ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलित-बहुजनों को एकजुट करने वाली किताब

खासतौर पर मुझे लगता है कि मंडल राजनीति की जड़ें बहुजनों के ब्राह्मणवाद-विरोध की परंपरा तक गयी ही नहीं। यही मुझे ठोस वजह लगती है, जिसके कारण मंडल आंदोलन के जरिए हिंदुत्व का मुकाबला नहीं किया जा सका। बता रहे हैं रिंकू यादव

[बीते 28 फरवरी, 2021 को फारवर्ड प्रेस के तत्वावधान में हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “हिंदू धर्म की पहेलियां : बहुजनो! ब्राह्मणवाद का सच जानो” का ऑनलाइन विमोचन व एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का विषय था – “हिंदी प्रदेशों में ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ का महत्व”। इसकी अध्यक्षता प्रो. कांचा आइलैया शेपर्ड ने की। इस परिचर्चा में प्रो. कालीचरण स्नेही, प्रो. बिलक्षण रविदास, प्रो. चंद्रभूषण गुप्त, अलख निरंजन, शिवचंद्र राम व रिंकू यादव ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का संचालन फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक अनिल वर्गीज तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तक के संकलक, संपादक और संदर्भ टिप्पणीकार डॉ. सिद्धार्थ ने किया। प्रस्तुत है इस कार्यक्रम में रिंकू यादव के संबोधन का संपादित अंश :] 

परिचर्चा : हिंदी प्रदेशों में ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ का महत्व

वर्ष 1990 में जब हमलोग होश संभाल रहे थे, उसी समय ब्राह्मणवादी शक्तियों ने राम मंदिर निर्माण की मुहिम शुरू कर दी थी। फिर हमने बाबरी मस्जिद का विध्वंस भी देखा। उसी समय बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के प्रयासों से मंडल राजनीति आगे बढ़ रही थी। आज जब किसानों ने दिल्ली को घेर कर रखा है तो उसी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए घर-घर चंदा उगाही के लिए ब्राह्मणवादियों ने अभियान चला रखा है। 

यह राम मंदिर कोई सामान्य मंदिर नहीं होगा, दरअसल हमारे समय में ब्राह्मणवादियों के वर्चस्व की पुनर्स्थापना का भव्य प्रतीक होगा। आज जब हिंदू राज्य की पुनर्स्थापना का जो प्रयास जोर-शोर से किया जा रहा हैं, उसकी आशंका डॉ. आंबेडकर ने पहले ही भांप ली थी। आज उनकी आशंकाएं हकीकत में तब्दील होती दिख रही हैं। ऐसे दौर में “हिंदू धर्म की पहेलियां” किताब का प्रकाशन महत्वपूर्ण है। इस किताब की सबसे आखिरी ‘राम कृष्ण की पहेली’ के संदर्भ में पुस्तक के संपादक, संकलक व टिप्पणीकार डॉ. सिद्धार्थ ने कहा है कि राम बहुजनों पर द्विजों का वर्चस्व स्थापित करने का उपकरण है। लंबे समय से राम को घर-घर पहुंचाया गया। 

फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक का आवरण व सामाजिक कार्यकर्ता रिंकू यादव की तस्वीर

हमें याद है कि बचपन में दूरदर्शन पर रामानंद सागर की ‘रामायण’ धारावाहिक का प्रसारण हुआ करता था और इस तरह हमने देखा कि घर-घर राम पहुंचाए गये। यह मुहिम पहले से चल रही थी। लंबे समय से राम ब्राह्मणवादियों का सबसे प्यारा नायक रहा है। एक बार फिर इस नायक के जरिए ब्राह्मण शक्तियां अपने आपको पुनगर्ठित कर चुकी हैं। ऐसे दौर में इस किताब और अधिक प्रासंगिक हो गई है। आज हम ऐसे दौर में हैं जब हमें कोई रास्ता सूझ नहीं रहा है कि कैसे हिंदुत्व से मुकाबला किया जाए, कैसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी जाय, तब ऐसे समय में इस किताब की भूमिका अहम हो जाती है। एक समय ऐसा लग रहा था कि दलित-मंडल राजनीति ब्राह्मणवादी शक्तियों को परास्त कर देगी, लेकिन यह गठजोड़ भी खंड-खंड होकर पाखंड का शिकार हो गई। एक प्रकार से उनकी निर्णायक हार अब हो चुकी है। 

आज यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि अगर ब्राह्मणवादी शक्तियों से मुकाबला करना है तो ‘जय श्रीराम’ के नारे का मुकाबला ‘हे राम’ से या जनेऊ दिखाकर नहीं हो सकता। बहुत सारे लोग हिंदू धर्म के अंदर उदारवादी, प्रगतिशील परंपरा की तलाश करते हैं। वे सोचते हैं कि हम उनके भीतर से ही हिंदुत्व के आक्रमण का मुकाबला कर लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं होने वाला है। ये सारे लोग आज विफल साबित हुए हैं। 

यह भी हम देखते हैं कि हमारे समाज के प्रगतिशील एवं उदारवादी बुद्धिजीवी भी राम की व्याख्या अलग तरीके से करते हैं। उनकी ये व्याख्यायें राम को नायक के रूप में स्थापित करती दिखती हैं। हिंदुत्व का मुकाबला आंबेडकर के विचारों से ही संभव है। इसलिए डॉ. आंबेडकर की यह किताब हिंदुत्व का मुकाबला करने के लिए जरूरी औजार के रूप में काम करेगी। इसलिए फारवर्ड प्रेस, अनुवादक अमरीश हरदेनिया, डॉ. सिद्धार्थ और कांचा इलैया शेपर्ड ने इस किताब को सामने लाने में जो काम किया है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण काम है। 

आज हम देखते हैं कि किसान आंदोलन ने भी डॉ. आंबेडकर का छायाचित्र घर-घर लगाने का आह्वान किया है। पिछले वर्ष सीएए के विरोध में हुए आंदोलन में भी हमने देखा कि डॉ. आंबेडकर के छायाचित्र संघर्ष के प्रतीक में रहे। वर्ष 2014 के बाद पहली बार देखा जा रहा है कि हिंदुत्व को आधार बनाकर आक्रमण तेज हुआ है और आंबेडकर लड़ाई के मैदान में आए और उन पर बातचीत भी शुरू हुई। लेकिन तब डॉ. आंबेडकर का पाठ नहीं हुआ। वामपंथी और उदारवादी शक्तियों ने आंबेडकर के छायाचित्र को जगह दी है, उनके उद्धरण को वे समय-समय पर इस्तेमाल करते रहते हैं, लेकिन आंबेडकर के विचारों को लेकर हिंदुत्व का मुकाबला करने के लिए वे तैयार नहीं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि आंबेडरकर केवल छायाचित्र एवं मूर्तियों तक सीमित नहीं रख दिए जाएं, उद्धरणों तक सीमित नहीं रह जाएं। अगर हिंदुत्व का सामना करना है, तो उनके समतामूलक समाज संबंधी विचारों को लोगों के बीच ले जाना होगा, क्योंकि हिंदू मानसिकता के साथ, हिंदुत्व का मुकाबला करना संभव नहीं है। जैसाकि मैंने मंडल राजनीति और पिछड़ों के आंदोलन का जिक्र किया था, वह कैसे आगे बढ़ा था, जिससे आज भी लोग उम्मीद रखे हुए हैं। लेकिन आज हम देखते हैं कि वे पूरी तरह से विफल साबित हुए हैं। खासतौर पर मुझे लगता है कि मंडल राजनीति की जड़ें बहुजनों के ब्राह्मणवाद-विरोध की परंपरा तक गयी ही नहीं। यही मुझे ठोस वजह लगती है, जिसके कारण मंडल आंदोलन के जरिए हिंदुत्व का मुकाबला नहीं किया जा सका। 

अब एक बार फिर से दलित-बहुजन का हिंदुत्व के खिलाफ जिस तरीके से आंदोलन खड़ा हो रहा है, उससे पिछड़ों के अंदर बेचैनी साफ-साफ देखी जा सकती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसे समय में यह पुस्तक हिंदुत्व से मुकाबला के लिए औजार का काम करेगी और पूरा हिंदी पट्टी को बदल देने का कार्य करेगी।

पुस्तक : हिंदू धर्म की पहेलियां : बहुजनो! ब्राह्मणवाद का सच जानो

लेखक : डॉ. भीमराव आंबेडकर

संकलन, संपादन, संदर्भ टिप्पणीकार : डॉ. सिद्धार्थ

अनुवादक : अमरीश हरदेनिया

प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली

मूल्य : 200 रुपए (अजिल्द), 400 रुपए (सजिल्द)

(संपादन : इमामुद्दीन/नवल)


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