बिहार के बड़े किसान सामंत, खेती को मानते हैं नीच कर्म : एन. के. नंदा

जाट और सिक्ख समुदाय के लोगों का चरित्र अलग है और बिहार के किसानों का चरित्र अलग है। बिहार के बड़े किसान सामंत हैं और खेती को नीच कर्म मानते हैं। जबकि पंजाब में बड़े किसान स्वयं भी खेतों में काम करते हैं। बिहार विधानसभा के पूर्व सदस्य एन. के. नंदा से नवल किशोर कुमार की खास बातचीत

साक्षात्कार

दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के आंदोलन के नब्बे दिन पूरे होने को हैं। एक तरफ यह आंदोलन अब उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान आदि राज्यों में किसान महापंचायतों के माध्यम से विस्तृत होता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर बिहार में इस आंदोलन को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है। इसके पीछे कारण क्या हैं। इन्हीं सवालों को लेकर फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने भाकपा माले के पूर्व विधायक एन. के. नंदा से दूरभाष पर खास बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश :

किसानों के आंदोलन को अब तीन महीने होने को हैं। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

निश्चित तौर पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार किसानों द्वारा उठाए जा रहे सवालों को न तो सुनने का प्रयास कर रही है और ना ही समझने का। मेरा मानना है कि किसानों के सवाल वाजिब सवाल हैं और सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह उनके सवालों का जवाब दे और तीनों कृषि कानूनों को रद्द करे।

बिहार में इस आंदोलन का कोई असर नहीं दिखता है। क्या कारण है?

आपने सही कहा कि बिहार में इस आंदोलन का प्रभाव नहीं दिख रहा है। हाल के दिनों में वामपंथी दलों द्वारा कुछ सुगबुगाहट हुई है लेकिन उनकी परेशानी यह है कि उनके साथ किसान नहीं हैं। वे राजनीतिक दल के कार्यकर्ता हैं। रही कारण की बात तो आपको पहले यह समझना होगा कि बिहार में किसान कौन है। यहां जिनके पास बड़ी जोत है, वे किसानी नहीं करते। इसलिए वे आंदोलन से सरोकार नहीं रखते। सरोकार तो तब रखते यदि वे स्वयं खेती करते। तो जो किसानी की परेशानियों को नहीं जानते-समझते हैं, उनके लिए सरकार चाहे जैसा भी कानून बना दे, कोई मायने नहीं रखता है।

अब देखिए कि बिहार में जो किसानी करते हैं उनके पास कम जोत है और इनमें वे भी शामिल हैं जो भूमिहीन हैं तथा खेतिहर मजदूर हैं। वे आर्थिक रूप से इतने लाचार हैं कि विरोध करने की स्थिति में ही नहीं हैं। इसके अलावा सामाजिक कारण भी बड़ा कारण है। मीडिया में दलित, पिछड़ों की हिस्सेदारी न्यून होने से इन वर्गों के किसानों के सवाल कभी विमर्श का हिस्सा ही नहीं बन पाते हैं।

लेकिन अभी जो आंदोलन दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा है, उसमें तो छोटे और बड़े किसान सभी शामिल हैं। इसकी वजह क्या है?

यह आपने महत्वपूर्ण सवाल पूछा है। दरअसल, जाट और सिक्ख समुदाय के लोगों का चरित्र अलग है और बिहार के किसानों का चरित्र अलग है। बिहार के बड़े किसान सामंत हैं और खेती को नीच कर्म मानते हैं। जबकि पंजाब में क्या है कि बड़े से बड़ा किसान भी खेती करता है। वह मजदूरों की सहायता लेता है लेकिन स्वयं भी खेतों में काम करता है। उसे किसानों को होनेवाली परेशानियों की समझ है। दूसरी बात यह भी है कि हिंदी पट्टी के राज्यों में हिंदुत्व का असर ज्यादा रहा है और समाज मनुवादी विचारधारा के प्रकोप से ग्रसित रहा है।

एन. के. नंदा, पूर्व सदस्य, बिहार विधानसभा

बिहार में तो विरोध तब भी नहीं हुआ था जब 2006 में राज्य सरकार ने एपीएमसी एक्ट को खत्म कर सरकारी मंडियों की व्यवस्था ही खत्म कर दिया था।

बिल्कुल। कौन करता विरोध? आप यह देखें कि उस समय जब नीतीश कुमार सत्ता में आए तब पंद्रह साल तक बिहार में राज करने वाले लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के पास विरोध करने का आधार नहीं था। कांग्रेस पहले से ही कमजोर थी। वामपंथी पार्टियों की ताकत भी क्षीण थी। आप यह भी देखें कि सत्ता में आते ही नीतीश कुमार ने जस्टिस अमीरदास आयोग को भंग कर दिया था जो रणवीर सेना के संरक्षकों के संबंध में जांच कर रही थी। किसी ने विरोध किया था?

अभी आप क्या मानते हैं कि भारत सरकार किसानों की बात मानेगी?

मुझे लगता है कि भारत सरकार जिस तरीके से किसानेां के आंदोलन का दमन कर रही है, वह किसानों की मांगों को नहीं मानने जा रही है। आप देखिए कि वह कर क्या रही है। एक तरफ तो वह किसानों के आंदोलन को लंबे समय तक चलाने को मजबूर कर रही है। दूसरी तरफ उनके आंदोलन को कभी खालिस्तानी तो कभी विदेशी षडयंत्र कहकर बदनाम कर रही है। यह सब सरकार की साजिशें हैं।

(संपादन : अनिल)


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