राजनीति में आदिवासी महिलाएं : न जिम्मेदारी, न भागीदारी

आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 लोकसभा सीटों में से 20 लोकसभा सीटों पर आजादी के बाद से अबतक कोई आदिवासी महिला सांसद नहीं चुनी जा सकी हैं। भारत की पहली एकमात्र आदिवासी महिला सांसद बोनिली खोंगमेन रहीं, जो 1952 में असम के स्वायत्त जिला लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुई थीं। बता रहे हैं राजन कुमार

लैंगिक संतुलन बेहतर बनाने के लिए दुनिया भर में सभी कार्यक्षेत्रों में महिलाओं को अधिक से अधिक शामिल करने का आह्वान किया जा रहा है। महिलाओं के लिए कई तरह के आरक्षण और अन्य सुविधाएं भी दी जा रही हैं। भारत भी इसमें पीछे नहीं है, लेकिन भारत में ये नीतियां अन्य देशों की तरह अमल में नहीं लाई जाती  हैं। वस्तुत: भारत में आदिवासी समाज को विकास के अंतिम पायदान पर माना जाता है। भारत का आदिवासी समुदाय संख्यात्मक रूप से अल्पसंख्यक समूह होने के बावजूद समूहों की विशाल विविधता का प्रतिनिधित्व करता है। आदिवासी समुदाय के लिए 47 लोकसभा सीट देशभर में आरक्षित है, जबकि राज्यों में लगभग 556 से ज्यादा विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। लेकिन इन आरक्षित सीटों पर भी आदिवासी महिलाओं की भागीदारी कुछ खास नहीं है। कई राज्यों ने पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया है, इसके बावजूद भी पंचायत चुनावों में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। 

आदिवासी महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व : एक नजर

आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 लोकसभा सीटों में से 20 लोकसभा सीटों पर आजादी के बाद से अबतक कोई आदिवासी महिला सांसद नहीं चुनी जा सकी हैं। भारत की पहली एकमात्र आदिवासी महिला सांसद बोनिली खोंगमेन रहीं, जो 1952 में असम के स्वायत्त जिला लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुई थीं। 1952 के 10 साल बाद 1962 में मध्य प्रदेश के रतलाम से दिग्गज आदिवासी नेत्री जमुना देवी सांसद बनीं। 1967 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ सीट से रजनी देवी एवं मध्य प्रदेश के शहडोल से गिरिजा कुमारी सांसद बनीं। 13 साल बाद 1980 में रायगढ़ से पुष्पा देवी सांसद बनीं। पुष्पा देवी 1984 और 1991 में भी सांसद निर्वाचित हुईं। 1984 में दो (सुमति उरांव झारखंड के लोहरदग्गा से), 1989 में एक (सुमति उरांव), 1991 में तीन (पुष्पा देवी, फ्रिडा टोपनो ओड़िशा के सुंदरगढ़ से, विभा कुमारी देवी पूर्वी त्रिपुरा से), 1996 में दो (ओड़िशा के मयूरभंज से सुशीला तिरिया और सुंदरगढ़ से फ्रिडा टोपनो), 1998 में एक (किम गैंग्टे बाहरी मणिपुर सीट से), 1999 एक (हेमा गमांग ओड़िशा के कोरापुट सीट से), 2004 में एक (सुशीला केरकेट्टा झारखंड के खूंटी से),  2009 में पांच (प्रभाकिशोर ताविड, जे शांता, अगाथा संगमा, राजेश नंदिनी सिंह एवं ज्योति धुर्वे), 2014 में छह (कोथपल्ली गीता, सावित्री ठाकुर, ज्योति धुर्वे, डॉ. हिना विजयकुमार गावित, शकुंतला लागुरी और डॉ. उमा सोरेन) आदिवासी महिलाएं सासंद बनीं। वर्तमान की 17वीं लोकसभा में 12 आदिवासी महिलाएं सांसद हैं। 

मतदान के लिए कतार में खड़ी आदिवासी महिलाएं

मातृवंशीय राज्य के रूप में प्रसिद्ध मेघालय जो एक आदिवासी बहुल राज्य है, यहां भी आदिवासी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी नगण्य है। कुल 60 विधानसभा सीटों वाले मेघालय विधान सभा में 55 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में 60 सीटों के लिए कुल 370 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें मात्र 32 महिलाएं थीं। उक्त 32 महिला उम्मीदवारों में से मात्र 4 महिलाएं ही निर्वाचित हो सकीं। यह भी काबिल-ए-गौर है कि मेघालय में किसी भी विधानसभा चुनाव में चार से अधिक महिलाएं विधायक नहीं बन सकीं हैं। हालांकि 2013 के विधानसभा में पांच महिलाएं विधायक थीं, जिनमें से चार विधानसभा चुनाव में निर्वाचित हुई थीं, जबकि एक उप-चुनाव में। 2013 से पहले की बात करें तो 2008 के विधानसभा चुनाव में एक, 2003 और 1998 में तीन, 1993 में एक, 1988 में दो तथा 1972 में एक महिला विधायक बनीं। 1983 और 1978 के विधानसभा चुनाव में कोई भी महिला विधायक नहीं बनीं। 

आदिवासी महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व की समस्याएं

देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां महिला सशक्तिकरण का नारा देती हैं, लेकिन उन महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं देतीं, जो महिला सशक्तिकरण के लिए मुखर हैं।

झारखंड की दिग्गज सामाजिक-राजनीतिक आदिवासी महिला आंदोलनकर्मी दयामणि बारला कहती हैं कि “झारखंड में आदिवासी महिलाएं राजनीतिक रूप से काफी जागरूक हैं। यह आज से नहीं, बल्कि बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हो के समय से है। झारखंड का इतिहास उठाकर देखिये फूलो-झानों, सिनगी दई इत्यादि आदिवासी महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलनों में हिस्सा लिया। अलग राज्य झारखंड बनाने के लिए भी आदिवासी महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभाईं। आज भी झारखंड में आदिवासी महिलाएं अनेक आंदोलनों का नेतृत्व करती हैं और काफी मुखर हैं, लेकिन झारखंड में ऐसी महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा के लिए पार्टियां टिकट नहीं देती हैं। झारखंड में राजनीतिक लोगों ने आदिवासी महिलाओं के साथ न्याय नहीं किया है। झारखंड में जो भी महिलाएं लोकसभा या विधानसभा गई हैं, उनके पति, पिता या ससुर पहले से सांसद, विधायक और मंत्री रहे हैं।”

वहीं जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन के राष्ट्रीय संरक्षक एवं मध्य प्रदेश के विधायक डा. हिरालाल अलावा कहते हैं कि “हम चाहते हैं कि संगठन में 50 फीसद से भी अधिक महिलाएं नेतृत्व करें। लेकिन इसके लिए महिलाओं को ही आगे आना पड़ेगा। हमारे संगठन में आदिवासी महिला कार्यकर्ता बड़ी संख्या में जुड़ी हैं, लेकिन उन अधिकतर महिलाओं में यह विश्वास पैदा नहीं हुआ है कि वे नेतृत्व करें। वे नेतृत्व के लिए आगे आएं, इसके लिए हम लगातार प्रयासरत हैं।” 

यह भी एक सच्चाई है कि आदिवासी राजनीति में प्रतिनिधित्व करते अधिकतर वे ही महिलाएं दिखती हैं, जो किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से रही हैं। वर्तमान में मध्य प्रदेश से एकमात्र महिला सांसद हिमाद्री सिंह हैं। हिमाद्री सिंह शहडोल संसदीय सीट से भाजपा की सांसद हैं। हिमाद्री सिंह पूर्व केंद्रीय मंत्री दलबीर सिंह और शहडोल से ही पूर्व सांसद राजेश नंदिनी सिंह की बेटी हैं।

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मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में सक्रिय अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मोनिका बट्टी कहती हैं कि “अधिकतर महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं, जिससे इनमें राजनीतिक जागरूकता की कमी है। ऐसे लोगों की भी कमी है जो इन्हें राजनीतिक रूप से जागरूक करें। राजनीति तो बहुत आगे की बात है, आदिवासी महिलाएं तो शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में पीछे हैं। आदिवासी महिलाएं घरेलू काम एवं जिम्मेदारियों के निर्वाह में व्यस्त रह जाती हैं। घर-गृहस्थी चलाने में, वनोत्पाद चुनने से लेकर खेती करने या फिर बाल-बच्चों की परवरिश करने में आदिवासी महिलाओं की भूमिका सबसे ज्यादा है। लेकिन वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पैमाने पर काफी पीछे हैं।” 

आदिवासी समाज और वहां के महिलाओं के मसलों पर मुखर रहने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में प्राध्यापक नीतिशा खलखो ने पिछले दिनों एक लेख में उन्होंने कहा कि अदिवासी स्त्री के मन में कुछ ऐसा है जो खदबदा रहा है और उसका हल ढूंढा जाना नितांत आवश्यक है। आदिवासी पुरुषों और स्त्रियों दोनों को एक मंच पर आकर खुलकर संवाद करने की जरूरत है। विश्व इतिहास में महिलाओं कि दुर्गति के विभिन्न कारणों और उनके साथ हुए अन्यायों को न्याय में परिवर्तित करने का समय आ गया है। भारत के आदिवासी समाज को इस परिवर्तन का अगुवा बनना चाहिए। 

कैसे बढ़े राजनीतिक प्रतिनिधित्व 

दयामणि बारला का मानना है कि राजनीति में महिला प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए लोकसभा-विधानसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करनी चाहिए एवं महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों में से आदिवासी-दलित महिलाओं के लिए अलग से लोकसभा-विधानसभा की सीटें आरक्षित की जानी चाहिए। उनका मानना है कि आदिवासी महिलाएं अन्य समाजों की अपेक्षा काफी स्वतंत्र हैं, लेकिन वे भी अपने पारंपरिक व्यवस्था में हाशिए पर हैं। सामाजिक रूप से लिए जानेवाले फैसलों में आदिवासी महिलाओं की भूमिका कम रहती है। संपत्ति के अधिकार से भी ये वंचित रहती हैं।

मोनिका बट्टी दयामणि बारला के विचारों से सहमति जताती हैं। उनका मानना है कि आदिवासी महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने के लिए जरूरी है राजनीतिक पार्टियां संसद से लेकर पंचायत स्तर तक उनकी भागीदारी बढाएं। 

आदिवासी महिलाएं जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेह हैं

यह सामान्य तौर पर स्वीकार्य है कि परंपरागत ग्राम-सभाओं में आदिवासी महिलाओं की भूमिका नगण्य रहती है। चूंकि आदिवासी समाज लोकतांत्रिक पद्धति का पुरोधा माना जाता है, ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि आदिवासी समाज अपनी महिलाओं को ऐसे सामाजिक फैसलों में नजरअंदाज कर लोकतांत्रिक प्रणाली को विकसित कैसे करेगा। अन्य समाजों के अनुरुप आदिवासी समाज को भी जरुरत है महिला सशक्तीकरण और महिलाओं की सामुदायिक भागीदारी के लिए प्रयास करे, ताकि उनमें आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता आदि गुणों का विकास हो। 

मध्य प्रदेश के जोबट विधानसभा क्षेत्र से विधायक सुश्री कलावती भूरिया कहती हैं कि “अनेक आदिवासी महिलाएं पंचायतों में सरपंच हैं, लेकिन विधानसभा और लोकसभा में जाने के लिए घर से निकलकर बाहर नेतृत्व करना पड़ेगा। आदिवासी महिलाओं को जवाबदारी मिले तो  पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ राजनीति में भी प्रतिनिधित्व कर सकती हैं। आदिवासी समाज अपनी महिलाओं को जवाबदारी दे और पार्टी-स्तर पर भी इस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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