विलुप्त होती आदिम जनजाति भाषा कोरवा को बचाने की कोशिश में हिरामन कोरवा

हिरामन कहते हैं कि कोरवा भाषा शब्दकोश बनाने के पीछे उनका मकसद था कि कोरवा भाषा का उत्थान। इसके लिए बचपन से कोरवा भाषा के जिन शब्दों का संग्रह किया था, उसे पुस्तकाकार दिया। बता रहे हैं विशद कुमार

झारखंड का गढ़वा जिले की भाषा आम तौर पर सादरी है, परंतु बिहार से सटे होने के कारण मगही और भोजपुरी का इतना ज्यादा प्रभाव है कि यहां की आदिम जनजातियां भी इससे अछुती नहीं हैं। इस इलाके में परहिया, खैरवार सहित अपनी संख्या में अधिक कोरवा जनजाति भी अपनी भाषा धीरे-धीरे खोती जा रहीं हैं। ऐसे में करीब 37 साल के हिरामन कोरवा एक उदाहरण हैं, जाे अपनी भाषा कोरवा को बचाने में जुटे हैं। उनका यह प्रयास बचपन से जारी है। इसके लिए वे विद्यालय में पढ़ाए जा रहे हिन्दी के शब्दों के अर्थ को कोरवा में जानने के लिए अपने दादा-दादी व अन्य बुजुर्गों से पूछते थे और उनके अर्थ को अपने कॉपी में नोट कर लेते थे।

जब हिरामन ने इंटर पास की तब गांव के लोगों ने उन्हें बच्चों को पढ़ाने को को कहा। हिरामन कोरवा वर्ष 2004 तक अपने गांव के पहले इंटर तक पढ़े व्यक्ति थे। उनका सिंजो गांव गढ़वा जिले के सुदूर रंका प्रखंड में जंगलों के बीच बसा है। वहां की आबादी लगभग 1300 है। इस गांव में मुख्यतः दो जातियां निवास करती हैं, आदिम जनजाति कोरवा और यादव (पिछड़ा वर्ग)। कोरवा की संख्या करीब 500 है तो यादवों की संख्या 800 के करीब है।

हिरामन कोरवा बताते हैं कि सामाजिक स्तर से मानसिक प्रताड़ना के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। चूंकि वे ही अपने गांव के पहले इंटर पास युवा थे, इसलिए पारा शिक्षक के रूप में इनका चयन हो गया। अब यही अस्थायी नौकरी उनके लिए जीवनयापन का माध्यम है, जिससे उन्हें प्रति माह करीब 12 हजार रुपए मानदेय के रूप में प्राप्त होता है। इतनी कम राशि में तीन बेटों, दो बेटियां, पत्नी, पिता, भाई और बहन की जिम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ता है। इसके बावजूद अपनी भाषा के प्रति लगाव से वे विमुख नहीं हुए।

हिरामन कोरवा

हिरामन कहते हैं कि कोरवा भाषा शब्दकोश बनाने के पीछे उनका मकसद था कि कोरवा भाषा का उत्थान। इसके लिए बचपन से कोरवा भाषा के जिन शब्दों का संग्रह किया था, उसे पुस्तकाकार दिया। लेकिन इसके लिए उन्हें आर्थिक सहयोग की आवश्यकता थी। उन्हें सहयोग करने वाले मल्टी आर्ट एसोसिएशन के सचिव मिथिलेश कुमार बताते हैं कि हमारी संस्था भाषा व संस्कृति के विकास के लिए हमेशा से कार्य करती रही है। जब हिरामन कोरवा द्वारा इस संबंध में प्रस्ताव आया तो हमलोगों ने इसे प्रकाशित करने की योजना बनाई। इसके बाद हिरामन द्वारा लिखे गये कोरवा के शब्दों की टाइपिंग कराकर पुस्तक की शक्ल में लाया गया। उसके बाद संस्था ने कोरवा शब्दकोश को प्रिटिंग के लिए डाल्टनगंज के सुनील प्रिंटर्स से बात की और प्रेस भेजा। वे कहते हैं कि पुस्तक की छपाई में संस्था के द्वारा पूरी तरह आर्थिक व तकनीकी मदद की गयी, तब जाकर कोरवा शब्दकोश की 1000 प्रतियों का प्रकाशन हो पाया। संस्था द्वारा यह सुनिश्चित कराने का प्रयास किया गया कि लगातार कोरवा भाषा के शब्द को अपग्रेड कर पुनः प्रकाशन जारी रहे। पुस्तक बिक्री से जो भी आय होगी, उससे शब्दकोश की छपाई और कोष का निर्माण हो, जिससे कोरवा भाषा शब्दकोश का लगातार प्रकाशन होता रहे। ताकि कोरवा समुदाय व भाषा का विकास हो सके। 

कोरवा भाषा को बचाने के लिए प्रकाशित शब्दकोश का मुख पृष्ठ

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 दिसंबर, 2020 को अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’के दौरान हिरामन कोरवा की चर्चा की थी। इसके बाद हिरामन पूरे झारखंड में सुर्ख़ियों में आए। बताया जाता है कि जब इस शब्दकोश की जानकारी स्थानीय मीडिया के माध्यम से पलामू के सांसद और झारखंड के पूर्व डीजीपी विष्णु दयाल राम को हुई तब उन्होंने इसकी सूचना प्रधानमंत्री कार्यालय को दी, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका जिक्र रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’में की।

(संपादन : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply