माता प्रसाद का आधुनिकता-बोध और ‘एकलव्य’

कंवल भारती के मुताबिक, माता प्रसाद द्वारा रचित काव्य ‘एकलव्य’ में भील समुदाय एकलव्य के साथ द्रोणाचार्य के द्वारा किए गए पक्षपात को अपना अपमान समझता है, और वह इसका बदला कृष्ण का वध करके लेता है। इसके बावजूद उनका उपचार गांधीवादी है।

पुनर्पाठ

माता प्रसाद (11 अक्तूबर, 1924 – 20 जनवरी, 2021) का पहला खंड-काव्य 1981 में ‘एकलव्य’ नाम से प्रकाशित हुआ, जो बहुत चर्चित हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार के समाज कल्याण विभाग ने इसे दलित पुस्तकालयों, पाठशालाओं, छात्रावासों और आंगनवाड़ी केन्द्रों के लिए स्वीकृत किया। यह उत्तर प्रदेश सरकार का सचमुच प्रशंसनीय निर्णय था। इससे इसका पहला संस्करण शीघ्र ही समाप्त हो गया। किन्तु दूसरा संस्करण तीन साल बाद 1984 में प्रकाशित हुआ।

माता प्रसाद ने ‘एकलव्य’ खंड-काव्य को अपने दिवंगत पिता श्री जगरूप राम को समर्पित किया, जिन्होंने स्वयं मजदूरी करके उन्हें अध्ययन के लिए प्रेरित किया। इस खंड-काव्य का आमुख सुप्रसिद्ध नाटककार लक्ष्मीनारायण लाल ने लिखा। उन्होंने लिखा– ‘एकलव्य के ऊपर न जाने कितने नाटक, गीत, खंड-काव्य आदि पहले लिखे गए हैं और भविष्य में भी लिखे जाएंगे। लेकिन जिन अर्थों में श्री माता प्रसाद जी द्वारा लिखित यह खंड-काव्य विशिष्ट और मौलिक है, वे हैं : (1) कवि स्वयं उसी वर्ग विशेष और समाज विशेष से आया है, जिससे एकलव्य निकला। इसलिए लेखक की आत्मानुभूति और साथ ही समाजानुभूति काफी सहज और गहरी है; (2) इस खंड-काव्य का समूचा भाव-पक्ष पुराण-काल से लेकर वर्तमान काल तक अपने बाहुपाश में शुद्ध भावना के धरातल पर प्रतिष्ठित हुआ है; (3) इसका कला पक्ष अत्यंत सरल और सहज है; (4) यह युगानुकूल है और सम्पूर्ण कृतित्व के धरातल पर यह खंड-काव्य किसी भी तरह अपने काव्यात्मक धरातल से कहीं भी नीचे नहीं उतरा है।’ उन्होंने आगे लिखा– ‘क्योंकि कवि के व्यक्तित्व पर राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रभाव रहे हैं और यह स्वभावतः भारतीय आदर्श और महात्मा गांधी की विचारधारा से अनुप्राणित व्यक्ति हैं, इसलिए यह खंड-काव्य आदि से अंत तक काव्यात्मक धरातल से स्खलित नहीं हुआ है।’

‘दो शब्द’ में स्वयं माता प्रसाद ने भी ‘एकलव्य’ खंड-काव्य के मूल में अपने गांधीवादी उद्देश्य को स्पष्ट किया है – ‘एकलव्य की कथा के माध्यम से वर्ण और जाति संबंधी दलित-जनजातियों और पीड़ित जनों के युवकों की भावनाओं को व्यक्त किया गया है। किसी जाति या वर्ग के प्रति दुर्भावना का उद्देश्य कदापि नहीं है, बल्कि सभी जातियों, धर्मों का सम्मान कर आपस में सौहार्द पैदा करके राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने की भावना से इसे लिखा गया है।’

माता प्रसाद व उनके द्वारा रचित ‘एकलव्य’ का कवर पृष्ठ

लक्ष्मीनारायण लाल का कहना सही है कि एकलव्य एक ऐसा विषय है, जिस पर काफी कुछ लिखा गया है और काफी कुछ आगे भी लिखा जाएगा। जिस समय माता प्रसाद का खंड काव्य आया, उस समय तक हिंदी साहित्य में एकलव्य की कथा पर अनेकानेक नाटक और काव्य-पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं। इनमें अधिकांश की कथाएं समान हैं, पर ‘उपचार’ की कल्पनाएं समान नहीं हैं, जो स्वाभाविक भी है। माता प्रसाद के एकलव्य की कथा भी यद्यपि वही है, जो महाभारत महाकाव्य में दी गई है, परन्तु अंगूठा देने के बाद एकलव्य में विद्रोह पैदा होता है। भील समुदाय भी इसे अपना अपमान समझता है, और वह इसका बदला कृष्ण का वध करके लेता है। इसके बावजूद उनका उपचार गांधीवादी है। इसलिए जो विद्रोह एकलव्य में पैदा होता है, वह बाद में शांत हो जाता है, वह प्रेम और अहिंसा का पुजारी हो जाता है। उसे ब्राह्मणों से भी कोई शिकायत नहीं रह जाती है, यहां तक कि द्रोण में भी उसे दोष नजर नहीं आता है। लेकिन भील युवकों में रोष है। भील युवक ‘जरा’ बदला लेता है, हालांकि भील समुदाय पांडवों से संधि करता है, जिसमें वह सेवाओं में आरक्षण लेकर ही संतुष्ट हो जाता है। यह संधि डॉ. आंबेडकर और गांधी के बीच पूना-संधि की याद दिलाती है।

खंड-काव्य सर्गों में विभाजित होता है, पर ‘एकलव्य’ में सर्ग नहीं हैं। इसमें सीधे-सीधे अध्याय के नाम दिए गए हैं। पहला शीर्षक ‘भीम सुशासन’ है, जिसकी शुरुआत इस दोहे से होती है :

एकलव्य की यह कथा, लिए व्यथा आभास.
जाति वर्ण संघर्ष से, कांप रहा इतिहास.

दूसरे अध्याय में ‘पांडू की सहायता तथा भीलों की समस्याएं’ हैं। भीलों ने दुश्मनों से हस्तिनापुर की रक्षा की है, जिससे प्रसन्न होकर पांडू राज भील राज का स्वागत करते हैं, और पूछते हैं कि उनकी कोई समस्या हो तो बताएं। तब भील राज एक ऐसी व्यवस्था की मांग करते हैं, जिसमें किसी का शोषण न हो, किसी पर अत्याचार न हो, कोई किसी का दमन न करे, और अवसरों से वंचित जातियों को प्रत्येक सेवा में आरक्षण प्रदान किया जाए। एक प्रकार से इसमें समतामूलक समाज की परिकल्पना है। यथा :

हम तो शासक नहीं, श्रमिक, शोषित, अछूत विस्थापित.
किन्तु आप सक्षम समता का, करें राज सुस्थापित.
घोषित कर दें राजाज्ञा में, आरक्षण हर सेवा पर.
जिससे दलित भील, भर, मुसहर, कोल, बियार मिले अवसर.
हैं जिन कर्मों के लिए आज, कुछ लोग दलित कहलाते.
उन कर्मों के रुक जाने पर, उत्पीडन कुछ करवाते.
है जीना भी दुर्लभ लगता, सुनता है कौन हमारी.
खान, पान, आवास, मार्ग अध्ययन का संकट भारी.
कुछ शिक्षा दें उत्थान करें, जो जीवन उच्च उठावें.
तब हिंदू मिशनरियों अरबों पर, सब दोष लगावें.
वे नहीं बुराई अपनी देखें, भाव विभेद बढावें.
ऐसे ढोंगी लोगों से, इस देश को आप बचावें.

कवि ने ईसाई मिशनरियों का उल्लेख किया है, जो दलितों को अपने धर्म में दीक्षित करके पढ़ाते-लिखाते हैं, और उनके जीवन-स्तर को ऊंचा उठाते हैं। किन्तु ‘एकलव्य’ जिस महाभारत काव्य का पात्र है, उस काल-खंड में ईसाई मिशनरियों को दर्शाना असंगत प्रतीत होता है। हालांकि ‘एकलव्य’ में कवि का यह आधुनिकता-बोध इतिहास की पुनर्व्याख्या की दृष्टि से विचारणीय है। यह एकलव्य को देखने की एक नई दृष्टि भी है, जो कवि ने सृजित की है।

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तीसरे अध्याय में एकलव्य की बाल्यावस्था एवं शिक्षा पर विचार किया गया है। भीलराज हिरण्य धनु की पत्नी मल्ली के गर्भ से एकलव्य के जन्म की कथा है। एकलव्य के बड़े होने पर उसे धनुर्विद्या की शिक्षा दिलाने की बात चली, तो हिरण्य धनु ने उसे द्रोण के पास भेजने का विचार किया। कुछ भीलों ने शंका भी की कि द्रोण छुआछूत मानते हैं और वह शूद्र को शिक्षा नहीं देंगे। किन्तु, पांडूराज से संबंधों के कारण वह एकलव्य को द्रोण के आश्रम भेज देते हैं। 

चौथे अध्याय के अनुसार एकलव्य जब आश्रम पहुंचे, तो द्रोण अर्जुन से काठ की चिड़िया की आंख भेदने की परीक्षा ले रहे थे। अर्जुन का निशाना चूक गया, और उसी समय एकलव्य के मुख से निकल गया   :

थोड़ा यत्न और हो निश्चय, लक्ष्य-भेद हो जाए.
एकलव्य ने कहा अचानक, खग पर दृष्टि गड़ाए.

यह सुनकर द्रोण की नजर एकलव्य पर पड़ती है, जो एक किनारे खड़ा देख रहा था। तब

द्रोण बोले बताओ क्या, तुम भेद सकोगे लक्ष.
आगे आओ, मौन खड़े क्यों, हो इसमें यदि दक्ष.

और तब :

एकलव्य ने सहज लक्ष्य पर, उठकर किया प्रहार.
काष्ठ विहग का नेत्र भेदकर, तीर गया उस पार.

यह देख कर द्रोण प्रसन्न होकर उससे उसका नाम और आने का प्रयोजन पूछते हैं। पर जैसे ही एकलव्य बताता है कि वह भीलराज का पुत्र एकलव्य है और उनसे धनुर्विद्या की शिक्षा ग्रहण करने आया है, तो   द्रोण की प्रसन्नता विषाद में बदल जाती है। वह एकलव्य से कहते हैं   :

शिक्षा जहां गुरुकुलों में है, वहाँ न सब पढ़ पाई.
पढ़ सकता द्विज वर्ग यहाँ, पर और न विद्या पाई.
उद्यम छोड़ जाति का निज, तुम चाहो शिक्षा तात.
सुन तेरी यह नई भावना, लगा मुझे आघात.

एकलव्य इस इनकार से दुखी हुआ, और सजल आंखों से द्रोण को प्रणाम कर अपने घर चला गया।

पांचवें अध्याय में कवि ने वर्ण-भेद पर चार कविताएं लिखी हैं। ये सभी कविताएं मार्मिक हैं। इनमें पहली कविता भूमिहीन गरीब पर है :

हैं कष्ट भोगते हम अपार.
है भूमि नहीं अपनी कुछ भी, ठुकरा कर दूर भगाया है.
अतिशीत, घाम, वर्षा सहते-सहते जीवन अकुलाया है.
दी आयु झोंपड़ी में गुजार.

इस कविता की अंतिम कली है :

मानवकृत विषम व्यवस्था यह, जग से कब हाय चूर्ण होगी?
सब समान हों, सबमें समान, अभिलाषा तभी पूर्ण होगी.
हो मित्र द्रोह दुःख सभी क्षार.

दूसरी कविता में जाति-व्यवस्था का विरोध है, तीसरी कविता में कवि पूछता है :

हमको सब क्यों कहते अछूत?
ईश्वर वह एक हमारा भी, सब जैसी शारीरिक रचना.
कर भेद हमें है पृथक किया, हमसे हर क्षण चाहे बचना.
क्या हम भारत के नहीं पूत?

चौथी कविता में एकलव्य का संकल्प है कि यदि प्रभु उसे पुन: मनुष्य का जन्म दे, तो उसे दीन-दलित भीलों के घर में ही जन्म मिले, जिससे उसका पूरा जीवन जाति-पांति के भेदभाव का विनाश करने में ही लगा रहे। यथा :

अभिलाषा एक यही मन में.
यदि मनुज जन्म पाऊं जग में, तो एक विनय हे करुणाकर.
इन दीन दलित भीलों के घर, फिर जन्म मिले मुझको प्रभुवर.
सेवा व्रत लक्ष्य रहे तन में. 

इस जाति-पांति के भेदभाव का, हो न जाए जब तक विनाश.
हम हों न शिथिल, निज यत्नों में, मन में न रंच भी हों हताश.
हो कष्ट भले ही जीवन में.

यह निश्चित रूप से कवि पर गांधीवाद का प्रभाव है, जो पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करता है, और जाति-पांति के भेदभाव का विनाश करने के लिए अगला जन्म लेना चाहता है। प्रथम तो अगला जन्म होता नहीं, और दूसरे, जो व्यक्ति वर्तमान में कुछ नहीं कर सकता, वह आगे भी निष्क्रिय ही रहता है। ठीक गांधी की तरह, जिन्होंने अगले जीवन में भंगी के घर में पैदा होने की कामना की थी, और वर्तमान जीवन में वह वर्ण-भेद के समर्थक ही बने रहे थे। इस कविता से यह भी साफ़ हो जाता है कि माता प्रसाद जी के आदर्श गांधी थे, आंबेडकर नहीं।

छठे अध्याय में द्रोण द्वारा एकलव्य को शिक्षा देने से मना करने से हिरण्य धनु और मल्ली की चिंता को चित्रित किया गया है। सातवें अध्याय में भीलराज भीलों की सभा बुलाते हैं और इस मुद्दे पर उनकी राय लेते हैं। कुछ भीलों ने कहा कि यह द्रोण ने भीलों का अपमान किया है, और इसके खिलाफ संघर्ष किया जाएगा। यथा :

इज्जत से जीना चाहो, तो मरना समझो खेल.
स्वाभिमान के रक्षा हित, हम खतरा भी लें झेल.
इस मुद्दे पर छेड़ेंगे, इस देश में हम संघर्ष.
निर्णय हो जायेगा इसका, आज एक निष्कर्ष.

लेकिन जब एकलव्य से पूछा जाता है कि उसकी राय क्या है, तो वह वन में एकांत में स्वयं साधना करने का संकल्प लेता है :

वन में दूर कहीं निर्जन में, करके कठिन साधना.
मुश्किल को भी सरल बनाकर, सत्य करूंगा सपना.

आठवें अध्याय में अभ्यास और गुरु दक्षिणा का चित्रण है। इसलिए यह एक महत्वपूर्ण अध्याय है। एकलव्य वन में कुटिया बनाकर साधना-रत है। एक दिन आचार्य द्रोण अपने राजकुमार शिष्यों के साथ विचरते हुए एकलव्य की कुटी के नजदीक पहुंचते हैं। उनके साथ एक कुत्ता था, जो आगे-आगे चलता था। एकलव्य ने कुत्ते के भोंकने की आवाज सुनी, तो उसने बाणों से कुत्ते का मुंह भर दिया :

श्वान भौंकने की ध्वनि आई, था वन में जो निस्तब्ध.
वह लौटा तीरों से मुंह भर, सब देख उसे स्तब्ध.

इस कौशल को देखकर द्रोण गुरु हैरान हो गए। वह उस कुशल धनुर्धर के पास गए, और उससे उसका परिचय पूछा। जब उन्हें मालूम हुआ कि यह वही भील एकलव्य है, जिसे विद्या देने से उनके द्वारा मना किया गया था, तो उन्होंने पूछा, तुम्हें यह विद्या किस गुरु ने सिखाई है? तब एकलव्य ने कहा कि उसने आपको ही श्रद्धा से गुरु मानकर आपकी ही मूर्ति बनाकर साधना की है, इसलिए आप ही गुरु हैं। तब द्रोण बोले :

द्रोण बोले कुटिल मन प्रिय शिष्य तुम तब तक न हो.
मेरे कथन अनुकूल तुम, गुरु दक्षिणा जब तक न दो.

एकलव्य ने जवाब दिया :

दक्षिणा क्या लाऊं बोला, गुरु विनत कर जोड़ कर.
दूँगा तुरत मैं आपको वह, गगन से भी तोड़ कर.

यह सुनकर द्रोण ने कहा :

हे शिष्य, दायें हाथ का, तेरा अंगूठा चाहिए.
दो काटकर तत्काल मन में, कुछ विषाद न लाइए.

यह सुनकर एकलव्य ने अपना कुछ भी भला-बुरा सोचे, तुरंत अपना अनूठा काटकर हथेली पर रखकर द्रोण को दे दिया। कवि ने लिखा है कि यह दृश्य देखकर द्रोण को आघात हुआ, और उसके हाथ कांपने लगे। इसी समय कवि ने द्रोण के मुख से यह सत्य भी कहलवा दिया है :

यह जाति यदि बढ़ती रही, सब कौशलों के साथ.
सम्मान देना ही पड़ेगा, कुछ दिनों पश्चात.

माता प्रसादजी ने एकलव्य की उसी कथा का अनुसरण किया, जो ब्राह्मणों ने लिखी। उसका पुनर्पाठ उन्होंने नहीं किया। जब द्रोण के आश्रम में एकलव्य ने काष्ठ की चिड़िया की आंख भेदी थी, और वन में भौंकते हुए कुत्ते का मुंह बाणों से भर दिया था, तो यह समझा जाना चाहिए कि एकलव्य पहले से ही धनुर्विद्या में निष्णात था, क्योंकि यह धनुर्विद्या जनजातियों की पारंपरिक विद्या थी। द्रोण ने इस डर से कि एकलव्य उनके पांडव शिष्यों के लिए चुनौती न बन जाए, एकलव्य का जबरन अंगूठा काटकर उसकी विद्या को नष्ट किया था। यह गुरु-दक्षिणा नहीं, बल्कि हत्या थी। विचार करने की बात है कि क्या ब्राह्मणों में गुरु-दक्षिणा का यही तरीका प्रचलित था? क्या एकलव्य से पहले द्रोण ने किसी द्विज शिष्य का अंगूठा गुरु-दक्षिणा में लिया था? सवाल यह भी है कि द्रोण ने एकलव्य के अंगूठे का क्या किया? उसे न तो पकाकर खाया जा सकता था, और न वह सजाकर रखने वाली चीज थी। वह मांस का टुकड़ा था, जिसका कुछ समय के बाद सड़ना निश्चित था। सामंती राज-व्यवस्था में एकलव्य का अंगूठा जबरन ही काटा जा सकता था। यदि माता प्रसादजी एकलव्य की कथा का पुनर्पाठ करते, तो यह दृष्टिकोण अवश्य ही उनके सामने आता।

माता प्रसादजी ने नवें अध्याय में एकलव्य के विद्रोह और हिरण्य धनु के सन्देश की कल्पना की है। एकलव्य को पश्चाताप होता है, क्योंकि वह समझ जाता है कि द्रोण ने छल किया है। वह विद्रोह से भर उठता है, द्रोण के प्रति उसकी सारी भक्ति खत्म हो जाती है, और वह द्रोण की मूर्ति को तोड़ देता है। यथा :

क्यों किया छल द्रोण ने, कैसे करूँ सम्मान अब.
है व्यर्थ उनकी वन्दना, मन घट गया सब मान अब.
तन जल गया विद्रोह से, मन-भक्ति से ही हट गया.
ध्यान केंद्रित मूर्ति से, विलग होकर बँट गया.
विक्षिप्त सा गुरु मूर्ति धरती पर गिरा कर तोड़ दी.
अश्रुपूरित नेत्र थे, गुरु-भक्ति से मुंह मोड़ ली.

वीर एकलव्य अब बाएं हाथ को साधकर पुन: धनुर्विद्या का अभ्यास करता है, और उसमें भी निपुण हो जाता है। इसी बीच उसके पिता हिरण्य धनु का निधन हो जाता है। मरने से पूर्व वह भील समाज को सन्देश देते हैं :

सभी उठाकर कष्ट दीन अरु, दुखियों की रक्षा करना.
अपमानित होकर जीने से, तो मर जाना अच्छा.

दसवें अध्याय में कवि ने भील सरदारों की सभा का चित्रण किया है, जिसमें इस प्रश्न को रखा गया   है कि कटे अंगूठे का बदला कैसे लिया जाए? सभी सरदार अपनी-अपनी राय रखते हैं। कोई युद्ध की राय देता है, तो कोई छापामार कार्यवाही करने की बात रखता है। किसी ने कृष्ण की आलोचना की। पर सबसे पृथक और मुख्य विचार एकलव्य का है, जिसका इस अध्याय में हृदय परिवर्तन हो गया है। उसमें वह विद्रोह भी शांत हो गया है, जो पहले पैदा हुआ था। कहना न होगा कि कवि ने एकलव्य में गांधी को प्रवेश करा दिया है, जो अहिंसा, प्रेम और शान्ति की बात करता है। वह ब्राह्मणों को त्यागी, बलिदानी और समाज-हितैषी बताता है और उनके प्रति दुर्भावना का त्याग करने को कहता है :

बोले एकलव्य वीरो तुम, द्रोण को बुरा बताते हो.
उनके ही संग विप्र जाति पर, तुम आरोप लगाते हो.
सभी जातियों अरु धर्मों में, होते अधिक भले हैं लोग.
देश जाति को आगे ले जाने में, है उनका सहयोग.
त्यागी बलिदानी समाज-हित, विप्रों में अनेक मिलते हैं.
कर   उनका सम्मान दिखाएँ, उनसे यद्यपि कुछ जलते हैं.
राजनीति में है यह जायज, कपटनीति से मिले सफलता.
अर्जुन ने भी यही कराया, किया द्रोण ने जो कौशलता.

एकलव्य के वचनों के बाद, सरदारों की सभा में निर्णय होता है : ‘विश्व युद्ध परिणाम देख लो, आगे कौन वरण करता जय।’ इस विश्व युद्ध से मतलब महाभारत-युद्ध से है। इस युद्ध का वर्णन ग्यारहवें अध्याय में किया गया   है, जिसमें पांडवों की जीत होती है और कृष्ण उनके नायक बनते हैं :

अंतिम विजय मिली पांडव को, कृष्ण बने थे उनके नायक.
बन्धु बांधव सुहृद न जाने, कितने ही मर गए सहायक.

धर्मराज का राजतिलक होने के बाद कृष्ण द्वारिकापुर चले गए। इसी द्वारिकापुर के वन खंड में कृष्ण का वध होता है। इसलिए यह अध्याय में मुख्य रूप से कृष्ण-वध पर आधारित है। कृष्ण वन-विहार के लिए जाते हैं और वहां एक व्याध के तीर का शिकार हो जाते हैं। यथा :

शासन करते बीते कुछ दिन, एक दिवस वन करत विहार.
थक कर एक वृक्ष के नीचे, लेट गए थे नन्दकुमार.
एक व्याध ने कर प्रहार था, मारा तीर कृष्ण के पाँव.
रुधिर बह चला, व्याकुल होकर, बैठ गए वह तरु की छाँव.

कृष्ण अचेत होकर गिर जाते हैं और फिर मर जाते हैं। मरने से पूर्व कृष्ण व्याध से पूछता है कि वह कौन है और उसने क्यों बाण चलाया? तब व्याध जवाब देता है कि उसने भील जाति के अपमान का बदला लिया है, एकलव्य का अंगूठा काटने तथा घटोत्चक सुत बर्बरीक की हत्या का प्रतिशोध लिया है। यथा :

कहा कृष्ण ने बधिक कौन तुम? तेरा कौन बिगाड़ा काम?
कहा व्याध ने ‘जरा’ नाम है, भील जाति से हूँ बदनाम.
घटोत्चक सुत बर्बरीक को, बिन कारण ही तुमने मारा.
पुर वधुओं गोपी संग क्रीडा कर नैतिकता कहाँ विचारा.
बने सारथी अर्जुन के यश, अपना ही है जिसने देखा.
एकलव्य का कटा अंगूठा, अपनी बदली भाग्य की रेखा.
है उस अन्याय कुटिलता का, छल से बदला ले लिया आज.
हो गया मनोरथ पूर्ण धरे, संतोष हमारा अब समाज.

कृष्ण के निधन की सूचना इन्द्रप्रस्थ पहुंचती है, तो पांडव दुखी हो जाते हैं। अर्जुन तत्काल द्वारिका पहुंचते हैं। एक माह तक द्वारिका में रहकर वह द्वारिका के राजपरिवार की गोप-गोपिकाओं, विधवाओं, बच्चों आदि को लेकर इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करते हैं। क्योंकि द्वारिका सिंधु के उफान से जल में डूब रही थी।

कवि ने बारहवें और अंतिम अध्याय में अर्जुन का मान-मर्दन और पांडव-भील संधि को दिखाया है। जब द्वारिका के नर-नारियों को लेकर अर्जुन का रथ पञ्च नद क्षेत्र से गुजरा, तो धनुष बाण से सज्जित भील वहां छिपकर घात लगाए बैठे थे। अवसर देखते ही उन्होंने चढ़ाई कर दी। यथा :

छापामार लड़ाई करते, कभी निकट पल दूर थे.
कभी मारते कभी भागते, बने हुए अति क्रूर थे.

अर्जुन रोष में भरकर गांडीव उठाते हैं, पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके। तभी आरण्यक सरदार प्रकट होकर बोलता है :

आरण्यक सरदार सामने, उसी समय है आया.
पार्थ सुनो वह बोला तुमको, द्रोण ने यही सिखाया.
एकलव्य का काट अंगूठा, तेरा यश चमकाया.
किन्तु अजेय धनुर्धर तुमको, अभी नहीं कह पाया.
निशस्त्र कर्ण पर अस्त्र उठाते, तुम्हें न लज्जा आई.
वीर शिरोमणि कैसे मानूँ, मुझको दो समझाई.
भील युवक का काट अंगूठा, तुम भी बने धनुर्धर.
क्षुब्ध भील वे नष्ट कर रहे, तेरा गर्व यहाँ पर.

अर्जुन ने इंद्रप्रस्थ जाकर भीलों के हमले पर विचार किया और वार्ता के लिए एकलव्य के पास दूत भिजवाया। दूत ने एकलव्य के समक्ष आरक्षण का प्रस्ताव रखा। इस पर एकलव्य ने कहा :   आरक्षण जरूरी है। परंतु, यह समस्या का हल नहीं है। आरक्षण तभी तक होना चाहिए, जब तक सब बराबर न हो जाएं। कोई स्थाई व्यवस्था कायम करिए, जिससे सबको औरों के समान ही सम्मान मिले। अगर इससे पहले आरक्षण खत्म किया तो जाति-युद्ध छिड़ जाएगा। यथा :

करो व्यवस्था स्थाई, कुछ खोजो रोग निदान.
औरों के समान ही, जिससे हमें मिले सम्मान.
जब तक ऐसा कर न सको, तब तक यह धर्म तुम्हारा.
आरक्षण की बैशाखी का, तुम दो हमें सहारा.
सम अवसर को दिए बिना, आरक्षण खत्म करेंगे.
जाति-युद्ध छिड़ जाए, फिर कितनों के खून बहेंगे.

इसके बाद इंद्रप्रस्थ की सत्ता भीलों के साथ समझौता करती है। भीलों को नागरिकता के साथ सामाजिक न्याय का भरोसा मिलता है, और बदले में भील समुदाय इंद्रप्रस्थ की सत्ता को स्वीकार करता है। यथा :

मिली नागरिकता भीलों को, अरु अवसर की समता.
स्वीकारी भीलों ने भी, तब इंद्रप्रस्थ की सत्ता.
दलित भील के साथ हुआ है, अब तक जो अन्याय.
सुविधाएँ विशेष दे उनको, खुला नया अध्याय.

अंत में कवि ने लिखा :

राजदूत यह समझौता कर, इंद्रप्रस्थ को आए.
दलित भील सब इधर खुशी में, उत्सव खूब मनाए.

अन्यायपूर्ण राजव्यवस्था में ही सामाजिक न्याय की परिकल्पना इस संधि में की गई है। क्या यह एकलव्य के अंगूठे का प्रतिशोध था? या इंद्रप्रस्थ की ब्राह्मणवादी सत्ता के अवरोध को ध्वस्त करने की रणनीति थी? कौन जाने?

(संपादन : नवल)


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