मध्य प्रदेश : आदिवासियों की पहचान मिटाने की साजिश

मध्य प्रदेश में एक बार फिर आदिम जाति कल्याण विभाग का नाम बदलकर जनजातीय कार्य विभाग कर दिया गया है। इससे वहां के आदिवासी बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। बता रहे हैं राजन कुमार

मध्य प्रदेश में सत्तासीन भाजपा सरकार ने “आदिम जाति कल्याण विभाग” का नाम बदलकर “जनजातीय कार्य विभाग” कर दिया गया है। सूबे के आदिवासी जनप्रतिनिधियों एवं बुद्धिजीवियों ने सरकार के इस कृत्य को आदिवासी समाज पर सांस्कृतिक हमला बताया है।

ध्यातव्य है कि बीते 15 नवंबर, 2020 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विभाग का नाम बदलने की घोषणा की थी। मुख्यमंत्री के इस फैसले का जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन समेत मध्य प्रदेश के अनेक आदिवासी संगठनों ने विरोध किया था। आदिवासी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद सरकार ने 20 जनवरी, 2021 को सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा आदिम जाति कल्याण विभाग का नाम बदलकर जनजातीय कार्य विभाग करने का एक आदेश जारी किया, जिसे 30 जनवरी 2021 को आदिवासी विकास आयुक्त ने एक अधिसूचना के द्वारा इसी नाम को भविष्य में समस्त शासकीय कार्यों में इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है।

विभाग का नाम बदलने की राजनीति

आदिम जाति कल्याण विभाग का नाम बदलने की राजनीति पुरानी है। पहले इस विभाग का नाम आदिवासी विकास विभाग था, जिसे पूर्व की शिवराज सरकार ने ही बदलकर जनजातीय कार्य विभाग कर दिया था तथा विभाग द्वारा संचालित समस्त आदिवासी छात्रावासों के नाम से आदिवासी शब्द हटाकर सीनियर-जूनियर छात्रावास कर दिया था। दिसंबर 2018 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनीं तो आदिवासी संगठनों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुरोध पर जनवरी 2019 में जनजातीय कार्य विभाग का नाम आदिम जाति कल्याण विभाग कर दिया गया। साथ ही, विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों के नाम में पुनः आदिवासी शब्द जोड़ दिया गया।

शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश

आदिवासियों पर सांस्कृतिक हमला आरएसएस-भाजपा का पुराना षड्यंत्र

आदिवासी शब्द दो शब्दों ‘आदि’ और ‘वासी’ से मिल कर बना है और इसका अर्थ मूल निवासी होता है। आदिवासियों के आदिम पहचान को खत्म करने के लिए आरएसएस लंबे समय से एक षड्यंत्र के तहत आदिवासियों को वनवासी कहता है। यहां तक कि विभागीय कार्यवाहियों एवं प्रेस-विज्ञप्तियों में भी अनेक बार आदिवासियों को वनवासी संबोधित किया जाता है।

आरएसएस के लोग तर्क देते हैं कि जिस तरह नगर में रहने वाले नगरवासी और ग्राम में रहने वाले ग्रामवासी कहे जाते हैं उसी तरह वनों में रहने वाले वनवासी कहे जाएंगे। जबकि आदिवासी बुद्धिजीवी इसे आरएसएस-भाजपा का आदिवासियों पर सांस्कृतिक हमला करार देते हैं। 

देश के आदिवासी क्षेत्रों में आरएसएस द्वारा एकल स्कूल वनवासी कल्याण आश्रम एवं वनवासी नाम से अनेक संगठन चलाए जा रहे हैं। आरएसएस इन एकल स्कूलों तथा संगठनों के माध्यम से आदिवासी बच्चों का हिन्दुकरण (जय श्रीराम का नारा तथा राम की देवता के रूप में स्थापना) करता है। वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना 1952 में की गई थी। इसका मुख्यालय जमशेदपुर (झारखंड) में है।

जनमंच के संयोजक एवं रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एस.आर. दारापुरी ने पिछले दिनों एक लेख में कहा था कि आरएसएस-भाजपा आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी (जंगल में रहने वाले) इसलिए कहता है क्योंकि इन्हें आदिवासी कहने से उन्हें स्वयं को आर्य और आदिवासियों को अनार्य (मूलनिवासी) मानने की बाध्यता खड़ी हो जाएगी। इससे आरएसएस के हिंदुत्व का मॉडल ध्वस्त हो जाएगा।

क्या कहते हैं आदिवासी बुद्धिजीवी

जयस के राष्ट्रीय संरक्षक एवं मध्य प्रदेश के मनावर से विधायक डॉ. हिरालाल अलावा कहते हैं कि आदिवासियों की ऐतिहासिक पहचान आदिवासी/आदिम शब्द को विभाग से ख़त्म करने वाली भाजपा कभी आदिवासियों का भला नहीं कर सकती है, यह बात जितनी जल्दी आदिवासी समुदाय समझ जाए अच्छा है। आदिवासी क्षेत्रों आदिवासियों की संस्कृति पर हमला करने का षड्यंत्र गैर-आदिवासी संगठनों द्वारा किया जा रहा है। इस षड्यंत्र का लगातार पर्दाफाश करने में जयस कार्यकर्ता लगे हुए हैं। 

जयस के संस्थापक व विधायक डा. हिरालाल अलावा

बताते चलें कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान डॉ. अलावा ने सरकार से प्रश्न पूछा था कि वनवासी शब्द का संविधान के किस अनुच्छेद या किस प्रचलित कानून में उल्लेख किया गया है? आदिवासियों या जनजातियों को राज्य में वनवासी संबोधित करने का क्या कारण है? ऐसा किस प्रावधान के अनुसार किया जा रहा है? उनके इस प्रश्न का मध्य प्रदेश सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है।

आदिवासी सेवा मंडल महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष चंद्रा सरवटे कहती हैं कि आदिम जाति कल्याण विभाग का नाम बदलना दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रदेश के सभी आदिवासियों को मिलकर आवाज उठाने की जरुरत है। यदि अभी आवाज नहीं उठाए तो आनेवाले समय में ये लोग आदिवासी समुदाय के पहचान एवं अधिकार के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे।

अजजा सेवानिवृत एम्पलाईज वेलफेयर, मध्य प्रदेश के सचिव आर.बी. वट्टी कहते हैं कि आदिम जाति कल्याण विभाग या आदिवासी विकास विभाग की जगह जनजातीय कार्य विभाग करने में एक बड़ा शाब्दिक दोष है। आदिम जाति कल्याण विभाग या आदिवासी विकास विभाग में आदिवासियों के कल्याण या विकास से संबंधित कार्यों का आभास होता है, जबकि जनजातीय कार्य विभाग में सामान्य रुप में जनजातियों के मामलों से संबंधित है, इसमें आदिवासियों के कल्याण या विकास जैसे शब्द नहीं है। चूंकि यह विभाग आदिवासियों तक कार्यान्वित विकास परियोजनाओं का अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने एवं देश की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि में हिस्सेदारी करने के उद्देश्य से बनाया गया है, ऐसे में इसका नाम आदिम जाति कल्याण विभाग या आदिवासी विकास विभाग ही रहना उचित होगा।

आदिवासी की परिभाषा एवं मान्यता

वर्ष 1931 की जनगणना के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों को ‘बहिर्वेशित’ और ‘आंशिक रूप से बहिर्वेशित’ क्षेत्रों में ‘पिछड़ी जनजातियों’ के रूप में जाना जाता है। संविधान में अनुसूचित जनजातियों की मान्यता के मानदंडों को परिभाषित नहीं किया गया है, इसलिये स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में 1931 की जनगणना में निहित परिभाषा का उपयोग किया गया। हालांकि संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के लिये प्रक्रिया निर्धारित करता है, जिसमें अनुच्छेद 342 के खंड (1) के तहत राष्ट्रपति अधिसूचना द्वारा अनुसूचित जनजाति घोषित करता है और 342 के खंड (2) के तहत संसद उसे प्रभावी करता है।

पहले पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग, 1953) ने अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित किया कि – “वे एक अलग अनन्य अस्तित्व रखते हैं और लोगों की मुख्य धारा में पूरी तरह से आत्मसात् नहीं किए गए हैं। वे किसी भी धर्म के हो सकते हैं।”

अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के मानदंड पर विचार करने के लिये भारत सरकार द्वारा 1965 में लोकूर समिति का गठन किया गया था। समिति ने उनकी पहचान के लिये पांच मानदंड सुझाए– आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और पिछड़ापन। 

अनुसूचित जनजातियों की श्रेणीकरण के लिए वर्तमान में जो कानून प्रचलित है वह लोकसभा प्रश्न संख्या 3171, दिनांक 06/08/2018 के अनुसार है–

“जनजातीय कार्य मंत्रालय भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति के रुप में समुदाय की अधिसूचना के लिए नोडल मंत्रालय है। भारत सरकार ने दिनांक 15/06/1999 (दिनांक 25/06/2002 को पुनः संशोधित) को अनुसूचित जनजातियों की सूचियों को निर्दिष्ट करने वाले आदेशों में समावेशन, से अपवर्जन तथा अन्य संशोधनों के लिए दावों का निर्धारण करने हुते प्रविधियां निर्धारित की है। इन प्रविधियों के अनुसार, केवल उन दावों पर विचार किया जाएगा जिन पर संबंधित राज्य सरकार/संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, भारत के महापंजीयक (आरजीआई) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा सहमति प्राप्त हुई है। जब भी मंत्रालय में किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र की अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी समुदाय के समावेशन, से अपवर्जन हेतु अभ्यावेदन प्राप्त होते हैं तब मंत्रालय उस अभ्यावेदन को संबंधित राज्य सरकार/संघ राज्यक्षेत्र को संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत आवश्यक सिफारिश के लिए अग्रेषित करता है। यदि संबंधित राज्य सरकार/संघ राज्यक्षेत्र प्रस्ताव की सिफारिश करते हैं तब उसे भारत के महापंजीयक (आरजीआई) को प्रेषित किया जाता है। आरजीआई यदि राज्य सरकार/संघ राज्यक्षेत्र की सिफारिश से संतुष्ट होते हैं तब वह उस प्रस्ताव की सिफारिश केंद्र सरकार को करते हैं। तत्पश्चात, सरकार राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को उनकी सिफारिश के लिए प्रस्ताव को संदर्भित करती है। यदि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी इस मामले की सिफारिश करता है तो मामले को मंत्रिमंडल के निर्णय के लिए संसाधित किया जाता है। तत्पश्चात, मामले को राष्ट्रपति के आदेश को संशोधित करने के लिए एक विधेयक के रुप में संसद के समक्ष रखा जाता है। समावेशन/अपवर्जन के लिए ऐसे मामाले को अस्वीकार कर दिया जाता है जिसका समर्थन राज्य सरकार या आरजीआई या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग नहीं करते हैं।”

हालांकि अक्सर ऐसा देखा गया है कि भारत के महापंजीयक एवं एनसीएसटी लोकूर समिति के मानदंडों के आधार पर ही अपनी सहमति या असहमति देते हैं।

वहीं दिसंबर 2016 में लोकुर समिति के मानदंडों के आधार पर ही आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्रालय ने झारखंड की तमाड़िया समुदाय को अनुसूचित जनजाति मानने से इनकार कर दिया। आदिवासी मंत्रालय के रजिस्ट्रार जनरल ने लोकूर समिति का हवाला देते हुए कहा था कि जनजाति में शामिल करने के लिए कुछ शर्तें तय हैं और तमाड़िया समुदाय उसमें फिट नहीं बैठता। वह आदिवासी की बजाय हिंदू संस्कृति के ज्यादा नजदीक है। उनकी पूजा पद्धति और कुछ परंपराएं हिंदू के ज्यादा नजदीक हैं। ऐसे में उसे आदिवासी नहीं माना जा सकता है।

लोकूर समिति के मानदंड से पिछड़े रह जाएंगे आदिवासी?

आदिवासी समुदाय संख्यात्मक रूप से एक अल्पसंख्यक समूह होने के बावजूद समूहों की विशाल विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं। आदिवासियों की अपनी विशिष्ट संस्कृति और इतिहास है। ‘जनजाति’ या आदिवासी के रुप में उनका श्रेणीकरण सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम को दर्शाता है, तो ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में श्रेणीकरण के राजनीतिक-प्रशासनिक निहितार्थ भी हैं।

सरकार की बहुद्देशीय परियोजनाओं के कारण आदिवासियों की अनचाहे विस्थापन हो या फिर बाहरी समुदायों के साथ तेजी से बढ़ते संपर्क, या फिर राजनीतिक दखल के कारण कुछ अन्य समुदायों को अनुसूचित जनजाति के श्रेणीकरण करने की मांग– इसके मद्देनजर अनेकों आदिवासी लोकूर समिति के मानदंडों को पूरा नहीं करते। 

लोकूर समिति कि सिफारिश आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति के रुप में राजनीतिक-प्रशासनिक लाभ के लिए बाहरी समुदायों एवं आधुनिकता से दूर रहने, पिछड़ा बने रहने की पहचान निर्धारित करती है।

बहरहाल, आरएसएस-भाजपा आदिवासियों को वनवासी घोषित करके उनके अस्तित्व को ही नकारने की कोशिश कर रहे हैं। यह केवल आदिवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश की विविधता के लिए भी खतरा है। आदिवासियों को इस चाल को समझना होगा तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान की रक्षा करनी होगी।

(संपादन : नवल)


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