महाड सत्याग्रह : सवाल पानी नहीं, मानवाधिकारों की स्थापना का था

20 मार्च, 1927 को महाड़ के चावदार तालाब में डॉ. आंबेडकर के पानी पीने के बाद दलितों ने भी पानी पीकर अपना अधिकार स्थापित किया। लेकिन इसके बाद सवर्णों ने साजिश के तहत हमला बोला। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने धैर्य बनाए रखा। वे चाहते थे कि महाड़ सत्याग्रह एक उदाहरण बने

‘डॉ. आंबेडकर : लाइफ एंड मिशन’ का अंश जो बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय, हिंदी संस्करण, खंड 35 के (पृष्ठ 3-8) में अनुवादित और पुनर्प्रकाशित है 

आत्माभिमान का सूरज आसमान में चमकने लगा है और दमन के बादल छंट रहे हैं। दमित वर्गों ने हिम्मत दिखानी शुरू कर दी है। अब हम डॉ. बी.आर. आंबेडकर के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना पर आते हैं। यह घटना थी महाड की ओर कूच। इस घटना की पृष्ठभूमि में था बंबई विधान परिषद् में एस.के. बोले द्वारा प्रस्तुत एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव, जिसे बंबई सरकार ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी थी। बोले द्वारा प्रस्तुत संकल्प को 1923 में पारित किया गया था और कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ 1929 में उसकी पुष्टि की गई थी। संकल्प के अनुपालन में महाड नगरपालिका ने महाड तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया था। परन्तु यह निर्णय केवल कागजों तक सीमित था क्योंकि सवर्ण हिंदुओं के कड़े विरोध के चलते अछूत अपने इस अधिकार का प्रयोग नहीं कर पा रहे थे। अतः कोलाबा जिले के दमित वर्गों के लोगों ने यह तय किया कि वे 19-20 मार्च 1927 को महाड में एक सम्मेलन का आयोजन करेंगे। सम्मेलन के आयोजकों ने इस कार्यक्रम की तिथियों की सूचना उसके पिछले महीने के पहले सप्ताह में डॉ. आंबेडकर को दे दी थी। सुरेन्द्रनाथ टिपणिस, सूबेदार सावरकर और अनंतराव चित्रे ने काफी लगन से सम्मेलन की तैयारियां की। सम्मेलन के दो महीने पहले से कार्यकर्ताओं और नेताओं ने आसपास के पहाड़ों और घाटियों की खाक छानते हुए दमित वर्गों को इस सम्मेलन के महत्व से परिचित करवाया। नतीजे में पंद्रह साल की उम्र के लड़कों से लेकर सत्तर साल के वृद्ध तक खाने की पोटलियां अपने कंधों पर टांगे सौ मील से भी अधिक की दूरी पैदल तय कर महाड पहुंच गए। महाराष्ट्र और गुजरात के लगभग सभी जिलों से दमित वर्गों के करीब दस हज़ार प्रतिनिधि, कार्यकर्ता और नेता महाड सम्मेलन में भागीदारी करने उपस्थित हुए। सम्मेलन को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास किये गए, हर संभव सुविधा जुटाई गई और हर चीज़ का ध्यान रखा गया। सम्मेलन में आए लोगों के लिए सवर्ण हिंदुओं से चालीस रुपये का पानी भी खरीदा गया क्योंकि सम्मेलन स्थल पर अछूतों के लिए पानी उपलब्ध नहीं था। 

डॉ आंबेडकर अर्धनग्न, व्यग्र व उत्सुक पुरुषों और महिलाओं को संबोधित करने उठे। उन्होंने अपनी बात छोटे और सरल परंतु ओजस्वी वाक्यों में कहनी शुरू की। 

उनकी आवाज़ में एक अजीब से उत्तेजना थी। उन्होंने सबसे पहले दापोली, जहां से उनकी शिक्षा की शुरुआत हुई थी, का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर हमारा बचपन बीतता है वह हमारे लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रहता है और अगर वह स्थान प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर हो तो उसके प्रति हमारा आकर्षण और बढ़ जाता है। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि “एक समय था जब हम, जिन्हें आज अछूत कह कर नीची निगाहों से देखा जाता है, अगड़े वर्गों की तुलना में बहुत उन्नत थे और शिक्षा के क्षेत्र में उनसे बहुत आगे थे। उन दिनों देश का यह हिस्सा हमारे लोगों के कार्यों और प्रभाव से स्पंदित था।”

फिर उन्होंने अपने लोगों को अत्यंत गंभीरता और उत्साह से जो संदेश दिया, उसने महाराष्ट्र के गांवों, पहाड़ों और घाटियों को गुंजायमान कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे लोगों के पराभव का एक कारण है सैन्य सेवाओं से हमारा दूर हो जाना। “सेना हमें अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने और सैन्य अधिकारी बतौर अपनी योग्यता, प्रज्ञा, साहस और कुशाग्रता साबित करने के अद्वितीय अवसर उपलब्ध उपलब्ध करवाती थी। उन दिनों अछूत भी सैनिक स्कूलों के प्रधानाध्यापक हो सकते थे और सैन्य कैम्पों में प्रदान की जाने वाली अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अत्यंत प्रभावी और समग्र थी।” अंग्रेजों द्वारा उन अछूतों के लिए सेना के दरवाज़े बंद करना, जिन्होंने उस समय भारतीय साम्राज्य की स्थापना में उनकी मदद की थी, जब वहां की सरकार नेपोलियन के साथ युद्धों में फ्रांसीसियों के चंगुल में फंसी हुई थी, घोर विश्वासघात और धोखा है।” 

महाड़ सत्याग्रह का शैल चित्र जिसमें डॉ. आंबेडकर को चावदार तालाब से पानी पीते दिखाया गया है

इसके बाद, उन्होंने अत्यंत प्रेरक शब्दों में कहा, “हम तब तक अपनी स्थाई उन्नति की उम्मीद नहीं कर सकते जब तक कि हम अपने शुद्धिकरण की तिहरी प्रक्रिया से नहीं गुज़र जाते। हमें अपने आचरण में सुधार करना चाहिए। हमें अपनी बात कहने के तरीके को बेहतर बनाना चाहिए और अपनी मानसिकता को बदलना चाहिए। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप इसी क्षण यह प्रतिज्ञा करें कि आप मृत पशुओं का सड़ा-गला मांस नहीं खाएंगे। अब समय आ गया है कि हम अपने मन से ऊंच-नीच का विचार निकाल फेंकें। आप यह संकल्प करें कि आप फेंके हुए टुकड़े नहीं खाएंगे। हमारी आत्मोन्नति तभी होगी जब हम स्वावलंबी होंगे। अपना आत्मसम्मान पुनः अर्जित कर लेंगे और आत्माज्ञान प्राप्त कर लेंगे।” उन्होंने अपने लोगों से यह आग्रह भी किया कि वे थलसेना, नौसेना और पुलिस में उनकी नियुक्ति पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आंदोलन करें तथा उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षा का महत्व समझाया। 

महारों के प्रश्न पर उन्होंने उनमें आत्मसम्मान के भाव को बढ़ावा देने के लिए कहा कि रोटी के चंद टुकड़ों के बदले अपने मानवाधिकार बेचना नितांत अपमानजनक है। उन्होंने ज़ोरदार अपील की कि वे उनका अपमान करने वाली और उन्हें गुलाम बनाने वाली परंपराओं को त्याग दें और अपने-अपने वतनों को छोड़ कर वनभूमि पर कृषि कार्य करने का उपक्रम करें। अंत में, उन्होंने हृदयस्पर्शी स्वर में कहा, “यदि माता-पिता अपने बच्चों को अपने से बेहतर स्थिति में देखना नहीं चाहेंगे तो उनमें और पशुओं में कोई अंतर नहीं रहेगा।”

सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण विषयों पर प्रस्ताव पारित किए गए। एक संकल्प के जरिए सम्मेलन ने सवर्ण हिंदुओं से यह अपील की कि वे नागरिक अधिकार पाने में अछूतों की मदद करें। उन्हें नौकरियां दें। अछूत विद्यार्थियों के लिए भोजन की व्यवस्था करें और अपने मृत पशुओं को स्वयं ठिकाने लगाएं। एक अन्य प्रस्ताव द्वारा, सम्मेलन ने सरकार से अपील की कि वह विशेष कानून बनाकर अछूतों द्वारा मृत पशुओं के मांस के सेवन को प्रतिबंधित करे, शराबबंदी करे, उन्हें अनिवार्य और निशुल्क प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करवाए, दमित वर्गों के छात्रावासों के लिए सहायता प्रदान करे, ‘बोले संकल्प’ को वास्तविक अर्थों में लागू करने के लिए स्थानीय संस्थाओं को निर्देश थे और यदि ज़रूरी हो तो इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 लागू करे।

सम्मेलन के पहले दिन सवर्ण हिंदुओं के कुछ प्रवक्ताओं, जिनमें स्थानीय और बाहरी दोनों लोग शामिल थे, ने सम्मेलन में दमित वर्गों के अधिकारों को औचित्यपूर्ण ठहरते हुए भाषण दिए और उनकी सहायता करने का वचन दिया। सम्मेलन की विषय समिति ने उसी रात अपनी बैठक में उच्च वर्गों के उन नेताओं, जिन्होंने सम्मेलन में भाग लिया था, के विचारों पर संज्ञान लेते हुए यह तय किया कि सम्मेलन में शामिल सभी लोग एक साथ चावदार तालाब जाएं और उससे पानी लेने के दमित वर्गों के अधिकार की उद्घोषणा करें। अगली सुबह, सम्मेलन ने दो सवर्ण हिंदू प्रवक्ताओं से अनुरोध किया कि वे सवर्ण हिंदुओं के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से संबंधित प्रस्ताव का समर्थन करें। दोनों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, सिवा उस हिस्से के जिसमें अंतरजातीय विवाहों की बात कही गई थी। 

महाड नगरपालिका, जिसने वर्ष 1924 में अपने तालाब दमित वर्गों के लिए खोल दिते थे, के प्रस्ताव के अनुरूप यह निश्चय किया गया कि तालाब से पानी लेकर अछूतों के अधिकार को स्थापित किया जाय। तदानुसार, सम्मेलन के प्रतिनिधिगण एक साथ शांतिपूर्वक चावदार तालाब की ओर बढे ताकि तालाब से पानी लेने के उनके अधिकार को स्थापित किया जा सके। एक ऐतिहासिक घटना, जिसका फलक विशाल और परिणाम दूरगामी थे, घटने जा रही थी। दासता-विरोधी, जाति-विरोधी और पुरोहित-विरोधी डॉ. आंबेडकर, जो कि अछूत हिंदुओं की जागृत आत्मा का प्रतिनिधित्व करते थे, उस तालाब की ओर जा रहे थे, जिससे तथाकथित स्पृश्य हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमान और ईसाई पानी भी लेते थे, परंतु जिससे अछूत हिंदुओं, जो कि हिंदू देवताओं की पूजा करते थे, जो युगों से हिंदू धर्म को मानते रहे थे, को उनके गले प्यास से सूखे रहने पर भी एक बूंद पानी नहीं लेने दिया जाता था।

इस प्रकार, अस्पृश्य लोग अपने इतिहास में पहली बार अपने ही एक बड़े नेता के नेतृत्व में अपने अधिकारों को स्थापित करने हेतु मार्च कर रहे थे। उन सबने भरपूर अनुशासन, ऊर्जा और उत्साह दिखाया। यह मार्च महाड की गलियों से गुजरता हुआ चावदार तालाब पर समाप्त हुआ। डॉ. आंबेडकर स्वयं तालाब के किनारे खड़े थे। वे शिक्षितों में शिक्षित,  पृथ्वी पर किसी भी विद्वान आदमी के समकक्ष और उच्च आकांक्षाओं वाले हिंदू थे। फिर भी वे सार्वजनिक जल स्रोत से पानी नहीं ले सकते थे। अपनी जन्मभूमि और पुण्यभूमि हिन्दुस्तान में किसी भी सार्वजनिक पुस्तकालय में पढ़ नहीं सकते थे। वह आदमी अब अत्याचारियों के अहंकार को चुनौती दे रहा था, उन लोगों की नीचता की पोल खोल रहा था, जो यह शेखी बघारते थे कि उनका धर्म जानवरों से भी सहृदयता से व्यवहार करता है, परंतु जो अपने ही सहधर्मियों से बिल्लियों और कुत्तों से भी बुरा व्यवहार करते थे।

डॉ. आंबेड़कर ने तालाब से पानी लिया और उसे पी लिया। लोगों की बहुत बड़ी भीड़ ने उनका अनुसरण किया और अपने अधिकार को स्थापित किया। तत्पश्चात जुलूस शांतिपूर्वक पंडाल में लौट आया। 

इस घटना के दो घंटे बाद कुछ शठबुद्धि सवर्ण हिंदुओं ने झूठी अफवाह फैला दी कि अछूत वीरेश्वर मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं। इस पर असामाजिक तत्वों की एक बड़ी भीड़ डंडे लिए गलियों के नुक्कड़ों पर एकत्र हो गई। संपूर्ण रूढ़िवादी महाड उठ खड़ा हुआ और वह क़स्बा उपद्रवी लोगों की भीड़ बन गया। उनका कहना था कि उनका धर्म खतरे में है। इससे भी विलक्षण यह कि वे मानते थे कि उनके भगवान के भी अपवित्र हो जाने का खतरा है। इस अपमानजनक चुनौती से उनके दिल कांप रहे थे, उनके हाथ फड़फ़ड़ा रहे थे और उनके चेहरे क्रोध से तमतमाये हुए थे।

उनके धर्म का अपमान हुआ है, इस गलत विचार से और वीरेश्वर मंदिर को अपवित्र किए जाने की आशंका से ग्रस्त क्रुद्ध सवर्ण हिंदूदमित वर्ग सम्मेलन के पंडाल में घुस गए। उस समय बहुत से प्रतिनिधि छोटे-छोटे समूहों में शहर में घूम रहे थे। कुछ अपना सामान बांध रहे थे और कुछ अपने गांवों के लिए निकलने से पहले खाना खा रहे थे। अधिकांश प्रतिनिधि कस्बे को छोड़ चुके थे। उपद्रवी पंडाल में उपस्थित प्रतिनिधियों पर झपट पड़े, उनके खाने को मिट्टी में मिला दिया, उनके बर्तनों को तोड़ डाला और कुछ प्रतिनिधियों की बुरी तरह पिटाई कर दी। वहां मौजूद लोगों को समझ में ही नहीं आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।  पंडाल में अफरातफरी मच गई। रूढ़िवादी अपनी अंतरात्मा तो खो ही चुके थे। अब वे अपने होश खोने के लक्षण दिखाने लगे थे।

अछूत बच्चे, महिलाएं और प्रतिनिधि, जो महाड की गलियों में चहलकदमी कर रहे थे, इस घटनाक्रम से घबरा गए। उनमें से कुछ को पीटा गया। उन्हें भागकर मुसलमानों के घरों में शरण लेनी पड़ी। स्थानीय मामलातदार और पुलिस निरीक्षक, जो उपद्रवियों को रोकने में असफल रहे थे, शाम के चार बजे ट्रैवलर्स बंग्लो पहुंचे जहां डॉ. आंबेडकर और उनका दल ठहरा हुआ था। डॉ. आंबेडकर ने अधिकारियों से कहा कि “आप अन्य लोगों को नियंत्रित कीजिए, मैं अपने लोगों को नियंत्रित करूंगा।” और वे अपने दो या तीन साथियों के साथ शीघ्रता से घटनास्थल पर गए। गली में उपद्रवियों के एक समूह ने उन्हें घेर लिया। परंतु उन्होंने बिना आपा खोये उन्हें शांत करने की कोशिश की और कहा कि मंदिर में प्रवेश करने की न तो उनकी इच्छा है और ना ही कोई योजना। वे आगे गए और स्थिति को स्वयं देखा और बंगले में वापस चले गए। तब तक अछूतों में से लगभग बीस व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। एक डाक्टर को बुलवाया गया।। उन्होंने घायलों के ‘असामयिक दुस्साहस’ के लिए उनका मखौल बनाया और फिर उनके घावों पर मरहम-पट्टी की।

तत्पश्चात, उपद्रवियों ने मुख्य गलियों की गश्त लगानी शुरू कर दी और वे दमित वर्गों के उन सदस्यों पर हमले करने लगे जो छोटी-छोटी टोलियों में अपने गांवों को जा रहे थे। परंतु उनके व्यवहार का सर्वाधिक निंदनीय पहलू यह था कि उन्होंने अपने गुर्गों को संदेश भेजे कि वे अपने-अपने गांवों में सम्मेलन के प्रतिनिधियों को दंडित करें। इस आदेश के पालन में अनेक महार स्त्री-पुरुषों पर उनके अपने गांवों में पहुंचने से पहले या बाद में हमले किए गए।

इसी बीच, प्रतिनिधियों पर इस क्रूर हमले की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। जब डॉ. आंबेडकर बंगले पर लौटे तो उन्होंने लगभग एक सौ लोगों को उनके निर्देश का अधीरता से इंतजार करते पाया। उन लोगों की आंखों में शोले भड़क रहे थे और उनके हाथ प्रतिशोध लेने के लिए फड़क रहे थे। परन्तु उनके नेता ने उनसे शांति और अनुशासन बनाये रखने का अनुरोध किया। कुछ देर तक निस्तब्ध चुप्पी पसरी रही। डॉ. आंबेडकर के एक ही भड़काऊ शब्द से महाड में खून-खराबा और तोड़फोड़ हो जाती। कस्बे, पंडाल और बंगले में ठहरे हुए प्रतिनिधियों की कुल संख्या अब भी गुंडों से अधिक थी और वे गुंडों की खोपड़ियां फोड़ देते। अछूतों में सैकड़ों ऐसे आदमी थे जो प्रथम विश्वयुद्ध में विभिन्न क्षेत्रों में लड़ाईयां देख चुके थे और लड़ भी चुके थे।

परंतु उनके नेता के आदेश पर उन्होंने शानदार अनुशासन बनाए रखा। वे हमलावरों से नाराज़ थे परंतु उनका संघर्ष अहिंसक और संवैधानिक था। उन्होंने कानून तोड़ने की कल्पना तक नहीं की। इस प्रकार दंगा थम गया। शाम होने पर सभी प्रतिनिधि अपने-अपने गांवों को चले गए। डॉ. आंबेडकर ने अपने समर्थक अनंतराव चित्रे सहित बंगला छोड़ दिया क्योंकि उस शाम से वह एक सरकारी अधिकारी के नाम पर आरक्षित था। वे पुलिस स्टेशन के कमरों में रहे। उन्होंने दंगे की जांच पूरी की और 23 मार्च को बंबई वापस चले गए।

पुलिस हिंसा समाप्त होने के बाद घटनास्थल पर पहुंची। उसने कुछ रूढ़िवादी दंगाईयों को गिरफ्तार किया। रूढ़िवादी हिंदू नायकों में से पांच, जिन्होंने सबसे ज्यादा बहादुरी दिखाई थी, को 6 जून, 1927 को जिला दंडाधिकारी द्वारा चार माह के कठोर कारावास की सजा दी गई। डॉ. आंबेडकर ने बाद में यह बिल्कुल वाजिब टिप्पणी की कि यदि जिले के मुख्य अधिकारी गैर-हिंदू न होते तो अछूतों के साथ निष्पक्ष न्याय नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि अगर इस समय पेशवा का शासन होता तो उन्हें हाथियों के पैरों तले कुचल कर मार दिया जाता। पेशवा के शासनकाल में अछूतों को दिन के कुछ घंटों में पूना शहर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी और जिस समय दी जाती थी तब उन्हें थूकने के लिए अपने गर्दनों में मिट्टी के बर्तन लटकाए शहर में जाना पड़ता था।  

(संपादन: अमरीश हरदेनिया / नवल)


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