार दिन बाद वहीं उसकी मौत हो गई। फातिमा की मौत का उसके परिजनों को कोई मुआवजा नहीं मिला। असलम दैनिक भास्कर अखबार का वह पेज भी दिखाते हैं जिसमें मृत फातिमा को गोद में उठाकर उसकी दादी यासमीन खातून विलाप कर रही है। इलाके के लगभग सभी अखबारों ने तस्वीर के साथ उसकी खबरें प्रकाशित की थी। असलम कहते हैं, वह कई बार अस्पताल गए लेकिन हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर उन्हें टरका दिया गया। दो बार स्वास्थ्य विभाग के लोग भी घर पर आए थे लेकिन पैसा आज तक नहीं मिला। असलम दिल्ली में मजदूरी करते हैं लेकिन लाॅकडाउन के बाद से घर पर हैं। तंग गलियों में एक कच्चा मकान असलम और उसके परिवार का ठिकाना है। घर में पक्का शौचालय नहीं है। इस मोहल्ले में कुजरा और मंसूरी जाति के लोग रहते हैं। गांव में बढ़ई, राम और कुम्हारों की भी आबादी है। इसी गांव में थोड़ी दूरी पर शेख और सैयद लोगों का अलग मोहल्ला है।

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मुजफ्फरपुर के औराई ब्लाॅक के डेकूली गांव के मजदूर सुरंजन राय की 8 वर्षीय बेटी सुरूची कुमारी की 9 सितंबर को मुजफ्फरपुर श्रीकृष्ण मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल (एसकेएमसीएच) में चमकी बुखार से मौत हो गई थी। सुरंजन लुधियाना में मजदूरी करते हैं। उनके पास जाॅब कार्ड नहीं हैं। घर में अभी दो लोग और बीमार है। सुरंजन कहते हैं, उन्हें सुरूची के मरने के एक माह बाद मृत्यु प्रमाणपत्र दिया गया, लेकिन मुआवजा की राशि आज तक नहीं मिली है। वह कई बार इलाके के बीडीओ से भी इस संदर्भ में मिल चुके हैं। सुरंजन कहते हैं, “एक ही बीमारी में सरकार एक को मुआवजा देती है और एक को नहीं। आखिर यह भेदभाव क्यों है।”

अधिकांश पीड़ित पिछड़ी और दलित जातियों से

हमने पश्चिमी चंपारण के लौरिया गांव के मुकेश राम से भी बात की। मुकेश की डेढ़ साल की बेटी शिल्पा की बीते 3 सितंबर को एसकेएमसीएच मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से मौत हो गई थी। मुकेश को भी मुआवजा नहीं मिला है। इस तरह इस साल इंसेफेलाइटिस से मरने वाले आठ बच्चों के परिजनों से हमने बात की। हमने लगभग 30 ऐसे परिजनों से भी बातचीत की जिनके बच्चों को इंसेफेलाइटिस हुआ था लेकिन अस्पताल में इलाज मिलने के बाद वे ठीक हो गए। इनमें सभी लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों से ताल्लुक रखते हैं। उनके पास रोजगार की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। पक्का मकान, पक्का शौचालय और यहां तक कि पीने के साफ पानी का भी इंतजाम नहीं है। उनके पास आयुष्मान कार्ड भी नहीं है। कई लोगों ने बताया कार्ड तो है लेकिन अस्पतालों में इसका कोई लाभ नहीं मिलता है।

पिछले साले के मुकाबले 2020 में हुई कम मौतें

पिछले साल 2019 में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार के प्रदेश में 500 से अधिक मामले सामने आए थे और उनमें लगभग 140 बच्चों की मौत हुई थी, वहीं वर्ष 2020 में मृतकों की संख्या में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। इस साल सिर्फ 11 बच्चों की इस बीमारी से मौत हुई है। अगर राज्य स्वास्थ्य सोसाइटी बिहार के 1 जनवरी 2020 से 7 मई 2020 के आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल चमकी बुखार से जुड़े प्रदेश में कुल 44 मामले सामने आए हैं। इनमें सिर्फ 4 बच्चों की मौत हुई जबकि अन्य 40 बच्चे ठीक हो गए। इस साल जो मामले रिपोर्ट किए गए उनमें 23 लड़के और 21 लड़कियां थीं। इस साल जिन जिलों में चमकी बुखार के मामले सामने आए उनमें जहानाबाद, मुजफ्फरपुर, पटना, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, पूर्णिया, शिवहर, सीतामढ़ी, सारण, सिवान और वैशाली शामिल थे।

इस मामले में मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल के शिशु रोग और इंसेफेलाइटिस विभाग द्वारा जारी आंकड़े थोड़े अलग हैं। 27 मार्च 2020 से 19 अगस्त 2020 के बीच इंसेफेलाइटिस के ज्ञात और अज्ञात कुल 67 मामले यहां सामने आए जिनमें 11 बच्चों की मौत हो गई।  

बड़ी उपलब्धि बता रहा स्वास्थ्य विभाग

स्वास्थ्य विभाग इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रहा है। मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन डाॅ. शैलेश प्रसाद सिंह कहते हैं, इस साल स्वास्थ्य विभाग इस बीमारी की रोकथाम के लिए पूरी तरह मुस्तैद था। हमने ब्लाॅक और पंचायत स्तर पर तैयारियां की थी। पंचायत स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं को घर-घर भेजकर लोगों को जागरूक किया गया था। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए उचित ट्रेनिंग दी गई थी। डाॅ. शैलेश कहते हैं, “पिछले साल मृत्यु के मामले इस लिए बढ़े क्योंकि मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका था। कई बच्चों की मौत इसलिए हुई क्योंकि प्राथमिक स्तर के अस्पतालों और डाॅक्टरों को बीमारी को समझने में देर हुई और उन्हे़ं देरी से इलाज मिला।”

मामले की गिरावट में प्राकृतिक कारण भी जिम्मेदार

यूं तो बिहार में चमकी बुखार का मामला पहली बार मुजफ्फरपुर में वर्ष 1995 में सामने आया था लेकिन 2005 के बाद से इस बीमारी से लगातार बच्चों की मौत हो रही है। सरकार ने इससे निपटने के लिए वर्ष 2016 में स्टैंडर्ड आपेरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू किया था। इसके बाद 2017 और 2018 में मौतों पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया गया था। लेकिन 2019 में मृतकों की संख्या में अचानक इजाफा हो गया। बोचहा प्रखण्ड के स्वास्थ्य प्रबंधक कुमार राम कृष्ण कहते हैं पिछले साल मामले इसलिए ज्यादा हुए क्योंकि 2019 में लोकसभा चुनाव को लेकर इस बीमारी की रोकथाम की तैयारियों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। वह कहते हैं, हर साल इस बीमारी का प्रकोप नहीं होता है। जिस साल गर्मी ज्यादा होती है उस साल इसके फैलने का खतरा भी ज्यादा होता है। इस साल गर्मी पिछले साल की तुलना में कम पड़ी है। लगातार बारिश होते रहने से मौसम ठंडा रहा है। दूसरा लाॅकडाउन के कारण बच्चे भी घरों में ज्यादा रहे। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भी मृत्यू दर पर पड़ा है।

सरकार ने की थी घोषणाएं

उल्लेखनीय है कि पिछले साल बिहार में चमकी बुखार से लगभग 140 बच्चों की मौत के बाद यह मामला देशभर की मीडिया की सुर्खियों में आया था और इसे लेकर बिहार सरकार की काफी फजीहत हुई थी। चमकी बुखार के उपचार के लिए बनाए गए मुख्य केंद्र मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल काॅलेज एवं हाॅस्पीटल (एसकेएमसीएच) में 17 जून, 2019 को जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पीड़ित परिवारों से मिलने गए थे तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। उस वक्त बिहार सरकार ने घोषणा की थी कि मुजफ्फरपुर के श्रकृष्ण मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल की 610 बिस्तर की क्षमता को बढ़ाकर 2,500 बिस्तर में तब्दील किया जाएगा। सरकार ने आश्वासन दिया था कि 1,500 बिस्तर की क्षमता का निर्माण एक साल के अंदर ही पूरा कर लिया जाएगा। साथ ही आईसीयू की क्षमता को 50 से बढ़ाकर 100 किया जाएगा। सरकार ने यह भी कहा था कि निजी वाहन से अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को सरकार 400 रूपया किराया और मृतकों के परिजन को 4 लाख का मुआवजा देगी।

सरकार के कितने वादे हुए पूरे

सरकार की घोषणाएं कितनी पूरी हुई इस सवाल पर एसकेएमसीएच के सुपरिटेंडेंट डाॅ. सुनील कुमार शाही कहते हैं, “अस्पताल में 100 बिस्तर की क्षमता वाला इंसेफेलाइटिस वार्ड बनकर तैयार हो चुका है। 1500 बिस्तर और 50 आईसीयू के लिए नई बिल्डिंग बन रही है, जल्द ही यह काम भी पूरा हो जाएगा। मुआवजे की रकम भी लाभार्थियों को तत्काल उपलब्ध करा दी गई है।” पिछले साल मरने वाले कुछ बच्चों के अभिभावक मुआवजा न मिलने की शिकायत करते हैं, इस सवाल पर डाॅ. शाही कहते हैं, “मुआवजे को लेकर लोगों में बहुत भ्रम की स्थिति है। मुआवजा डेथ सर्टिफिकेट के आधार पर दिया जाता है जिसमें मौत का ज्ञात कारण एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) बताया गया हो। कुछ बच्चे चमकी बुखार से मिलते-जुलते मेनेंजाइटिस, मिजल्स या अन्य बीमारी से भी मर जाते हैं। इन बीमारियों के लक्षण भी चमकी बुखार जैसे ही दिखते हैं। ऐसे केस में उनके परिजनों को मुआवजा नहीं मिलता है।”

इस साल 2020 में मरने वाले बच्चों के परिजनों को मुआवजा नहीं मिलने के सवाल पर सुनील कुमार शाही कहते हैं कि हो सकता है कि लाॅकडाउन और चुनाव के कारण ऐसे लोगों को अभी मुआवजा नहीं मिला हो और  प्रोसेस में हो। वहीं मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन शैलेश प्रसाद सिंह कहते हैं, “पिछले साल चूंकि चमकी बुखार एक महामारी का रूप ले लिया था इसलिए सरकार ने मृतकों के लिए 4 लाख रुपये मुआवजे का ऐलान किया था, लेकिन इस साल उतनी संख्या में मौतें नहीं हुई है। इसलिए अभी तक शासन की तरफ से किसी को मुआवजा देने का आदेश नहीं आया है। इस साल सिर्फ कोरोना से मरने वालों को 4 लाख का मुआवजा दिया जा रहा है।” हालांकि वे कहते हैं, चमकी बुखार से पीड़ित मरीजों द्वारा किराए के वाहन से अस्पताल पहुंचने पर अभी भी उन्हें 400 रूपये का यात्रा भुगतान किया जा रहा है।

बहरहाल, इंसेफेलाइटिस के कारण अपने बच्चों को खोने वाले परिजनों का कहना है कि सरकार मुआवजा दे या न दे, लेकिन बच्चों की जान बचाने के लिए पहल जरूर करे। बच्चों की जान को बचाया जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्हें उम्मीद है कि नई सरकार इस दिशा में कुछ करेगी।

(यह रिपोर्ट सेंटर फाॅर रिसर्च एंड डायलाग ट्रस्ट के बिहार चुनाव रिपोर्टिंग फेलोशिप के तहत प्रकाशित की गई है)

(संपादन : नवल/अमरीश)

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