ब्राह्मणवादी हवाओं के बरक्स तेज होती फुले की ज्योति

जोतीराव फुले की ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ और ‘किसान का कोड़ा’ जैसी रचनाओं को आज डेढ़ शताब्दी से अधिक समय बीत चुका है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में विकास ने जो प्रतिगामी राह पकड़ी है, उससे फुले और उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता जितनी तब थी, उतनी ही आज भी है। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890) पर विशेष

भारत में सामाजिक सुधार की शुरुआत की बात भले ही राजा राममोहन राय से होती हो, लेकिन देश को आधुनिक राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ाने का श्रेय जोतीराव फुले को ही जाता है। उनका आंदोलन मुख्यत: दो मुद्दों पर केंद्रित था। पहला धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा फैलाए जा रहे आडंबरों का विरोध और दूसरा शूद्र-अतिशूद्र में फैले अज्ञान और अंधविश्वासों को मिटाने के लिए शिक्षा पर जोर। इन दोनों का संबंध जिस सामाजिक बुराई से था, वह थी—जाति प्रथा। हजारों वर्षों से जड़ जमाए बैठी जाति प्रथा को चुनौती देने के लिए हिंदू धर्म को निशाना बनाना आवश्यक था; और धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वासों तथा रूढ़ियों से मुक्ति बिना शिक्षा के संभव न थी। शिक्षा के प्रसार हेतु उन्होंने स्कूल खोले; तथा ब्राह्मणों के सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती देने के लिए ‘तृतीय रत्न’ जैसे नाटक और ‘गुलामगिरी’ जैसी पुस्तकें लिखीं।

 

उस समय भारत में 94 प्रतिशत जनता औपचारिक शिक्षा से वंचित थी। 6 प्रतिशत शिक्षितों में आधे ब्राह्मण थे। उनकी शिक्षा भी मुख्यत: धार्मिक मामलों तक सीमित थी। भारतीय समाज में शिक्षा की स्थिति का आकलन करने के लिए 1882 में ‘इंडियन एजुकेशन मिशन’ की स्थापना की गई थी। उसके अध्ययन का निष्कर्ष था कि कस्बों और शहरों में शिक्षा में सुधार हुआ है। लेकिन गांवों में वैसे ही हालात थे। शहरों में भी शिक्षा का जितना लाभ ऊंची जातियों ने उठाया था, शूद्रों, अतिशूद्रों तक उतना लाभ नहीं पहुंच पाया था। 

दरअसल, अशिक्षा तथा दूसरी सामाजिक कुरीतियों के बारे में राजा राममोहनराय सहित उस समय के द्विज समाज सुधारकों की सोच थी कि पहले ऊंची जातियां पढ़-लिख जाएं। वे पढ़-लिख जाएंगीं तो नीचे तक शिक्षा अपने आप चली जाएगी। यह अर्थशास्त्र के प्रचलित सिद्धांत—‘ट्रिकिल डाउन थ्योरी’ जैसा था, जिसे हिंदी में ‘रिसाव का सिद्धांत’ कह दिया जाता है। उसके अनुसार उपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो बूंद-बूंद रिसकर नीचे भी आएगी। इस सिद्धांत की आलोचना उसकी शुरुआत से ही होने लगी थी। बावजूद इसके अधिकांश समाज-सुधारक ‘रिसाव के सिद्धांत’ पर टिके हुए थे। यह जानते हुए भी कि भारतीय समाज में व्याप्त घोर अशिक्षा का कारण संसाधनों की कमी नहीं थी, उन्हें जानबूझकर शिक्षा से दूर रखा गया था—शीर्ष जातियों से आए समाज सुधारक ऊंची जातियों के चरित्र में आमूल परिवर्तन के बिना ही, समाज सुधार का सपना देखते थे। 

जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890)

फुले जानते थे कि जाति के बहाने सत्ता और संसाधनों पर पीढ़ियों से कब्जा जमाए बैठे लोग, जाति के नाम पर प्राप्त विशेषाधिकारों को आसानी से छोड़ने को तैयार न होंगे। शूद्रों-अतिशूद्रों को खुद उनके सामाजिक सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकलना होगा। संयोग से देश की राजनीतिक परिस्थितियां उनके अनुकूल थीं। नए कानून द्वारा शिक्षा के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए गए थे। उनमें बड़ी संख्या में भाषायी स्कूल भी शामिल थे। अमेरिकी और यूरोपीय मिशनरियां भी शिक्षा के विस्तार में लगी थीं। लेकिन यथास्थितिवादियों का उनके प्रति रवैया सकारात्मक नहीं था। ब्राह्मण एक ओर तो कहते थे कि आधुनिक शिक्षा के नाम पर सरकार निचली जातियों का ईसाईकरण करना चाहती है। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में, जहां ऊंची जाति के बच्चे पढ़ते थे, शूद्र-अतिशूद्र विद्यार्थियों के प्रवेश पर आपत्ति करते थे। जो बच्चे किसी तरह प्रवेश पाने में सफल हो जाते थे उनके प्रति भी ब्राह्मण अध्यापकों का रवैया सहानुभूति पूर्ण न था। इस स्थिति को फुले ने ‘शिक्षा  विभाग के ब्राह्मण अध्यापक’ पोवाड़े में अभिव्यक्त किया है—

‘ऐसे दुष्ट लोगों को अध्यापक बनाते
बच्चे वे गैरों(सवर्णों) के ही पढ़ाते
स्वजाति के बच्चे (को) गलती करने पर बार-बार समझाते
शिक्षा यत्नपूर्वक देते
परजाति के बच्चे गलती करते, थप्पड़-मुक्का मारते
जोर से कान ऐंठते
शूद्र बालक के मन को घायल करके भगा देते।’ 

ब्राह्मणों की मानसिकता को देखते हुए फुले ने शूद्रों-अतिशूद्रों विद्यार्थियों के लिए अलग स्कूल खोलने का फैसला किया। 1848 में मात्र 21 वर्ष की अवस्था में उन्होंने पुणे से अपने शिक्षा आंदोलन की शुरुआत की। जगह-जगह स्कूलों की स्थापना की, जिनमें लड़कियों के प्रवेश की भी व्यवस्था थी। 1852 तक वे 18 स्कूलों की स्थापना कर चुके थे। उनमें से कुछ केवल शूद्र, अतिशूद्र एवं मुसलमान बच्चों के लिए थे, जबकि बाकी में सभी वर्गों के बच्चे पढ़-लिख सकते थे। इस काम में उन्हें अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के अलावा सगुणाबाई और फातिमा बी का साथ भी मिला था। सगुणाबाई फुले की बुआ थीं। मां के असमय देहावसान के बाद उन्होंने ही फुले को पाला-पोसा था। फुले में स्त्री जाति के प्रति सम्मान भाव पैदा करने तथा उन्हें अच्छे संस्कार देने में उस अनपढ़ स्त्री का बड़ा योगदान था। फातिमा बी सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थीं। मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित करने में उनका युगांतरकारी योगदान था। 

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अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। उसकी निरंतर बढ़ती ख्याति से परेशान ब्राह्मणों ने, यथास्थिति बनाए रखने के लिए अपने वही पुराने हथियार निकाल लिए थे, जो उन्होंने दो सहस्राब्दि पहले बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से निपटने के लिए आजमाए थे। वे थे समाज को जड़ मिथकों और पुराकथाओं की ओर ढकेल देना। इसके लिए 2000-2200 वर्ष पहले पुराणों और स्मृतियों की रचना की गई थी। 19वीं शती में पौराणिक आख्यानों को तरह-तरह से पुनर्जीवित करने के साथ-साथ नए मिथों की रचना की जाने लगी थी। उन दिनों एक नया मिथ ‘सत्यनारायण की कथा’ के नाम से सामने आया। इस कथा का कोई पौराणिक संदर्भ नहीं था। न ही घर-घर जाकर इस कथा का वचन करने वाले पंडित ‘सत्यनारायण’ के बारे में कुछ बताते थे। असल में ‘सत्यनारायण की कथा’ के नाम पर ब्राह्मण-पूजा, व्रत, उपवास और दान-दक्षिणा पर जोर देतीं, कुछ लोककथाएं थीं, जो धर्म से डरी-सहमी कुल-ललनाओं को और डराने का काम करती थीं। 

फुले समझते थे कि शूद्रों-अतिशूद्रों की वास्तविक मुक्ति, ब्राह्मणों के सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती दिए बिना असंभव है। अपने रोज़मर्रा के जीवन में जरूरी मार्गदर्शन और प्रेरणा के लिए अशिक्षित जन समाज में प्रचलित धार्मिक आख्यानों की मदद लेते हैं। जिनकी रचना ब्राह्मणों द्वारा अपने वर्गीय हितों को साधने के लिए की गई है। इन्हीं की मदद से ब्राह्मण लोगों को शताब्दियों से अपनी इच्छा अनुसार हांकते आए हैं। फुले जानते थे कि ब्राह्मणवाद को हराने के लिए पहले उन मिथकों को किनारे करना पड़ेगा जिनकी मदद से वह लोकमानस पर राज करता है। इसके लिए उन्होंने लेखों, पुस्तकों और नाटकों के माध्यम से समाज को जागरूक करने का काम किया। उनकी रचनाओं में ‘तृतीय रत्न’ (नाटक, 1855 ), ‘ब्राह्मण का कोड़ा’ (1869), ‘शिवाजी का पोवाड़ा’ (1869), ‘गुलामगिरी’ (1873) आदि प्रमुख हैं। 

‘तृतीय रत्न’ नाटक में उन्होंने ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अशिक्षित जनता के बहुआयामी शोषण को दर्शाया है। यह नाटक बताता है कि ब्राह्मण पुरोहित अशिक्षित जनता को कदम-कदम पर किस तरह भरमाते हैं। धर्म और अनीति का भय दिखाकर उनका धन लूटने में लगे रहते हैं। कोई ऐसा सामाजिक अनुष्ठान नहीं है जिसमें ब्राह्मण की मौजूदगी और उसके द्वारा दान-दक्षिणा के नाम पर गरीब जनता से धन न ऐंठा जाता हो। धर्म के नाम पर उन्हें इतना भयभीत किया जाता है कि कर्ज लेकर भी कर्मकांडों  में लिप्त रहते हैं। बस एक उम्मीद होती है कि कभी न कभी देवता उनपर कृपा करेगा। उसके बाद उनके सारे दलिद्दर नष्ट हो जाएंगे। होता इसका उलटा है। दुख-दलिद्दर मिटना तो दूर, महाजन का कर्ज सिर चढ़ जाता है। उसे चुकाने के लिए वे जमींदार के घर बेगार करते रहते हैं। यह नाटक इतना प्रामाणिक है कि 170 वर्ष बाद भी इसमें भारत के ग्रामीण समाज झलक दिखाई पड़ती है। इस नाटक में उन्होंने अंग्रेजी शासन की प्रशंसा की है, लेकिन अंग्रेजी शासन से उनकी सहानुभूति तभी तक थी जब तक वे उत्तरदायी शासक का फर्ज निभाते हैं। नाटक का सूत्रधार एक जगह कहता है—

‘ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों पर जो शिक्षा बंदी लगाई थी, उसको समाप्त करके, उनको शिक्षा का मौका प्रदान करके होशियार बनाने के लिए भगवान ने इस देश में अंग्रेजों को भेजा है। शूद्र-अतिशूद्र पढ़-लिखकर होशियार होने पर वे लोग अंग्रेजों का अहसान नहीं भूलेंगे। फिर वे लोग पेशवाई से भी सौ गुना ज्यादा अंग्रेजों को पसंद करेंगे। आगे यदि मुगलों की भांति अंग्रेज लोग भी इस देश की प्रजा का उत्पीड़न करेंगे तो शिक्षा प्राप्त  बुद्धिमान शूद्र-अतिशूद्र पहले जमाने में हुए जवांमर्द शिवाजी की भांति अपने शूद्र-अतिशूद्र राज्य की स्थापना करेंगे और अमेरिकी लोगों की तरह अपनी सत्ता खुद चलाएंगे। लेकिन ब्राह्मण-पंडों की दुष्ट और भ्रष्ट पेशवाई को आगे कभी आने नहीं देंगे। यह बात जोशी-पंडों को भली-भांति समझ लेनी चाहिए।’

अपने पोवाड़ों के माध्यम से वे सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। एक पोवाड़े में वे निर्माण विभाग के अधिकारी की रिश्वतखोरी की आदत को सामने लाते हैं। एक अन्य रचना में वे ब्राह्मण अध्यापक द्वारा अछूत विद्यार्थियों के प्रति पक्षपात को दर्शाया गया है। ब्राह्मण अधिकारियों की पोल खोलते हुए वे शिक्षा अधिकारी से निवेदन करते हैं कि वह शिक्षा विभाग में शूद्र और अतिशूद्र विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए इसी वर्ग के अध्यापकों की नियुक्ति करे। 

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पांच छोटे-छोटे अध्यायों में विस्तृत ‘किसान का कोड़ा’ में उन्होंने व्यापारियों द्वारा किसान और शिल्पकार वर्ग के बहुविध शोषण का खुलासा किया है। उनमें धर्म और संस्कृति के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा शोषण तो शामिल है ही, मंडी में बिचौलियों द्वारा किसानों की ठगी पर भी उनकी नजर गई है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह बात भी सामने आती है कि शूद्रों-अतिशूद्रों की मुख्य समस्या गरीबी नहीं है। असली समस्या गरीबी के कारण को न समझ पाने की है। समाज के प्रमुख उत्पादक शिल्पकार और किसान हैं। लेकिन अपनी आय को अपनी मर्जी से खर्च करने का सत्साहस उनमें नहीं है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा धार्मिक-सामाजिक कर्मकांडों पर खर्च होता है। आड़े समय पर किसानों को कर्ज लेना पड़ता है। फसल के समय महाजन और बिचौलिए उनकी फसल का बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं। जो बचता है, उसे भी अपनी मर्जी से, अपने विकास के लिए खर्च करना, उनके लिए संभव नहीं होता। शादी-विवाह, श्राद्ध, मुंडन, उपनयन जैसे अनेक संस्कार हैं, जो बेहद खर्चीले, मगर पूरी तरह अनुत्पादक हैं। वे लोगों की आर्थिक विपन्नता और बौद्धिक विकलांगता दोनों को बढ़ाते हैं। सामाजिक व्यवस्था ऐसी कि व्यक्ति इनके चंगुल से निकल ही नहीं पाता। शिक्षा के अभाव में आम आदमी वही करता है, जो पुरोहित उन्हें बताता है।

इस पुस्तक में फुले ने उन अंग्रेज अधिकारियों की आलोचना की थी जो अपनी काहिली या ब्राह्मणों के प्रभाव में आकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े रहते हैं। यूरोप की औद्योगिक क्रांति की प्रशंसा करते हुए उन्होंने अंग्रेजों की यह कहकर आलोचना की है कि वे भारतीय प्रजा से धन ऐंठकर अपने मुल्क पहुंचाने में लगे रहते हैं। इस विषय पर दादा भाई नौरोजी ने भी लिखा था। उनका प्रसिद्ध भाषण ‘पावर्टी इन इंडिया’ 1876 का है, जबकि ‘किसान का कोड़ा’ 1881 में लिखी गई। फुले पर नौरोजी का कितना प्रभाव था, यह बता पाना तो कठिन है, लेकिन इससे इतना साफ हो जाता है कि उस समय तक अंग्रेजों की व्यापार नीति की आलोचना होने लगी थी। ‘किसान का कोड़ा’ में फुले उसे अपनी शैली में प्रस्तुत करते हैं। नौरोजी की पुस्तक जहां अर्थशास्त्रीय महत्त्व रखती है, वहीं फुले अंग्रेजों द्वारा देश के आर्थिक शोषण के साथ-साथ वर्गीय शोषण को भी उठाते हैं। इसलिए ‘किसान का कोड़ा’ का अर्थशास्त्र के साथ-साथ समाज-वैज्ञानिक महत्त्व भी है। पुस्तक से फुले की व्यापक दृष्टि का भी पता चलता है। खेती के विकास के लिए वे बांध बनाने, नए बीज अपनाने, बिचौलिए दुकानदारों पर पाबंदी लगाने, यहां तक कि किसानों के प्रशिक्षण की मांग भी सरकार से करते हैं। वे बौद्ध धर्म तथा उसके अनुयायियों की प्रशंसा करते हैं। 

फुले का जिक्र हो तथा उनकी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ (ब्राह्मणधर्म की आड़ में होने वाली) उल्लेख से वंचित रह जाए—यह नामुमकिन है। इस पुस्तक को उन्होंने ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के सदाचारी जनों को जिन्होंने गुलामों को दासता से मुक्त करने के कार्य में उदारता, निष्पक्षता और परोपकार वृत्ति का प्रदर्शन किया था, के लिए सम्मानार्थ समर्पित’ किया गया है। भारत में इसे अपने विषय की इकलौती पुस्तक है, जो न केवल ब्राह्मणों द्वारा स्वार्थ पूर्ण ढंग से गढ़े गए मिथकीय संसार के खोखलेपन को सामने लाती है, अपितु समानांतर श्रम संस्कृति की स्थापना भी करती है। ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास में इस पुस्तक का ठीक वही स्थान है, जो दुनिया-भर के मजदूर आंदोलनों के इतिहास में ‘कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो’ का है। ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन मिथों पर सीधे प्रहार करते हैं, जो शताब्दियों से जनसमाज की बौद्धिक विकलांगता का कारण बने थे। 

‘गुलामगिरी’ में परिशिष्ट के रूप में ‘ब्राह्मण कर्मचारी इंजीनियरिंग विभाग में किस प्रकार धांधली मचाते हैं’—इस विषय पर एक पावड़ा दिया गया है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मण कर्मचारियों की स्वार्थपरता और काहिली के साथ-साथ अंग्रेज अधिकारियों पर भी तंज कसा है—

‘ब्राह्मण बड़ी चतुराई करते। लिखने में कौशल दिखलाते। कुनबी को दिन-दहाड़े लूटते। हाजिरी-बही ले फैल (कार्यस्थल) पर जाते…।फैल में जो हों शूद्र औरतें उनसे बरतन मंजवाते। बेगारी मजदूरों से फिर अपना बिस्तर हैं लगवाते। पागल से कुन्बी को पाकर उससे अपने पैर दबवाते। खूब मजे से खुर्राटे भरते। अपनी जात के बाम्हन को फैल पर काम को हैं ले जाते…।किसान का लहू चूस-चूसकर मोटे-ताजे हैं बन जाते। जितना ये घी-शक्कर हैं उड़ाते, सब किसान के ऊपर।’

व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की मांग करते हुए मार्टिन लूथर किंग(1929-1968) ने कहा था—‘मैं मानता हूं कि सभी मनुष्य एक समान हैं। मेरा एकमात्र सपना है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे एक दिन ऐसे राष्ट्र के नागरिक होंगे जहां उनकी पहचान चमड़ी के रंग के बजाय उनके चारित्रिक गुणों के आधार पर तय की जाएगी।’ अभिजनों के सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर आने का एक रास्ता उनकी संस्कृति के खोखलेपन को उजागर करते हुए समानांतर जनसंस्कृति की जनवादी विशेषताओं को केंद्र में ले आना है। ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से फुले ने यही काम किया था। इस पुस्तक को हम ब्राह्मणवादी संस्कृति के प्रतिरोध का बीजग्रंथ भी कह सकते हैं। बीसवीं शताब्दी में धुर दक्षिण से उत्तर और पूरब से लेकर पश्चिम तक भारत में ब्राह्मणवाद के विरोध में अनेक आंदोलन उभरे। उनका स्वरूप, उनकी चिंताएं और अपेक्षाएं भले ही अलग-अलग हों, किंतु उनकी वैचारिकी पर ‘गुलामगिरी’ का पूरा-पूरा असर था।  

सच्चा महापुरुष वह होता है जिसके विचारों के तेज को समय की आंधियां कभी धुंधला नहीं कर पातीं। ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ और ‘किसान का कोड़ा’ जैसी रचनाओं को आज डेढ़ शताब्दी से अधिक समय बीत चुका है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में विकास ने जो प्रतिगामी राह पकड़ी है, उससे फुले और उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता जितनी तब थी, उतनी ही आज भी है। 

(संपादन : नवल/ अनिल)


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