हिंदुत्व बनाम गणतंत्र

वह हिंदुत्व, जो संघ की विचारों के मूल में है, स्वतंत्रता का भी विरोधी है। वह मनुष्य पर सामाजिक निर्योग्यताएं लादता है। शूद्र हो अथवा स्त्री या कि अंत्यज, उनको किसी प्रकार की आज़ादी के पक्ष में हिंदुत्व नहीं दिखाई पड़ता है। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

वह 26 नवंबर, 1949 का दिन था जब संविधान का प्रारूप संविधान सभा को सौंपा गया था और भारत ने 26 जनवरी, 1950 को एक राष्ट्र की हैसियत से उसे अंगीकृत और आत्मार्पित करते हुए बेहद गर्व से स्वीकार किया था। वह एक ऐसा गौरवशाली क्षण था, जिस पर हर देशभक्त भारतीय नागरिक को अभिमान महसूस हुआ, लेकिन क्या हिंदुत्ववादियों को इससे प्रसन्नता हुई? क्या उसने इसका स्वागत किया? 

आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गेनाइजर’ ने 30 नवम्बर, 1949 के अपने अंक के तीसरे पृष्ठ पर एक आधिकारिक प्रतिक्रिया आई, जो इस प्रकार थी- ‘‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन से बहुत पहले लिखी गई थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लेखित है, विश्वभर में सराहना की जाती रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।’’

आरएसएस के लिए वर्तमान संविधान सदैव विदेशी, आयातित, पश्चिम देशों से नकल किया हुआ तथा भारतीय संस्कृति व मूल्यों के विरुद्ध जबरदस्ती थोपा हुआ दस्तावेज रहा है, उसके लिए तो मनुस्मृति के होते हुए अलग से संविधान बनाए जाने और लागू किए जाने का काम भी विदेशी विचार है। उसके मुताबिक किसी नए संविधान की कोई जरूरत नहीं थी, जैसे उसने अपनी स्थापना से लेकर 25 वर्ष तक खुद का भी कोई संविधान नहीं बनाया। महात्मा गांधी की हत्या में आरोपित होने के पश्चात प्रतिबंध से छूटने के लिए आरएसएस ने अपना एक लिखित संविधान बनाकर भारत सरकार के समक्ष पेश किया था, पर उस पर कभी अमल नहीं किया। देश के आम नागरिकों की बात तो छोड़िए, उसके खुद के स्वयंसेवक और सक्रिय कार्यकर्ता तक नहीं जानते कि आरएसएस का संविधान क्या है और उसमें क्या लिखा हुआ है।

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रष्ट्र को संबोधित करते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

संघ अपनी शाखाओं में ‘मनुष्य तू बड़ा महान है, मनु की संतान है’ जैसे गीत तो अब भी प्रतिदिन गवाता ही है, शाखाओं में कभी भी संविधान की बात नहीं होती और ना ही वहां संविधान सिखाया या बताया जाता है। मनुस्मृति के सुभाषित जरूर बोले जाते है। मनु को भगवान व महर्षि कहा जाता है और बाबासाहब जैसे मनुस्मृति व मनुवाद के प्रखर विरोधी को आधुनिक मनु कह कर अपमानित किया जाता है।

संघ के अधिकांश स्वयंसेवक स्वयं को मनु से जोड़ने में गर्व की अनुभूति करते हैं। चाहे वे संघ या उसके किसी भी विविध क्षेत्र में कार्यरत हों। एक बार भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि मैं मनु की संतान हूं। भाजपा सरकार ने राजस्थान हाई कोर्ट के परिसर में मनु की मूर्ति लगवाई जो आज तक विद्यमान है। राजस्थान के मौजूदा राज्यपाल कलराज मिश्र, जो क़ि उत्तर प्रदेश में भाजपा के नामचीन नेता रहे हैं, उन्होंने एक बार कहा था कि “हम मनुवादी हैं, मनु की संतान है और मनु की आचार संहिता पर चलने वाले हैं।”

राजनीतिक हिंदुत्व के आदिपुरुष और हिंदुत्व विचार के वैचारिक अधिष्ठाता विनायक दामोदर सावरकर तो अपने पूरे जीवन में मनुस्मृति को वेदों के बाद दूसरे नंबर का पूजनीय ग्रंथ मानते रहे। उन्होंने तो यहां तक कहा कि यह आज भी हिंदुओं के लिए एक कानून के समान है।

आरएसएस के प्रिय साहित्यकार गुरूदत्त ने ‘राष्ट्र राज्य और संविधान’ नामक किताब लिखी, जो संघी प्रकाशनों पर अब भी बिकती है, उसमें साफ लिखा है कि ‘‘भारतीय संविधान में कुछ आधारभूत भूलें है, जिनके कारण वर्तमान दुर्व्यवस्था फैली है तथा निरंतर फैलती जा रही है। इस संपूर्ण संविधान में भारतीय चिंतन का लेशमात्र भी संकेत नहीं है, इसलिए इसमें आमूलचूल परिवर्तन लाना होगा।’’

गुरूदत्त एक नए आदर्श संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि भारत देश के संविधान का आरंभ एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान तत्व परमात्मा का नाम लेकर इस प्रकार होना चाहिए-

‘‘हम देश के रहने वाले, परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार कर, उसके नियमों का पालन करते हुए यह विधान कर रहे है….।’’ उनके अनुसार वर्तमान संविधान की उद्देशिका में वर्णित ‘समानता, स्वतंत्रता और बंधुता’ जैसे शब्दों की जगह ‘स्वत्व, धन, संपदा, ज्ञान और मानव समाज’ में श्रेष्ठ स्थान पाना जैसे शब्द रखे जाने चाहिए।

यह कोई छिपी बात नहीं है  कि आरएसएस सदैव संविधान की समीक्षा का राग अलापता रहता है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संविधान की समीक्षा का काम भी शुरू किया था। वर्तमान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी हैदराबाद के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कह चुके है कि ‘‘भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए। संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं, अब उन पर गौर करना चाहिए।’’

हाल ही में भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके संविधान की उद्देशिका से ‘सेकुलर व सोशलिस्ट’ शब्द निकालने की मांग की है। 

इस तरह हम देख सकते है कि संघ प्रारंभ से ही भारतीय संविधान का विरोधी रहा है। उसे बदल देने के लिए कृत संकल्प है। वह संविधान को सारी समस्याओं की जड़ मानता है, उसकी शाखाओं में और काडर को संविधान का विरोध करने की शिक्षा दी जाती है, जिसके फलस्वरूप हिंदुत्व के समर्थक जंतर-मंतर पर खुलेआम संविधान को जलाने का कृत्य करते हैं।

संघ जिस हिंदुत्व को स्थापित कर रहा है, वह समानता पर विश्वास नहीं करता है। उसका मूल आधार ऊंच-नीच को शास्त्रीय आधार पर उचित ठहराने वाली जाति और वर्ण की विषम व्यवस्था है। वर्णव्यवस्था संसाधनों का अन्यायपूर्ण वितरण की भी व्यवस्था है, जिसमें दलित बहुजन अधिकार विहीन सेवक के रूप में जीवन जीने को मजबूर किए गए हैं। उनके कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं और उनको कोई अधिकार नहीं है। अधिकार सिर्फ़ ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य को प्राप्त है। शूद्र का कर्तव्य है कि वे सिर्फ़ उपरोक्त तीन वर्णों की सेवा करे। महिला भी इस वर्णाश्रम धर्म में शूद्र की भांति ही दासी के रूप में देखी गई है और अतिशुद्र तो अस्पृश्य हैं। उनकी तो छाया तक से परहेज़ किया गया। संघ इस वर्णवादी व्यवस्था का प्रशसंक है और इसे वह उचित ठहराता रहा है।

वह हिंदुत्व, जो संघ की विचारों के मूल में है, स्वतंत्रता का भी विरोधी है। वह मनुष्य पर सामाजिक निर्योग्यताएं लादता है। शूद्र हो अथवा स्त्री या कि अंत्यज, उनको किसी प्रकार की आज़ादी के पक्ष में हिंदुत्व नहीं दिखाई पड़ता है। मसलन, मनुस्मृति तो महिला को बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्रों के अधीन रहने की बात कहती है। मतलब यह कि वह जीवन में कभी भी स्वतंत्र नहीं रह सकती है। जाति व्यवस्था जन्मना जाति आधारित आर्थिक गतिविधियों का पक्षधर है। आरएसएस भी इसी विचार का महिमामंडन करता है। उसे पुश्तैनी काम करने वाले दलित पिछड़ों से बेहद प्यार है। वह अस्वच्छ कार्य में लगे दलितों के प्रति ख़ास हमदर्दी दिखाता है और उनको अपने वैचारिक जाल में फँसाता है।

हिंदुत्व में बंधुत्व के लिए भी कोई जगह नहीं है। जबकि किसी भी धर्म का मूल आधार ही भ्रातृत्व की भावना मानी जाती है। डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को लोकतंत्र के बुनियादी मूल्य बताया और संविधान की प्रस्तावना में उन्हें उल्लेखित किया। इसी पर हमारा लोकतंत्र टिका हुआ है, जबकि हिंदुत्व इन विचारों का विरोधी है और आरएसएस इस हिंदुत्व का न केवल पोषक है, बल्कि उसके आधार पर इस देश को पंथ निरपेक्ष समाजवादी राष्ट्र से बदल कर हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है।

डॉ. आंबेडकर ने हिंदू राष्ट्र के ख़तरे के प्रति सचेत करते हुए कहा था कि,  “यदि हिंदू राष्ट्र सच में बन जाता है तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह इस देश के लिए सबसे बड़ी आपदा होगी। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि हिंदू क्या कहते हैं। हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के लिए ख़तरा है, इसलिए यह लोकतंत्र के साथ भी नहीं चल सकता है। किसी भी क़ीमत पर हिंदू राज को रोका जाना चाहिए।”

यह साफ़ है कि हिंदुत्व व लोकतंत्र दो विरोधी विचार हैं। दोनों में कोई मेल नहीं है। हिंदुत्व कभी भी लोकतांत्रिक नहीं हो सकता है और कोई भी लोकतंत्र हिंदुत्व की नींव पर नहीं टिक सकता है। यह जानते हुए भी भाजपा और आरएसएस हिंदूत्व और हिंदू राष्ट्र का गुणगान करते रहते हैं, क्या यह उचित है?

(संपादन : नवल/अनिल)


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