किसान और गांवों के बारे में पेरियार के विचार

आप ऐसा पूछ सकते हैं कि ग्रामीण ऐसा नहीं करेंगे तो खेती कौन करेगा। यह प्रश्न कुछ ऐसा ही है, जैसे यह पूछना कि जब सभी सफाईकर्मी पढ़-लिखकर दूसरे काम करने लगेंगे तो सफाई का काम कौन करेगा। इस प्रश्न के सापेक्ष मेरा उत्तर होगा कि सभी समुदायों, जातियों को अपनी जनसंख्या के अनुपात में मानवीय श्रम के लिए आगे आना चाहिए

[किसान और ग्रामीण विकास के संबंध में पेरियार ने यह भाषण 31 अक्तूबर 1944 को ‘ग्राम्य: अधिकारी प्रशिक्षण स्कूल, इरोड’ के वार्षिकोत्सव के अवसर पर दिया था। गांधी तथा उनके समर्थक ‘आत्मनिर्भर गांव’ का सपना देखते थे। पेरियार का मानना था कि जब तक गांव हैं, तब तक दलितों और पिछड़ों के जीवन में आत्मनिर्भरता आ ही नहीं सकती। वे गांव शब्द को ही शब्दकोश से मिटा हुआ देखना चाहते थे। इस भाषण से समझा जा सकता है कि पेरियार अपने समय के नेताओं की अपेक्षा कितने आधुनिक थे। (स्रोत : कलेक्टेड वर्क्स ऑफ पेरियार)]

समाज के शब्दकोश से मिटा दिया जाय गांव नामक शब्द

  • पेरियार

अध्यक्ष महोदय तथा साथियो!

ग्रामीण अधिकारी बनने हेतु प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे, यहां इस भोर में उपस्थित सभी विद्यार्थियो…. 

इस सभा के अध्यक्ष शिक्षा विभाग के अधिकारी हैं। उनसे आगे की सीट पर विराजमान उप कर-संग्रह अधिकारी, ग्रामीण अधिकारियों का मार्गदर्शन करते हैं। उन दोनों अधिकारियों के पास बड़ी जिम्मेदारियां तथा उन्हें पूरा करने वाली शक्तियां हैं। जहां तक मेरा संबंध है, मुझे तो सभी राजनेता अपना कट्टर दुश्मन मानते हैं। समाज के वे सभी तथाकथित बड़े लोग, जिनसे जनता नफरत करती है, जो उसे नापसंद हैं, सभी मेरे विरुद्ध हैं। केवल वही नहीं, तथाकथित ऊंची जातियों के लोग, जो इस देश के समस्त सत्ताकेंद्रों पर मौजूद रहकर उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण करते हैं, वे भी मेरा विरोध करते हैं। इसके साथ-साथ मुझे सनातन परंपरा, संस्कृति तथा धर्मशास्त्रों का दुश्मन बताया जाता है। 

यद्यपि मैं अपने आपको समाज सुधारक कहलवाना पसंद करूंगा, किंतु समाज सुधार की मेरी अवधारणा तथा उनके लिए काम करने का तरीका दूसरों से एकदम अलग है। मैं ऐसी किसी चीज को जरा भी महत्व नहीं देता, जो धर्म तथा प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं पर आधारित हो। मेरे अधिकांश सुधारवादी तरीके, काम करने का ढंग, परंपरा द्वारा स्थापित मार्गों, विधियों के विखंडन पर टिके हैं। कुछ भी नया गढ़ने के लिए पुराने तथा जीर्ण पड़ चुके विश्वासों का ध्वस्त होना अत्यंत आवश्यक है, समाज सुधार संबंधी मेरे आदर्श मुख्यतः इसी सिद्धांत पर केंद्रित हैं। इस कारण लोग मुझे खतरनाक और विध्वसंक मानने की गलती भी करते रहे हैं।

ई. वी. रामासामी पेरियार की तस्वीर

इन हालात में, यहां उपस्थित जनसमुदाय के बीच, मुझे जिस विषय पर वक्तव्य देना है, वह है, ‘ग्राम्य सुधार तथा ग्राम्य विकास हेतु संरचनात्मक योजना’। मैं नहीं जानता कि इस गरिमामयी उपस्थिति के बीच मेरे विचार कितने सटीक और स्वीकार्य सिद्ध होंगे। मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि जैसे हम सब नाटकों में अविश्वसनीय और ऊटपटांग हास्य प्रसंगों को भी धैर्यपूर्वक पचा लेते हैं, वैसे ही मैं जो कहने जा रहा हूं, आप उसे भी धैर्यपूर्वक सुनने का कष्ट करेंगे। मेरी प्रार्थना है कि घर लौटने के बाद, मैंने यहां जो भी कहा है, उसे एक बार फिर याद करने की कोशिश करें। खुले दिलोदिमाग, निरपेक्ष भाव और स्वतंत्र मन से उसपर पुनर्विचार करें। मनुष्य सिर्फ गंभीर चिंतन-मनन से ही सत्य का साक्षात कर सकता है। क्रोधित मनोभावों के बीच श्रेष्ठ और संतुलित निर्णय कर पाना असंभव होता है। 

उतावलेपन में किए गए फैसले, बुद्धिमत्तापूर्ण निष्कर्ष नहीं होते। इसलिए मेरी आप सबसे दुबारा प्रार्थना है कि मेरे निष्कर्षों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें, तभी किसी युक्ति-युक्त परिणाम तक पहुंचें।

साथियो! अब मुझे सीधे-सीधे ग्राम्य सुधार पर चर्चा आरंभ कर देनी चाहिए। ग्राम्य सुधार से मेरा अभिप्राय है कि सभी गांवों को समाप्त हो जाना चाहिए। सिर्फ इतना ही नहीं, ‘गांव’ शब्द को भी शब्दकोश से मिटा देना चाहिए। मैं तो कहना चाहूंगा कि ‘गांव’ शब्द के लिए राजनीति में भी कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए। 

आज, गांव के बारे में अवधारणा है कि इसका लक्ष्यार्थ तथा परिवेश, शहरों एवं कस्बों से स्पष्टतः भिन्न है। आप गांवों के विकास तथा उनके पुनरुद्धार हेतु चाहे जितने प्रयत्न करें, आप अपने वास्तविक लक्ष्य, यानी संपूर्ण कामयाबी को कभी प्राप्त नहीं कर सकते। कुछ ऐसे ही जैसे ‘परया’ और ‘चिक्कलीस’ जैसी अछूत जातियों के उत्थान हेतु चलाए गए समाज सुधारवादी सभी कार्यक्रम,एक नए वर्ग जैसे कि ‘हरिजन’ या ‘आदि-द्रविड़’ का जन्मदाता सिद्ध हुए हैं। कुछ मामूली बदलाव भी अवश्य हुए होंगे, किंतु वे ग्राम्य विकास योजनाओं के औचित्य उनकी सार्थकता को सिद्ध करने वाले नहीं हैं। गांव में रहने वाले वैसी आजादी और उन अधिकारों का आनंद कभी नहीं उठा सकते, जो आजादी और अधिकार शहरों और कस्बों में रहने वाले लोगों को प्राप्त होते हैं। वह इसलिए कि शहरों और कस्बों की स्थापना का उद्देश्य गांवों की स्थापना के उद्देश्य से पूरी तरह अलग होता है।

मैं इसपर विस्तार से चर्चा करना चाहूंगा। आप समाज को वर्णाश्रम सिद्धांत के अनुसार विभिन्न श्रेणियों यथा शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और पंचम में बंटा हुआ पाते हैं। उसमें आप पंचमों (अछूत) को सामाजिक स्तरीकरण अर्थात वर्णव्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर पाते हैं। इसी तरह शहरों, कस्बों में गांवों के श्रेणीक्रम में आप गांवों को सबसे निचले स्तर पर देख सकते हैं। 

वर्णाश्रम सिद्धांत यानी वर्णव्यवस्था क्या है? इस व्यवस्था में कुछ लोगों को ऊंचा और दूसरों से श्रेष्ठतर मान लिया जाता है। जबकि कुछ लोगों को हीन एवं तुच्छ मानकर सबसे निचले स्तर पर पटक दिया जाता है। शीर्षस्थ श्रेणी के लोग जिन्हें ब्राह्मण कहा जाता है, बगैर शरीर को हिलाए, बिना कोई श्रम किए सुखी और गरिमामय जीवनयापन के लिए बने हैं। उन्हें काम करने की आवश्यकता नहीं है। बावजूद इसके उन्हें अपने जीवन में सभी प्रकार के आराम और सुखामोदों का अधिकारी मान लिया गया है। जबकि दूसरे वर्ग, द्रविड़ प्रजाति के लोगों को अंतहीन श्रम करना पड़ता है। उनके श्रम का लाभ दूसरे लोग उठाते हैं। वर्णाश्रम धर्म यानी जाति-व्यवस्था का यही मूलाधार है। इसके अलावा वह और कुछ भी नहीं है।

इस जघन्य, अतिदुष्ट बुराई (जातिप्रथा) के कारण वर्णव्यवस्था के आधार पर निर्मित शीर्ष तीन वर्ण, समाज में जानबूझकर चौथे और पांचवे वर्ण का शोषण करते हैं। यह माना जाता है कि चौथे और पांचवें स्तर की जातियों के लोगों को, तीन शीर्ष जातियों के सुखी एवं समृद्ध जीवन की खातिर बनाया गया है। यह भी बताया जाता है कि चौथे और पांचवें वर्ण में आने वाली जातियां, तीनों शीर्ष जातियों की सेवा द्वारा ही मोक्ष रूपी वैतरणी को पार कर, स्वर्ग की अधिकारी बन सकती हैं। इसके अलावा उनके उद्धार(मोक्ष) का दूसरा कोई उपाय नहीं है। 

आगे यह भी नियम भी बनाया गया है कि यदि चौथे और पांचवें वर्ण के लोगों के हाथों में नकद राशि आ जाती है, तो उसे उच्च जाति के ब्राह्मण बलपूर्वक छीन सकते हैं।

यह भी बताया गया है कि पढ़ने और लिखने का अधिकार केवल प्रथम श्रेणी के लोगों, यानी ब्राह्मणों को है। चौथे और पांचवे वर्ण के लोग (द्रविड़) न तो पढ़ सकते हैं और ना ही लिख सकते हैं।

वर्णव्यवस्था का यही मूलभूत सिद्धांत है, जिसे आप शहरों, कस्बों और गांवों में कहीं भी देख सकते हैं। कृपया सोचें क्या यह सही है या नहीं।

गांव क्या है?

अब हमें इसपर विचार करना चाहिए कि गांव क्या है? गांव वह जगह है जहाँ न कोई स्कूल है, न अस्पताल, न नाट्यागार, न पार्क हैं, न पुलिस स्टेशन, न अदालत, न अच्छी सड़कें, न पर्याप्त प्रकाश-व्यवस्था और जहां ना ही शुद्ध पेयजल है। यहां तक कि वहां सभ्यता के भी अवशेष नहीं हैं। ग्रामीणों की कमाई केवल भूख रूपी राक्षस को घर से बाहर रखने तक सीमित होती है। वहां सामान्य सुखी जीवन हेतु आवश्यक धनार्जन का कोई उपाय नहीं होता। न ही बुद्धिबल द्वारा उन्नति करने, जो मनुष्य का सहज अधिकार है, का कोई अवसर होता है। शहरी और कस्बाई नागरिकों को जैसी सुविधाएं प्राप्त होती हैं, ग्रामीण उससे सर्वथा वंचित होते हैं। क्या गांवों के हालात के बारे में इससे अधिक बताने की भी आवश्यकता है?

लेकिन, कहा यही जाता है कि शहर और कस्बे गांवों पर निर्भर हैं। ग्रामीणों के श्रम के लाभ शहरों और कस्बों में रहने वाले लोग उठाते हैं। गांव के प्रत्येक उत्पाद का आनंद शहरी और कस्बाई जनों द्वारा उठाया जाता है। कुल मिलाकर शहरों और कस्बों में रहने वाले धनवान लोग ही असली लाभग्राही वर्ग होते हैं। कर उगाही के मामले में भी गांव सरकार को योगदान करते हैं। यहां तक कि सारे तथाकथित देवता और देवालय, साथ में वे लोग भी जो उन देवालयों और मंदिरों पर आश्रित हैं, गांवों की मौजूदगी के कारण मजे उड़ाते हैं।

उन लोगों के आर्थिक स्तर और समृद्धि पर नजर डालें जो उपजाऊ और अधिसिंचित जमीन के स्वामी हैं। गांव जाएं और वहाँ रहते हुए देखें कि वे कैसा जीवन जीते हैं। उस क्षेत्र में उन साहूकारों और मारवाड़ियों पर नजर डालें जहां बंजर, परती और बेनामी जमीन पड़ी है। देखें कि वहाँ साहूकार कैसे गांववालों को नाच नचाते हैं। उनके जीवन और सचमुच में हल चलाने वाले किसानों तथा मजदूरों के जीवन की तुलना करें। यहां तक कि वे लोग भी जो गांवों से वस्तुएं खरीदकर उन्हें कस्बों और शहरों में ले जाकर बेचते हैं, वे भी शानदार जीवन जी लेते हैं। गांवों में सिर्फ खेती के सहारे जीवनयापन करने वाला किसान ही पिछड़ा और स्तरहीन जीवन जीने को बाध्य होता है। ऐसा क्यों होता है? 

इसलिए कि वह अशिक्षित है। वह कठिन परिश्रम करके अन्नोत्पादन करता है। फसल पकने के बाद वह उसे बोरियों में भरकर उन्हें कस्बों और शहरों के लिए लाद देता है। केवल घटिया और बेकार दानों को ही वह अपनी झोपड़ी में ले जाता है। उनका मांड और दलिया बनाकर वह अपने बच्चों को यह तसल्ली देते हुए पिलाता है कि, ‘ईश्वर ने उन्हें इतना ही दिया है।’ वह अपने बच्चों का पेट मांड से भरकर, वह उसी जीवन से संतुष्ट बना रहता है।

यदि आप गांव वालों को पढ़ने-लिखने में सक्षम बना दें तो वे बहुत सी बातों को समझने लगेंगे और कहेंगे—

‘हम पसीना बहाते हैं, हम उत्पादन करते हैं। लेकिन हमें केवल मांड और आधे-अधूरे पेट से गुजारा करना पड़ता है। दूसरी ओर जो मेहनत-मशक्कत नहीं करते, वे हर चीज भरपेट खाते हैं। बिना काम किए ही वे जीवन का आनंद लेते हैं। हमारे कष्टों का कारण क्या है?’

एक बार, जब आप गांववालों को शिक्षित कर देंगे, तब वे अपनी भीषण परेशानियों के बारे में काफी कुछ जान जाएंगे। यही कारण है कि गांव वालों को बिना शिक्षा के अंधेरे में रखा गया है। क्या यह इस बात का स्पष्ट संकेत नहीं है कि गांववालों के साथ वही सुलूक किया जाता रहा है जो वर्णव्यवस्था के अनुसार ‘पंचमों’(अछूतों) के साथ किया जाता है।

इन परिस्थितियों में विकास योजनाओं की मदद से ग्राम्य सुधार की बात करना बहुत बड़ा धोखा है। वे लोग जिन्हें आज भी दूसरों से श्रेष्ठतर एवं उच्च माना गया है, वे जोर-शोर से ग्रामोद्धार का नारा लगाने में व्यस्त हैं। वे समाज सुधारकों को गांवों तक जाने की सलाह देते हैं। 

अपने मुवक्किलों, असामियों और ग्राहकों की खोज के आंतरिक उद्देश्य के साथ वकील और व्यापारी लोग रविवार को गांवों का दौरा करते हैं। वहां जाकर झाड़ू उठाते हैं। आसपास की जगह साफ करते हैं। यहां तक कि वे भजन भी गाते हैं। टोकरी में कूड़ा-कचरा भरकर वे धर्म-प्रचार का काम करते हैं! अनपढ़-अशिक्षित गांववालों के कानों में राम और हनुमान की महानता के किस्से भर दिए जाते हैं। उसी समय वे लंकापति रावण के चरित्र की भर्त्सना भी करते हैं।

क्या आपको लगता है कि मात्र इस तरह की गतिविधियों द्वारा गांव का विकास संभव है? 

इस बात पर कृपया गंभीरतापूर्वक विचार करें कि क्या इस तरह की साधारण गतिविधियों से ग्रामवासियों का वास्तविक उत्थान हो सकता है।

गांवों को क्या मिलता है?

गांवों की देखभाल की क्या आवश्यकता है? गांवों में लोग क्या करते हैं? वे बकरियों, गायों, सांडों, बैलों और सूअरों के प्रजनन चक्र की देखभाल करते हैं। वे दूध, दही, मक्खन आदि का उत्पादन और संरक्षण करते हैं ताकि कस्बों और शहरों में रह रहे लोग उनका आनंद उठा सकें।

एक ग्रामीण आमतौर पर सुबह दो बजे उठता है। वह अपने पालतु पशुओं को चारा डालता है। प्यास बुझाने के लिए उन्हें पानी भी पिलाता है। चार बजे तक वह पशुओं के बाड़े को साफ कर देता है। गाय-भैंसों को दुहता है। बिना दूध के थोड़े-से मांड या दलिया का सेवन करता है। पांच बजे वह घर से निकल पड़ता है। तीन से पांच किलोमीटर की यात्रा के बाद प्रातः छह बजे, भोर से पहले, अंधेरे में ही, वह शहरों और कस्बों में जाकर अपने ग्राहकों के बंद पड़े दरवाजों को खटखटाता है, आवाज लगाता है—‘सर दूध….मैडम दूध लीजिए।’ 

उसके बच्चे दूध या घी की उपयोगिता से अनजान से रहते हैं। यह सच है कि शहरों और कस्बों में रहने वाले ग्रामीणों को पैसा देते हैं। यहां आपको देखना होगा कि कस्बों और शहरों में रहने वाले लोगों से ग्रामीणों को जो पैसा मिलता है, उनका क्या होता है। उसका एक हिस्सा नगर निगम के कर्मचारियों को चला जाता है। एक हिस्सा पुलिस की जेब में समा जाता है। जो बचता है, उसका बड़ा हिस्सा वकीलों, अदालतों और बाबुओं के पेट में समा जाता है। 

अनाज

गांवों में खेती-किसानी करने वाले लोग भी उसी नाव के सवार हैं। उनकी हालत भी प्रशंसनीय नहीं है। खेतों में रात-दिन पसीना बहाने वाला गरीब किसान अपनी उपज को शहरों में आढ़तियों तक ले जाता है। वे उसे सौदेबाजी में फंसा लेते हैं। तरह-तरह के करों के नाम पर उसे ठग लिया जाता है। यहां तक कि अनाज तौलते समय भी किसान को धोखे में रखा जाता है। दलाली के दौरान तरह-तरह की कटौतियां की जाती हैं। ‘धर्मादे के नाम पर, चौकीदार के लिए, कुली के लिए, खाता-बही के वास्ते वगैरह-वगैरह। इतनी सारी कटौतियों के बाद आढ़ती किसान के हाथ में मामूली रकम थमा देता है। उन थोड़े से नोटों और सिक्कों को हाथों में लिए किसान सोचता है कि उसके कठिन परिश्रम के बदले भगवान ने बस इतना ही दिया है। वह चाय पीता है, सिनेमा देखता है और वापस अपने घर लौट जाता है। व्यापारी उस अनाज को अपने गोदाम में रखकर दाम बढ़ने की प्रतीक्षा करता है। उसके बाद वह जमाखोरी और कालाबाजारी के जरिए मोटा मुनाफा कमाता है। धीरे-धीरे अमीर बन जाता है। बंगलों में रहता है। जबकि ग्रामीण बैलगाड़ियों को हांकने, मवेशी चराने और घरेलू कामकाज में उलझे रहते हैं।

सरकार की निगाह में ग्रामीण कमोबेश कसाई के पास ले जाई गई भेड़ की तरह होते हैं।

इसलिए यह कहते हुए मैं खुद को गलत नहीं मानता कि ग्रामीण लोग समाज में अछूत की तरह हैं। वे अपना समूचा जीवन दूसरों को सुखी एवं संपन्न बनाने के लिए जीते हैं। जब हालात ही इतने विकट हैं तो आप क्या हासिल करने जा रहे हैं? ग्रामीण हमेशा उन्हीं हालात में रहने को विवश होंगे जिन हालात में समाज में अछूत और शूद्र रहते हैं। 

इन हालात में समाधान क्या है? हम ऐसे समाज की चाहत रखते हैं जिसमें न कोई ब्राह्मण हो, न ही कोई अछूत हो। इसी तरह हम कामना करते हैं ऐसे समाज की, जिसमें न कोई कस्बा हो, न शहर, न गांव और न ही झोपड़-पट्टी। ऐसा समाज, जिसमें सिर्फ इन्सान बसते हों, वहां केवल शहर ही होने चाहिए। इसे भलीभांति समझ लेना चाहिए कि वर्णव्यवस्था में जैसा बर्ताव निचली जातियों के साथ किया जाता है, गांवों के साथ भी वैसा ही व्यवहार, मैं तो कहना चाहूंगा कि उससे भी बदतर व्यवहार किया जाता है।

समाज में 90 प्रतिशत लोग जाति-व्यवस्था के अनुसार चौथे और पांचवे दर्जे में आते हैं। केवल दस प्रतिशत लोग वर्णव्यवस्था की तीन उच्च श्रेणियों से संबंधित होते हैं। इसी प्रकार 100 बस्तियों में 90 गांव हैं। इस कार्यक्रम के अध्यक्ष ने बताया है कि भारत में सात लाख गांव हैं। जबकि कस्बों और शहरों की संख्या 75,000 से भी कम है।

यही नहीं, गांवों और कस्बों में रहने वाला मामूली गाड़ीवान या चपरासी या फिर भीख पर निर्भर रहने वाला ब्राह्मण पुजारी भी, अपने बच्चों को पढ़ाने में सक्षम होता है। उनमें से कुछ मैट्रिक, कुछ इंटरमीडिएट और कुछ बीए पास कर लेते हैं। कुछ तो डाक्टर, इंजीनियर और यहां तक कि आइसीएस(भारतीय सिविल सेवा) अधिकारी भी बन जाते हैं। यहां तक कि 100 से 200 एकड़ भूमि धारकों को भी अपनी आय का एक हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना पड़ता है। मगर द्रविड़ प्रजाति के गांवों के बारे में यह सच नहीं है। गरीब काश्तकार का बेटा चलना शुरू करते ही मवेशियों की देखभाल में लग जाता है। 

शहरों में सरकार सभी बच्चों, यहां तक कि जमादार के बच्चों को भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है। ऐसे स्कूल खुल चुके हैं जहां कोई फीस नहीं ली जाती। ग्रामीणों के मामले में उनका बालक शिक्षा ग्रहण करने के लिए कस्बों में जाता है। वहां पर्याप्त मार्गदर्शन के अभाव उनकी प्रतिभा नष्ट होने लगती है। कुछ तो बीड़ी-सिगरेट, शराब और नशाखोरी जैसी बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं। 

ज्यादा दूर क्यों जाएं? खाद्यान्नों की आपूर्ति के मामले को ही लें। नट्टूकोट्टई के व्यापारी जैसे मंदिरों और देवताओं के नाम पर आवश्यक अनाज की निश्चित मात्रा नियमित रूप से जारी करते हैं, ठीक वैसे ही शहरी जनता के लिए सरकार आवश्यक अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित करती है। गांवों में इस तरह की कोई राशन-व्यवस्था नहीं है। वहां लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। ग्रामीण कस्बों में जाकर चुपके से एक-एक रुपये के चावल खरीदते हैं। वे अन्न उत्पादक हैं, किंतु उन्हें अपने ही उत्पाद से वंचित कर दिया जाता है। उसे अपराध करने के लिए बाध्य किया जाता है। क्योंकि हम उसे धक्के खाने के लिए छोड़ देते हैं। अपनी जरूरतों की भरपाई के लिए, शहरों और कस्बों में जाने के अलावा उसके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता।

अब हम लोगों की जीवन-शैली पर आते हैं। शहरों और कस्बों में रहने वाले सौ में से नब्बे लोग कठिन परिश्रम नहीं करते। फिर भी वे सुखी जीवन जीते हैं। यह बात गांव में रहने वाले लोगों के बारे में सच नहीं है। यदि लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद हो जाए तो ग्रामीणों को शहर भागना पड़ता है। वहाँ जाकर न्याय के लिए बार-बार गुहार लगानी पड़ती है। गांव के जनजीवन की सबसे गंभीर समस्या यह है कि वहां व्यक्ति को, आर्थिक रूप से समृद्ध और रसूखदार लोगों के आगे दबकर रहना पड़ता है।  

आपका ध्यान दूसरे पहलुओं पर मोड़ते हुए अब मैं ग्रामीण अधिकारियों के बारे में कुछ शब्द कहना चाहता हूं। उन्हें मासिक वेतन के रूप में मात्र 15 रुपये प्राप्त होते हैं, जबकि अपने परिवार के भरण-पोषण तथा स्तर को बनाए रखने के लिए उनका वेतन कम से कम 100 रुपये प्रति माह होना चाहिए। इतना कम वेतन पाने वाले ग्रामीण अधिकारियों से आप न्याय की उम्मीद भला कैसे कर सकते हैं! कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपने कर्तव्य का विधिवत पालन कर पाएंगे। गांव की निगाह में वह भले ही अधिकारी हो, शहर में उसकी हैसियत महज साधारण कर्मचारी जितनी होती है।

कृषि

पिछले 200 वर्षों से हमारा खेती करने का ढंग एक जैसा है। उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ। एक सीमा खेती की नई जमीन के सिंचन हेतु सिंचाई सुविधाएं और ओवरहेड टैंक जरूर बनाए हैं। लेकिन कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो पाया है। कृषि विभाग ने कुछ गिने-चुने कर्मचारियों की भर्ती अवश्य की है, लेकिन कुल मिलाकर वह भी केवल ब्राह्मणों का मददगार हैं, जिन्हें खेती-किसानी का ककहरा भी नहीं आता। 

अनाज के उत्पादन में कोई सुधार नहीं हो पाया था। खेती के तरीकों में भी किसी प्रकार का सुधार नहीं था। खेत की जुताई करने वाले को अपनी मेहनत के अनुपात में पर्याप्त अनाज नहीं मिल पाता। किसानों को उनके किसानी के आधुनिकतम तरीकों, नई प्रौद्योगिकी के बारे में नहीं बताया गया है। सरकार ने उनके लिए क्या किया है? इस गलतफहमी के कारण कि गांव के किसान शिक्षित हैं, उनके बीच छपी हुई प्रचार सामग्री बांटी गई है! यह मान लेना एकदम गलत है कि दूसरे देशों की तरह हमारे यहाँ के किसान भी पढ़े-लिखे हैं। सरकार इस सच्चाई को नहीं समझ पाई है कि अधिकांश किसान अशिक्षित और असभ्य हैं। वे शहरों और कस्बों से दूर रह रहे हैं। वे आधुनिक कृषि यंत्रों तथा आविष्कारों के बारे में कुछ नहीं जानते। उन्हें जान-बूझकर विवेकरहित और तर्क-शून्य प्राणी बनाकर रखा गया है।

समाधान

यदि हम ग्रामीणों के हालात में सुधार के प्रति सचमुच गंभीर हैं, अपने गाँवों का पुनरुद्धार करना चाहते हैं, तो हमें अनेक योजनाएं लागू करनी होंगीं। गांवों के सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण योजनाएं हैं।

इन दिनों खेती को शारीरिक श्रम के सहारे किया जाता है। उसे बदलना चाहिए। मशीनों के प्रयोग द्वारा खेती को उद्योग में बदल देना चाहिए।

जुताई, बुआई से लेकर फसलों की निराई-गुड़ाई, कटाई जैसे प्रत्येक काम के लिए मशीनों की मदद ली जानी चाहिए। नलकूप लगाना, पानी निकालना, और खेतों तक पानी पहुंचाने का काम सभी कुछ मशीनों की मदद से होना चाहिए।

इन सब बदलावों के लिए आवश्यक है कि खेतों को इस प्रकार सुनियोजित किया जाए, जिससे उनमें मशीनों का इस्तेमाल किया जा सके। उन खेतों में जहां खेती का मशीनीकरण संभव न हो, ऐसी फसलों की खेती की जानी चाहिए, जिनके लिए किसानों को न्यूनतम श्रम और अल्पतम देखभाल की आवश्यकता हो।

किसानों को सहकारी समितियों के माध्यम से संगठित कर देना चाहिए। उनके द्वारा उगाई गई फसल पर किसान सहकारी समितियों के नियंत्रण होना चाहिए। खेती से जो भी मुनाफा हो, उसे किसानों को आपस में बराबर-बराबर बांट लेना चाहिए। गांवों को एक-दूसरे से जोड़कर कस्बों के रूप में विकसित कर देना चाहिए। उनमें स्कूल, अस्पताल, पार्क, सिनेमा घर, नाट्य-कला केंद्र, मनोरंजन सदन, पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष, रेडियो केंद्र, अच्छी सड़कें, बस स्टैंड, पुलिस स्टेशन आदि सब कुछ होना चाहिए। इनके अलावा वहां एक न्यायाधिकारी तथा कृषि उत्पादों के संरक्षण-वितरण हेतु बाजार की व्यवस्था होनी चाहिए। इनके अलावा चलती-फिरती प्रदर्शनियां लगाई जानी चाहिए, जो इस गांव से उस गांव के बीच यात्रा करती रहें।

विवादों पर पुनर्विचार हेतु जगह-जगह न्यायालय होने चाहिए। जब भी कहीं कलह, अदावत या आपसी रंजिश के चिह्न नजर आएं, उपयुक्त व्यक्तियों जिनकी जिम्मेदारी प्रभावित स्थानों पर जाकर, वहीं रहते हुए समाधान खोजने की है, द्वारा उनका अविलंब समाहार किया जाना चाहिए। 

आज (1944) मद्रास शहर की जनसंख्या 10 लाख है। कोयंबटूर की जनसंख्या 1 लाख है। इरोड कस्बे की जनसंख्या 50,000 है। इरोड के आसपास स्थित गाँवों कोल्लम पालयम, मूलपालयम, सुरमपत्ती, मेत्तुवलासु आदि को, ऐसा घेरा बनाकर जिसमें 3000 से 5000 आबादी शामिल हो, उन्हें परस्पर जोड़कर उसी नाम अथवा किसी नए नाम से कस्बे का रूप दे देना चाहिए। कस्बों में आमतौर पर पनपने वाले दलालों से उनकी सावधानीपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए। 

यह भावना कि गांव केवल शहरों और कस्बों के मजे के लिए हैं, को पूरी तरह त्याग देना चाहिए।

इसके अलावा गांवों में और उनके आसपास लघु उद्यम लगाए जाने चाहिए। उससे ग्रामीणों के रोजगार की तलाश में शहर जाने पर रोक लगेगी। ऐसे बहुत से घरेलु उद्यम हैं, जिन्हें छोटी मशीनों की मदद से चलाया जा सकता है। हमें ग्रामीणों को उन्हीं के गांवों में रोजगार उपलब्ध कराना होगा। ‘कुप्पईकट्टन’ (जंगली, उजड्ड), पट्टीकट्टन (गंवार), ग्रामाथन (देहाती) जैसे हेय और अपमानसूचक शब्दों के प्रयोग से हमें परहेज करना चाहिए। ऐसे शब्दों की अब हमें आवश्यकता नहीं है। मैं नहीं समझ पाया कि कठिन परिश्रम करने वाले लोगों के लिए इस प्रकार के अवमाननाकारी संबोधन भला क्यों होने चाहिए। इनका आगे भी उपयोग करते रहना, अनुचित एवं अन्यायकारी है। मैं इन शब्दों को मिटते हुए देखना चाहता हूं।

मैंने विदेश यात्राएं की हैं। मैं पश्चिमी देशों के अनेक गांवों के दर्शन कर चुका हूं। वहां मुझे ठीक वैसे ही गांव मिले, जैसे गांवों की मैं कल्पना करता हूं।

सच तो यह है कि आप वहां आसानी से ऐसा कोई गांव नहीं खोज सकते जहां सड़क न हो। पानी की टोटियां, जल आपूर्ति, बिजली, स्कूल, खेल के मैदान और फैक्ट्री न हो। सबसे बड़ी बात है उन गांवों के बीच बेहतरीन समानता। इस तरह के कुछ गांव मैं केवल रूस में देख पाया था। पक्के तौर पर अब तक वे सभी गांव कस्बों में ढल चुके होंगे। मैं विश्वासपूर्वक कहना चाहूंगा कि जिस तरह के गांव आपको यहां दिखाई पड़ते हैं, वैसा एक भी गांव यूरोपीय देशों में देखने को नहीं मिलेगा।

आप कह सकते हैं कि गांवों का अस्तित्व कस्बों और शहरों की सेवा करने के लिए है। ठीक ऐसे ही जैसे ब्राह्मणों की सेवादारी के लिए बड़ी संख्या में लोगों को ‘शूद्र’ एवं ‘अछूत’ बना दिया गया है। लेकिन पश्चिमी देशों में आप एक भी ऐसा गाँव नहीं पाएंगे जिसका अस्तित्व कस्बों के निमित्त हो।

आप ऐसा पूछ सकते हैं कि ग्रामीण ऐसा नहीं करेंगे तो खेती कौन करेगा। यह प्रश्न कुछ ऐसा ही है, जैसे यह पूछना कि जब सभी सफाईकर्मी पढ़-लिखकर दूसरे काम करने लगेंगे तो सफाई का काम कौन करेगा। इस प्रश्न के सापेक्ष मेरा उत्तर होगा कि सभी समुदायों, जातियों को अपनी जनसंख्या के अनुपात में मानवीय श्रम के लिए आगे आना चाहिए। यह सिद्धांत हर जगह लागू होना चाहिए। ऐसा मेरा मानना है।

काम को ‘ओछा’ और ‘हीन’ कहने की प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। वे सभी काम जिनके लिए कठोर परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें सरल और हल्का-फुल्का बनाया जाना चाहिए। तब हम देखेंगे कि इस तरह के पेशे धीरे-धीरे अपने आप समाप्त हो जाएगे। तभी हम अपनी तरक्की कर सकते हैं। तभी देश को प्रगतिशील बना सकते हैं।

यदि कोई अकेला आदमी जलयान बनाकर करोड़पति बन जाता है तो उसे पक्के तौर पर पूरे देश की तरक्की नहीं माना जा सकता। यदि कोई व्यक्ति लोहे का उद्योग लगाकर करोड़पति बन जाता है तो उसका आशय संपूर्ण राष्ट्र की समृद्धि नहीं है।

यदि पेशों को ‘हेय’ और ‘तुच्छ’ समझने की प्रवृत्ति को खत्म करना संभव नहीं है, यदि इन पेशों में लगने वाले मानवीय श्रम को आसान करना, और उसकी मात्रा घटाना संभव नहीं है, यदि ग्रामीणों को अधिक अनाज और लाभांश उपलब्ध करा पाना संभव नहीं है, यदि ग्रामीणों के जीवन-स्तर का आकलन कर उसमें सुधार करना असंभव है, तब ग्रामीण सुधार कार्यक्रम पर चर्चा करने का भी कोई अर्थ नहीं है। मुझे पूरा भरोसा है कि यदि हम विभिन्न प्रकार के उर्वरकों, दवाइयों और मशीनों का उपयोग ग्रामीण स्तर पर शुरू कर दें तो हम आसानी से सफलता प्राप्त कर सकते है। 

एक समय ऐसा भी आएगा जब किसी स्थान की पहचान गांव के रूप में नहीं होगी।

इसे समाजवाद या साम्यवाद का नाम देना सरासर हास्यास्पद, बेहूदा और मूर्खतापूर्ण है। आधुनिकताबोध से संपन्न, प्रगतिशील सोच का कोई भी व्यक्ति मान जाएगा कि मेरे विचारों में न्याय एवं सच्चाई समाहित है।

यदि कोई ग्रामीण किसान या मजदूर अपनी आमदनी के रूप कुछ अधिक सिक्के जुटा लेता है तब? व्यक्ति को सिर्फ उसी से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए।

मुद्रास्फीति के कारण देश में मजदूर और पूंजीपति के बीच मतभेदों में वृद्धि हुई है। 

इसी तरह आमदनी में असमान वृद्धि के कारण ग्रामीण और कस्बाई मनुष्य के बीच की खाई भी चौड़ी हुई है। अंतर कम करने के लिए हमें इस खाई को पाटना होगा।

दोनों के बीच आर्थिक अंतर ने हालात को काफी बिगाड़ दिया है। गरीबी और उसकी यंत्रणा का लंबे समय तक बने रहना, समाज के बड़े हिस्से को नीच, हेय और दलित बनाने वाला सिद्ध होगा।

समाज को असमानता, अमानवीकरण और मनुष्यता के पतन पर अंकुश लगाना होगा। उसी अवस्था में लोग सुखी और संतुष्ट जीवन जी सकते हैं।

(अंग्रेजी से अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल)


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