ओबीसी नायकों को रेखांकित करती किताब “नेपथ्य के नायक”

वर्तमान में पिछड़ा वर्ग को जो हक-अधिकार प्राप्त हुए हैं, उसके लिए इस वर्ग को लंबा संघर्ष करना पड़ा है। इसी संघर्ष के नायकों को किताब में याद किया गया है। इनमें जोतीराव फुले से लेकर एम. करुणानिधि तक शामिल हैं। नवल किशोर कुमार की समीक्षा

पुस्तक समीक्षा

भारत के बहुसंख्यक यानी बहुजन समाज के लोग अब अपनी अस्मिता, संस्कृति, अधिकार को लेकर सजग हो रहे हैं। हालांकि दक्षिण भारत के राज्यों में यह जागृति बहुत पहले आ चुकी है, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में अभी भी जागरूकता का स्तर अपेक्षाकृत कम है। लेकिन अभी तक की जो भी उपलब्धियां हमारे पास हैं, वह एक मजबूत बुनियाद है जिसके बूते आने वाली पीढ़ियां सामाजिक न्याय की लड़ाई को जारी रखेंगी। और इस बुनियाद को बनानेवालों को याद करती हुई एक किताब है “नेपथ्य के नायक (खंड 1)”। किताब का प्रकाशन प्यारा केरकेट्टा फ़ाउंडेशन, रांची द्वारा किया गया है और इसका संपादन बिहार में साहित्यिक गतिविधियों के केंद्र में रहने वाले युवा साहित्यकार व समालोचक अरुण नारायण ने।

किताब का उद्देश्य किताब के कवर से स्पष्ट है। इसमें पिछड़ा वर्ग समाज के महानायकों के जीवन को संकलित किया गया है। मेरे हिसाब से यह प्रथम पुस्तक है जिसमें पहली बार ओबीसी महानायकों के जीवन को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। यही इसकी खासियत है और इसकी मूल भावना को इससे समझा जा सकता है कि पुस्तक को कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान मुसीबतों को सहते हुए पैदल अपने गांव-घर लौटते अप्रवासी मजदूरों को समर्पित किया गया है।

दरअसल, यह एक बड़ा सवाल है जो वर्तमान में सबसे अधिक मौजूं है। देश की अर्थव्यवस्था का प्राथमिक क्षेत्र जिसमें कृषि, मवेशीपालन, मत्स्यपालन व वनादि शामिल हैं, से पिछड़ा वर्ग दिन-ब-दिन वंचित होता जा रहा है। सरकारों की दोषपूर्ण भूअर्जन नीति के कारण पहले से ही कम जोत के मालिक रहे इन वर्गों के लोगों के पास अब इतनी भी जमीन नहीं है कि वे अपने लिए दो जून की रोटी का प्रबंध कर सकें। और सरकार भी उन्हें आय प्राप्ति के लिए विकल्प उपलब्ध करवाने में ठोस पहल नहीं कर सकी है। शासन-प्रशासन में भागीदारी मंडल कमीशन की अनुशंसाओं के लागू होने के तीन दशक के बाद भी पर्याप्त नहीं हो सकी है। अरुण नारायण द्वारा संपादित पुस्तक “नेपथ्य के नायक” में जिन महानायकों के जीवन को संकलित किया गया है, उन सभी के सरोकार यही रहे कि कैसे यह बहुसंख्यक आबादी अपने पैरों पर खड़ा हो।

समीक्षित पुस्तक “नेपथ्य के नायक” का कवर पृष्ठ

बहरहाल, इस किताब को कुल पांच खंडों में बांटा गया है। पहले खंड “सामाजिक, सांगठनिक जागरण के सूत्रधार” में जोतीराव फुले के बारे में बताया गया है। इसके लेखक डॉ. श्रीभगवान ठाकुर ने गागर में सागर के समान जोतीराव फुले के जीवन के विभिन्न पहलुओं को लिपिबद्ध किया है। वैसे इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह बिल्कुल वाजिब है। आधुनिक भारत में ओबीसी को सबसे पहले जगाने और संगठित करने वाले जोतीराव फुले ही रहे। हालांकि जोतीराव फुले ने अपने संघर्ष में तमाम वंचित तबकों को शामिल किया। फिर चाहे वह दलित हों, स्त्रियां हों या फिर पिछड़े वर्ग के लोग। फुले पर केंद्रित इस लेख में कसाव की कमी है। लेकिन इसके बावजूद यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आज की पीढ़ी उनके बारे में मौलिक सूचनाएं ग्रहण करे। उनके संदेशों को समझे। 

वहीं मनीष रंजन द्वारा सरदार जगदेव सिंह पर लिखित आलेख त्रिवेणी संघ की याद दिलाता है जो 1930 के दशक में बिहार में ओबीसी और दलितों के लिए पहला राजनीतिक और सामाजिक संगठन था। बेहतर तो यह होता कि इसी खंड में त्रिवेणी संघ के अन्य दो संस्थापकों शिवपूजन सिंह और जेएनपी मेहता के बारे में भी आलेख होते। इससे त्रिवेणी संघ के तीनों संस्थापकों के बारे में जानकारी मिलती। आलेख में लेखक केवल सरदार जगदेव सिंह तक सीमित रहे। इससे बचा जा सकता था।

बिहार के छपरा जिले के एकमा में जन्मे चुल्हाई साहू के बारे में डॉ. अरुण कुमार का परिचयात्मक आलेख है। यह आलेख उनके कृतित्व को रेखांकित तो करता ही है, इतिहासकारों की साजिशों को भी बताता है कि कैसे एक जमीनी संगठनकर्ता और नेतृत्वकर्ता को केवल इसलिए दरकिनार कर दिया जाता है क्योंकि उसका संबंध उच्च जाति से नहीं है। पहले ही खंड में रामलखन चंदापुरी और डॉ. सोनेलाल पटेल के बारे में कमश: डॉ. दिलीप कुमार और अशोक प्रताप का आलेख प्रकाशित है। 

पुस्तक का दूसरा खंड “समानांतर अंत:संघर्ष की नायिकाएं” पुस्तक में निहित उद्देश्य को विस्तार देता है। इस खंड में नरेंद्र कुमार दिवाकर द्वारा लिखित चकली अइलम्मा पर लिखित आलेख दक्षिण और उत्तर को जोड़ता है। उनके बारे में बताया गया है कि वह शाही खानदान से नहीं थीं। लेकिन एक साधारण महिला के रूप में उन्होंने सामंती अत्याचारों का सामना किया। यहां तक कि उनकी बेटी की अस्मत लूट ली गई। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा कि “अब और नहीं” और अपनी पूरी फसल के लिए अनुचित जुर्माना/कर देने से इंकार कर दिया और आंध्र महासभा के गुटुपाल संघम के जरिए अपनी चार एकड़ जमीन की रक्षा की। चकली अइलम्मा की नजर में आत्मसम्मान बहुत बड़ी चीज और यह प्रत्येक महिला का जन्मसिद्ध अधिकार है। केवल तेलंगाना की ही नहीं, अपितु पूरे देश की महिलाओं को जानना चाहिए कि धोबी जाति की एक महिला किसके लिए खड़ी थी।

महिलाओं के संघर्ष पर आधारित यह खंड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खंड यह संदेश देने में कामयाब है कि सामाजिक न्याय के संघर्ष में आधी आबादी की भूमिका पुरूषों से कम नहीं रही है। ताराबाई शिंदे, रूकैय्या सखावत हुसैन और झलकारी बाई के जीवन परिचय से सुसज्जित यह खंड अत्यंत ही पठनीय हो गया है।

तीसरे खंड का शीर्षक “साम्राज्यवादी, सामंतवादी संघर्ष के योद्धा” रखा गया है। इस शीर्षक में त्रुटि प्रतीत होती है। बेहतर यह होता कि इसका शीर्षक “साम्राज्यवाद, सामंतवाद के खिलाफ लड़ने वाले योद्धा” रखा जाता। खैर, इस खंड में रघुनाथ महतो, अजायब सिंह महतो, पीर मुहम्मद मूनिस, विजय सिंह पथिक और शिवनंदन पाल के उपर आधारित आलेख हैं। इनमें पीर मुहम्मद मूनिस के बारे में बिहार के चर्चित पत्रकार श्रीकांत ने लिखा है। यह लेख भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गैर सवर्ण मुसलमानों के योगदान को रेखांकित करता है। मूनिस “प्रताप” से संबद्ध पत्रकार थे और चंपारण सत्याग्रह के समय उनकी रिपोर्टें तत्कालीन हुकूमत को नागवार गुजरती थीं। ठोस तथ्यों और उद्धरणों से सुसज्जित यह लेख तत्कालीन बिहार में सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न आयामों को सामने लाने में कामयाब है।

चौथा खंड है – “साहित्य, रंगमंच, प्रकाशन, संगीत और खेल के सितारे”। इस खंड में डॉ. मन्नू राय का आलेख भिखारी ठाकुर पर केंद्रित है। डॉ. आंबेडकर के समकालीन रहे संतराम बी.ए. के संबंध में सुरेश कुमार का आलेख जानकारियों से परिपूर्ण है। वहीं उत्तर भारत में प्रतिरोधी चेतना के सूत्रधार रहे चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु के बारे में डॉ. अजय कुमार ने उल्लेखनीय वर्णन किया है। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद और बिरहा के आदि विद्रोही रहे नसुड़ी के संबंध में क्रमश: अशोक कुमार सिन्हा व रामजी यादव का आलेख भी पठनीय है।

पुस्तक में विभिन्न कालखंडों व क्षेत्रों का ध्यान रखा गया है। मसलन अंतिम खंड पांच में “राजनीतिक संघर्ष के अगुआ” में चौधरी चरण सिंह, ज्ञानी जैल सिंह, बीपी मंडल, कर्पूरी ठाकुर और एम. करुणानिधि के बारे में आलेख संकलित हैं। यह खंड आज की पीढ़ी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जिनके सामने सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों में अधिकांश वे हैं जो या तो समझौतावादी हैं या फिर परिवारवादी।

कुल मिलाकर “नेपथ्य के नायक” का पहला खंड अपने उद्देश्यों में सफल है।

समीक्षित पुस्तक : नेपथ्य के नायक (खंड एक)
संपादक : अरुण नारायण
प्रकाशक : प्यारा केरकेट्टा फ़ाउंडेशन, रांची
मूल्य : 250 रुपए

(संपादन : अनिल)


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