मिहनतकश किसानों की सामूहिक पहचान का पुनरुदय

खेती-किसानी में बदलावों के अलावा सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक बदलावों के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आबोहवा बदली है। सतेन्द्र कुमार इन बदलावों के संदर्भ में उन कारणों का भी विश्लेषण कर रहे हैं जिनके कारण जाटों और मुसलमानों के बीच एकता बढ़ी है और किसानों का आंदोलन मजबूत हुआ है

इसी वर्ष 29 जनवरी को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फरनगर का इंटर कॉलेज मैदान हजारों किसानों से खचाखच भरा था। वे भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के अध्यक्ष नरेश टिकैत के आह्वान पर आयोजित महापंचायत में हिस्सेदारी करने पहुंचे थे। नरेश टिकैत ने उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमा पर गाज़ीपुर में अपने भाई राकेश टिकैत के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन के समर्थन में इस महापंचायत का आयोजन किया था। महापंचायत में जिन लोगों ने भाषण दिए उनमें भाकियू के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता और दिवंगत महेंद्र सिंह टिकैत के निकट सहयोगी मुहम्मद जौला शामिल थे। इस कार्यक्रम में जौला और मुस्लिम किसानों की भागीदारी को ‘किसान’ की साझा पहचान तले मुसलमानों और जाटों के फिर से एक होने का संकेत माना जा रहा है। 

वर्ष 2013 के मुज़फ़्फरनगर दंगों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र के सामाजिक तानेबाने को तहस-नहस कर दिया था। इन दंगों के पीछे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके क्षेत्रीय नेता थे। उन्होंने एक स्थानीय जातिगत विवाद को सांप्रदायिक रंग दे दिया, जिसके नतीजे में गांव के गांव धार्मिक आधार पर बंट गए। उस समय तो ऐसा लगने लगा था मानों जाट किसानों ने हिंदुत्व का वरण कर लिया हो।  

परन्तु यह रातों-रात नहीं हुआ था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की गोलबंदी और उनके आंदोलनों का लंबा इतिहास है। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों और कृषि में आए परिवर्तनों के कारण बड़ी संख्या में किसानों ने गैर-कृषि कार्य करने शुरू कर दिए। इस कारण राज्य के उत्तर-पश्चिमी इलाके की किसान राजनीति में दरारें पड़ गईं, जिसका लाभ भाजपा ने उठाया। परन्तु हालिया घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि किसानों की एक समुदाय के रूप में पहचान का पुनरुदय हो रहा है। 

परिवर्तन की बयार

उन्नीसवीं सदी के मध्य या शायद उसके पहले से ही, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेती की ज़मीनों पर जाटों का वर्चस्व रहा है। जाट हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं और दोनों समुदाय गांवों में मिलजुलकर एक साथ रहते आए हैं।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत, जिनके नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की एकता मजबूत हुई है

सन 1960 के दशक की शुरुआत से लेकर 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध तक, हरित क्रांति के चलते जाट किसान और संपन्न व मजबूत होते चले गए। वे वहां की श्रमिक, सेवा-प्रदायक व शिल्पी जातियों, जिनमें से अधिकांश पसमांदा मुसलमान हैं, के जजमान बन गए। श्रमिक व सेवा-प्रदायक जातियों के सदस्य या तो भूमिहीन हैं अथवा छोटे और सीमान्त कृषक हैं। भाकियू ने ग्रामीण इलाकों के विभिन्न समुदायों को धर्म की सीमाओं से परे एक साझा मंच उपलब्ध करवाया। इनमें खेतिहर मजदूर और सीमान्त व मध्यम दर्जे के कृषक शामिल थे। सन् 1980 के दशक में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में इन वर्गों ने मुसलमान किसानों और भूमिहीन मजदूरों को साथ लेकर सस्ती बिजली और कृषि उपज के बेहतर दामों की मांग को लेकर एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया। 

सन् 1990 के दशक में हरित क्रांति के और बड़े इलाके में विस्तार के साथ, किसानों की आमदनी में वृद्धि की दर धीमी पड़ने लगी और परिवार के सदस्यों के बीच बंटवारे से खेतों के आकार छोटे होने लगे। देश में नवउदारवादी आर्थिक नीतियां लागू होने लगीं, कृषि क्षेत्र को मिलने वाला अनुदान कम होने लगा, खेती की लागत बढ़ने लगी, कृषि उत्पादकता स्थिर हो गई और पर्यावरणीय अनिश्चितताओं में इज़ाफा होने लगा। इन सब कारकों के चलते, किसानों का रुझान गैर-कृषि आर्थिक गतिविधियों की ओर होने लगा। इससे जाट किसानों का बोलबाला कम हुआ और सियासत पर भकियू की पकड़ कमज़ोर हुई।

सामाजिक बदलाव

अब हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि ग्रामीण खेतों में कम और शहरों में ज्यादा दिखाई देते हैं। विभिन्न समुदायों के व्यक्तियों के बीच संवाद कम हो गया है। जो किसान पहले रोज़मर्रा के कामों (कृषि उपकरणों की मरम्मत, हजामत बनवाने, कपडे धोने इत्यादि) के लिए शिल्पी और सेवा-प्रदायक जातियों पर निर्भर थे, वे अब नयी तकनीकों और निकटवर्ती शहरों में उपलब्ध सेवाओं का प्रयोग करने लगे हैं। जजमानी व्यवस्था समाप्त हो चली है और सबकुछ अब नगद लेनदेन से होने लगे है। सभी जातियों की युवा पीढ़ी उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव में आ गयी है। जो ग्रामीण गैर-कृषि आय या बाहर रहने वाले परिवारजनों द्वारा भेजे जाने वाले धन पर निर्भर हैं, वे अब अपने-आपको शहरी मध्यम वर्ग से जोड़ने लगे हैं। परिवार, रिश्तेदारी और एक-दूसरे के काम आने पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का स्थान व्यक्ति-केन्द्रित अर्थव्यवस्था ने ले लिया है जिसमें हर व्यक्ति अपने कौशल के बदले नगद धन पाना चाहता है। जातियों, परिवारों और रिश्तेदारों के बीच आर्थिक असमानताएं बढ़ रहीं हैं। एक ग्रामीण मध्यम वर्ग आकार ले रहा है, जिसमें मुस्लिम शिल्पी और सेवा-प्रदायक जातियां शामिल हैं। जजमानी रिश्तों के समाप्त होने और सभी को मत देने का अधिकार मिलने से जाटों और उन्हें सेवाएं प्रदान करने वालों में राजनैतिक प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न हो गयी है। उनके आर्थिक रिश्ते अब परस्पर निर्भरता पर नहीं, बल्कि परस्पर प्रतिस्पर्धा पर आधारित हो गए हैं। 

महेंद्र सिंह टिकैत की तस्वीर

शिल्पी व सेवा-प्रदायक जातियों की युवा पीढ़ी, वर्चस्वशाली जाति को जजमान की तरह नहीं देखती और अपने अधिकारों को लेकर गोलबंद हो रही है। पूर्व में हाशियाकृत रहे समुदायों द्वारा अपने अधिकारों की मांग करने से टकराव उत्पन्न हो रहे हैं। परन्तु इन टकरावों से निपटने और उनका निराकरण करने में ग्रामीण समाज सक्षम नहीं है क्योंकि आपसी रिश्ते कमज़ोर हुए हैं, विभिन्न जातियों-समुदायों और व्यक्तियों (जो शहरी क्षेत्रों में रहते हैं) के बीच मेलजोल घटा है और लोग गांवों और उनके नियम-कायदों से दूर हो गए हैं। 

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इन परिवर्तनों के चलते जाट और अन्य वर्चस्वशाली जातियों की इन टकरावों का निराकरण अपने पक्ष में करने की क्षमता कम हो गयी है। 

भाजपा का उभार

कृषि से जीवयापन कठिन हो जाने के कारण जाट रोज़गार के अन्य अवसरों और नए राजनैतिक गठबंधनों की तलाश में हैं। अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के फलस्वरूप ग्रामीण युवा पीढ़ी, शहरी हिंदू मध्यम वर्ग के प्रभाव में आ रही है। इस पीढ़ी की रुचियां, रस्मो-रिवाज़, भाषा, प्रतीक, राजनीति और नैतिक मानदंड, सभी बदल गए हैं। मीडिया से प्रभावित नयी संस्कृति के उद्भव और लोगों की गतिशीलता में वृद्धि के कारण महत्वाकांक्षाओं और पहचानों में आए परिवर्तनों से पूरे इलाके का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश बदल गया है। संवाद व मनोरंजन की नयी तकनीकों ने सामाजिक और आर्थिक रिश्तों की भौगोलिक सीमा का विस्तार अनंत तक कर दिया है। इसके कारण नए सामाजिक-राजनैतिक समूहों के लिए जगह बनी है। आर्थिक और स्थानिक गतिशीलता ने जाट समुदाय की एकता को भी खंडित किया है। 

भाजपा ने युवाओं की राजनैतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का उद्यम किया; उन्हें प्रतिनिधित्व प्रदान किया और राजनैतिक पद दिए। बड़ी संख्या में युवा अपनी आर्य समाजी जड़ों से दूर हो गए और उनका जुड़ाव शहरी धार्मिक और आध्यात्मिक संस्थाओं से हो गया। कृषि-आधारित और ग्रामीण त्योहारों का स्थान हिन्दू कर्मकांडों और त्योहारों ने ले लिया। आरएसएस और उससे जुड़ी संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले धार्मिक आयोजनों में भागीदारी बढ़ रही है। भाजपा ने जाट स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की जयंतियां और शहीदी दिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर इस समुदाय के गर्व के प्रतीकों पर कब्ज़ा जमा लिया है। कुछ टीवी चैनलों (उदाहरण के लिए आस्था) के दर्शकवर्ग में जबरदस्त वृद्धि हुई है। बाहरी दुनिया से संपर्कों के कारण जाति और धर्म को देखने का नजरिया बदला है। 

इलाके के मुसलमानों में क्यूटीवी और पीस टीवी जैसे चैनल लोकप्रिय हैं। पश्चिम एशिया में काम करने वाले मुसलमान वहां के मुसलमानों के बारे में जानकारियां अपने-अपने गांवों तक ले जा रहे हैं। इससे भी मुसलमानों, विशेषकर युवाओं, की सोच प्रभावित हो रही है। पिछले तीन दशकों से पिछड़े मुसलमानों ने इस्लाम के वैश्विक प्रतीकों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। तबलीगी जमात की गतिविधियों में पुरुषों और महिलाओं की सहभागिता बढी है। तबलीगी जमात की सोच, नियम-कायदों और व्यवहारगत मानदंडों ने एक नयी मुस्लिम पहचान को गढ़ा है। इलाके के मुसलमानों और हिन्दूओं दोनों में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है।

नए समूह

जाटों में उभरते नए मध्यम वर्ग की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने जाटों को विभाजित कर दिया है और ‘किसान’ के रूप में उनकी पहचान और राजनीति कमज़ोर पड़ी है। सन् 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय लोक दल की बुरी गत बनी और जाटों में एक नए राजनैतिक नेतृत्व का उदय हुआ। भाजपा के वर्चस्व वाला यह नेतृत्व, उन युवाओं की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो मुसलमानों को एक खतरे के रूप में देखते हैं। परन्तु कृषि संकट, बिजली की बढ़ती दरें, डीजल और खाद के दामों में बढोत्तरी और शक्कर मिलों द्वारा किसानों को समय पर गन्ने के दाम का भुगतान करने में असफलता के कारण हिंदू और मुसलमान – दोनों धर्मों के किसानों का जीना मुहाल हो गया है।

दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा गाजीपर आंदोलन स्थल पर आंदोलनरत किसान

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा बनाए गए कड़े गोवध-निषेध कानूनों ने रही सही कसर पूरी कर दी है। आवारा मवेशी फसलों को चट कर रहे हैं। कोविड महामारी ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। जाट किसानों को कृषि मजदूर नहीं मिल रहे हैं क्योंकि 2013 के दंगों के शिकार मुस्लिम शिल्पी और सेवा प्रदायक जातियों के सदस्य गांवों से पलायन कर गए हैं। किसानों को यह अहसास हो रहा है कि उन्हें एक होना ही होगा। यही कारण है कि जौला, विपिन बालियान और पूरन सिंह जैसे लोगों ने 2017 और 2018 में हिन्दू-मुस्लिम किसान पंचायतों का आयोजन किया। सन 2019 के चुनाव के ठीक पहले, राकेश टिकैत ने भाकियू के झंडे तले एक विशाल रैली का आयोजन किया और दिल्ली तक मार्च निकाला। इस रैली में हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के किसानों ने भाग लिया। 

केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों के कारण किसानों में यह डर बैठ गया है कि उनकी ज़मीनें उनके हाथ से खिसक सकतीं हैं। भाजपा से उनका मोहभंग हो गया है। बीते 27 जनवरी, 2021 की रात के घटनाक्रम से हिन्दू और मुस्लिम जाट किसानों के आत्मसम्मान को चोट पहुंची है और किसानों के गठबंधन के निर्माण की प्रक्रिया में तेजी आई है। वर्तमान किसान आंदोलन पुराने जख्मों को भर कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत समाज को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखता है। एक नई सुबह की लालिमा क्षितिज पर देखी जा सकती है। 

(यह लेख मूलतः अंग्रेजी में द हिन्दू समाचारपत्र के 13 फरवरी 2021 के अंक में प्रकाशित हुआ था। यहां इसे हम लेखक की अनुमति से अनुवाद प्रकाशित कर रहे हैं।)

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल) 


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